HIV की रोकथाम के लिए साल में दो बार दिए जाने वाले दुनिया के पहले इंजेक्शन को FDA की मंज़ूरी के साथ एक प्रमुख उत्पादनकर्ता के रूप में भारत की भूमिका अगली पीढ़ी के सार्वजनिक स्वास्थ्य के टूल को अपनाने के मामले में देश की तैयारी के बारे में ज़रूरी सवाल खड़े करती है.
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जून 2025 में अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (US FDA) ने गिलियड के लेनाकापाविर को अपनी तरह के पहले ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) की रोकथाम के टूल के रूप में मंज़ूरी दी. लेनाकापाविर एक लंबे समय तक काम करने वाला इंजेक्शन है जो साल में केवल दो बार दिया जाता है. इस इंजेक्शन की मार्केटिंग येज़्तुगो (Yeztugo) के रूप में की जाती है और ये कैप्सिड इन्हिबिटर (एक तरह की एंटीवायरल दवाई जो वायरस के प्रोटीन शेल को निशाना बनाती है) अब दुनिया का पहला और एकमात्र PrEP (प्री-एक्सपोज़र प्रोफाइलैक्सिस) विकल्प है जो हर डोज़ में 6 महीनों की लगातार सुरक्षा प्रदान करता है. FDA की तरफ से इसको मंज़ूरी एक ऐतिहासिक क्षण है जिसका स्वागत पूरी दुनिया के विशेषज्ञों और एजेंसियों ने किया है. शुरुआती ट्रायल के नतीजे इतने अच्छे थे कि उन्हें निर्धारित समय से पहले ही रोक दिया गया: तीसरे चरण के परीक्षण में लेनाकापाविर का इंजेक्शन लेने वाली महिलाओं में HIV संक्रमण का कोई नया मामला सामने नहीं आया, वहीं पुरुषों और ट्रांसजेंडर भागीदारों के समानांतर परीक्षण में संक्रमण के केवल 2 मामले सामने आए. कुल मिलाकर रोज़ाना ओरल PrEP (टेनोफोविर/एमट्रिसिटाबाइन) लेने वालों की तुलना में इस इंजेक्शन ने लगभग 100 प्रतिशत लोगों को सुरक्षा प्रदान की. HIV/AIDS पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम (UNAIDS) के निदेशक के अनुसार, अमेरिकी FDA की मंज़ूरी दशकों की वैज्ञानिक प्रगति के बाद एक मील का पत्थर है और इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इंजेक्शन की उपलब्धता सबके लिए हो और ये कम दाम पर सबको मिले.
लेनाकापाविर एक इनोवेटिव एंटीरेट्रोवायरल दवा और कार्रवाई के नए तौर-तरीके के साथ पहला HIV कैप्सिड इन्हिबिटर है जो वायरस के जीवनचक्र में कई चरणों में रुकावट डालता है. रोकथाम के लिए इसकी नवीनता इसके मॉलिक्यूल के संबंध में कम और लंबे समय तक काम करने वाले इसके असरदार फॉर्मूलेशन में अधिक है. एक समय पर रोज़ एक स्टैंडर्ड PrEP की गोली लेने की तुलना में लेनाकापाविर को हर छह महीने पर एक इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है जो लगातार दवा के स्तर को स्थिर बनाए रखता है और HIV संक्रमण को रोकता है. वास्तव में साल में दो बार लिया जाने वाला इंजेक्शन भरोसेमंद तरीके से HIV को रोकता है. ये एक ऐसी सुविधा है जो HIV की रोकथाम में आने वाली ज़्यादातर बाधाओं को पार कर सकती है.
संक्षेप में कहें तो लेनाकापाविर उन लोगों को भी PrEP की तरफ आकर्षित कर सकता है जो मौजूदा तरीकों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं या हिचकिचाहट रखते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि साल में दो बार लिया जाने वाला इंजेक्शन कई समस्याओं का समाधान करने में मदद कर सकता है जैसे कि रोज़ गोली लेने की थकान, बार-बार क्लिनिक जाने की आवश्यकता और नियमित रूप से HIV का इलाज कराने से लगने वाला कलंक. संक्षेप में कहें तो लेनाकापाविर उन लोगों को भी PrEP की तरफ आकर्षित कर सकता है जो मौजूदा तरीकों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं या हिचकिचाहट रखते हैं. ये देखते हुए कि वर्तमान में PrEP का उपयोग कई देशों में योग्य स्तर से नीचे बना हुआ है (उदाहरण के लिए, अमेरिका में ख़तरे का सामना करने वाले केवल 36 प्रतिशत लोगों को ही PrEP लेने का निर्देश दिया गया है), ऐसे में लेनाकापाविर जैसा दीर्घकालिक विकल्प उपयोग बढ़ाने और रोकथाम तेज़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण इनोवेशन के रूप में देखा जा रहा है.
