Author : Priya Noronha

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Published on May 07, 2026 Updated 3 Days ago

महासागर दुनिया की अर्थव्यवस्था और जलवायु संतुलन के लिए बेहद जरूरी हैं लेकिन इनके संरक्षण में निवेश की भारी कमी है. ब्लू फाइनेंस इसी कमी को पूरा कर निरंतर विकास और ग्लोबल साउथ की समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश है- जानें कैसे.

ब्लू फाइनेंस: क्या है और क्यों जरूरी है?

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महासागर जीवन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. वे जलवायु को नियंत्रित करते हैं, वैश्विक व्यापार के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से को संचालित करने में सहायता करते हैं, प्रतिवर्ष लगभग 2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक मूल्य उत्पन्न करते हैं और दुनिया भर में लगभग 35 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं. इसके बावजूद, महासागर पृथ्वी की सबसे कम वित्तपोषित साझा संपत्तियों में शामिल हैं. सतत विकास लक्ष्य (SDG) 14 - ‘जल के नीचे जीवन’ - को प्राप्त करने के लिए वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 175 बिलियन अमेरिकी डॉलर के ब्लू निवेश की आवश्यकता है, लेकिन इस लक्ष्य को कुल SDG विकास वित्त का 1 प्रतिशत से भी कम प्राप्त होता है. समुद्री और तटीय प्रणालियों में कम निवेश से मत्स्य क्षेत्र प्रभावित होता है, खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ती है और जलवायु लचीलापन घटता है. महासागरों के खराब स्वास्थ्य का सबसे अधिक बोझ ग्लोबल साउथ के उन देशों पर पड़ता है, जिनकी विकास यात्रा महासागरों पर निर्भर है. महासागर आधारित क्षेत्रों को अब विकास, लचीलापन और जलवायु अनुकूलन के प्रमुख साधन के रूप में देखा जा रहा है. विश्व बैंक और OECD ने ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा दिया है, लेकिन वित्तीय संसाधनों की असमान उपलब्धता और धीमा निवेश ग्लोबल साउथ की महासागर-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की प्रगति को सीमित कर रहा है.

ब्लू फाइनेंस क्या है

ब्लू फाइनेंस का अर्थ है सार्वजनिक, निजी और परोपकारी पूंजी को महासागरीय तथा तटीय पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण, पुनर्स्थापन और सतत उपयोग के लिए जुटाना. ब्लू फाइनेंस का ढांचा बहुस्तरीय है. संप्रभु स्तर पर, ‘डेट-फॉर-नेचर स्वैप‘  आर्थिक दबाव झेल रही सरकारों को अपने बाहरी ऋण के एक हिस्से को कानूनी रूप से बाध्यकारी समुद्री संरक्षण प्रतिबद्धताओं के बदले विनिमय करने की अनुमति देता है. इससे सरकारों को वित्तीय राहत मिलती है और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए धन उपलब्ध होता है. बेलीज़ के ऐतिहासिक रीफ संरक्षण समझौते के बाद इक्वाडोर, बहामास और गैबॉन में भी ऐसे समझौते किए गए.

ब्लू फाइनेंस का ढांचा बहुस्तरीय है. संप्रभु स्तर पर, ‘डेट-फॉर-नेचर स्वैप‘  आर्थिक दबाव झेल रही सरकारों को अपने बाहरी ऋण के एक हिस्से को कानूनी रूप से बाध्यकारी समुद्री संरक्षण प्रतिबद्धताओं के बदले विनिमय करने की अनुमति देता है.

सॉवरेन ब्लू बॉन्ड‘  जिसकी शुरुआत 2018 में सेशेल्स ने की थी, अंतरराष्ट्रीय बाजारों से समुद्री संरक्षण और सतत मत्स्य पालन के लिए पूंजी जुटाने का माध्यम है. वहीं, जहां जलवायु जोखिम अधिक है, वहां ‘पैरामीट्रिक बीमा‘  पारंपरिक बीमा की तुलना में अधिक तेज़ विकल्प प्रदान करता है. उदाहरण के लिए, कैरेबियाई क्षेत्र की COAST सुविधा मछुआरों और तटीय नगरपालिकाओं को आपदा की स्थिति में त्वरित भुगतान उपलब्ध कराती है, जिससे धीमी बीमा प्रक्रियाओं की आवश्यकता कम हो जाती है.

परियोजना और उद्यम स्तर पर, ब्लू लोन, स्थिरता-आधारित वित्तपोषण, प्रभाव निवेश कोष  और ब्लू कार्बन क्रेडिट जैसे साधन जलीय कृषि, अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा, सतत नौवहन और तटीय पुनर्स्थापन में निवेश को बढ़ावा देते हैं. इन सभी की प्रभावशीलता केवल वित्तीय साधन पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय नीतियों, मजबूत डेटा प्रणालियों, समावेशी शासन संरचनाओं और समस्या के अनुरूप सही वित्तीय साधन के चयन पर निर्भर करती है.

