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Published on Feb 26, 2026 Updated 0 Hours ago

फरवरी 2026 में कज़ाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति पाकिस्तान गए, दोनों को निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया. जानें कैसे ये कदम भारत के रणनीतिक हितों और क्षेत्रीय भू-राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं.

निशान-ए-पाकिस्तान: मध्य एशिया से भारत तक असर

फरवरी 2026 की शुरुआत में, कज़ाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम जोमार्ट तोकायेव पाकिस्तान गए. 23 साल बाद ये पहला मौका था, जब कज़ाकिस्तान के राष्ट्रपति इस्लामाबाद आए. इसके बाद उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्ज़ियोयेव ने भी पाकिस्तान का दौरा किया. दोनों नेताओं को पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया, जो इन मुलाकातों के प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाता है. पिछले कुछ साल के संघर्षों के कारण इस क्षेत्र में काफ़ी भू-रणनीतिक बदलाव हुए हैं. आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधाओं के बीच, हिंद महासागर तक पाकिस्तान की पहुंच ने यूरेशियाई भू-आर्थिक परिदृश्य में उसकी स्थिति को मज़बूत किया है, विशेष रूप से मध्य एशिया के लिए. भारत के लिए इस क्षेत्र में पाकिस्तान का मज़बूत होना गंभीर चिंता की बात है, क्योंकि भारत भी मध्य एशिया को रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण मानता है. हालांकि, कई विशेषज्ञ मध्य एशिया में पाकिस्तान के प्रभाव के विस्तार को व्यापक रूप से ज़ोखिम कम करने की रणनीति के रूप में देखते हैं, लेकिन भारत की विस्तारित पड़ोस नीति और विशेष रूप से यूरेशिया के लिए इस प्रतिकूल रणनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं.

मध्य एशियाई देशों और पाकिस्तान के बीच साझेदारी हाल के वर्षों में काफ़ी मज़बूत हुई है. ये साझेदारी पांच बुनियादी बातों पर आधारित है. राजनीतिक, आर्थिक, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और सैन्य सहयोग. पाकिस्तान ने मध्य एशिया के लिए, जो इस्लामाबाद विज़न 2021 जारी किया था, उसमें इनका उल्लेख है. 2021 के बाद से, पाकिस्तानी नेतृत्व ने इन देशों के साथ गहरे राजनीतिक संबंध स्थापित किए हैं. इसका सबूत, इनके बीच नियमित अंतराल में होते शिखर सम्मेलन हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने चार मध्य एशियाई नेताओं से मुलाकात की और दिसंबर 2025 में तुर्कमेनिस्तान की यात्रा की, जिससे इस साझेदारी को मज़बूत किया जा सके. इस दौरान कनेक्टिविटी बढ़ाने पर भी सहमति बनी. दिसंबर 2025 में ही किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सादिर जापारोव ने दो दशकों में पहली बार पाकिस्तान का दौरा किया. उनकी इस यात्रा में दोनों देशों के बीच ऊर्जा, भूविज्ञान, व्यापार, शिक्षा और कानून से संबंधित 15 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए.

व्यापार और कनेक्टिविटी को मिली नई रफ्तार

हाल ही में हुई उच्च स्तरीय यात्राओं से पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने की बढ़ती प्रतिबद्धता का संकेत मिलता है. तोकायेव और मिर्ज़ियोयेव दोनों ने 1 अरब अमेरिकी डॉलर और 2 अरब डॉलर के महत्वाकांक्षी द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य निर्धारित किए हैं. कज़ाकिस्तान ने पाकिस्तान के साथ 37 और उज़्बेकिस्तान ने 28 समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर साइन किए. ये समझौते निवेश, व्यापार और संपर्क पर केंद्रित हैं, जो मध्य एशियाई देशों के साथ पाकिस्तान के संबंधों के लिए केंद्रीय महत्व रखते हैं. कज़ाकिस्तान के अक्ताऊ अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह और पाकिस्तान के कराची बंदरगाह प्रशासन ने समुद्री रसद को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए. इसके अलावा, इस्लामाबाद और ताशकंद ने समुद्री व्यापार को बढ़ावा देने, कराची, ग्वादर और कासिम के लिए बंदरगाह व्यवस्था को प्राथमिकता देने पर सहमति व्यक्त की. दोनों पक्षों ने 4.8 अरब डॉलर की अनुमानित लागत वाली उज़्बेकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान रेल परियोजना के रणनीतिक महत्व पर ज़ोर दिया और इसे क्षेत्र के लिए एक "क्रांतिकारी" कदम बताया.