अपने जेनेरिक दवा उद्योग की ताकत को देखते हुए भारत लेनाकापाविर को व्यापक रूप से उपलब्ध उत्पाद बनाने में एक अहम भूमिका निभा सकता है. अक्टूबर 2024 में गिलियड साइंसेज़ ने HIV के ज़्यादा बोझ वाले देशों में लेनाकापाविर की मांग की उम्मीद में किफायती दाम पर लेनाकापाविर मुहैया कराने के लिए छह जेनेरिक उत्पादकों के साथ स्वैच्छिक लाइसेंसिंग समझौता करने की घोषणा की. ध्यान देने की बात है कि इनमें से कम-से-कम चार उत्पादकों का मुख्यालय भारत में है: डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज, हेटेरो लैब्स, एमक्योर फार्मास्युटिकल्स और माइलान (वायट्रिस). ये इस बात का प्रमाण है कि भारत का दर्जा “विकासशील देशों की दवा फैक्ट्री” के रूप में है. इस रॉयल्टी से मुक्त लाइसेंस के तहत भारतीय कंपनियों ने तकनीक का ट्रांसफर हासिल किया (2024 के अंत तक ये काम पूरा हुआ) और जैसे ही नियामक मंज़ूरियां मिलती हैं, उन्हें जल्द-से-जल्द जेनेरिक लेनाकापाविर बनाने का काम मिला हुआ है. हालांकि ये साफ नहीं है कि भारत को उन देशों की सूची में शामिल किया गया है या नहीं जिन्हें घरेलू उपलब्धता के लिए रखा गया है. इसका कारण ये है कि गिलियड ने लाइसेंस के तहत मौजूद सभी 120 देशों का नाम सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया है. भारत उन 18 प्राथमिकता रजिस्ट्रेशन वाले देशों की सूची में शामिल नहीं है जो दुनिया में HIV के बोझ का 70 प्रतिशत उठाते हैं.
HIV की रोकथाम करने वाली दवाई के लिए लाइसेंस देने की दिशा में ये शुरुआती कदम अभूतपूर्व है. इसका लक्ष्य मुख्य रूप से 120 ऐसे देशों को शामिल करना है जो निम्न और निम्न-मध्यम आमदनी वाले हैं. ये कदम दुनिया भर के स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के दबाव और अतीत के HIV हस्तक्षेपों से हासिल सबक की वजह से उठाया गया है- विशेष रूप से ये कि उपलब्धता में वर्षों की देरी से बचने के लिए समय पर जेनेरिक उत्पादन आवश्यक है. भारत के कई दवा उत्पादकों को शामिल किया जाना निर्णायक है: भारत के पास HIV के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर अच्छी क्वालिटी की जेनेरिक दवाओं के उत्पादन का एक ट्रैक रिकॉर्ड है जैसा कि नई शताब्दी में एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के साथ देखा गया था और ये लेनाकापाविर को विकासशील देशों में रहने वाले लाखों लोगों तक ब्रांडेड दवा की लागत के एक छोटे से अंश में पहुंचाने में समर्थ बना सकता है. भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियां लेनाकापाविर की सालाना लागत 100 अमेरिकी डॉलर प्रति मरीज़ से नीचे ले जाने में मदद कर सकती हैं- जो कि पश्चिमी देशों के दाम की तुलना में नाटकीय कमी है- और जल्दी से इसकी शुरुआत कर सकती हैं.
लेनाकापाविर की असली परीक्षा वास्तविक दुनिया में इसके कार्यान्वयन में होगी, विशेष रूप से उन देशों में जहां HIV की दर सबसे ज़्यादा है. विज्ञान ने तो सफलता हासिल कर ली है लेकिन मौजूदा कीमत और संभावित जेनेरिक लागत के बीच सामर्थ्य का अंतर गंभीर चिंता का विषय है. गिलियड ने खुलासा किया है कि लेनाकापाविर के दो इंजेक्शन के लिए हर साल प्रति व्यक्ति लगभग 28,000 अमेरिकी डॉलर (लगभग 24 लाख रुपये) खर्च करने होंगे. अगर सब्सिडी नहीं मिलती है या जेनेरिक विकल्प उपलब्ध नहीं हैं तो इतना महंगा दाम निम्न और मध्यम आय वाले देशों में लोगों या सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों तक पहुंच से लेनाकापाविर को दूर रखता है. इसके विपरीत स्वतंत्र शोधकर्ताओं का आकलन है कि जेनेरिक लेनाकापाविर का उत्पादन बड़े स्तर पर केवल 35-46 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष की लागत पर किया जा सकता है, अगर हर साल 5-10 मिलियन डोज़ का उत्पादन होता है तो ये दाम गिरकर लगभग 25 अमेरिकी डॉलर भी हो सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो कुशल जेनेरिक बाज़ार में लेनाकापाविर 100 अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष से भी कम कीमत में बनाया और बेचा जा सकता है. ये कीमत मौजूदा ओरल PrEP गोलियों के बराबर या उससे कम है.
