पारदर्शिता, स्वदेशी AI के विकास और कामकाजियों के कौशल विकास के ज़रिए भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की हिफ़ाज़त करने और न्यायोचित होड़ को बढ़ावा देने के साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तमाम संभावनाओं का दोहन कर सकता है.
आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) इंसान के ज्ञान को पीछे छोड़ रहा है और हमारी दुनिया को नए सिरे से ढाल रहा है. हालांकि, AI के मौजूदा जोखिम और इससे जुड़ी चिंताओं ने विश्वास की कमी वाली ऐसी खाई बना दी है, जो लगातार चौड़ी होती जा रही है. जब तक AI के एल्गोरिद्म या प्रशिक्षण के डेटा स्याह राज़ बने रहेंगे, तब तक कोई भी नियमन कामयाब नहीं हो सकेगा. क्योंकि, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस द्वारा किए जाने वाले फ़ैसले यूज़र्स को दिखाई नहीं देते और उनकी समझ से भी परे होते हैं. ऐसे में अब समय आ गया है कि हम AI के ब्लैक बॉक्स की अपारदर्शिता के पार झांककर देखें.
अब समय आ गया है कि हम AI के ब्लैक बॉक्स की अपारदर्शिता के पार झांककर देखें.
AI के बुनियादी मॉडल जिन्हें कच्चे आंकड़ों के विशाल भंडार की मदद से मुख्य रूप से अमेरिका, ब्रिटेन और चीन स्थित तकनीकी कंपनियों ने तैयार किया है, जैसे कि GPT-o, GPT 4 और 5, जेमिनी 1.0 अल्ट्रा, लामा 2, ग्रेनाइट, टाइटन टेक्स्ट, क्लॉड 3.5, फुयु 8B, जुरैसिक-2, ल्यूमिनस, स्टारकोडर, मिस्ट्राल 7B, स्टेबल डिफ्यूज़न 3 और पालमायरा अब पीएचडी के स्तर की बुद्धिमत्ता के क़रीब पहुंचने को हैं. वैसे तो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ये ताक़तवर मॉडल इंसान और समाज के बर्ताव पर गहरा असर डालते हैं, मगर पारदर्शिता के मामले में इनका प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा है. डेटा तक पहुंच में पारदर्शिता अक्टूबर 2023 में 20 प्रतिशत से घटकर मई 2023 में सात प्रतिशत रह गए थे. रिसर्चर इस गिरावट की वजह डेटा को उजागर करने के क़ानूनी जोखिमों को बताते हैं, ख़ास तौर से जब मामले कॉपीराइट, निजता या फिर अवैध कंटेंट के हों.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बाज़ार पर दबदबे की होड़ और कमज़ोर क़ानून स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं. AI की मूल्य संवर्धन श्रृंखला पर एनविडिया का दबदबा है और, आज जब प्रतिद्वंदी उसके इस दबदबे को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, तो ग्राफिक्स प्रॉसेसिंग यूनिट (GPU) के बाज़ार में उसकी हिस्सेदारी लगभग 80 फ़ीसद है. आज जब भारत अपने AI मिशन को मज़बूत करने के लिए 10 हज़ार GPU ख़रीदने पर विचार कर रहा है, तो GPU के बाज़ार में मौजूदा एकाधिकार, भारी लागत, जीपीयू ख़रीदने की लंबी क़तार और नई चिपों का विकास शायद भारत को नुक़सान पहुंचाए. दिलचस्प बात ये है कि दुनिया का 20 प्रतिशत डेटा (AI को प्रशिक्षित करने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल) औऱ AI की 19 फ़ीसद परियोजनाएं भारत निर्मित करता है.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के मामले में दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत के विशाल बाज़ार का इस्तेमाल अपने प्रयोग के लिए करते हैं, ताकि नई तकनीकों को प्रामाणिक बना सकें. ये आंकड़े इन कंपनियों को मुफ़्त में मिलते हैं. 1.4 अरब नागरिकों के विविधता भरे डेटा और बोलियों के स्वर्ण भंडार का इस्तेमाल करते हुए, AI की अग्रणी कंपनियां, सुपरइंटेलिजेंस के क़रीब पहुंचती जा रही हैं. वहीं, भारत आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के स्वदेशी मॉडल अब तक नहीं बना सका है.
महत्वपूर्ण बात ये है कि, 80 साल पहले दुनिया के पहले कोड तोड़ने वाले कंप्यूटर कोलोसस ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी कोड तोड़ने में मदद की थी. आज आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस युद्ध लड़ने के तौर तरीक़े बदल रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़े ख़तरे पैदा कर रहा है. उल्लेखनीय है कि 2022 से 2023 के बीच AI के लिए अमेरिकी सेना का बजट तीन गुना बढ़ गया और अमेरिकी सीनेट ने चीन से बढ़त बनाए रखने के लिए 32 अरब डॉलर की मांग की थी. AI इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक़, 2023 में अमेरिका ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में 67.2 अरब डॉलर की रक़म का निवेश किया था, जो चीन से 8.7 गुना और भारत से 48 गुना अधिक है. चीन का 47.5 अरब डॉलर का चिप फंड भी अमेरिकी पाबंदियों के बीच आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर केंद्रित है.
