ब्राज़ील इस साल लगातार तीन महत्वपूर्ण वैश्विक समूहों की अध्यक्षता कर रहा है, जिसमें G-20, ब्रिक्स और COP30 शामिल हैं. ज़ाहिर है कि इससे ब्राज़ील को व्यापार, स्वास्थ्य, हरित ऊर्जा और डिजिटल गवर्नेंस को लेकर दक्षिण-दक्षिण नीतिगत सहयोग को मज़बूत करने का एक अहम अवसर मिला है.
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ब्राज़ील में हो रहा 17वां ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) शिखर सम्मेलन कई मायनों में अभूतपूर्व है. सबसे पहले, ब्राज़ील वर्ष की दूसरी तिमाही में COP30 की अध्यक्षता करने जा रहा है, ऐसे में उसे एक साल के कामकाज को केवल छह महीनों में पूरा करना पड़ा है. दूसरी अहम बात यह है कि ब्राज़ील ब्रिक्स की अध्यक्षता G20 की अध्यक्षता करने के तुरंत बाद कर रहा है, जो कि इतिहास में एक अनोखा अवसर उपलब्ध कराता है, क्योंकि इससे पहले किसी देश ने एक के बाद इतने अहम समूहों की अध्यक्षता नहीं की है. ब्राज़ील के लिए यह स्वास्थ्य सहयोग और ग्लोबल गवर्नेंस में सुधार जैसी अपनी G20 की उपलब्धियों को सिलसिलेवार तरीक़े से आगे बढ़ाने और उन पर ब्रिक्स समूह के भीतर आम सहमति बनाने का मौक़ा भी है.
ब्राज़ील ब्रिक्स की अध्यक्षता G20 की अध्यक्षता करने के तुरंत बाद कर रहा है, जो कि इतिहास में एक अनोखा अवसर उपलब्ध कराता है, क्योंकि इससे पहले किसी देश ने एक के बाद इतने अहम समूहों की अध्यक्षता नहीं की है.
ब्राज़ील ने इस वर्ष के BRICS की थीम “अधिक समावेशी और सतत शासन के लिए वैश्विक दक्षिण सहयोग को मज़बूत करना” रखी है. इस थीम के ज़रिए ब्राज़ील ने सिर्फ़ बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाए सटीक संदेश की कोशिश की है. इस थीम से स्पष्ट हो जाता है कि ब्राज़ील ब्रिक्स समिट के दौरान विकास और प्रगति पर अपना ध्यान केंद्रित रखने के लिए प्रतिबद्ध है. ऐसा इसलिए भी संभव हो पाया है क्योंकि ब्रिक्स के सदस्य देशों ने तमाम भू-राजनीतिक मतभेदों के बावज़ूद पारस्पिक सहयोग को बरक़रार रखा है, ख़ास तौर पर आर्थिक विकास और मुद्दा आधारित सहयोग को मज़बूत करने में ब्रिक्स आगे बढ़ा है. ज़ाहिर है कि इन सहयोगी संबंधों को लेकर सदस्य देशों में कोई मतभेद नहीं है और यह सब 'आम सहमति' से हुआ है, जो कि ब्रिक्स समूह में निर्णय लेने का बुनियादी सिद्धांत है.
ब्रिक्स की गतिविधियों पर बारीक़ी से नज़र डाली जाए तो इसने अब तक सदस्य देशों की घरेलू ज़रूरतों और चिंताओं को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी है, यानी इनसे दूरी बनाकर रखी है और इनके समाधान में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. इसी रवैये की वजह से ग्लोबल साउथ से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों पर ब्रिक्स ने ज़्यादा कुछ हासिल नहीं किया है और बेहद मामूली प्रगति हासिल की है.