पिछले कुछ साल के संघर्षों के कारण इस क्षेत्र में काफ़ी भू-रणनीतिक बदलाव हुए हैं. आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधाओं के बीच, हिंद महासागर तक पाकिस्तान की पहुंच ने यूरेशियाई भू-आर्थिक परिदृश्य में उसकी स्थिति को मज़बूत किया है, विशेष रूप से मध्य एशिया के लिए. भारत के लिए इस क्षेत्र में पाकिस्तान का मज़बूत होना गंभीर चिंता की बात है.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की बढ़ती पकड़ ने मध्य एशिया की रणनीतिक योजना में पाकिस्तान के महत्व को बढ़ा दिया है. अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर लगातार तनाव के बावजूद मध्य एशियाई देशों ने तालिबान के साथ संबंध बनाए रखे हैं क्योंकि वे शासन की स्थिरता को आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए मूलभूत मानते हैं. हालांकि, पाकिस्तान और तालिबान के बीच तनाव से कज़ाकिस्तान-तुर्कमेनिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान कॉरिडोर और उज़्बेकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान रेल परियोजना संकट में आ सकती है. 2024 में, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान ने तोरघुंडी में एक लॉजिस्टिक्स केंद्र स्थापित करने और रेलवे लाइन को हेरात और कंधार तक विस्तारित करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. बाद में पाकिस्तान की सीमा पर स्थित स्पिन बोल्दक तक इसका विस्तार करने का भी निर्णय लिया गया. अप्रैल 2025 में, कज़ाकिस्तान ने इसका निर्माण कार्य शुरू करने के लिए 500 मिलियन डॉलर देने का वादा किया. हेरात तक रेलवे लाइन के 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है. 2025 में, अफ़ग़ानिस्तान और उज़्बेकिस्तान के बीच व्यापार 1.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया, और कज़ाकिस्तान इस समय अफ़ग़ानिस्तान को अनाज मुहैया कराने वाला प्रमुख देश है.

मध्य एशिया का सामरिक महत्व

रूस-यूक्रेन संघर्ष ने मध्य एशिया के प्रमुख व्यापार मार्गों को पहले ही बाधित कर दिया है, जिसमें उत्तरी गलियारा भी शामिल है. कड़े प्रतिबंध और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान की वजह से इस क्षेत्र के हाइड्रोकार्बन और रेयर-अर्थ उद्योग प्रभावित हो रहे हैं. इनकी बाज़ार पहुंच पहले से ही सीमित है और ये मुख्य रूप से चीन पर निर्भर हैं. लगातार चल रहे संघर्ष ने इन देशों को भू-रणनीतिक और भू-आर्थिक दोनों उद्देश्यों के लिए भारत समेत नए क्षेत्रीय साझेदार तलाशने के लिए मज़बूर कर दिया है. भारत के चाबहार बंदरगाह को मध्य एशियाई देश हिंद महासागर का एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार मानते हैं. मध्य एशिया का ज़्यादातर व्यापार ईरान के बंदर अब्बास और चाबहार बंदरगाहों से होकर गुजरता है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान ने विश्वसनीय रेल और सड़क संपर्क स्थापित कर लिए हैं, जिससे ये मार्ग व्यापार के लिए तेज़ी से अनुकूल हो गए हैं. हालांकि, जून 2025 में अमेरिकी हमलों और बढ़ते घरेलू अशांति ने ईरान की अर्थव्यवस्था और मध्य एशिया में उसकी महत्वाकांक्षाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाला है.

यूक्रेन युद्ध, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में वृद्धि और इस क्षेत्र में रूस की घटती रुचि ने ईरान से जुड़ी कनेक्टिविटी परियोजनाओं की गति धीमी कर दी है. अमेरिकी प्रतिबंधों की चिंताओं के कारण मध्य एशियाई देशों ने भी सतर्क रुख़ अपनाया है. इसके अलावा, सितंबर 2025 में अमेरिका ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह के लिए प्रतिबंधों से मिली छूट को रद्द कर दिया. इससे ना सिर्फ यूरेशिया में भारत की कनेक्टिविटी संबंधी महत्वाकांक्षाओं में रुकावट पैदा हुई, बल्कि मध्य एशियाई देशों को व्यापार और वाणिज्य के लिए हिंद महासागर तक पहुंच हासिल करने के लिए वैकल्पिक साझेदारों की तलाश करने के लिए भी मज़बूर होना पड़ा. चाबहार बंदरगाह यूरेशिया में चीन के प्रभाव का मुकाबला करने और हिंद महासागर में बीजिंग की बढ़ती शक्ति को सीमित करने में भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक महत्व रखता है.

मध्य एशियाई राष्ट्र और तुर्क भाषी देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, यूरोप और चीन के बीच व्यापार एवं रसद संबंधों को मज़बूत करने के लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं. इसी उद्देश्य से तुर्क देशों के संगठन (ओटीएस)के अंतर्गत मध्य गलियारे जैसे वैकल्पिक संपर्क मार्ग स्थापित किए जा रहे हैं. ये मध्य एशियाई देश चीन की बेल्ट एंड रोड पहल में प्रमुख भागीदार भी हैं. इसीलिए ये देश, पाकिस्तान और ग्वादर जैसे बंदरगाहों में चीन के निवेश को हिंद महासागर तक संभावित नए मार्गों के रूप में भी देखते हैं. चीन के नेतृत्व वाले ग्वादर बंदरगाह ने भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के संबंध में चिंताएं पैदा की हैं. चाबहार बंदरगाह से ग्वादर पोर्ट की दूरी लगभग 170 किलोमीटर है और ये चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का केंद्रबिंदु है.

