Author : Ramanath Jha

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Published on Feb 09, 2026 Updated 0 Hours ago

बजट 2026-27 में छोटे और मध्यम शहरों के लिए बड़े प्रोजेक्ट और फंड का ऐलान किया गया है लेकिन सवाल यह है कि क्या ये पहल वास्तव में शहरों का जीवन स्तर सुधार पाएंगी और शहरी विकास को नई दिशा दे पाएंगी? आइए जानें इस बजट के शहरी प्रावधानों की पूरी कहानी.

बजट 2026-27: अब छोटे शहर प्राथमिकता

1 फरवरी, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार नौवीं बार भारत का केंद्रीय बजट पेश किया. इसमें शहरी स्थानीय निकायों (ULB) और शहरों के लिए जो प्रावधान किए गए हैं, वे बताते हैं कि सरकार शहरों को ज़रूरी प्राथमिकता दे रही है और दीर्घकालिक शहरी विकास की ज़रूरत खूब समझ रही है.

पिछले बजटों में शहरी निकायों को महत्व

शहरी मुद्दों पर पिछले पांच केंद्रीय बजटों में भी ध्यान दिया गया था. 2021 के बजट में चुनिंदा शहरी सेवाओं के विस्तार और सुधार के लिए उनके बुनियादी ढांचे को मज़बूत बनाने पर ज़ोर दिया गया. 2022 में वित्त मंत्री ने शहरी नियोजन पर ध्यान केंद्रित किया. 2023 में नगरपालिकाओं में सुधारों पर विशेष ध्यान दिया गया और राज्य व ULB को प्रोत्साहन पैकेज बांटे गए. 2024 में शहरी आवास और स्ट्रीट वेंडरों पर ज़ोर दिया गया और पिछले वर्ष के बजट में ‘शहरों को विकास-केंद्र’ के रूप में विकसित करने के लिए शहरी चुनौती कोष बनाने की बात कही गई और शहरी शासन, म्युनिसिपल सेवाओं, शहरी नियोजन व शहरी भूमि में राज्य स्तरीय सुधारों को प्रोत्साहित किया गया.

बजट 2026-27 में शहरी निकायों के लिए प्रावधान

इस साल पांच लाख से अधिक आबादी वाले शहरों, दूसरे व तीसरे दर्जे के शहरी निकायों पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया है. इन निकायों को ‘उभरता हुआ विकास-केंद्र’ बताया गया है, जिसकी पहली झलक वित्त मंत्री के भाषण के पैराग्राफ 15 (vi) में भारत सरकार के पहले ‘कर्तव्य’ में मिलती है. इसमें ‘शहरी आर्थिक क्षेत्रों के विकास’ की चर्चा है. पैरा 32 में कहा गया है कि अब उनके बुनियादी ढांचे के विकास पर अधिक ज़ोर दिया जाएगा. पैरा 39 में वित्त मंत्री ने इसकी फिर से चर्चा की और इसमें ‘मंदिर नगरों’ को शामिल करते हुए वहां आधुनिक बुनियादी ढांचे व बुनियादी सुविधाओं के विकास की ज़रूरत बताई. उन्होंने आगे कहा कि इस बजट का मक़सद उन शहरों की आर्थिक शक्ति में योगदान देने की क्षमता को बढ़ाना है. इसकी रूपरेखा यही होगी कि विकास करने की क्षमता के आधार पर शहरी आर्थिक क्षेत्रों (CER) का ख़ाका खींचा जाए. इसके लिए, बजट में हर CER के लिए पांच वर्षों के लिए 50 अरब रुपये आवंटित किए गए हैं. ‘सुधार-सह-परिणाम आधारित वित्तपोषण तंत्र वाले चुनौती मोड’ के ज़रिये शहर अपनी योजनाओं को लागू कर सकते हैं.

2023 में नगरपालिकाओं में सुधारों पर विशेष ध्यान दिया गया और राज्य व ULB को प्रोत्साहन पैकेज बांटे गए. 2024 में शहरी आवास और स्ट्रीट वेंडरों पर ज़ोर दिया गया और पिछले वर्ष के बजट में ‘शहरों को विकास-केंद्र’ के रूप में विकसित करने के लिए शहरी चुनौती कोष बनाने की बात कही गई और शहरी शासन, म्युनिसिपल सेवाओं, शहरी नियोजन व शहरी भूमि में राज्य स्तरीय सुधारों को प्रोत्साहित किया गया.

अपने भाषण के पैराग्राफ 40 में वित्त मंत्री ने पर्यावरण हितैषी टिकाऊ सार्वजनिक परिवहन तंत्रों की बात की. उन्होंने बजट में प्रमुख शहरों के बीच सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव रखा, जो हैं-  (1) मुंबई-पुणे, (2) पुणे-हैदराबाद, (3) हैदराबाद-बेंगलुरु, (4) हैदराबाद-चेन्नई (5) चेन्नई-बेंगलुरु (6) दिल्ली-वाराणसी, और (7) वाराणसी-सिलीगुड़ी.

भाषण के पैरा 46 में म्युनिसिपल बॉन्ड का ज़िक्र किया गया है. इसका उद्देश्य बड़े शहरों द्वारा अधिक मूल्य के म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करने को बढ़ावा देना है. इसके तहत, 10 अरब रुपये से अधिक के बॉन्ड जारी करने पर एक अरब रुपये का प्रोत्साहन दिया जाएगा. छोटे शहरों के लिए, कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिए अटल मिशन (AMRUT) के तहत चल रही योजनाओं से ULB को समर्थन देना जारी रखा जाएगा.