ज़ाहिर है कि इनमें सबसे बड़ा मुद्दा व्यापार को सुगम और सुविधाजनक बनाने का है. उम्मीद है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में लीडर्स डिक्लेरेशन यानी अध्यक्ष के घोषणापत्र में इसका उल्लेख ज़रूर होगा. ब्राज़ील ने भारत और दक्षिण अफ्रीका के समर्थन से वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के ज़रिए व्यापार सहयोग पर सार्थक बातचीत की है. इतना ही नहीं, ब्राज़ील डिजिटल पेमेंट और स्थानीय मुद्रा में भुगतान के मुद्दे पर भी सदस्य देशों के बीच बातचीत में सहमति बनाने में सफल रहा है. ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद अध्यक्ष की ओर से जो वक्तव्य जारी किया गया था उससे यह साफ हो जाता है कि सीमा पार भुगतान के लिए एक प्लेटफॉर्म पर बातचीत चल रही है. हालांकि, इससे यह भी स्पष्ट है कि ब्रिक्स देशों के बीच एक कॉमन करेंसी यानी एक मुद्रा को लेकर कोई विचार-विमर्श नहीं हुआ है. ज़ाहिर है कि ब्रिक्स की कॉमन करेंसी का मुद्दा उठाया जाता रहा है, लेकिन धरातल पर इसका कोई वज़ूद फिलहाल नहीं है. ब्रिक्स देशों की एक कॉमन करेंसी की चर्चा लंबे समय से चल रही है, लेकिन शुरू से ही सभी को पता है कि यह एक ऐसा मसला है, जो संभव नहीं हो सकता है. इसके अलावा, हाल में ही जिस प्रकार से ब्रिक्स समूह का विस्तार हुआ और नए सदस्य देश इसमें जुड़े हैं, उसके बाद तो यह बिलकुल असंभव हो चुका है.
ब्रिक्स की कॉमन करेंसी का मुद्दा उठाया जाता रहा है, लेकिन धरातल पर इसका कोई वज़ूद फिलहाल नहीं है.
व्यापार सहयोग के बाद ब्रिक्स में दूसरा अहम मुद्दा वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग को लेकर चर्चा है. ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे ब्राज़ील ने सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में वैश्विक समुदाय की नाक़ामी को एक-एक करके संबोधित करने की योजना तैयार की है. G20 की प्रेसीडेंसी के दौरान ब्राज़ील ने भूख और ग़रीबी के विरुद्ध ग्लोबल अलायंस की स्थापना की थी. वहीं, BRICS की अध्यक्षता के दौरान ब्राज़ील ने वैक्सीन सहयोग और “सामाजिक रूप से निर्धारित बीमारियों को समाप्त करने” का मुद्दा चुना है. यानी TB, मलेरिया और दूसरी ट्रॉपिकल बीमारियों को समाप्त करने के लिए वैक्सीन सहयोग का मुद्दा चुना है. टीबी जैसी बीमारियां फिर से उभर रही हैं और इसको लेकर दुनिया के देश कहीं न कहीं लापरवाह हो गए हैं. ब्रिक्स के सदस्य देशों में भी यह देखने को मिल रहा है, हालांकि इसकी बड़ी वजह इसमें शामिल होने वाले नए राष्ट्र हैं. कहने का मतलब है कि ब्रिक्स के नए सदस्य देशों में इस तरह की बीमारियां फैली हुई हैं और वे अभी भी पुरानी बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए जूझ रहे हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इन देशों में इन बीमारियों को लेकर जागरूकता का आभाव है. ब्रिक्स समिट के दौरान सदस्य देशों में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों को साझा करने पर बातचीत होगी. ज़ाहिर है कि इससे तमाम सदस्य देशों को फायदा होगा और उन्हें बीमारियों से लड़ने की क्षमता हासिल होगी. वैक्सीन के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करना ब्रिक्स का बहुत पुराना लक्ष्य है और शिखर सम्मेलन में पारस्परिक सहयोग से जुड़ा यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. ब्रिक्स में वर्ष 2018 में वैक्सीन सहयोग की मुहिम शुरू की गई थी और ब्रिक्स समूह के हर राष्ट्र के पास इस काम के लिए एक विशेष वैक्सीन अनुसंधान और विकास (R&D) केंद्र है. इन्हीं केंद्रों को भागीदार देशों के साथ वैक्सीन सहयोग की ज़िम्मेदारी दी गई है.
BRICS देशों के बीच पारस्परिक सहयोग में कनेक्टिविटी और आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया है. जिस प्रकार से महामारी और पश्चिम एशियाई संकट के दौरान व्यापार पर असर पड़ा है, उसने देखा जाए तो ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार के वैकल्पिक मार्गों की ज़रूरत पर बल दिया है. इन संकटों ने अफ्रीकी देशों के बीच कनेक्टिविटी के महत्व को सामने लाने का काम किया है. ज़ाहिर है कि अफ्रीकी महाद्वीप संभावनाओं और अवसरों से भरा है और वैश्विक विकास और वृद्धि में अपनी अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार है. इतना ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने के लिए अफ्रीका की स्थिरता और विकास बेहद महत्वपूर्ण हो गया है. ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि 2000 के दशक के चीन जैसे विकास के प्रमुख वैश्विक केंद्र अब अपनी चमक खोने लगे हैं.
