Author : Arpan Tulsyan

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Published on Mar 18, 2026 Updated 0 Hours ago

स्कूलों में रोज़ाना बम धमकी जैसी सूचनाएं आती रहती हैं जिससे छात्रों और स्टाफ में डर फैलता है. असल में ये छोटी-छोटी गड़बड़ियां सुरक्षा कमजोरियों को उजागर करती हैं. जानिए इनको नियंत्रित करने के क्या तरीके हो सकते हैं.

स्कूलों में बम धमकियांः क्या है सुरक्षा की कहानी?

एक परिचित पैटर्न में, हाल के हफ्तों में दिल्ली एनसीआर, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और अन्य राज्यों के कई स्कूलों को बम-धमकी वाले ईमेल प्राप्त हुए हैं. अधिकांश मामलों में विस्फोटक नहीं मिले; फिर भी इन धमकियों के कारण स्कूलों को खाली कराना पड़ा, आपातकालीन तलाशी ली गई, परीक्षाएं बाधित हुईं और छात्रों व अभिभावकों में व्यापक चिंता फैल गई. पुलिस और आपातकालीन सेवाओं को बार-बार अल्प सूचना पर तैनात किया गया जबकि बाद में इनमें से कई घटनाएं केवल फर्जी साबित हुईं.

ये धमकियां कम लागत लेकिन बड़े प्रभाव वाले व्यवधान का एक तरीका हैं. डिजिटल गुमनामी का उपयोग करके स्कूलों और अस्पतालों जैसे संस्थानों को निशाना बनाया जाता है, जहां भावनात्मक संवेदनशीलता अधिक होती है. ऐसे में मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि भारत में स्कूल सुरक्षा नियम मौजूद हैं या नहीं बल्कि यह है कि क्या मौजूदा सुरक्षा और आपदा-प्रतिक्रिया प्रणाली आधुनिक, सूचना-आधारित खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है.

बम धमकियां भी अब सुरक्षा का हिस्सा

भारत की स्कूल सुरक्षा व्यवस्था अपेक्षाकृत व्यापक है. इसमें मुख्य रूप से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दिशा-निर्देश: स्कूल सुरक्षा नीति (2016) शामिल है जो प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों प्रकार के जोखिमों को शामिल करते हुए ‘ऑल-हैजर्ड्स’ दृष्टिकोण अपनाती है. इसके अलावा स्कूल सुरक्षा और संरक्षा दिशानिर्देश (2021), जो स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSEL) द्वारा जारी किए गए हैं, ‘समग्र स्कूल सुरक्षा’ ढाँचा प्रस्तुत करते हैं और स्कूल प्रबंधन को जिम्मेदारियां सौंपते हैं.

डिजिटल गुमनामी का उपयोग करके स्कूलों और अस्पतालों जैसे संस्थानों को निशाना बनाया जाता है, जहां भावनात्मक संवेदनशीलता अधिक होती है. ऐसे में मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि भारत में स्कूल सुरक्षा नियम मौजूद हैं या नहीं बल्कि यह है कि क्या मौजूदा सुरक्षा और आपदा-प्रतिक्रिया प्रणाली आधुनिक, सूचना-आधारित खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है.

इन दोनों दिशानिर्देशों का उद्देश्य केवल छात्रों को शारीरिक नुकसान से बचाना ही नहीं बल्कि मानसिक और मनोसामाजिक तनाव से भी सुरक्षा प्रदान करना है. इस कारण, बम धमकी जैसी घटनाओं को भी स्कूल सुरक्षा के दायरे में माना जा सकता है क्योंकि वे घबराहट, भगदड़, मानसिक आघात और पढ़ाई में व्यवधान पैदा कर सकती हैं. दिशा निर्देश जिला प्रशासन, पुलिस और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के साथ समन्वय पर भी जोर देते हैं तथा स्कूलों को आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार करने की आवश्यकता बताते हैं.

व्यवहार में कई सीमाएँ सामने आती हैं, जो चार प्रमुख कमियों के रूप में दिखाई देती हैं.

  • तत्काल निर्णय और उसके जोखिम

स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था भले ही हर तरह की आपदा से निपटने के लिए बनाई गई हो लेकिन असल में इसका ध्यान ज़्यादातर भूकंप, बाढ़, चक्रवात, आग या इमारत से जुड़ी दुर्घटनाओं जैसी प्राकृतिक या अचानक होने वाली घटनाओं पर ही रहता है. इसके मुकाबले, जानबूझकर दी जाने वाली धमकियों-खासकर इंटरनेट या डिजिटल माध्यम से आने वाली धमकियों-से निपटने के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक दिशा-निर्देश बहुत कम मिलते हैं. इसी वजह से जब ऐसी कोई धमकी मिलती है तो कई स्कूल बिना ज्यादा जांच-पड़ताल के पूरे स्कूल को तुरंत खाली कराना ही सबसे सुरक्षित कदम मान लेते हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे से बच्चों और स्टाफ को दूर रखा जा सके. जबकि बार-बार ऐसा करना स्वयं जोखिम और व्यवधान पैदा कर सकता है.

