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Published on Sep 30, 2025 Updated 0 Hours ago

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर्यावरण अनुकूल टिकाऊ विकास के लिहाज़ से एक मिसाल बन सकता है. यानी अगर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर वहां स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करके और जैव विविधता की रक्षा करते हुए, ब्लू बॉन्ड्स के ज़रिए विकास से जुड़ी ब्लू परियोजनाओं को वित्तपोषित किया जाता है, तो यह क्षेत्र टिकाऊ विकास के नज़रिए से एक मॉडल के रूप में उभर सकता है.

समुद्र से समृद्धि तक: ब्लू बॉन्ड्स कैसे बदलेंगे अंडमान-निकोबार का भविष्य

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दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एक प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है. समुद्री जहाजों की आवाजाही के लिहाज़ से देखें तो अंडमान-निकोबार जलडमरूमध्य बेहद व्यस्त समुद्री मार्ग है और यहां से हर साल 90,000 से ज़्यादा जहाजों का आवागमन होता है. भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से होकर गुजरने वाले इस समुद्री मार्ग की वैश्विक समुद्री व्यापार में क़रीब 30 प्रतिशत की हिस्सेदारी है और आने वाले समय में इसके और ज़्यादा बढ़ने की संभावना है. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बंदरगाहों और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र के बंदरगाहों के बीच सबसे कम रेडियल दूरी लगभग 50 किलोमीटर है. बंदरगाहों के बीच यह निकटता कहीं न कहीं भारत को इन देशों के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंध स्थापित करने में काफ़ी मददगार है. अगर स्वच्छ ऊर्जा को अपनाकर एवं क्षेत्र की जैव विविधता को नुक़सान पहुंचाए बगैर यानी उसका संरक्षण करते हुए यहां वर्ल्ड क्लास आपूर्ति श्रृंखला इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया जाता है और इसे बढ़ावा दिया जाता है, तो निश्चित तौर पर इससे न केवल अंडमान और निकोबार के द्वीपों के विकास को पंख लग सकते हैं, बल्कि देश की समृद्धि में यह बेहद कारगर साबित हो सकता है.

स्वच्छ ऊर्जा और जैव विविधता के बीच संतुलन

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भूमध्यरेखीय क्षेत्र में स्थित है और इस वजह से पूरे इलाक़े में भरपूर सूरज की रोशनी मिलती है. ये तेज़ धूप तमाम द्वीपों में सोलर माइक्रो-ग्रिड स्थापित करने के लिए बहुत अच्छी है. इसके अलावा, पूरे क्षेत्र में बड़े समुद्र तटीय इलाक़े हैं और तेज़ समुद्री हवाओं के बीच कोई अवरोध भी नहीं है, यानी पहाड़ों आदि जैसी की कोई रुकावट नहीं है. ऐसे में तटों पर और उनके पास के क्षेत्रों में विंड एनर्जी पार्क स्थापित किए जाने की भी काफ़ी गुंजाइश है. ज़ाहिर है कि पवन ऊर्जा भी स्वच्छ ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है.

अगर स्वच्छ ऊर्जा को अपनाकर एवं क्षेत्र की जैव विविधता को नुक़सान पहुंचाए बगैर यानी उसका संरक्षण करते हुए यहां वर्ल्ड क्लास आपूर्ति श्रृंखला इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया जाता है और इसे बढ़ावा दिया जाता है, तो निश्चित तौर पर इससे न केवल अंडमान और निकोबार के द्वीपों के विकास को पंख लग सकते हैं, बल्कि देश की समृद्धि में यह बेहद कारगर साबित हो सकता है.

