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Published on Jan 13, 2026 Updated 2 Days ago

अफगान-पाक संकट मध्य एशिया की रणनीति बदल रहा है. देश सुरक्षा और व्यापार में वैकल्पिक रास्ते अपना रहे हैं. इससे क्षेत्र अब वैश्विक भू-राजनीति में ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.

मध्य एशिया: अफगान-पाक संकट का प्रभाव

अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच बढ़ता टकराव आज मध्य और दक्षिण एशिया को प्रभावित करने वाले सबसे गंभीर भू-राजनीतिक झटकों में से एक बन गया है. तालिबान और पाकिस्तानी बलों के बीच होने वाली कभी-कभार की झड़पें अब हवाई हमलों, ड्रोन हमलों, सीमा बंदी और राजनीतिक तनाव से जुड़े एक लगातार सुरक्षा संकट में बदल चुकी हैं. मध्य एशिया अब इस संघर्ष को किसी अस्थायी समस्या के रूप में नहीं देखता, जिसे कूटनीति से जल्द सुलझा लिया जाएगा बल्कि एक ऐसी स्थायी स्थिति मानता है जिसके अनुसार भविष्य की योजना बनानी होगी. इस सोच में बदलाव ने क्षेत्रीय सुरक्षा आकलनों को प्रभावित किया है और सीमा-पार उग्रवाद तथा पाकिस्तान की एकतरफा कार्रवाइयों को लेकर चिंताओं को और गहरा किया है.

मध्य एशियाई सरकारों के लिए बार-बार सीमा बंद होना, सीमा शुल्क विवाद और सुरक्षा घटनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल इस विश्वास को कमजोर कर चुके हैं कि अफगान-पाक मार्ग दक्षिण एशिया और समुद्री बाजारों तक पहुँच का एक भरोसेमंद रास्ता है. इसलिए अब रणनीतिक सोच लचीलापन, वैकल्पिक मार्गों और छोटे-छोटे, जरूरत के अनुसार काम करने वाले संपर्क ढांचों पर केंद्रित हो रही है. इससे सुरक्षा, व्यापार और अवसंरचना विकास के प्रति क्षेत्र का दृष्टिकोण बदल रहा है.

प्रतिस्पर्धी लेकिन पूरक यूरेशियाई धुरियों का केंद्र: अफगानिस्तान

अफगान-पाक संकट पूरे यूरेशिया में एक व्यापक भू-राजनीतिक पुनर्संरचना को तेज कर रहा है. दो अवसंरचना-केंद्रित धुरियाँ उभरकर सामने आ रही हैं. पहली धुरी ईरान-भारत की है जिसमें उत्तर की ओर रूस एक महत्वपूर्ण साझेदार है और जिसका जोर मार्गों के विविधीकरण पर है. दूसरी धुरी पाकिस्तान-सऊदी अरब की है जिसमें चीन एक अहम पूर्वी साझेदार के रूप में ऊर्जा गलियारों और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़े संपर्कों को आगे बढ़ा रहा है.

अफगानिस्तान इन दोनों धुरियों के हितों के संगम पर स्थित है. जैसे-जैसे काबुल और इस्लामाबाद के संबंध बिगड़ते जा रहे हैं, अफगानिस्तान ईरान, भारत, रूस और मध्य एशिया के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है जबकि आर्थिक रूप से वह चीन और पाकिस्तान से भी जुड़ा हुआ है. इसका नतीजा यह है कि अफगानिस्तान एक ऐसे बहु-स्तरीय ट्रांजिट मंच के रूप में उभर रहा है, जहाँ प्रतिस्पर्धा भी है और सहयोग भी.

मध्य एशिया अब इस संघर्ष को किसी अस्थायी समस्या के रूप में नहीं देखता, जिसे कूटनीति से जल्द सुलझा लिया जाएगा बल्कि एक ऐसी स्थायी स्थिति मानता है जिसके अनुसार भविष्य की योजना बनानी होगी.

