समुद्र में करोड़ों का खजाना छिपा है लेकिन क्या ये सच में धरती और जलवायु के लिए टिकाऊ है? ब्लूवॉशिंग के जाल में फंसने से पहले जानें असली कहानी.
बीते कुछ सालों में ‘ब्लू इकॉनमी’ यानी समुद्र से जुड़ी अर्थव्यवस्था को एक नए मौके के तौर पर देखा जा रहा है. इसमें कमाई भी है और जलवायु संकट से लड़ने की उम्मीद भी. समुद्र से जुड़े कई काम नेट-ज़ीरो लक्ष्य हासिल करने में मददगार बताए जा रहे हैं. जैसे कार्बन कैप्चरिंग, उसका प्रयोग और उसे सुरक्षित रखना (CCUS), समुद्री कचरे से ऊर्जा बनाना और कचरे से दूसरे काम के प्रोडक्ट तैयार करना लेकिन ब्लू इकॉनमी की तरक्की के साथ एक बड़ी और अक्सर नजर न आने वाली समस्या भी बढ़ रही है- ‘ब्लूवॉशिंग’.
ब्लूवॉशिंग को आप ग्रीनवॉशिंग का समुद्री रूप समझ सकते हैं. समुद्र से जुड़े प्रॉजेक्ट्स के पर्यावरणीय फायदे अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बताए जाते हैं जबकि उनके पीछे ठोस वैज्ञानिक सबूत नहीं होते. ब्लूवॉशिंग, आम ग्रीनवॉशिंग से थोड़ा अलग है क्योंकि समुद्री सिस्टम बहुत जटिल होते हैं. उनमें केमिकल और बायोलॉजिकल प्रक्रियाएं लंबे समय तक चलती रहती हैं जिन्हें हम अभी पूरी तरह समझ भी नहीं पाए हैं. इसी वजह से वैज्ञानिक सबूत और ‘सस्टेनेबिलिटी’ के दावों के बीच फर्क रह जाता है. इसका असर नीतियों, भरोसे, समाज और समुद्री इकोसिस्टम- सब पर पड़ता है.
ब्लूवॉशिंग के पीछे कई वैज्ञानिक, नीतिगत और रेग्युलेशन से जुड़े गैप हैं. सबसे बड़ी समस्या है मजबूत निगरानी और जांच सिस्टम का अभाव- जिसे मॉनीटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन (MRV) कहा जाता है. जमीन पर चलने वाली रणनीतियों के मुकाबले समुद्र में कार्बन का बहाव, इकोसिस्टम पर असर और लंबे समय के बदलावों को ट्रैक करना ज्यादा मुश्किल और ज्यादा महंगा होता है. इससे ऐसे भी दावे होने लगते हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से जांचना आसान नहीं होता.
ब्लूवॉशिंग, आम ग्रीनवॉशिंग से थोड़ा अलग है क्योंकि समुद्री सिस्टम बहुत जटिल होते हैं. उनमें केमिकल और बायोलॉजिकल प्रक्रियाएं लंबे समय तक चलती रहती हैं जिन्हें हम अभी पूरी तरह समझ भी नहीं पाए हैं. इसी वजह से वैज्ञानिक सबूत और ‘सस्टेनेबिलिटी’ के दावों के बीच फर्क रह जाता है.
कई निवेश ‘ग्रीन’ या ‘ब्लू’ बताकर बेचे जाते हैं लेकिन असल में वे टिकाऊ नहीं होते. उदाहरण के तौर पर, एक्वाकल्चर यानी समुद्री खेती को अक्सर पर्यावरण के लिए अच्छा बताया जाता है लेकिन कुछ जगहों पर ज्यादा गहरी समुद्री खेती से प्रदूषण बढ़ा है और समुद्र की सेहत भी बिगड़ी है. डीप-सी माइनिंग यानी समुद्र की गहराई में खनन भी इसी तरह का मामला है. इसे साफ ऊर्जा की सप्लाई चेन के लिए जरूरी बताया जाता है मगर आलोचक कहते हैं कि इससे समुद्री पर्यावरण को लंबे समय का नुकसान हो सकता है.
KTH जैसे कुछ प्रॉजेक्ट ब्लू इकॉनमी में किए जा रहे दावों की साख मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. मसलन, समुद्री घास (सीवीड) की खेती, सीफूड और तटीय इलाकों की बहाली. ये प्रॉजेक्ट कोशिश करते हैं कि लोगों की भागीदारी बढ़े और जिसमें नीति बनाने की प्रक्रिया भी अधिक से अधिक शामिल हो.