अंडमान और निकोबार के द्वीप देखा जाए तो जैव विविधता का एक बड़ा केंद्र हैं. इन द्वीपों न सिर्फ़ बड़ी संख्या में विशेष प्रकार की वनस्पतियां और जीव पाए जाते हैं, बल्कि इनमें से कुछ प्रजातियां तो ऐसी हैं, जो केवल इसी क्षेत्र में ही पाई जाती हैं. हालांकि, इस क्षेत्र में डिफोरेस्टेशन, जलवायु परिवर्तन और भूकंप का ख़तरा लगातार बढ़ रहा है. इस तरह की आपदाएं भूमि क्षरण के अलावा जैव विविधता को भी व्यापक स्तर पर नुक़सान पहुंचाती हैं. ज़ाहिर है कि प्रकृति-आधारित समाधान (NBS) जहां एक ओर जैव विविधता और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के संरक्षण में कारगर साबित होते हैं, वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, आपदा से जुड़े ख़तरों और खाद्य सुरक्षा जैसी सामाजिक चुनौतियों से निपटने में भी लाभदायक होते हैं. ये प्रकृति आधारित समाधान न केवल मानव कल्याण के लिए कारगर होते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक साबित होते हैं. एनबीएस में पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण, उनके टिकाऊ प्रबंधन और उनका पुनर्स्थापन करने जैसे कार्य शामिल हैं. ये कार्य जहां भूमि को लचीला बना सकते हैं, यानी उसे जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के अनुकूल बना सकते हैं, वहीं क्षेत्र के द्वीपों को पर्यटक स्थल के रूप में भी विकसित कर सकते हैं और ऐसा करके देश-दुनिया से पर्यटकों को आकर्षित करके राजस्व में भी वृद्धि कर सकते हैं.

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के विकास के लिए ब्लू बॉन्ड

द्वीपों के विकास से जुड़ी इन सभी नई परियोजनाओं के लिए ज़ाहिर तौर पर पर्याप्त मात्रा में धनराशि की ज़रूरत है. ऐसी पर्यावरण अनुकूल परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए निजी निवेश जुटाने के लिहाज़ से ब्लू बॉन्ड और ग्रीन बॉन्ड जैसे वित्तीय विकल्प बेहद लाभदायक हो सकते हैं. ऑफशोर विंड एनर्जी, समुद्री थर्मल एनर्जी कन्वर्जन, टाइडल पावर और मैंग्रोव पुनर्स्थापन जैसी समुद्र-आधारित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं देखा जाए तो ब्लू बॉन्ड जारी करने के लिहाज़ एकदम सही हैं. इसके अलावा, अंतर्देशीय हरित ऊर्जा और एनबीएस परियोजनाओं को ग्रीन बॉन्ड्स के ज़रिए वित्तपोषित किया जा सकता है. गौर करने वाली बात यह है कि ये क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक और फायदेमंद है, साथ ही स्थानीय निकाय सरकारी मदद से या फिर सरकारी सहायता के बिना पूंजी जुटाने के लिए ग्रीन या ब्लू बॉन्ड्स का उपयोग कर सकते हैं. एक अहम बात यह भी है कि एनबीएस परियोजनाएं हमेशा पूरी तरह से व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक नहीं हो सकती हैं. ऐसे मामलों में भारत सरकार को संभावित नुक़सान की भरपाई करने के लिए इन ग्रीन या ब्लू बॉन्ड को संरक्षण प्रदान करना चाहिए.

ब्लू बॉन्ड के मार्ग में आने वाली रुकावटें

ग्रीन बॉन्ड्स को समय के साथ नियम-क़ानून के दायरे में लाया गया है और काफ़ी हद तक इसने इनके उपयोग को सुगम और सुलभ बनाया गया है. ग्रीन बॉन्ड्स की तुलना में ब्लू बॉन्ड्स देखा जाए तो नए हैं. यही वजह है कि अभी तक कोई वैश्विक फ्रेमवर्क विकसित नहीं हुआ है, जिससे ब्लू परियोजनाओं की आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावशीलता का आकलन किया जा सके और इससे निवेशकों को इसका अंदाज़ा नहीं लग पाता है कि इन योजनाओं में निवेश से उन्हें क्या फायदा होगा और इनमें पैसों का इस्तेमाल किस तरह से किया जाएगा. मौज़ूद वक़्त में ब्लू इकोनॉमी परियोजनाओं के थोड़े-बहुत आंकड़े ही उपलब्ध है. इसके अलावा, ब्लू परियोजनाएं अक्सर बहुत बड़ी नहीं होती हैं और इनसे तुरंत फायदा मिलने की उम्मीद नहीं होती है, बल्कि इसमें काफ़ी लंबा समय लगता है और इसका आकलन करना भी बेहद जटिल होता है. 

ब्लू प्रोजेक्ट्स के बारे में सटीक आकलन की सुविधा उपलब्ध नहीं होने की वजह से ब्लू बॉन्ड जारी करने वाले संस्थान यह दावा तो कर सकते हैं कि इसके पर्यावरणीय लाभ वास्तविकता से कहीं ज़्यादा हैं, लेकिन वे यह बताने में नाक़ाम रहते हैं कि विपरीत हालातों में इसके क्या नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं और इसका कितना नुक़सान हो सकता है.