यह रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अफगान भूमि से गुजरने वाले दो प्रमुख रेल गलियारों में साफ दिखाई देती है-कज़ाख़स्तान-तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान (KTA) मार्ग और उज़्बेकिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान (UAP) मार्ग. जो भी गलियारा पहले बड़े पैमाने पर माल ढुलाई को आकर्षित करेगा, वही शुल्क, मानक और राजनीतिक प्रभाव को काफी हद तक तय करेगा, भले ही आगे चलकर दोनों मार्ग साथ-साथ काम करें.

सरकारी स्तर पर इन्हें पूरक परियोजनाएँ बताया जाता है लेकिन माल ढुलाई, राजनीतिक छवि और बाहरी समर्थन को लेकर प्रतिस्पर्धा से इनकार नहीं किया जा सकता. चीन पूर्वी मार्ग का समर्थन करता है, जबकि भारत के लिए पश्चिमी मार्ग को आगे बढ़ाने के मजबूत कारण हैं. मध्य एशियाई देशों के लिए सबसे बड़ा लाभ यह है कि उनके पास कई विकल्प मौजूद हैं.

कज़ाख़स्तान की KTA पहल, जो तुर्गुंडी-हेरात रेलवे के उन्नयन पर आधारित है, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) की पूर्वी शाखा से जुड़ती है. इससे रूस से जुड़े आपूर्ति तंत्र सुरक्षित रहते हैं और ईरान व भारत के साथ संबंध भी बने रहते हैं. कज़ाखस्तान का निवेश हेरात को एक ऐसे लॉजिस्टिक केंद्र के रूप में विकसित कर रहा है, जहाँ से पूर्व में उज़्बेकिस्तान और पश्चिम में ईरानी बंदरगाहों तक पहुँच संभव है.

उज़्बेकिस्तान की UAP परियोजना, जिसे जुलाई 2025 में औपचारिक रूप दिया गया, मध्य एशिया को पाकिस्तानी बंदरगाहों तक सबसे तेज रास्ता देती है. यह चीन-किर्गिज़स्तान-उज़्बेकिस्तान (CKU) रेलवे और CPEC रणनीति के साथ जुड़कर काशगर, मध्य एशिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को जोड़ने वाला एक संभावित पूर्वी परिवहन चक्र बनाती है.

बिखरा हुआ शासन और सुरक्षा का रिसाव

मध्य एशिया के सुरक्षा आकलनों में तालिबान की संस्थागत कमजोरी और आंतरिक गुटबाजी पर विशेष ध्यान दिया जाता है. अफगानिस्तान आज प्रांतीय कमांडरों, कबीलाई नेटवर्कों, खुफिया इकाइयों और धार्मिक नेतृत्व का एक ढीला-ढाला समूह है, जिनकी निष्ठाएँ और हित अलग-अलग हैं. फैसले अक्सर स्थानीय स्तर पर लिए जाते हैं, राजस्व व्यवस्थाएँ अनौपचारिक हैं और आदेश की श्रृंखला स्पष्ट नहीं है.

अफगानिस्तान के उत्तरी प्रांत खास तौर पर संवेदनशील हैं क्योंकि वे लंबे समय से तस्करी, अनौपचारिक व्यापार और कट्टरपंथी नेटवर्कों के मार्ग रहे हैं. यदि तालिबान का ध्यान और संसाधन पाकिस्तान के साथ टकराव या पूर्वी क्षेत्रों की आंतरिक सुरक्षा पर ज्यादा केंद्रित हो जाते हैं तो उत्तर में शासन और कमजोर पड़ सकता है. इससे सीमा पर घटनाओं, उग्रवादी घुसपैठ और काबुल के नियंत्रण से बाहर स्थानीय तनाव बढ़ने की आशंका है. 27 नवंबर को ताजिकिस्तान में चीनी श्रमिकों पर हुए ड्रोन हमले ने इन आशंकाओं को और मजबूत किया है, यह दिखाते हुए कि अफगान अस्थिरता मध्य एशिया में विदेशी परिसंपत्तियों को भी प्रभावित कर सकती है.

जैसे-जैसे काबुल और इस्लामाबाद के संबंध बिगड़ते जा रहे हैं, अफगानिस्तान ईरान, भारत, रूस और मध्य एशिया के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है जबकि आर्थिक रूप से वह चीन और पाकिस्तान से भी जुड़ा हुआ है.

