AI भारत में बैंकिंग और कर्ज की दुनिया तेजी से बदल रहा है. अब फोकस सिर्फ बैंक खाता खोलने पर नहीं बल्कि लोगों तक आसान और तेज़ कर्ज पहुंचाने पर है. जानिए, कैसे AI बदल सकता है भारत में फाइनेंशियल इन्क्लूजन की तस्वीर.
जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है, यह समझना जरूरी हो गया है कि वह किसी देश की विकास जरूरतों को कैसे पूरा कर सकता है. भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राइवेट सेक्टर में इनोवेशन में काफी तरक्की हुई है, लेकिन फाइनेंशियल इन्क्लूजन यानी लोगों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है. AI और नई तकनीकों से ऐसी रुकावटों को कम करने का मौका मिला है.
करीब दस साल पहले भारत में फाइनेंशियल इन्क्लूजन का मतलब लोगों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ना था. लेकिन अब सिर्फ बैंक में खाता खुलवाना काफी नहीं है, बल्कि लोगों की आर्थिक भागीदारी जरूरी मानी जा रही है. अब भारत की फाइनेंशियल इन्क्लूजन यात्रा में सबसे ज्यादा ध्यान कर्ज तक पहुंच पर होना चाहिए. भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और फिनटेक सेक्टर की तेज ग्रोथ ने फाइनेंशियल इन्क्लूजन को नई दिशा दी है. अब सिर्फ खाता खोलना नहीं, बल्कि आसान कर्ज, तेज डिजिटल लेनदेन और आर्थिक सुरक्षा तक पहुंच को असली बदलाव माना जा रहा है.
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के फाइनेंशियल इन्क्लूजन इंडेक्स (FI-Index) के मुताबिक, देश में फाइनेंशियल इन्क्लूजन लगातार बढ़ रहा है. यह इंडेक्स 2021 के बाद 24.3 फीसदी बढ़कर 2025 में 67 तक पहुंच गया. यानी बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच और सेवाओं की गुणवत्ता तो बढ़ी है, लेकिन उनका इस्तेमाल अब भी पीछे है.
अब भारत की फाइनेंशियल इन्क्लूजन यात्रा में सबसे ज्यादा ध्यान कर्ज तक पहुंच पर होना चाहिए. भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और फिनटेक सेक्टर की तेज ग्रोथ ने फाइनेंशियल इन्क्लूजन को नई दिशा दी है. अब सिर्फ खाता खोलना नहीं, बल्कि आसान कर्ज, तेज डिजिटल लेनदेन और आर्थिक सुरक्षा तक पहुंच को असली बदलाव माना जा रहा है.
अगर लोग इन सेवाओं का लगातार इस्तेमाल नहीं करते, तो फाइनेंशियल इन्क्लूजन का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा. इस कमी को दूर करने के लिए लोगों को वित्तीय जानकारी देना, भरोसा पैदा करना और ऐसी सेवाएं बनाना जरूरी होगा जो आम लोगों की जरूरतों के हिसाब से हों.जन धन खाते, UPI और बढ़ते डिजिटल लेनदेन ने भारत की वित्तीय व्यवस्था को बदल दिया है. अब फोकस सिर्फ बैंकिंग पहुंच पर नहीं, बल्कि लोगों को कर्ज और आर्थिक सुरक्षा से जोड़कर उनकी असली आर्थिक भागीदारी बढ़ाने पर है.
भारत में फाइनेंशियल इन्क्लूजन लोगों की असली आर्थिक भागीदारी बढ़ाना है. आज कर्ज, डिजिटल पेमेंट और सामाजिक सुरक्षा तक जुड़ी पहुंच इस बदलाव को आगे बढ़ा रही है. देश में 52 करोड़ से ज्यादा जन धन खाते हैं, UPI हर महीने करीब 18 अरब ट्रांजैक्शन कर रहा है और MSME व खेती में लगातार कर्ज बढ़ रहा है. अब ध्यान इस बात पर है कि कर्ज को फाइनेंशियल इन्क्लूजन का मजबूत आधार बनाया जाए.
कर्ज किसी भी वित्तीय सिस्टम की बुनियाद होता है और किसी व्यक्ति की कर्ज चुकाने की क्षमता जांचना इसका अहम हिस्सा है. इसी वजह से कर्ज देने की प्रक्रिया में AI का इस्तेमाल बड़ा बदलाव माना जा रहा है. आज के AI मॉडल लोगों के पेमेंट रिकॉर्ड, आमदनी, खर्च और बिजली बिल या मोबाइल पेमेंट जैसे दूसरे डेटा का विश्लेषण करते हैं. इससे ज्यादा सही क्रेडिट स्कोर और जोखिम प्रोफाइल तैयार किए जा सकते हैं. इसका सबसे ज्यादा फायदा उन लोगों को होता है, जिनके पास पहले से कोई बड़ा क्रेडिट रिकॉर्ड नहीं होता.