ब्लू परियोजनाओं की सटीक जानकारी और उनकी प्रभावशीलता के बारे में पता लगाने के लिए तमाम विकसित रिमोट सेंसिंग तकनीक़ें और ऑन-ग्राउंड निगरानी प्रणालियां उपलब्ध हैं. बावज़ूद इसके ब्लू-प्रोजेक्ट्स के सही-सही आकलन और उनके पर्यावरण व सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के बारे में पता लगाना आसान नहीं है. यह एक ऐसा क्षेत्र है जो लगातार बदलाव के दौर से गुजर रहा है और इसके बारे में सभी जानकारियां जुटाना और उनका विश्लेषण करना बड़ी चुनौती बना हुआ है. ज़ाहिर है कि इस सच्चाई ने "ब्लू वॉशिंग" को लेकर चिंताएं पैदा कर दी हैं और इस वजह से इस सेक्टर में निवेशकों की दिलचस्पी कम हो रही है. उदाहरण के तौर पर ब्लू प्रोजेक्ट्स के बारे में सटीक आकलन की सुविधा उपलब्ध नहीं होने की वजह से ब्लू बॉन्ड जारी करने वाले संस्थान यह दावा तो कर सकते हैं कि इसके पर्यावरणीय लाभ वास्तविकता से कहीं ज़्यादा हैं, लेकिन वे यह बताने में नाक़ाम रहते हैं कि विपरीत हालातों में इसके क्या नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं और इसका कितना नुक़सान हो सकता है.

ब्लू बॉन्ड्स की चुनौतियों का समाधान

ब्लू बॉन्ड्स को बढ़ावा देने के लिए उच्च क्रेडिट रेटिंग और निवेशकों का व्यापक हित सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है. इसे क्षेत्र की पारंपरिक (गैर-पर्यावरणीय) परियोजनाओं से प्राप्त आय का एक हिस्सा ऋण चुकाने में लगाया जा सकता है. ऐसा करना कहीं न कहीं उस सिद्धांत के मुताबिक़ होगा, जिसमें कहा जाता है कि पर्यावरण को होने वाले नुक़सान की भरपाई वही करेगा, जो इसके लिए ज़िम्मेदार है. इतना ही नहीं, इससे द्वीपों पर पर्यावरण अनुकूल ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार में भी मदद मिलेगी. इसके अलावा, केंद्र सरकार निवेशकों को आश्वस्त करने के लिए ब्लू बॉन्ड के लिए क्रेडिट गारंटी भी दे सकती है. इसके अतिरिक्त, इन ब्लू बॉन्ड्स को जारी करने वाले संस्थानों और निकायों की वित्तीय स्थिति को मज़बूत करने के लिए सरकारी वित्तीय मदद (उदाहरण के तौर पर अनुदान और रियायती ऋण) और निजी पूंजी के मिलेजुले फाइनेंस मॉडल को भी अपनाया जा सकता है. सरकारी मदद का इस्तेमाल लेनदेन के ख़र्च को कवर करने के लिए भी किया जा सकता है, जिसमें प्रमाणन और निगरानी की लागत भी शामिल है.

अगर ब्लू-बॉन्ड द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं की प्रगति और उनके असर की पूरी निगरानी करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और ब्लॉकचेन जैसी अत्याधुनिक तकनीक़ों का इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे निश्चित तौर पर "ब्लू वॉशिंग" के ख़तरों को कम किया जा सकता है. लाभप्रद बॉन्ड फ्रेमवर्क ब्लू बॉन्ड वाशिंग के जोख़िमों को कम करने के सबसे बेहतरीन तरीक़ा है, यानी इस फ्रेमवर्क के ज़रिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि बॉन्ड जारी करने वाला बैंक या संस्थान बॉन्ड बेचकर मिली धनराशि को योग्य ब्लू प्रोजेक्ट्स में किस प्रकार आवंटित करेगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें बॉन्ड से प्राप्त फंड का पहले से निर्धारित ब्लू परियोजनाओं में उपयोग किया जा सकता है और इसमें जोख़िम की संभावना कम होती है. इसमें धनराशि के उपयोग से जुड़े समझौते में इस बात का प्रावधान किया जा सकता है कि अगर "ब्लू वॉशिंग" होता है, तो ब्लू बॉन्ड्स जारी करने वाले पर जुर्माना लगाया जाएगा. इससे यह सुनिश्चित होगा कि ब्लू बॉन्ड जारी करने वाले संस्थानों को जो मुनाफा होता है, उसे हर हाल में केवल समुद्र से जुड़ी टिकाऊ परियोजनाओं में ही ख़र्च किया जाएगा.