समुद्री कार्बन हटाने (CDR) और CCUS के मामले में यह चुनौती और साफ दिखती है. जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाला अंतरराष्ट्रीय पैनल IPCC मानता है कि ये तकनीकें मददगार हो सकती हैं लेकिन सचाई यह है कि इनमें से ज्यादातर अभी लैब या छोटे लेवल की टेस्टिंग तक ही हैं. उदाहरण के लिए, 40 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश के बावजूद पारंपरिक कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) हर साल दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 0.1 प्रतिशत से भी कम पकड़ पाता है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक यह हर साल 1,020 से 1,960 मिलियन टन कार्बन पकड़ सकती है लेकिन असल में लंबे समय तक सिर्फ करीब 173 मिलियन टन कार्बन ही जमा हो पाता है- जो दुनिया के कुल उत्सर्जन में सिर्फ 0.4 से 2.5 प्रतिशत की कमी लाता है.
इसके अलावा ‘स्थायी स्टोरेज’ के दावों में कई अनिश्चितताएं हैं- जैसे कार्बन कितने समय तक जमा रहेगा, कहीं लीक तो नहीं होगा और इसका समुद्री केमिकल सिस्टम पर क्या असर पड़ेगा? अमेरिका की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज ने भी कहा है कि बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले इन तकनीकों पर लंबे समय तक रिसर्च और निगरानी जरूरी है. फिर भी इन्हें अक्सर ऐसे पेश किया जाता है मानो ये तुरंत बड़े स्तर पर लागू हो सकती हैं.
सीवीड यानी समुद्री घास की खेती को अक्सर कार्बन स्टोर करने और जलवायु संकट कम करने का आसान तरीका बताया जाता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक यह हर साल 1,020 से 1,960 मिलियन टन कार्बन पकड़ सकती है लेकिन असल में लंबे समय तक सिर्फ करीब 173 मिलियन टन कार्बन ही जमा हो पाता है- जो दुनिया के कुल उत्सर्जन में सिर्फ 0.4 से 2.5 प्रतिशत की कमी लाता है.
इसके अलावा कई आकलन पूरी लाइफ-साइकल को ध्यान में नहीं रखते- जैसे समुद्र में ऑपरेशन, कटाई, सुखाना, ट्रांसपोर्ट और प्रोसेसिंग से निकलने वाले उत्सर्जन. यह मान लेना भी सही नहीं कि जमा की गई बायोमास हमेशा के लिए कार्बन को कैद कर लेगी क्योंकि पोषक चक्र और माइक्रोबियल प्रक्रियाएं इसे तोड़ सकती हैं. ब्लू कार्बन क्रेडिट कुल कार्बन क्रेडिट का सिर्फ करीब 0.35 प्रतिशत हैं. यानी जितना प्रचार है, उसके मुकाबले असली बाजार बहुत छोटा है. 2022 से 2024 के बीच चीन में कम से कम दस कोर्ट केस सामने आए, जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बावजूद ब्लू कार्बन क्रेडिट का गलत इस्तेमाल कर कानूनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की गई.
अगर पूरा एनर्जी और मटेरियल बैलेंस साफ न हो तो यह कहना मुश्किल है कि इससे सच में फायदा हुआ या सिर्फ बोझ एक जगह से दूसरी जगह चला गया. किसी तकनीक को सच में ‘ग्रीन’ कहने के लिए उसके पूरे जीवन-चक्र का आकलन जरूरी है- शुरू से लेकर अंत तक.
समुद्री प्लास्टिक को ईंधन या दूसरे मटेरियल में बदलने वाली तकनीकें भी खूब प्रचारित हो रही हैं. कहा जाता है कि इससे प्रदूषण और जलवायु संकट, दोनों से लड़ाई में मदद मिलेगी लेकिन सिर्फ ‘रीसायकल’ कहना काफी नहीं है. इन प्रक्रियाओं से जहरीले उप-उत्पाद निकल सकते हैं और इनमें काफी ऊर्जा भी लगती है. अगर पूरा एनर्जी और मटेरियल बैलेंस साफ न हो तो यह कहना मुश्किल है कि इससे सच में फायदा हुआ या सिर्फ बोझ एक जगह से दूसरी जगह चला गया. किसी तकनीक को सच में ‘ग्रीन’ कहने के लिए उसके पूरे जीवन-चक्र का आकलन जरूरी है- शुरू से लेकर अंत तक.
इस पूरी समस्या की जड़ विज्ञान और नीति के बीच की दूरी है. निवेशकों और नीति बनाने वालों पर जल्दी नतीजे दिखाने का दबाव होता है इसलिए वे ऐसे समाधान आगे बढ़ाते हैं जो सुनने में अच्छे लगते हैं लेकिन उनके पीछे लंबी अवधि के वैज्ञानिक सबूत कम होते हैं.
कई बार तकनीक कितनी तैयार है, इसे गलत समझ लिया जाता है. अनिश्चितताओं को डिजाइन की समस्या मानने के बजाय सिर्फ कहानी की तरह पेश कर दिया जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि अधूरी वैज्ञानिक तैयारी के बावजूद नीतियां जल्दी समर्थन दे देती हैं. इससे भरोसा कम होता है, फंड बेकार जाता है, संसाधन गलत जगह लगते हैं और पर्यावरण पर खतरा बढ़ता है.