सैन्य आविष्कारों और सुरक्षा के जोखिमों से निपटने के लिहाज़ से सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और AI बेहद अहम हैं. जहां अमेरिका, चीन के लक्ष्य आधारित तकनीकी निवेशों पर क़ाबू पाने के क़रीब पहुंच रहा है, वहीं रूस भी एकाधिकार रोकने के लिए AI के क्षेत्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. ऐसे प्रतिबंध नैतिकता, सुरक्षा, संप्रभुता और उन नीतियों पर सवाल खड़े करते हैं, जो AI के प्रशासन से जुड़ी हैं. ओपन एआई का पहुंच सीमित करना और चीन के लिए अपने दरवाज़े बंद करने का फ़ैसला दुनिया में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की भू-राजनीति में भरोसे की कमी की खाई को और चौड़ा कर सकते हैं. आज जब एनविडिया के ब्लैकवेल और CUDA-Q जैसे सॉफ्टवेयर प्लेटफ़ॉर्म कंप्यूटिंग को और मज़बूत बना रहे हैं, तो भारत को क्यूडा के लॉक-इन और स्वदेशी AI विकसित करने जैसे मसलों पर विचार करना चाहिए. 4 ट्रिलियन डॉलर GDP वाले भारत के लिए अब समय आ गया है कि आज जब ख़रबों डॉलर वाली बड़ी तकनीकी कंपनियां और बड़ी होती जा रही हैं, तो वो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को लेकर अपनी तैयारी का मूल्यांकन करे.
भारत का आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का मिशन घरेलू आविष्कारों के विकास पर बल देता है, ताकि तकनीकी संप्रभुता बनी रहे. आज जब सरकार AI का इनोवेशन इकोसिस्टम बनाने में इस मिशन की प्रगति की समीक्षा कर रही है, तो उसे चाहिए कि वो सामरिक साझेदारियों, सबके लिए पहुंच सुलभ बनाने, स्वदेशी AI विकसित करने, सबसे काबिल लोगों को साथ लाने, स्टार्ट अप को पोषित करने और समावेशी AI के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करे.
आज जब एनविडिया के ब्लैकवेल और CUDA-Q जैसे सॉफ्टवेयर प्लेटफ़ॉर्म कंप्यूटिंग को और मज़बूत बना रहे हैं, तो भारत को क्यूडा के लॉक-इन और स्वदेशी AI विकसित करने जैसे मसलों पर विचार करना चाहिए.
राष्ट्रीय सुरक्षा की हिफ़ाज़त के लिए भारत को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की जानकारी, निजता के संरक्षण, विनियमन के मसलों, कॉपीराइट के क़ानून, और एकाधिकार की जांच को मज़बूत बनाना चाहिए, जिनके दायरे में पहले विकसित किए गए AI भी आएं. भारत को चाहिए कि वो ये परिभाषित करे कि AI के मॉडलों के ‘इनपुट’ और ‘आउटपुट’ पर किसका मालिकाना हक़ होगा. चिप के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने और तकनीकी संप्रभुता के लिए भारत को मूनशॉट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना चाहिए.
वैसे तो लार्ज लैंग्वेज मॉडल के बंद संस्करण, ओपेन सोर्स मॉडलों को पछाड़ देते हैं. लेकिन, सवाल ये है कि ओपेन किस हद तक ओपेन सोर्स है? आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के औज़ारों के कच्चे माल और AI के मॉडलों के डेटा, उनके कंप्यूटेशन तक पहुंच, शर्तें और सौदे अपारदर्शी होते हैं और इन पर बड़ी तकनीकी कंपनियों का नियंत्रण होता है. ऐसी अपारदर्शिता की चिंताओं ने अमेरिकी संसद के निचले सदन को-पायलट और चैटजीपीटी को अपने कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधित करने पर मजबूर किया था. AI की कंपनियां दावा करती हैं कि वो चैटजीपीटी तक पहुंच को सस्ता करके भारत पर ध्यान केंद्रित करके और भारत के विशाल भारतीय भाषा के भंडार से सीख करके भारत के मिशन में मदद करती हैं. हालांकि, सफल होने के लिए भारत को स्वदेशी AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और डिजिटल लेनदेन के रिसर्च और विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि GDP विकास को 10 प्रतिशत तक पहुंचाया जा सके.