पैरा 62 में प्रमुख औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर के आसपास पांच विश्वविद्यालय टाउनशिप बनाने के लिए चैलेंज रूट के ज़रिये राज्यों को सहायता देने का उल्लेख है. ये टाउशनिप राणनीतिक शैक्षणिक क्षेत्रों के रूप में बनाए जाएंगे, जिनमें कई विश्वविद्यालय, कॉलेज, शोध संस्थान, कौशल केंद्र और आवासीय परिसर होंगे. बेशक ये मौजूदा ULB से बाहर होंगे, लेकिन समय के साथ महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में विकसित होंगे. इनके लिए बजट में 16वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को मान लिया गया है और 2026-27 में अनुदान के रूप में राज्यों को 14 अरब रुपये आवंटित करने का फ़ैसला लिया गया है.

बजटीय प्रावधानों का विश्लेषण

दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों को महत्व देना बजट की बड़ी विशेषता है. लघु और मध्यम शहरों के एकीकृत विकास (IDSMT) कार्यक्रम बंद होने के बाद से छोटे व मध्यम शहरों की उपेक्षा होती रही है. शहरीकरण का जो असंतुलित रूप हम आज देखते हैं, जिसमें अधिकांश प्रवासन बड़े शहरों में ही होता है, उसके लिए कुछ हद तक यह भी ज़िम्मेदार है. 2011 की जनगणना में क़रीब चार दर्जन ऐसे शहर थे, जिनकी आबादी पांच लाख से दस लाख के बीच थी. इनके विकास से न सिर्फ़ यहां जीवन की गुणवत्ता सुधर सकती है, बल्कि प्रवासन कम होने से अत्यधिक भीड़भाड़ वाले महानगरों पर दबाव भी कम हो सकता है.

शहरी नियोजन, बुनियादी ढांचे और आवास में सुधार संबंधी प्रावधानों के बाद भी पिछले पांच केंद्रीय बजटों का नतीजा राज्य स्तरीय बाधाओं और शहर स्तरीय सीमाओं से प्रभावित रहा है. इस कारण उन बुनियादी चुनौतियों पर उनका असर कम हुआ है, जिनसे भारतीय शहर जूझ रहे हैं.

इसी तरह, कई परिवहन गलियारों को विकास के वाहक के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है. भारत में, परिवहन-मार्ग विकास का इंजन होते हैं और नए आर्थिक केंद्र बनाते हैं. इसलिए, आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र बनाने और प्रवासन को संतुलित बनाने के लिए ऐसे मार्गों के विकास में तेज़ी लाने और इनकी संख्या बढ़ाने की ज़रूरत है. नगर निगम के बॉन्ड जारी करने का विचार भारत में नया नहीं है, लेकिन कुछ बड़े शहरों को छोड़कर यह बहुत प्रभावी साबित नहीं हो सका है. ज़्यादातर नगर निगम आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं और अभी तक निवेशकों को आकर्षित करने वाली क्रेडिट रेटिंग नहीं पा सके हैं. इसलिए, बॉन्ड बाज़ार को बढ़ावा देने से पहले, केंद्र व राज्य सरकारों को शहरों के स्थानीय निकायों को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाना चाहिए.

ULB के लिए बजट में दिए गए कुछ प्रोत्साहन ‘चैलेंज मोड’ के ज़रिये हैं. पिछले बजट में, शहरों को विकास-केंद्रों में बदलने के लिए 1,000 अरब रुपये का शहरी चुनौती कोष (UCF) बनाया गया था. दुर्भाग्य से, यह फंड ज़्यादातर काग़ज़ों पर ही रहा. आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MOHUA) द्वारा इस योजना के लिए बनाए गए नियमों को कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिल सकी, जिससे यह संभावना कम है कि चालू वर्ष में वित्तीय लक्ष्य पाए जा सकेंगे. इससे इस साल के बजट में बताए गए कार्यक्रम को लेकर भी चिंताएं बढ़ जाती हैं, जो ‘चैलेंज मोड’ पर ही आधारित हैं.

इसी तरह, बजट में राज्यों को 14 अरब रुपये आवंटित किए गए हैं, जो ग्रामीण स्थानीय निकायों, आपदा प्रबंधन और शहरी स्थानीय निकायों पर ख़र्च होंगे. मगर इसका बंटवारा कैसे होगा, इसके बारे में साफ़-साफ़ नहीं बताया गया है. चूंकि यह राशि राज्यों को दी गई है, इसलिए इसका बंटवारा राज्यों की प्राथमिकताओं पर ही निर्भर होगा. हालांकि, ऐसे मामलों में शहरी स्थानीय निकायों को अक्सर नुक़सान उठाना पड़ा है, विशेष रूप से उन राज्यों में, जहां ग्रामीण क्षेत्र अधिक हैं.

बेशक, ULB के लिए बजट-प्रस्ताव की दिशा सही है, लेकिन शहरों में मौजूद दिक्क़तों को देखते हुए वे पर्याप्त नहीं लगते. शहरों पर सरकार द्वारा अधिक ध्यान देने के बावजूद शहरी विकास के प्रयास सीमित दिखते हैं. शहरी नियोजन, बुनियादी ढांचे और आवास में सुधार संबंधी प्रावधानों के बाद भी पिछले पांच केंद्रीय बजटों का नतीजा राज्य स्तरीय बाधाओं और शहर स्तरीय सीमाओं से प्रभावित रहा है. इस कारण उन बुनियादी चुनौतियों पर उनका असर कम हुआ है, जिनसे भारतीय शहर जूझ रहे हैं. इसलिए, अब केंद्र सरकार को न सिर्फ़ शहरों को अधिक संसाधन देने चाहिए, बल्कि अपनी मज़बूत इच्छाशक्ति भी दिखानी चाहिए. 


रामनाथ झा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो हैं.

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