2021 के दिशा निर्देश साइबर सुरक्षा का उल्लेख तो करते हैं लेकिन डिजिटल धमकी संदेशों को साइबर अपराध के रूप में संभालने के लिए स्पष्ट निर्देश नहीं देते. उदाहरण के लिए, ईमेल को सुरक्षित रखना, मेटाडाटा संरक्षित करना, संदेश को आगे न भेजना या न मिटाना और साइबर अपराध इकाइयों के साथ समन्वय करना-इन सब पर स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है. परिणामस्वरूप, धमकी वाले ईमेल को केवल अलार्म के रूप में देखा जाता है जबकि वे अपराधियों की पहचान के लिए महत्वपूर्ण डिजिटल सबूत भी हो सकते हैं.

  • सच्ची धमकी या फर्जी, कैसे पता चले?

वर्तमान दिशानिर्देशों में यह निर्धारित करने के लिए कोई संरचित प्रणाली नहीं है कि कौन-सी धमकी वास्तविक हो सकती है और कौन-सी केवल फर्जी. इस कारण या तो तुरंत घबराहट में प्रतिक्रिया होती है, या बार-बार फर्जी धमकियों के कारण लोग लापरवाह हो सकते हैं. सुरक्षा घटनाओं के दौरान अभिभावकों और जनता के साथ कैसे संवाद किया जाए, इस पर दिशानिर्देश लगभग मौन हैं. वास्तविकता में जानकारी अक्सर सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप के माध्यम से तेजी से फैलती है.

जानबूझकर दी जाने वाली धमकियों-खासकर इंटरनेट या डिजिटल माध्यम से आने वाली धमकियों-से निपटने के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक दिशा-निर्देश बहुत कम मिलते हैं. इसी वजह से जब ऐसी कोई धमकी मिलती है तो कई स्कूल बिना ज्यादा जांच-पड़ताल के पूरे स्कूल को तुरंत खाली कराना ही सबसे सुरक्षित कदम मान लेते हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे से बच्चों और स्टाफ को दूर रखा जा सके.

दिल्ली के दिल्ली शिक्षा निदेशालय (DoE) ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद 2025 में मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) पर एक अधिसूचना जारी की. हालांकि इस SOP में निवारक, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति से जुड़े उपायों का उल्लेख है और इसमें स्कूल प्रमुखों, शिक्षकों, अभिभावकों, पुलिस, अग्निशमन सेवाओं तथा जिला प्राधिकरणों की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां भी निर्धारित की गई हैं, फिर भी इसका मुख्य ध्यान निकासी योजनाओं, CCTV कवरेज, मॉक ड्रिल और आपातकालीन सेवाओं के साथ समन्वय पर ही केंद्रित रहता है.

अगर स्कूल सुरक्षा से जुड़े सुधार दुनिया के अच्छे उदाहरणों और दूसरे क्षेत्रों-जैसे विमानन-से मिले अनुभवों को ध्यान में रखकर किए जाएँ, तो इससे बेहतर तैयारी की जा सकती है. अभी अक्सर ऐसी घटनाओं में घबराहट और अफरातफरी का माहौल बन जाता है, लेकिन सही योजना और स्पष्ट नियम होने से स्थिति को शांत और व्यवस्थित तरीके से संभाला जा सकता है. स्कूलों के पास पहले से तय प्रक्रिया, प्रशिक्षण और सही जानकारी होगी तो वे किसी भी ऑनलाइन धमकी या अफवाह का जल्दी और समझदारी से जवाब दे पाएँगे. इससे न केवल छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि पढ़ाई में रुकावट भी कम होगी. इस तरह की तैयारी से भारत के स्कूल डिजिटल माध्यम से आने वाली परेशानियों और झूठी धमकियों का सामना अधिक मजबूती और आत्मविश्वास के साथ कर सकेंगे. 

  • डिजिटल-युग के खतरों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल में सुधार

उत्तर अमेरिका, यूरोप और बाल्टिक देशों में भी पहले स्कूलों को लक्षित करके बम-धमकी वाले ईमेल या सोशल मीडिया पोस्ट की घटनाएं हो चुकी हैं. इसके जवाब में कई देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर दिशानिर्देश जारी किए हैं-जैसे राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी सुरक्षा कार्यालय (यूके) और साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचा सुरक्षा एजेंसी (अमेरिका).

अभी अक्सर ऐसी घटनाओं में घबराहट और अफरातफरी का माहौल बन जाता है, लेकिन सही योजना और स्पष्ट नियम होने से स्थिति को शांत और व्यवस्थित तरीके से संभाला जा सकता है. स्कूलों के पास पहले से तय प्रक्रिया, प्रशिक्षण और सही जानकारी होगी तो वे किसी भी ऑनलाइन धमकी या अफवाह का जल्दी और समझदारी से जवाब दे पाएँगे.