इसके जवाब में मध्य एशियाई देश अपनी सीमाओं पर ढाँचा और निगरानी व्यवस्था मजबूत कर रहे हैं. ताजिकिस्तान रूस-नेतृत्व वाले सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) के सहयोग से सीमा ढाँचे और सैन्य उपकरणों को उन्नत कर रहा है. ड्रोन के बढ़ते उपयोग ने एंटी-ड्रोन रडार, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और मानव रहित हवाई निगरानी इकाइयों के विकास को और जरूरी बना दिया है.

चीन से भी उम्मीद की जा रही है कि वह खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवाद-रोधी प्रशिक्षण और सीमा निगरानी व एंटी-ड्रोन क्षमताओं के समर्थन के जरिए मध्य एशिया के साथ अपने सुरक्षा सहयोग को और गहरा करेगा. CSTO, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और द्विपक्षीय चैनलों के माध्यम से तालमेल बढ़ा है, जबकि रूस अफगान सीमा पर अब भी मुख्य बाहरी सुरक्षा सहारा बना हुआ है. क्षेत्रीय सरकार इस सहयोग को रूसी सुरक्षा गारंटी के पूरक के रूप में देखती हैं.

सुरक्षा की कमजोरी साथ-साथ

हालांकि तालिबान की सुरक्षा व्यवस्था बिखरी हुई है लेकिन उसकी आर्थिक प्रशासन क्षमता शुरुआती अपेक्षाओं से अधिक संगठित दिखाई देती है. प्रांतीय सीमा शुल्क अधिकारी और व्यापार से जुड़े अधिकारी यह दिखा चुके हैं कि पाकिस्तान द्वारा सीमा बंद किए जाने पर वे तेजी से व्यापार मार्ग बदल सकते हैं और आयात-निर्यात को ईरान तथा मध्य एशिया की ओर मोड़ सकते हैं.

आर्थिक रूप से तर्कसंगत व्यवहार और कमजोर सुरक्षा नियंत्रण का यह साथ बना रहना लगातार अनिश्चितता पैदा करता है. मध्य एशिया के लिए मुख्य खतरा काबुल की ओर से जानबूझकर टकराव नहीं है, बल्कि तालिबान की दूर-दराज़ के प्रांतों में अनुशासन लागू करने की सीमित क्षमता है.

CSTO, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और द्विपक्षीय चैनलों के माध्यम से तालमेल बढ़ा है, जबकि रूस अफगान सीमा पर अब भी मुख्य बाहरी सुरक्षा सहारा बना हुआ है. क्षेत्रीय सरकार इस सहयोग को रूसी सुरक्षा गारंटी के पूरक के रूप में देखती हैं.

इस लचीलेपन ने यह डर कुछ हद तक कम किया है कि हर सुरक्षा घटना से आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह टूट जाएगी. फिर भी, मजबूत आर्थिक फैसलों और कमजोर नियंत्रण के इस मेल से अनिश्चितता बनी रहती है. मध्य एशिया के लिए जोखिम का असली कारण टकराव नहीं, बल्कि शासन की कमजोरी है.

मध्य एशिया में अस्थिरता का असमान प्रभाव

अफगान अस्थिरता का असर मध्य एशिया के सभी देशों पर समान नहीं है. ताजिकिस्तान सबसे अधिक संवेदनशील बना हुआ है, क्योंकि उसकी अफगानिस्तान के साथ लंबी और पहाड़ी सीमा है और तालिबान के साथ उसके राजनीतिक संबंध भी तनावपूर्ण हैं. दुशांबे द्वारा तालिबान को मान्यता न देना और अफगान विपक्षी समूहों से उसके कथित रिश्ते स्थानीय स्तर पर उकसावे के खतरे को बढ़ाते हैं.

