Published on Jun 26, 2017 Updated 2 Days ago

बीआरआई का अभ्‍युदय एशिया में अमेरिकी सामरिक भ्रम से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

बीआरआई: चीन-भारत समीकरण में पेंच

भारत द्वारा एकाकी मार्ग का अनुसरण करने के साथ-साथ हाल के महीनों में चीन की सबसे महत्वाकांक्षी आर्थिक एवं राजनीतिक पहल पर उसके चर्चित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘बेल्ट एवं रोड फोरम’ का बहिष्कार किए हुए एक माह से भी अधिक समय बीत चुका है। भारत का यह निर्णय अखबारों की सुर्खियों में रहा और इस पर तीखी प्रतिक्रिया एवं भांति-भांति के विचार सामने आए। कुछ ऐसा ही हाल देश के भीतर भी देखने को मिला।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचकों ने इसे गलत कदम बताया और इसके साथ ही कहा कि चीन की निवेश एवं कनेक्टिविटी परियोजना की उपेक्षा करने की कोई जरूरत नहीं थी क्‍योंकि इस पहल का एक हिस्सा बनकर भारत लाभान्वित हो सकता था। हालांकि, मुख्यधारा से जुड़ी राय यही है कि भारत सरकार के पास वास्तव में और कोई चारा नहीं रह गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति टीम का यही मानना है। वहीं, भारत के प्रधानमंत्री ने चीन को बाजार पहुंच की पेशकश करने के साथ-साथ उसे कोई भी असुविधा न होने देने के लिए भरसक प्रयास किए थे। हालांकि, राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भारत के ये कदम कतई रास नहीं आए थे और उन्‍होंने भारतीय फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए चाइनीज बाजार को खोलने से लेकर आतंकवाद से जुड़ी भारतीय चिंताओं तक के कई मुद्दों पर भारत की एक नहीं सुनी थी।

बेल्ट एवं रोड पहल (बीआरआई) इस दिशा में पराकाष्‍ठा थी। इस पहल का एक हिस्सा अर्थात चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भारतीय संप्रभुता के आड़े आ रहा था, क्योंकि यह उस इलाके से होकर गुजरता था जिस पर भारत ने कानूनी तौर पर दावा कर रखा है। इससे भी बड़ी बात यह है कि भारत के पास-पड़ोस अर्थात दक्षिण एशिया एवं हिंद महासागर क्षेत्र में क्रियान्वित की जा रही विभिन्‍न बीआरआई परियोजनाएं दुनिया के उस हिस्से में अलाभकारी निवेश, नव-औपनिवेशिक निर्भरता और संभावित राजनीतिक उथल-पुथल को बढ़ावा देती रही थीं जिसका असर भारत पर पड़ता था। यही नहीं, इन परियोजनाओं को भारत की अपनी खुद की वैध या न्‍यायसंगत आकांक्षाओं की राह में राजनीतिक अवरोध भी माना जाता था।

ये सारी बातें जगजाहिर हैं। अब यह जानना जरूरी है कि ताजा हालात क्‍या हैं? इस संदर्भ में निम्‍नलिखित तीन बिंदुओं पर ध्यान देने की जरूरत है।

पहली बात, बीआरआई फोरम में भारत सरकार की पूर्णतया नामौजूदगी ने चीन को वास्तव में हैरत में डाल दिया था। चीन ने इसके बाद आयोजित अनेक कार्यक्रमों के दौरान भारतीय अधिकारियों के साथ अनौपचारिक बातचीत में इस बात का स्‍पष्‍ट रूप से उल्‍लेख किया। यही नहीं, अस्ताना में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के दौरान भी इस बात का जिक्र किया गया। हालांकि, एक अर्थ में, नई दिल्ली स्थित रणनीतिक समुदाय के विभिन्‍न वर्गों की ओर से आई टिप्पणी, विश्लेषण और प्रतिक्रिया ने उन्‍हें गुमराह कर दिया था या उन्‍होंने स्वयं को गुमराह होने दिया था। इस समुदाय में कुछ लोग तो चीन के पुराने वार्ताकार हैं और कुछ लोग विशेष रूप से वर्तमान शासन व्‍यवस्‍था का ही हिस्सा हैं। किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि अंत में मोदी तमाम दावों को खोखला साबित कर देंगे और बीआरआई फोरम में किसी को भी भेजने से साफ इनकार कर देंगे। दरअसल, भारत के प्रधानमंत्री बीआरआई को भारत के साथ-साथ अपनी विरासत के लिए भी जिस हद तक एक रणनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं उसका सही अंदाजा नहीं लगाया गया है।

मोदी इस बारे में क्या कर सकते हैं और क्या वह बीआरआई के व्यावहारिक विकल्प ( भले ही वे पूर्णतया समकक्ष न हों क्‍योंकि यह मुश्किल और अनावश्यक दोनों ही है) प्रदान करने के लिए भारतीय कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं एवं समुद्री क्षमताओं को पर्याप्त स्तर तक बढ़ा सकते हैं, यह एक अलग बात है। सच्‍चाई तो यही है कि चीन ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ उनकी सरकार के मूड को भी गलत तरीके से पढ़ा है। यह बात अपने आप में ही इस तथ्‍य को रेखांकित करने के लिए पर्याप्‍त है कि चीन को कम से कम सामरिक दृष्टि से ही सही अपना नजरिया नए सिरे से तय करना चाहिए। इसके लिए चीन को भारत की राजधानी में राजनयिक एंटीना की जरूरत होगी जिसे किसी न किसी रूप में अपग्रेड करना होगा।