उदाहरण के तौर पर, डिसीजन ट्री पर आधारित एल्गोरिद्म अब कर्ज जांच में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. यह तकनीक फाइनेंशियल सेवाओं में नई मानी जाती है, लेकिन इससे कर्ज देने की प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित हुई है. यह सिस्टम सामाजिक और आर्थिक जानकारी, कर्ज चुकाने का व्यवहार और लोन की खासियतों के आधार पर अच्छे और खराब कर्ज लेने वालों के बीच फर्क कर सकता है. इसकी शाखाओं जैसी बनावट अलग-अलग संभावनाओं का आकलन करती है और संस्थाओं को ज्यादा साफ और डेटा आधारित फैसले लेने में मदद देती है.
AI अब कर्ज देने की पूरी प्रक्रिया को तेजी से बदल रहा है. फाइनेंशियल सेक्टर में AI आधारित एल्गोरिद्म अब कर्ज देने के फैसलों को ज्यादा तेज और डेटा आधारित बना रहे हैं. PSB Loans in 59 Minutes जैसे प्लेटफॉर्म दिखाते हैं कि AI आधारित सिस्टम कितनी तेजी से लोन मंजूर कर सकते हैं. AI सिस्टम अब लगातार लोगों की वित्तीय गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं. इससे यह जल्दी पता चल जाता है कि किसी व्यक्ति की कर्ज चुकाने की क्षमता कमजोर हो रही है या नहीं. इससे कर्ज देने वाली संस्थाएं समय रहते जोखिम कम कर सकती हैं. इसके अलावा AI लोन से जुड़े दस्तावेज पढ़ने, जानकारी जांचने, क्रेडिट ब्यूरो से डेटा मिलाने और नए डेटा के हिसाब से मॉडल को अपडेट करने जैसे काम भी कर सकता है.
अगर लोग इन सेवाओं का लगातार इस्तेमाल नहीं करते, तो फाइनेंशियल इन्क्लूजन का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा. इस कमी को दूर करने के लिए लोगों को वित्तीय जानकारी देना, भरोसा पैदा करना और ऐसी सेवाएं बनाना जरूरी होगा जो आम लोगों की जरूरतों के हिसाब से हों.जन धन खाते, UPI और बढ़ते डिजिटल लेनदेन ने भारत की वित्तीय व्यवस्था को बदल दिया है.
MSME सेक्टर के लिए AI की यह क्षमता खास तौर पर अहम है. भारत में कई NBFCs और फिनटेक कंपनियां अब AI एल्गोरिद्म का इस्तेमाल कर रही हैं, जो MSME लोन आवेदन का तेजी से विश्लेषण कर सकते हैं. इसमें ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड, GST फाइलिंग, बिजली बिल, कारोबार का प्रदर्शन और यहां तक कि सोशल मीडिया गतिविधियां भी शामिल होती हैं.
सरकार समर्थित PSB Loans in 59 Minutes जैसे प्लेटफॉर्म दिखाते हैं कि AI आधारित लोन सिस्टम कितनी तेजी से मंजूरी दे सकते हैं. इसका फायदा खासकर छोटे शहरों और उन क्षेत्रों को हो रहा है, जहां पहले कर्ज तक पहुंच मुश्किल थी.
फाइनेंशियल सेवाओं में AI का सबसे बड़ा असर लोगों को उनकी भाषा में और सबको साथ लेकर चलने वाला अनुभव देना है. सोशल मीडिया और कम्युनिकेशन सेक्टर के कई अधिकारियों ने कहा है कि बोलने-बतियाने वाली AI और UPI जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम के जुड़ने से लोगों के लिए अपनी भाषा में आसान फाइनेंशियल सेवाएं मिलना संभव हो रहा है.
भारत के पूर्व G20 शेरपा अमिताभ कांत भी डेटा आधारित कर्ज सिस्टम की अहमियत पर जोर देते हैं. उनका कहना है कि भविष्य का कर्ज सिस्टम कागज रहित, बिना शारीरिक मौजूदगी वाला और अलग-अलग तरह के डेटा पर आधारित होगा. ऐसे सिस्टम में AI पारंपरिक CIBIL स्कोर से आगे जाकर ज्यादा लोगों तक कर्ज पहुंचा सकता है.AI अब फाइनेंशियल सेवाओं को लोगों की अपनी भाषा में आसान और ज्यादा पहुंच वाला बना रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य का कर्ज सिस्टम पूरी तरह डिजिटल, कागज रहित और डेटा आधारित होगा. AI आधारित सिस्टम लोगों की असली आर्थिक स्थिति को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं.