उज़्बेकिस्तान काबुल के साथ अधिक व्यावहारिक और सकारात्मक संबंध बनाए हुए है, जिसमें व्यापार, बिजली निर्यात और ट्रांजिट समझौतों पर जोर है. इसके बावजूद, उज़्बेक अधिकारी अब अवसंरचना और ऊर्जा योजनाओं में अफगान-पाक अस्थिरता को ध्यान में रख रहे हैं. तुर्कमेनिस्तान की तटस्थ नीति भी उसे पूरी सुरक्षा नहीं देती, क्योंकि कम आबादी वाली सीमा पर गश्त और बाड़बंदी के बावजूद रणनीतिक गहराई सीमित है.

यहाँ तक कि कज़ाख़िस्तान भी, जिसकी अफगानिस्तान से सीधी सीमा नहीं है, अफगान अस्थिरता को एक रणनीतिक कारक मानता है. अस्ताना अब अफगानिस्तान को न केवल एक सुरक्षा जोखिम, बल्कि एक ऐसा भू-राजनीतिक क्षेत्र भी मानता है जहाँ कज़ाख़िस्तान और उज़्बेकिस्तान मध्यम शक्ति के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहते हैं. इसी कारण एक ही दक्षिणी मार्ग पर निर्भर रहने के बजाय समानांतर और वैकल्पिक ट्रांजिट मार्ग विकसित किए जा रहे हैं.

व्यावहारिक आर्थिक सहयोग और मजबूत संपर्क ढाँचा

लगातार सुरक्षा चिंताओं के बावजूद, मध्य एशिया ने तालिबान के साथ व्यावहारिक आर्थिक सहयोग बढ़ाया है. उज़्बेकिस्तान अफगानिस्तान के प्रमुख आर्थिक साझेदारों में से एक बन गया है और वह बिजली, आटा, खाद्य सामग्री, सीमेंट, पेट्रोलियम उत्पाद और निर्माण सामग्री की आपूर्ति करता है. तुर्कमेनिस्तान पश्चिमी अफगानिस्तान को बिजली निर्यात करता रहता है और TAPI पाइपलाइन जैसी दीर्घकालिक ऊर्जा परियोजनाओं के प्रति प्रतिबद्ध है.

अस्ताना अब अफगानिस्तान को न केवल एक सुरक्षा जोखिम, बल्कि एक ऐसा भू-राजनीतिक क्षेत्र भी मानता है जहाँ कज़ाख़िस्तान और उज़्बेकिस्तान मध्यम शक्ति के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहते हैं.

ताजिकिस्तान उत्तरी अफगान प्रांतों को मौसमी बिजली और कृषि उत्पाद भेजता है, जबकि कज़ाख़स्तान गेहूँ, आटा, खाद्य तेल, ईंधन और औद्योगिक सामग्री का बड़ा आपूर्तिकर्ता है. 2024 में अफगानिस्तान के कुल दर्ज आयात का लगभग 18-20 प्रतिशत और उसकी 80-90 प्रतिशत बिजली आयात मध्य एशिया से आया, जिससे यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सहायता घटने के दौर में काबुल के लिए एक अहम आर्थिक सहारा बन गया.

अफगानिस्तान का गहरा आर्थिक एकीकरण कट्टर राजनीतिक अस्थिरता के खतरे को कम करता है, क्योंकि इससे ट्रांजिट से आय होती है, रोजगार बना रहता है और आर्थिक पुनरुद्धार के लिए न्यूनतम आधार मिलता है. लेकिन ट्रांस-अफगान संपर्क बढ़ाकर मध्य एशियाई देश अनजाने में तालिबान की सत्ता को भी मजबूत करते हैं-एक ऐसा शासन जिसे कई क्षेत्रीय देश न तो औपचारिक मान्यता देते हैं और न ही दीर्घकालिक रूप से उपयुक्त साझेदार मानते हैं.

यही आपसी निर्भरता एक लेन-देन आधारित संतुलन बनाती है: मान्यता के बिना संवाद, राजनीतिक गठबंधन के बिना व्यापार और ठोस सुरक्षा गारंटी के बिना अवसंरचना सहयोग.

परियोजनाओं पर संकट की छाया और रणनीतिक संतुलन

अफगान-पाक संकट ने CASA-1000 बिजली परियोजना, TAPI पाइपलाइन और ट्रांस-अफगान परिवहन गलियारों के भविष्य को लेकर भी नई अनिश्चितता पैदा की है. CASA-1000 अफगान-पाक सीमा के पास असुरक्षित है, जबकि TAPI उन इलाकों से गुजरती है जो अफगानिस्तान के सबसे अस्थिर क्षेत्रों में आते हैं. पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता इन परियोजनाओं पर भरोसे को और कमजोर करती है.