चूंकि AI, क़ानून लागू करने को भी चुनौती देता है, इसलिए भारत को अमेरिका के न्याय विभाग की तरह मुख्य AI अधिकारी नियुक्त करने की संभावनाएं तलाशनी चाहिए. जब बात निजता, सुरक्षा, न्यायोचित प्रतिद्वंदिता और ग्राहक के संरक्षण की बात आती है, तो शायद एक खुला तरीक़ा नुक़सानदेह साबित हो. ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हासिल किए गए डेटा पर प्रशिक्षित मॉडलों की पड़ताल की जानी चाहिए और डेटा का भी परीक्षण किया जाना चाहिए, ताकि AI का भरपूर लाभ उठाया जा सके. न कि, कुछ गिने चुने लोग क्रिएटरों से मूल्य हासिल कर सकें और छोटे और मध्यम दर्जे के कारोबार को इससे दूर रखे रहें.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की लगभग 40 प्रतिशत नौकरियों पर AI से ख़तरा है. यहां तक कि बड़े बड़े इंजीनियर भी अब नौकरी हासिल करना एक बड़ी चुनौती देख रहे हैं. ऐसे में भारत को चाहिए कि वो AI को लेकर अपनी तैयारी में सुधार करे, प्रतिभाओं को हुनर सिखाए और अपनी आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुताबिक़ इनोवेशन को बढ़ावा दे. आज जब AI जवाब देने में ज़्यादा चतुर होता जा रहा है, तो हमें हमारे मक़सद, मूल्य, व्यवहार और गतिविधियों पर विचार करना चाहिए, ताकि बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें: हमें क्या पता है, कैसे पता है और हमें जो बात नहीं मालूम उसका हल कैसे निकालेंगे?
FTC के प्रमुख ज़ोर देकर कहते हैं कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की संभावनाओं और इसके अवसरों का लाभ उठाने के लिए हमें AI के पूरे स्टैक की अन्यायोचित अपारदर्शिता की छानबीन करनी चाहिए. फिर चाहे वो चिप हो, क्लाउड, मॉडल, कंप्यूटिंग, कच्चे माल, साझेदारियां, शर्तें, ऐप या फिर इनपुट तक पहुंच ही क्यों न हो. इनमें से किसी भी परत द्वारा बाज़ार का गला घोंटने, वैश्विक मालिकाना हक़ वाले डेटा पर क़ब्ज़ा, निजता का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, न ही ताक़त किसी एक के पास केंद्रित करनी चाहिए. यूरोपीय संघ (EU) ने बड़ी तकनीकी कंपनियों द्वारा किए जाने वाले AI के सौदों में एकाधिकार की छानबीन तेज़ कर दी है.
क़ानूनी व्यवस्था के पास वैसी प्रतिभा और कौशल होना चाहिए, जो ये समझ सके कि AI वास्तव में कैसे काम करता है और इसके सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेंगे.
क़ानून लागू करने वालों को चाहिए कि वो वैज्ञानिकों, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं को काम पर रखें, ताकि संस्थागत एकाधिकारों से निपट सकें. क़ानूनी व्यवस्था के पास वैसी प्रतिभा और कौशल होना चाहिए, जो ये समझ सके कि AI वास्तव में कैसे काम करता है और इसके सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेंगे. AI सुरक्षा एजेंसी की स्थापना, कानून लागू करने वालों के लिए मददगार बन सकती है और इससे, न्यायोचित होड़ को बढ़ावा देकर और AI की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करके उत्तरदायी AI के विकास और अपनाने को बढ़ावा दिया जा सकता है.
बहुत शोर-शराबे के बावजूद आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की संभावनाएं तमाम जवाबदेहियों के साथ जुड़ी हुई हैं. AI की कंपनियों को चाहिए कि स्व नियमन पर ज़ोर न दें. क्योंकि, अपने से अपना नियमन करना, मुनाफ़े के दबाव को नहीं झेल सकता है. एकाधिकार के ख़िलाफ़ मुक़दमे बहुत महंगे हो सकते हैं, जिससे मेहनत से हासिल की गई प्रतिष्ठा जा सकती है. IMF चेतावनी देता है कि अगर हम जोखिमों से निपटने में सफल नहीं होते हैं, तो AI अगली आर्थिक मंदी को जन्म दे सकता है. अब समय आ गया है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का विनियमन किया जाए, कामगारों का कौशल विकास किया जाए और क़ानूनी व्यवस्था को AI की वजह से आ रहे बदलाव से निपटने में सक्षम बनाया जाए. AI किसी सीमा को नहीं मानता; इसलिए हमें अपनी श्रम और टैक्स नीतियों को मानव केंद्रित बनाना होगा.
जैसा कि हाल ही के वैश्विक इंडियाएआई शिखर सम्मेलन में वादा किया गया है, भारत को चाहिए कि वो AI को लोकतांत्रिक बनाने के लिए इसके ‘वास्तविक जोखिमों और अवसरों’ का मूल्यांकन करें. AI को संकीर्ण बनाने या एकाधिकार को बढ़ावा देने वाला रहने देने से आविष्कारों को ही क्षति पहुंचेगी. संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा देशों के बीच डिजिटल खाई को पाटने के लिए AI के क्षेत्र में सहयोग के प्रस्ताव को स्वीकार करना एक स्वागत योग्य क़दम है. भारत AI पर भरोसे की समस्या का समाधान करने और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का दोहन करने के लिए दुनिया को सिखाने वाला ऐसा मॉडल पेश कर सकता है, जो सुरक्षित, आसान पहुंच वाला, समावेशी, विश्वसनीय और प्रभावी भी हो.
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Kiran Yellupula has over two decades of leadership experience in managing strategic communications for IBM, Accenture, Visa, Infosys, JLL and Adfactors. He also has a ...
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