मध्य एशियाई देशों के सामने एक रणनीतिक दुविधा है. वो तय नहीं कर पा रहे कि क्या पाकिस्तान के साथ सहयोग करके चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के माध्यम से हिंद महासागर तक पहुंच सुरक्षित करें क्योंकि महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता वैकल्पिक संपर्क मार्गों को सीमित करती है. एक व्यावहारिक दृष्टिकोण ये होगा कि मध्य एशियाई देश अपनी विदेशी साझेदारियों में विविधता लाएं.

लगातार राजनीतिक अस्थिरता और हिंसक विद्रोह के कारण ग्वादर बंदरगाह और बलूचिस्तान के संसाधनों का रणनीतिक महत्व कम हो गया है. पाकिस्तान ने ग्वादर बंदरगाह चीन को 40 साल के पट्टे पर दिया है लेकिन बलूचिस्तान के लोगों को लगता है कि उन्हें चीन का उपनिवेश बना दिया गया है. चीनी कंपनियों और पाकिस्तानी सरकार द्वारा बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का बहुत ज़्यादा दोहन किया गया है, लेकिन इससे स्थानीय आबादी को कोई खास फायदा नहीं मिला है. यही वजह है कि पाकिस्तानी सेना के साथ-साथ चीनी कंपनियों के कर्मचारी भी बलूच विद्रोही समूहों के निशाने पर आ गए हैं. हाल के वर्षों में, स्थानीय शिकायतों, मानवाधिकार उल्लंघन की रिपोर्टों और कथित आर्थिक शोषण ने कई युवा और शिक्षित बलूच लोगों को विद्रोह में शामिल होने के लिए प्रेरित किया है, इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं. इसी तरह, तालिबान के नेतृत्व वाले अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंध पिछले एक साल में काफ़ी ज़्यादा खराब हो गए हैं. द्विपक्षीय व्यापार लगभग 40 प्रतिशत घटकर 1.77 अरब डॉलर रह गया है. पिछले दो साल में, तालिबान और पाकिस्तान के बीच बातचीत लगातार टकरावपूर्ण होती जा रही है. सुरक्षा, व्यापार और आतंकवाद के मुद्दों पर दोनों के बीच तीखे मतभेद उभर कर सामने आए हैं. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हमलों में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है. अफ़ग़ान सीमा पर उग्रवाद ने बुनियादी ढांचे को भी बाधित किया है, जिसने आवागमन के समय को बढ़ा दिया है. अफ़ग़ानिस्तान से सटे ख़ैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आतंकी घटनाओं में 279.8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जो 2021 में 572 से बढ़कर 2024 में 2,173 हो गई हैं.

मध्य एशिया में भारतीय हितों का क्या होगा?  

मध्य एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भारत के रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकती है, खासकर पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता की बात है. व्यापार में मामूली वृद्धि के बावजूद, हाल के वर्षों में भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच संबंध स्थिर रहे हैं. हालांकि, इस बीच भारत को कुछ झटके लगे हैं, जैसे कि अयनी संधि से औपचारिक रूप से अलग होना और 2022 के बाद से द्विवार्षिक भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन का न होना. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) के हाशिए पर चले जाने और प्रतिबंधों के कारण चाबहार में भारत की गतिविधियों में बाधा आना भी नुकसानदायक साबित हुआ है. हालांकि, मध्य एशियाई देश वैकल्पिक कनेक्टिविटी मार्ग खोज रहे हैं लेकिन इनमें से कई अभी भी अव्यावहारिक हैं.

मध्य एशियाई देशों के सामने एक रणनीतिक दुविधा है. वो तय नहीं कर पा रहे कि क्या पाकिस्तान के साथ सहयोग करके चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के माध्यम से हिंद महासागर तक पहुंच सुरक्षित करें क्योंकि महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता वैकल्पिक संपर्क मार्गों को सीमित करती है. एक व्यावहारिक दृष्टिकोण ये होगा कि मध्य एशियाई देश अपनी विदेशी साझेदारियों में विविधता लाएं. हालांकि, इन देशों का तालिबान के साथ बातचीत में पाकिस्तान की तुलना में ज़्यादा प्रभाव है. वो अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान के साथ अपने संबंध मज़बूत करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं लेकिन पाकिस्तान में लगातार जारी आंतरिक अस्थिरता इस तरह की किसी पहल को कमज़ोर कर सकती है.


अयाज़ वानी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेश के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में फेलो हैं.

रजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेश के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.

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