भारत के पास HIV के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर अच्छी क्वालिटी की जेनेरिक दवाओं के उत्पादन का एक ट्रैक रिकॉर्ड है जैसा कि नई शताब्दी में एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के साथ देखा गया था और ये लेनाकापाविर को विकासशील देशों में रहने वाले लाखों लोगों तक ब्रांडेड दवा की लागत के एक छोटे से अंश में पहुंचाने में समर्थ बना सकता है.
गिलियड की प्रतिक्रिया दो तरफा वैश्विक पहुंच की योजना रही है. पहला, जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारतीय और दूसरे उत्पादकों के माध्यम से 120 देशों में तेज़ी से जेनेरिक इंजेक्शन पहुंचाया जाए. दूसरा, कंपनी ने लाइसेंस से कवर देशों में जेनेरिक इंजेक्शन की मांग को पूरा करने तक बिना किसी लाभ के आधार पर अपने ब्रांडेड लेनाकापाविर की सप्लाई करने का संकल्प लिया है. व्यावहारिक रूप से, गिलियड ने अंतरिम अवधि के दौरान उन देशों में रहने वाले 20 लाख लोगों को लेनाकापाविर मुहैया कराने की प्रतिबद्धता जताई है. वैसे तो ये प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है लेकिन ये अभी भी पूरी तरह सामर्थ्य के अंतर को दूर नहीं कर सकती है. इसका कारण ये है कि 20 लाख लोगों तक लेनाकापाविर पहुंचाने से भी वैश्विक आवश्यकता का केवल एक हिस्सा पूरा होता है. WHO का अनुमान है कि 2030 तक HIV की रोकथाम के लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगभग 1 करोड़ लोगों को PrEP पर होना चाहिए. इसके अलावा, जेनेरिक शुरू करने की समयसीमा भी एक कारक बनी हुई है: अमेरिका से बाहर नियामक मंज़ूरियों को जहां तेज़ किया जा रहा है (EU मेडिसिन फॉर ऑल प्रक्रिया और WHO प्रीक्वालिफिकेशन जैसे तौर-तरीकों के माध्यम से), वहीं ये भी कहा जा रहा है कि 2025-2026 तक जेनेरिक इंजेक्शन व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं होगा.
व्यावहारिक रूप से भारत के लोगों को तेज़ गति से स्थानीय उपलब्धता पर विश्वास करने के प्रति सतर्क रहना चाहिए. जब तक जेनेरिक को मंज़ूरी नहीं मिलती है और बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन नहीं होता है, तब तक एकमात्र उपलब्ध लेनाकापाविर विकल्प बहुत ज़्यादा कीमत वाला ब्रांडेड वर्ज़न होगा.
दस्तावेज़ों में तो भारत को गिलियड के लाइसेंस के लिए योग्य होना चाहिए (एक निम्न-मध्यम आय वाले देश के रूप में) और इसलिए घरेलू उपयोग के लिए उसे कम लागत पर जेनेरिक लेनाकापाविर मिलना चाहिए लेकिन ये अनिश्चित बना हुआ है. हालांकि व्यावहारिक रूप से भारत के लोगों को तेज़ गति से स्थानीय उपलब्धता पर विश्वास करने के प्रति सतर्क रहना चाहिए. जब तक जेनेरिक को मंज़ूरी नहीं मिलती है और बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन नहीं होता है, तब तक एकमात्र उपलब्ध लेनाकापाविर विकल्प बहुत ज़्यादा कीमत वाला ब्रांडेड वर्ज़न होगा. लेकिन इसकी ऊंची लागत की वजह से भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में इसे शुरू करना व्यावहारिक नहीं होगा. इसलिए भारत के स्वास्थ्य अधिकारी अभी तक किसी भी रूप में PrEP को अपनाने के मामले में सुस्त रहे हैं. 2016 में HIV के एक फिक्स्ड ड्रग कंबिनेशन (निर्धारित दवा संयोजन) को भारत के औषधि महानियंत्रक की मंज़ूरी के बाद ओरल PrEP के लिए कुछ साल पहले मसौदा दिशानिर्देश जारी किए गए थे. हालांकि फंडिंग से जुड़ी मजबूरियों, कम जागरूकता और कार्यक्रम के स्तर पर अपनाने में धीमी गति के कारण मौजूदा PrEP दवाओं की सार्वजनिक रूप से शुरुआत सीमित रही है और PrEP अभी भी काफी हद तक निजी रूप से प्रदान करने वालों और NGO के नेतृत्व वाली प्रदर्शन परियोजनाओं तक ही है.