दूसरी बात, भारत स्पष्ट रूप से बीआरआई को चीन का एक ऐसा विस्तारवाद मानता है जो उसे अस्वीकार्य है। एक सीधे-सादे भारतीय टिप्पणीकार ने भले ही इसे ‘एशिया के लिए मार्शल योजना’ के रूप में वर्णित किया हो, लेकिन यह उससे कहीं अलग हटकर है। दरअसल, बीआरआई को चीन और विभिन्‍न देशों के बीच द्विपक्षीय परियोजनाओं की एक श्रृंखला के रूप में देखा जा रहा है जिन्‍हें एक बहुपक्षीय रूपरेखा या ढांचे (फ्रेमवर्क) के तौर पर पेश किया जा रहा है। एक भारतीय अधिकारी ने तो साफ-साफ शब्‍दों में कहा है, ‘यह बहुपक्षीय नहीं है। नवीन विकास बैंक बहुपक्षीय है। यहां तक कि एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) भी एक बहुपक्षीय संस्थान है, क्योंकि इसके संचालन के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानदंडों को अपनाया जा रहा है और इसके साथ ही इस पर अनेक देशों का स्वामित्व है। बीआरआई बहुपक्षीय नहीं है। इसकी कमान चीन के हाथों में है और यह चीन द्वारा शासित है। चीन इसमें अन्‍य संस्‍थाओं एवं वास्तविक बहुपक्षीय संस्थानों की सहभागिता और सह-वित्तपोषण की गुंजाइश को खत्‍म करता जा रहा है।’

तीसरी बात, बीआरआई का अभ्‍युदय एशिया में अमेरिकी सामरिक भ्रम और डोनाल्ड ट्रम्प के आरंभिक शासन काल के अस्थिर स्‍वरूप से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। ऐसे में, भारत को आवश्‍यक समर्थन के लिए कि‍स सहयोगी की ओर मुखातिब होना चाहिए? चीन यूरोपीय संघ में ‘फूट डालो एवं शासन करो’ के लिए अपनी ओर से जो कुत्सित प्रयास कर रहा है उस वजह से यूरोप में असहज स्थिति देखने को मिल रही है। भारतीय नेतृत्व के साथ वार्तालापों में जर्मनी और फ्रांस दोनों के ही राजनेताओं ने चीन की शक्‍ल एवं अगुवाई वाली विश्व व्यवस्था कायम होने की संभावनाओं के प्रति आगाह किया है।

इसके बावजूद ये दोनों देश, कम से कम जर्मनी तो बीआरआई का हिस्सा बनने से होने वाले अल्पकालिक वाणिज्यिक अनुबंधों से संभावित फायदों को लेकर काफी उत्‍साहित है। ऐसे में, वे फिलहाल भारत का साथ न देकर खुले आम अपना हित साधने में जुट गए हैं। इसके बावजूद फ्रांस और जर्मनी की सहभागिता वाली यूरोपीय परियोजना की समग्रता के साथ एक संयुक्त अथवा एकजुट यूरोपीय संघ से होने वाला भारतीय लाभ पहले की तुलना में कहीं ज्‍यादा मजबूत नजर आ रहा है। इसी तरह पूरब में भारत की यह धारणा आज कहीं ज्‍यादा सुस्‍पष्‍ट प्रतीत हो रही है कि आसियान की वर्तमान एकजुटता को, जहां तक संभव हो सके, लंबे समय तक बरकरार रखा जाना चा‍हिए, भले ही दक्षिण पूर्व एशियाई समूह में विभाजन के लिए चीन अपनी ओर से कितनी भी कोशिशें क्‍यों न कर रहा हो।

आसियान और यूरोपीय संघ दोनों की ही दीर्घकालिक संभावनाएं चाहे कुछ भी हों, लेकिन अपने वर्तमान स्‍वरूप में उन्‍हें चीन के मार्ग में अवरोध या ढाल के रूप में देखा जाता है। भारतीय निवेश चाहे राजनीतिक हो अथवा किसी और रूप में हो, इसके साथ-साथ इन संगठनों में दोनों विशिष्ट देशों के संग-संग इन समग्र संगठनों के साथ भी सहभागिता बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं। उस मायने में यदि देखा जाए, तो भारत 2000 के दशक की आरंभिक अवधि के विपरीत अब ‘पुराने यूरोप’ के साथ-साथ अपने मूल ‘लुक ईस्ट’ मित्रों को भी फिर से तलाश रहा है। इन क्षेत्रों को एक समय अमेरिका जाने का रूट (मार्ग) माना जाता था। आज, वे बस वैकल्पिक मार्ग बनकर रह गए हैं।

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