ब्रिक्स 2030 इकोनॉमिक पार्टनरशिप स्ट्रैटेजी में साफ तौर पर कहा गया है कि 'डिजिटल गवर्नेंस' जैसे नए व्यापार मुद्दों पर चर्चा की जाए और समूह के देशों के बीच व्यापार की लागत को कम करने पर फोकस किया जाए.
ऐसे में ब्रिक्स समिट के दौरान राष्ट्राध्यक्षों के बीच कनेक्टिविटी, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाने और इन सेक्टरों में चल रही परियोजनाओं को गति देना चर्चा के केंद्र में हो सकता है. इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश एक ऐसा मुद्दा है जिसमें बहुत संभावनाएं हैं और इसे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में तवज्जो हासिल हो सकती है.
ज़ाहिर है कि दुनिया के सभी बड़े और तेज़ी से बढ़ते देशों के लिए ज़रूरी सामानों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए स्थिर और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बेहद ज़रूरी हैं. हालांकि, समय-समय पर आवश्यक वस्तुओं की परिभाषा ज़रूर बदलती है. ऐसे में ब्रिक्स देश भी अपवाद नहीं है और इनके लिए भी स्थिर और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं. ब्रिक्स समूह के इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे नए सदस्य देश इस बार के शिखर सम्मेलन में आपूर्ति श्रृंखलाओं के मुद्दे पर चर्चा का केंद्र हो सकते हैं. ब्रिक्स 2030 इकोनॉमिक पार्टनरशिप स्ट्रैटेजी में साफ तौर पर कहा गया है कि 'डिजिटल गवर्नेंस' जैसे नए व्यापार मुद्दों पर चर्चा की जाए और समूह के देशों के बीच व्यापार की लागत को कम करने पर फोकस किया जाए. इस रणनीति में बुनियादी ढांचे के विकास, लॉजिस्टिक्स और बंदरगाह कनेक्टिविटी में सुधार के बारे में भी काफ़ी कुछ कहा गया है, साथ ही ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा की मज़बूती पर भी ध्यान केंद्रित करने की बात कही गई है.
आख़िर में, ब्रिक्स समूह के देशों के बीच जो आधुनिक आर्थिक सहयोग है, उसमें डिजिटल अर्थव्यवस्था और डिजिटल परिवर्तन जैसे विषयों को लेकर चर्चा बेहद महत्वपूर्ण है. इसमें घरेलू औद्योगीकरण, सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (MSME) को बढ़ावा देने और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आपसी सहयोग जैसे अहम मुद्दे भी शामिल हैं. ज़ाहिर है कि ब्रिक्स राष्ट्र, चाहे वे नए हों या पुराने सदस्य देश अपनी मूल्य श्रृंखला भागीदारी में इस समय ज़बरदस्त बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं.
जहां तक भारत की बात है, तो भारत के लिए BRICS सदस्य देशों के साथ बातचीत का एक महत्वपूर्ण मंच है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि भारत इस प्लेटफॉर्म के ज़रिए विकास और प्रगति से जुड़े मुद्दों पर बहुत कुछ हासिल भले नहीं कर पाए, लेकिन इन मुद्दों पर व्यापक सहमति बना सकता है. इसके अलावा ब्रिक्स के माध्यम से भारत पश्चिमी देशों के साथ अपनी भागीदारी और साझेदारी से पीछे हटे बगैर ग्लोबल साउथ के मुद्दों को पुरज़ोर तरीक़े से उठा सकता है और उनकी आवाज़ बन सकता है. जिस प्रकार से भारत एक स्वतंत्र और निष्पक्ष अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली के लिए लगातार अपनी प्रतिबद्धता जताता रहा है और पुरानी बहुपक्षीय संस्थाओं को सशक्त करने पर ज़ोर देता रहा है, उससे यह साबित भी होता है. भारत ब्रिक्स के भीतर भी खुलकर अपने इन विचारों को रखता रहा है और मुक्त वैश्विक व्यापार की पैरोकारी करता रहा है. BRICS के अन्य सदस्यों, जिनमें नए सदस्य भी शामिल हैं, उनके लिए भी यह एक सच्चाई है, जो देखा जाए तो ब्रिक्स समूह की गैर-बाध्यकारी लेकिन आम सहमति से फैसले लेने की क्षमता से प्रभावित हैं और इसीलिए इसमें शामिल हुए हैं.
जाह्नवी त्रिपाठी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Jhanvi Tripathi is an Associate Fellow with the Observer Research Foundation’s (ORF) Geoeconomics Programme. She served as the coordinator for the Think20 India secretariat during ...
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