इन सभी के बीच ‘ब्लेंडेड फाइनेंस‘ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसका अर्थ है विकास पूंजी का उपयोग करके निजी वाणिज्यिक निवेश को आकर्षित करना, जो सामान्य परिस्थितियों में सतत विकास में निवेश नहीं करता. गारंटी तंत्र निवेशकों का भरोसा बढ़ाने और कमजोर तथा ऋण-संकटग्रस्त बाजारों में निजी पूंजी की पहुंच बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है. फिर भी, निजी पूंजी की भागीदारी सीमित बनी हुई है, क्योंकि समुद्री संरक्षण से मिलने वाले सार्वजनिक लाभों का आर्थिक मूल्यांकन करना कठिन होता है. इसके अलावा, ब्लेंडेड फाइनेंस की जटिल और विशेष प्रकृति इसे बड़े पैमाने पर लागू करने और दोहराने को धीमा तथा महंगा बना देती है.

ग्लोबल साउथ : महासागरीय संवेदनशीलता और वित्तीय अंतराल

जो देश महासागर से जुड़े जोखिमों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं, वही सुव्यवस्थित ब्लू फाइनेंस से सबसे अधिक लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं. अपने विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों के माध्यम से, लघु द्वीपीय विकासशील देश (SIDS) वैश्विक महासागरीय क्षेत्र के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से का प्रबंधन करते हैं. इसी कारण इन्हें अब ‘लार्ज ओशन स्टेट्स‘ कहा जाने लगा है, जो उनके समुद्री संरक्षण की विशाल भूमिका और महासागरीय वित्तीय चर्चाओं में उनकी संभावित प्रभावशीलता को दर्शाता है. फिर भी, महासागर-संबंधित आधिकारिक विकास सहायता (ODA) का केवल 6 प्रतिशत ही SIDS देशों को प्राप्त होता है, जबकि यही देश महासागरों पर सबसे अधिक आर्थिक रूप से निर्भर हैं.

हिंद महासागर रिम संघ (IORA) ने 2014 से ब्लू इकोनॉमी को प्राथमिकता दी है और भारत के ‘मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047’ में भी समुद्री साझेदारियों के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाई गई है. हालांकि, अधिकांश तटीय देशों के पास निवेश योग्य परियोजनाओं की पर्याप्त श्रृंखला नहीं है.

महासागर-निर्भर देशों को वित्तीय संसाधनों तक पहुंच में कई जटिल बाधाओं का सामना करना पड़ता है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां जलवायु जोखिमों को कम करने के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के बजाय जलवायु संवेदनशीलता को दंडित करती हैं और दीर्घकालिक लचीलेपन की तुलना में अल्पकालिक तरलता को प्राथमिकता देती हैं. कमजोर संस्थागत क्षमता और ऊंची लागत के कारण सबसे अधिक महासागरीय जोखिम झेलने वाले देश आवश्यक ब्लू फाइनेंस आकर्षित नहीं कर पाते.

यह वित्तीय अंतर समान रूप से न तो वितरित है और न ही मान्यता प्राप्त है. फिजी, माइक्रोनेशिया और किरिबाती जैसे प्रशांत क्षेत्र के SIDS देश सतत मत्स्य पालन और अपतटीय जलीय कृषि में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. इसके बावजूद, वे अंतरराष्ट्रीय संप्रभु बॉन्ड और ऋण-विनिमय बाजारों से लगभग बाहर हैं. अफ्रीकी तटीय देशों की स्थिति भी ऐसी ही है, जबकि गिनी की खाड़ी और कांगो बेसिन जैसे क्षेत्र महत्वपूर्ण समुद्री जैव विविधता और विशाल मत्स्य-निर्भर समुदायों का केंद्र हैं.

दूसरी ओर, हिंद महासागर रिम संघ (IORA) ने 2014 से ब्लू इकोनॉमी को प्राथमिकता दी है और भारत के ‘मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047’ में भी समुद्री साझेदारियों के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाई गई है. हालांकि, अधिकांश तटीय देशों के पास निवेश योग्य परियोजनाओं की पर्याप्त श्रृंखला नहीं है. साथ ही, नियामकीय कमियां और परिभाषागत अस्पष्टताएं पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं.