भारत में अभी तक इस बात का कोई पक्का अनुमान नहीं है कि ऐसी झूठी आपातकालीन कॉल्स से कितना खर्च होता है. लेकिन कुछ रिपोर्टों के अनुसार, स्वैटिंग यानी बम की झूठी धमकी, हमलावर होने की अफवाह या बंधक जैसी नकली आपातकालीन जानकारी देने पर काफी खर्च हो सकता है. जब ऐसी सूचना मिलती है तो पुलिस, फायर ब्रिगेड और अन्य सुरक्षा कर्मियों को तुरंत मौके पर भेजा जाता है. एक अनुमान के अनुसार, हर प्रतिक्रिया देने वाले कर्मी पर लगभग 125 से 150 अमेरिकी डॉलर प्रति घंटे तक खर्च हो सकता है. अगर कई टीमें भेजी जाएँ तो यह खर्च और बढ़ जाता है. इसलिए ऐसी झूठी धमकियाँ सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी डालती हैं. 

इसके अलावा, पढ़ाई का समय नष्ट होना, छात्रों की अनुपस्थिति बढ़ना, मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ना और खतरे से जुड़ी जानकारी का कमजोर संचार होना, इन घटनाओं की कुल लागत को और भी कई गुना बढ़ा सकता है. इन अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों में तीन प्रमुख सिद्धांत सामान्य रूप से दिखाई देते हैं. सुरक्षा के साथ-साथ डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखना. तुरंत खाली कराने के बजाय संरचित खतरा-आकलन प्रणाली. घबराहट कम करने के लिए मानकीकृत संचार प्रोटोकॉल.

  • प्रस्तावित सुधार

स्कूलों की सुरक्षा बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि स्कूलों की सुरक्षा प्रक्रियाओं में साइबर अपराध से जुड़े नियम भी शामिल किए जाएँ, ताकि किसी ऑनलाइन धमकी या घटना की स्थिति में स्कूल डिजिटल सबूत सुरक्षित रख सकें और तुरंत साइबर क्राइम यूनिट से संपर्क कर सकें. इसके साथ ही देश स्तर पर एक ऐसी धमकी-जाँच प्रणाली बनाई जानी चाहिए, जिससे यह समझने में मदद मिले कि कौन-सी धमकी झूठी है, कौन-सी संदिग्ध है और कौन-सी सच में खतरनाक हो सकती है. स्कूलों के लिए एक समान संचार व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि वे अभिभावकों और जनता को सही और स्पष्ट जानकारी आसानी से दे सकें. इसके अलावा, स्कूल प्राचार्यों, जिला शिक्षा अधिकारियों, शिक्षकों और काउंसलरों को ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे किसी भी आपात स्थिति में सही और शांत तरीके से काम कर सकें. 

कई बार लोग मज़ाक, बदला लेने या डर फैलाने के लिए ऐसी झूठी सूचनाएं भेज देते हैं, जिससे स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक जगहों पर अफरा तफरी मच जाती है. इसके लिए जरूरी है कि पुराने समय में प्राकृतिक आपदाओं या सामान्य आपात स्थितियों के लिए बनाए गए नियमों और व्यवस्थाओं को अपडेट किया जाए.

साथ ही, इन उपायों को लागू करने के लिए राज्यों के शिक्षा बजट से वित्तीय सहायता भी सुनिश्चित करनी होगी. भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की एक ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, जांच किए गए स्कूलों में से केवल 22 प्रतिशत के पास ही स्कूल सुरक्षा योजनाएँ थीं, और उनमें से कई दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं थीं. ग्रामीण क्षेत्रों में CCTV, साइबर प्रशिक्षण और पुलिस क्षमता के लिए लक्षित अनुदान दिए जाने चाहिए, ताकि स्कूल प्रशासन और शिक्षकों पर संचालन का बोझ कम हो सके.

क्या हो तरीका?

जब तक कम खर्च में और गुमनाम तरीके से लोगों या संस्थानों को परेशान करना आसान रहेगा, तब तक फर्जी बम-धमकियों जैसी घटनाएं होती रहने की संभावना है. कई बार लोग मज़ाक, बदला लेने या डर फैलाने के लिए ऐसी झूठी सूचनाएं भेज देते हैं, जिससे स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक जगहों पर अफरा तफरी मच जाती है. इसके लिए जरूरी है कि पुराने समय में प्राकृतिक आपदाओं या सामान्य आपात स्थितियों के लिए बनाए गए नियमों और व्यवस्थाओं को अपडेट किया जाए. उन्हें आज के डिजिटल दौर के अनुसार बदला जाए, ताकि ऑनलाइन धमकियों और अफवाहों से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके. इससे सुरक्षा एजेंसियां और संस्थान ऐसी स्थितियों को अधिक शांत और समझदारी से संभाल पाएंगे.


अर्पण तुलस्यान ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं.

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Arpan Tulsyan

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Arpan Tulsyan is a Senior Fellow at ORF’s Centre for New Economic Diplomacy (CNED). With 16 years of experience in development research and policy advocacy, Arpan ...

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