AI को फाइनेंस में सफल मानने का सही पैमाना यह होना चाहिए कि वह लोगों के बीच मौजूद असमानताओं को कम कर रहा है या नहीं. अगर समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो AI भारत में भरोसेमंद, सबको साथ लेकर चलने वाला और टिकाऊ आर्थिक विकास मजबूत कर सकता है.
AI, वैकल्पिक डेटा और डिजिटल पेमेंट सिस्टम मिलकर उन रुकावटों को दूर कर सकते हैं, जिनकी वजह से बड़ी आबादी अब तक औपचारिक फाइनेंस से बाहर रही है. लोगों के व्यवहार, लेनदेन और हालात से जुड़े डेटा का इस्तेमाल करके AI सिस्टम उनकी असली आर्थिक स्थिति को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. इससे फाइनेंशियल इन्क्लूजन का दायरा बढ़ सकता है. लंबे समय में यह बदलाव न सिर्फ कर्ज देने के तरीके को बदल सकता है, बल्कि ज्यादा मजबूत और सबको साथ लेकर चलने वाला वित्तीय सिस्टम भी बना सकता है.
सबसे बड़ी समस्या इसकी बनावट से जुड़ी है. कर्ज, बीमा और निवेश से जुड़े कई AI सिस्टम बिना ज्यादा पारदर्शिता के काम करते हैं. लोग अक्सर यह समझ ही नहीं पाते कि उनके बारे में फैसला कैसे लिया गया. इससे 'मौन बहिष्कार' जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जहां लोगों को बिना साफ वजह बताए सिस्टम से बाहर कर दिया जाता है. रिजर्व बैंक और सेबी ने डिजिटल लेंडिंग और एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग को लेकर कुछ नियम बनाए हैं. लेकिन अब भी ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है, जो सिस्टम को फैसलों की साफ वजह बताने, बराबरी की जांच करने या स्वतंत्र निगरानी के लिए मजबूर करे. इससे पुरानी असमानताएं और मजबूत हो सकती हैं. AI को फाइनेंस में सफल तभी माना जाएगा, जब उसका फायदा महिलाओं, छोटे कारोबारियों, गिग वर्कर्स और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक पहुंचे. तकनीक का असली मकसद आर्थिक असमानता कम करना और ज्यादा भरोसेमंद व सबको साथ लेकर चलने वाला सिस्टम बनाना होना चाहिए.
AI जादू की छड़ी नहीं है. लेकिन अगर इसका इस्तेमाल सही सोच और बराबरी को ध्यान में रखकर किया जाए, तो यह फाइनेंशियल इन्क्लूजन को तेजी से आगे बढ़ा सकता है. असली बदलाव तब होगा, जब छोटे फाइनेंस बैंक, सहकारी समितियां और ग्रामीण बैंक जैसी संस्थाओं को AI इस्तेमाल करने की क्षमता दी जाए. इसके लिए विशेष ग्रांट, ट्रेनिंग और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की जरूरत होगी. साथ ही इनोवेशन को सिर्फ तकनीकी तरक्की से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक असर से भी मापा जाना चाहिए. इसलिए नए प्रयोगों और नियामक परीक्षणों में यह भी देखा जाना चाहिए कि उनका फायदा समाज के कमजोर तबकों तक पहुंच रहा है या नहीं.
पॉलिसी बनाने वालों और नियामकों को उन तकनीकों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जो महिलाओं, कमजोर वर्गों, गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बेहतर नतीजे दें. AI को फाइनेंस में सफल मानने का सही पैमाना यह होना चाहिए कि वह लोगों के बीच मौजूद असमानताओं को कम कर रहा है या नहीं. अगर समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो AI भारत में भरोसेमंद, सबको साथ लेकर चलने वाला और टिकाऊ आर्थिक विकास मजबूत कर सकता है.
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Tanusha Tyagi is a research assistant with the Centre for Digital Societies at ORF. Her research focuses on issues of emerging technologies, data protection and ...
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Sauradeep is an Associate Fellow at the Centre for Security, Strategy, and Technology at the Observer Research Foundation. His experience spans the startup ecosystem, impact ...
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