ट्रांस-अफगान संपर्क बढ़ाकर मध्य एशियाई देश अनजाने में तालिबान की सत्ता को भी मजबूत करते हैं-एक ऐसा शासन जिसे कई क्षेत्रीय देश न तो औपचारिक मान्यता देते हैं और न ही दीर्घकालिक रूप से उपयुक्त साझेदार मानते हैं.

दक्षिणी संपर्क को पूरी तरह छोड़ने के बजाय, मध्य एशियाई देश अब जोखिम को बाँटने की रणनीति अपना रहे हैं. CAREC गलियारे, सड़क आधारित TIR प्रणालियाँ और तुर्कमेनिस्तान-हेरात के रास्ते पश्चिमी ट्रांस-अफगान मार्गों को केवल उनकी दक्षता के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी परखा जा रहा है कि वे बार-बार आने वाली रुकावटों के बीच कितने कारगर रह सकते हैं. तेरमेज़-मज़ार-ए-शरीफ-काबुल-पेशावर जैसी प्रमुख रेल परियोजनाएँ अब परिवर्तनकारी नहीं, बल्कि सहायक साधन के रूप में देखी जा रही हैं.

आगे की राह: अस्थिरता का प्रबंधन, विकल्पों की सुरक्षा

अफगान-पाक टकराव यह स्पष्ट करता है कि सुरक्षा में स्थिरता की उम्मीद अब नहीं की जा सकती, लेकिन नियंत्रित जोखिम के साथ आर्थिक सहयोग संभव है. मध्य एशिया पीछे हट नहीं रहा, बल्कि विविधीकरण, सीमाओं को मजबूत करने और बहु-दिशात्मक कूटनीति के जरिए जोखिम कम करते हुए आर्थिक लाभ निकाल रहा है.

इस संदर्भ में भारत-मध्य एशिया सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं. INSTC, चाबहार बंदरगाह, विकास वित्त और डिजिटल संपर्क के जरिए भारत की बढ़ती भूमिका मध्य एशिया की वैकल्पिक और स्वतंत्र रणनीति से मेल खाती है. पश्चिमी ट्रांस-अफगान लॉजिस्टिक्स केंद्रों में संयुक्त निवेश, रेल और मल्टीमॉडल मानकों पर समन्वय, हवाई मार्गों और डिजिटल व्यापार का विस्तार तथा INSTC और अश्गाबात समझौते के तहत नीति-सामंजस्य इस सहयोग को और गहरा कर सकते हैं.

यदि पूर्वी और पश्चिमी दोनों गलियारे विकसित होते हैं, तो मध्य एशिया को विकल्पों के जरिए अधिक प्रभाव मिलेगा. यदि कोई एक मार्ग हावी होता है, तो वह न केवल व्यापार बल्कि पूरे यूरेशिया में प्रभाव के संतुलन को भी तय करेगा. काबुल और इस्लामाबाद के बीच स्थिर संतुलन बनने तक, लचीलापन, वैकल्पिक मार्ग और व्यावहारिक सहयोग ही मध्य एशिया की दक्षिणी रणनीति की पहचान बने रहेंगे.


व्लाद पैडक एकेई इंटरनेशनल में सीनियर एनालिस्ट और नाइटिंगेल इंटरनेशनल में फेलो हैं.

सोबिर कुरबानोव एक अंतरराष्ट्रीय विकास विशेषज्ञ और नाइटिंगेल इंटरनेशनल में फेलो हैं.

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Authors

Vlad Paddack

Vlad Paddack

Vlad Paddack is a Senior Analyst at AKE International and a Fellow at Nightingale Int., specialising in Eurasian security and political affairs, with a particular ...

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Sobir Kurbanov

Sobir Kurbanov

Sobir Kurbanov is an international development expert and fellow at Nightingale Int. with over 20 years of experience in partnership-building, complex market reforms, program management, ...

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