ब्लू फाइनेंस का आगे का एजेंडा  

चिंताजनक स्थिति के बावजूद, ब्लू फाइनेंस बाजार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (IFC) ने 2020 से अब तक 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के ब्लू लोन और बॉन्ड जारी किए हैं. विश्व बैंक के बहुदाता ट्रस्ट फंड PROBLUE ने 89 अर्थव्यवस्थाओं में 223 गतिविधियों के माध्यम से 152 मिलियन अमेरिकी डॉलर का पोर्टफोलियो तैयार किया है. IFC, एशियाई विकास बैंक (ADB), OECD और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम–फाइनेंस इनिशिएटिव जैसी संस्थाओं के संयुक्त दिशानिर्देशों ने विश्वसनीय ब्लू बॉन्ड मानकों की स्थापना में सहायता की है. अब चुनौती इस प्रगति को व्यापक और व्यवस्थित स्तर तक पहुंचाने की है. इसके लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं उभरकर सामने आती हैं-

वर्गीकरण प्रणालियों, स्थिरता सिद्धांतों और प्रदर्शन-आधारित शर्तों के विकास ने पहले भी लेनदेन लागत कम करने और निवेशकों का विश्वास बढ़ाने में प्रभावी भूमिका निभाई है. ब्लू टैक्सोनॉमी और समान मानकों से लागत घटेगी, निवेश बढ़ेगा और ब्लू कार्बन लेखांकन तटीय देशों के लिए नए आर्थिक अवसर खोलेगा. साथ ही, ‘नेटवर्क फॉर ग्रीनिंग द फाइनेंशियल सिस्टम‘ जैसी संस्थाओं के माध्यम से महासागरीय जोखिमों को वित्तीय नियामकीय ढांचे में शामिल करने से निजी ऋणदाताओं की प्रोत्साहन संरचना में बड़े स्तर पर बदलाव आ सकता है.

यदि ब्लू फाइनेंस को व्यापक स्तर पर और समानता के साथ लागू किया जाए, तो यह महासागर-निर्भर देशों के अस्तित्व और विकास आवश्यकताओं के अनुरूप पूंजी को जोड़ने का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन सकता है.

छोटे द्वीपीय और गरीब देशों के बाजारों को जोड़ने वाले क्षेत्रीय मंच लागत घटाकर और जोखिम साझा कर ब्लू फाइनेंस को मजबूत बना सकते हैं. 2024 में आयोजित चौथे अंतरराष्ट्रीय SIDS सम्मेलन में प्रस्तावित ‘बिग ओशन स्टेट्स ब्लू इनोवेशन एंड इम्पैक्ट फंड‘ इस मॉडल को और आगे बढ़ाता है. बहुपक्षीय विकास बैंकों द्वारा ‘फर्स्ट-लॉस कैपिटल’ और संरचनात्मक सहयोग प्रदान करने से ऐसे फंडों की व्यवहार्यता में तेजी से वृद्धि हो सकती है.

ब्लू फाइनेंस के माध्यम से विकासशील देशों के समुद्री क्षेत्रों पर बाहरी और शर्त आधारित नियंत्रण का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है. इसलिए, डेट-फॉर-नेचर स्वैप और ब्लू बॉन्ड से जुड़े संरक्षण समझौतों में पारदर्शी और न्यायसंगत लाभ-साझेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए. स्थानीय स्तर पर आधारित मॉडल-जैसे सह-प्रबंधित मत्स्य पालन और सामुदायिक लाभ-साझेदारी ढांचे-अधिक सामाजिक वैधता, रोजगार सृजन और बेहतर स्थानीय शासन परिणाम प्रदान करते हैं.

हालांकि, कई वित्तीय व्यवस्थाओं में लैंगिक और सामाजिक समावेशन को अभी भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है. अंततः, सबसे टिकाऊ ब्लू फाइनेंस मॉडल वही होंगे, जिन्हें शुरुआत से ही स्थानीय सरकारों और समुदायों की भागीदारी से तैयार किया जाए.

हिंद महासागर में ब्लू फाइनेंस का प्रमुख केंद्र बनता भारत

एक प्रमुख समुद्री शक्ति, मजबूत तकनीकी क्षमता, एक्ज़िम बैंक जैसी बड़ी विकास वित्त संस्था और बढ़ते वैश्विक प्रभाव के कारण भारत हिंद महासागर क्षेत्र में ब्लू फाइनेंस की अगली पीढ़ी की संरचनाओं को सह-निर्मित करने की अच्छी स्थिति में है. भारत क्षेत्रीय जोखिम पूलों को स्थापित करने, ब्लू बॉन्ड की संरचना और सह-वित्तपोषण में सहायता करने तथा मानकीकरण निकायों में ग्लोबल साउथ के दृष्टिकोण का समर्थन करने की क्षमता रखता है. अधूरी वित्तीय आवश्यकताओं का विशाल पैमाना और स्थानीय वित्तीय संरचनाओं की कमी इस अवसर को और अधिक रणनीतिक बनाती है.

महासागर तटीय आजीविकाओं, वैश्विक व्यापार और पारिस्थितिक स्थिरता की आधारशिला हैं. यदि ब्लू फाइनेंस को व्यापक स्तर पर और समानता के साथ लागू किया जाए, तो यह महासागर-निर्भर देशों के अस्तित्व और विकास आवश्यकताओं के अनुरूप पूंजी को जोड़ने का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन सकता है. ब्लू फाइनेंस ऐसा होना चाहिए जो पर्यावरण और समाज को वास्तविक लाभ दे तथा ग्लोबल साउथ देशों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि निर्णय लेने में भी प्रमुख भूमिका मिले.



प्रिया नोरोन्हा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.

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