ब्लूवॉशिंग से निपटने के लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार वाली नीतियां जरूरी हैं-
अनिवार्य आकलन: ब्लू इकॉनमी से जुड़े हर प्रॉजेक्ट को सार्वजनिक लाइफ-साइकिल आकलन रिपोर्ट देनी चाहिए. सिस्टम की सीमाएं, मान्यताएं और अनिश्चितताएं साफ लिखी हों. कोरल रीफ, मैंग्रोव, तटीय समुदाय और दूसरे पारिस्थितिक तंत्र पर असर जानने के लिए पर्यावरणीय आकलन भी जरूरी हो.
मजबूत रिपोर्टिंग सिस्टम: फंडिंग सिर्फ तकनीक बनाने पर नहीं, लगातार डेटा मॉनिटरिंग और मूल्यांकन पर भी हो. स्टैंडर्ड रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क अपनाए जाएं ताकि पारदर्शिता बढ़े, और अलग-अलग प्रॉजेक्ट्स की तुलना हो सके. चीन की अटलांटिक ‘ब्लू बे’ पहल इसका उदाहरण है, जहां ड्रोन से भी पर्यावरण की निगरानी होती है.
पायलट और बड़े प्रॉजेक्ट अलग हों: नीति और निवेश ढांचे में रिसर्च, पायलट स्तर और कमर्शल स्तर के बीच साफ फर्क होना चाहिए.
सावधानी भरे नियम: समुद्र आधारिक कार्बन हटाने वाले प्रॉजेक्ट सख्त गवर्नेंस, सही रणनीतियों और साफ एग्जिट प्लान के तहत चलें. यूरोपीय यूनियन का ‘कार्बन कनेक्ट डेल्टा’ पहल निगरानी और सीमा-पार अनुपालन पर ध्यान देती है और नियंत्रित कार्बन प्रबंधन का रास्ता दिखाती है.
नतीजों से जुड़े फंडिंग : तकनीकी उपायों की तुलना दूसरे विकल्पों से की जाए. फंडिंग चरणों में दी जाए और तभी मिले जब पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक प्रदर्शन के वैज्ञानिक सबूत मौजूद हों.
विज्ञान और नीति का तालमेल: समुद्री विज्ञान, इंजीनियरिंग और नीति के बीच बहु-विषयक सहयोग जरूरी है. सेशेल्स का ब्लू बॉन्ड इसका उदाहरण है, जहां निवेश से पहले वैज्ञानिक सबूत और डेटा आधारित गवर्नेंस को महत्व दिया गया.
ब्लूवॉशिंग पर रोक जरूरी है ताकि नए प्रयोग भरोसेमंद बनें और जलवायु लक्ष्यों को जिम्मेदारी से हासिल किया जा सके. बड़ी बात यह कि विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है. इससे समुद्री पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और जलवायु लक्ष्य भी. इसके लिए राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर तालमेल जरूरी है.
समुदाय की भागीदारी: प्रॉजेक्ट शुरू करने से पहले सार्थक सार्वजनिक परामर्श जरूरी हो, खासकर संवेदनशील समुदायों के साथ. ब्लू इकॉनमी से स्थानीय लोगों को भी बराबर फायदा मिले. निगरानी और अनुपालन में उनकी भागीदारी के लिए ट्रेनिंग और ढांचा दिया जाए. ओडिशा में समुदाय आधारित समुद्री घास खेती ने 10,000 से ज्यादा तटीय परिवारों की आमदनी बढ़ाई है. यह नीचे से ऊपर जाने वाले मॉडल की सफलता दिखाता है.
निष्कर्ष
ब्लू इकॉनमी का भविष्य मजबूत विज्ञान और ठोस नीतियों पर टिका है. ब्लूवॉशिंग पर रोक जरूरी है ताकि नए प्रयोग भरोसेमंद बनें और जलवायु लक्ष्यों को जिम्मेदारी से हासिल किया जा सके. बड़ी बात यह कि विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है. इससे समुद्री पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और जलवायु लक्ष्य भी. इसके लिए राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर तालमेल जरूरी है. अकादमिक जगत, उद्योग, सरकार और तटीय समुदाय- सबको मिलकर काम करना होगा.
तटीय इलाकों के लिए अलग नीतियां, मजबूत निगरानी सिस्टम और जवाबदेही के साफ नियम बेहद जरूरी हैं. ब्लू इकॉनमी के लक्ष्यों को अंतरराष्ट्रीय जलवायु ढांचे से जोड़ना होगा और फैसले सिर्फ ठोस सबूतों और वैज्ञानिक आधार पर लेने होंगे. तभी ब्लूवॉशिंग कम होगी और इस क्षेत्र की साख बची रहेगी.
पूर्णिमा वी.बी. ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च असिस्टेंट हैं।
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