भारत स्वास्थ्य से जुड़े इनोवेशन के मामले में अक्सर एक विरोधाभास रहा है: दुनिया के लिए तो भारत उत्पादन करता है लेकिन ख़ुद इनोवेशन को अपनाने में धीमा रहा है. लेनाकापाविर के साथ ये तौर-तरीका बदलना चाहिए. 2023 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 25.4 लाख लोगों को HIV है और हर साल HIV संक्रमण के करीब 66,400 नए मामले सामने आते हैं, ऐसे में भारत इस मामले में ढिलाई बर्दाश्त नहीं कर सकता. रोकथाम को बुनियाद बनाया जाना चाहिए और कंडोम एवं ट्रीटमेंट-एज़-प्रिवेंशन (TasP) जैसी पारंपरिक रोकथाम की पद्धतियों के साथ PrEP, जिसे लंबे समय से अनदेखा किया गया है, को बढ़ाया जाना चाहिए.
भारत में PrEP को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक अहम रणनीति होगी स्थापित HIV सेवाओं जैसे कि ART केंद्रों, लक्षित हस्तक्षेप स्थलों और एकीकृत परामर्श एवं परीक्षण केंद्रों (ICTC) से PrEP को जोड़ना क्योंकि यहां सेक्स वर्कर, पुरुष के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुष (MSM) और ट्रांसजेंडर तक पहले से ही पहुंचा जा रहा है. कोलकाता में महिला सेक्स वर्कर के साथ PrEP प्रदर्शन परियोजनाओं जैसी शुरुआती पहल ने दिखाया है कि भरोसेमंद रोकथाम के कार्यक्रमों के भीतर समुदाय आधारित शुरुआत को जोड़ने से संपर्क बढ़ता है और अनुपालन सुविधाजनक होता है.
इसके अलावा, भारत के उभरते डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम में दूरदराज और सेवाओं से दूर क्षेत्रों में टेलीफोन और डिजिटल माध्यमों से टेली-काउंसलिंग, जोखिम समीक्षा, अपॉइंटमेंट बुकिंग और अनुपालन पर नज़र के ज़रिए प्रभावी ढंग से पहुंचा जा सकता है. ये सुविधा आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और उससे जुड़े प्लैटफॉर्म के ज़रिए दी जा सकती है. लंबे समय तक इसे बनाए रखने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों और प्रशिक्षित प्राथमिक देखभाल प्रदानकर्ताओं को PrEP सेवाओं का प्रबंधन करने के लिए सशक्त बनाया जा सकता है.
भारत के नीति-निर्माताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राधिकरणों को FDA की मंज़ूरी को घरेलू नियामक और नीतिगत तैयारी को तेज़ करने के लिए उत्प्रेरक के रूप में भी देखना चाहिए. इसके तहत WHO के प्रकाशित दिशानिर्देशों के साथ जुड़ना, लेनाकापाविर के लिए आवश्यक मंज़ूरी की प्रक्रियाओं में तेज़ी लाना (संभवत: WHO प्री-क्वालिफिकेशन या EU मेडिसिन फॉर ऑल जैसे तौर-तरीकों का लाभ उठाकर) और महत्वपूर्ण रूप से PrEP के लिए बजट आवंटित करना एवं वितरण की रणनीति तैयार करना शामिल है. राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) के PrEP दिशानिर्देशों को कागज़ से व्यवहार में लाने की ज़रूरत है. उदाहरण के लिए, HIV के ज़्यादा मामले वाले शहरों या राज्यों में पायलट प्रोग्राम शुरू करके, परामर्श एवं इंजेक्शन प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करके और PrEP के उपयोग को कलंक मुक्त करने के लिए काम करके. पर्याप्त संसाधनों और लोगों की भागीदारी के माध्यम से ये चिकित्सकीय सफलता दुनिया भर में लोगों की जान बचाने में मदद कर सकती है.
के. एस. उपलब्ध गोपाल ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की हेल्थ इनिशिएटिव में एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...
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