 अगर सरकार और उसकी एजेंसियां इन ब्लू परियोजनाओं में एक निवेशक के तौर पर अपनी भागीदारी करती हैं, तो इससे न केवल इन प्रोजेक्ट्स को लेकर भरोसा बढ़ेगा, बल्कि इनकी क्रेडिट प्रोफाइल भी मज़बूत हो सकती है. ज़ाहिर है कि ऐसा होने पर ब्लू बॉन्ड में अधिक से अधिक निवेश हो सकता है.

ब्लू बॉन्ड की कामयाबी और "ब्लू वॉशिंग" को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने तीन प्रमुख क़दमों की सिफ़ारिश की है. पहला सुझाव है कि ब्लू बॉन्ड के मापदंड ऐसे होने चाहिए जो वर्तमान वैश्विक मानकों के अनुरूप हों. यूएन के दूसरे सुझाव के मुताबिक़ एक ऐसा फ्रेमवर्क विकसित करने की ज़रूरत है, जो एक 'ब्लू बेसलाइन' स्थापित करें, यानी समुद्री संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए एक आधार रेखा या मानक तय करे, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ रहे. कहने का मतलब है कि ब्लू प्रोजेक्ट्स के प्रदर्शन का समय-समय पर आकलन करने और उनकी पर्याप्त निगरानी के लिए दिशानिर्देश और मापदंड तय किए जाने चाहिए. यूएन ने जो तीसरी सिफ़ारिश की है, उसके अनुसार नीली परियोजनाओं की रूपरेखा, योग्यता और प्रदर्शन को तय करने के लिए एक सेकेंड पार्टी ओपिनियन ज़रूरी किया जाए. इससे ब्लू परियोजनाओं के बारे निष्पक्ष तरीक़े से पता चल सकेगा और इस तरह का मूल्यांकन ब्लू बॉन्ड जारी करने को विश्वसनीय भी बनाएगा. यानी ऐसा करने से सरकार या दूसरी संस्थाओं को ब्लू बॉन्ड जारी करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी. 

ब्लू बॉन्ड में सरकार की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी

ऊपर सुझाई गई पहलों को अमली जामा तभी पहनाया जा सकता है जब इनमें सरकार की ओर दिलचस्पी ली जाए और पूरी भागीदारी निभाई जाए. कहने का मतलब है कि सरकार और उसकी एजेंसियां ब्लू परियोजनाओं में सरकार भले ही सीमित निवेश करे, पर उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी आवश्यक है. इससे जहां एक ओर यह सुनिश्चित होगा की सरकार पर्यावरण अनुकूल समुद्री विकास को लेकर प्रतिबद्ध है, वहीं इससे इन ब्लू परियोजनाओं की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी. ज़ाहिर है कि इससे दूर-सुदूर समुद्र तटीय क्षेत्रों में निवेश के लिए प्राइवेट सेक्टर को प्रोत्साहन मिलेगा और निजी निवेशकों के लिए जोख़िम भी कम होंगे. अगर सरकार और उसकी एजेंसियां इन ब्लू परियोजनाओं में एक निवेशक के तौर पर अपनी भागीदारी करती हैं, तो इससे न केवल इन प्रोजेक्ट्स को लेकर भरोसा बढ़ेगा, बल्कि इनकी क्रेडिट प्रोफाइल भी मज़बूत हो सकती है. ज़ाहिर है कि ऐसा होने पर ब्लू बॉन्ड में अधिक से अधिक निवेश हो सकता है.

भारत सरकार की ओर से जारी की गई दि लॉजिस्टिक्स ईज एक्रोस डिफरेंट स्टेट्स यानी विभिन्न राज्यों में लॉजिस्टिक्स सुगमता (LEADS) 2024 रिपोर्ट में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को 'आकांक्षी' श्रेणी में रखा गया है, यानी एक ऐसे क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है जो बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार है. ऐसे में अगर ब्लू बॉन्ड्स के ज़रिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ब्लू परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाता है, तो निसंदेह तौर पर इस क्षेत्र को बदलाव के लिए आकांक्षी से अग्रणी की श्रेणी में लाया जा सकता है. इतना ही नहीं, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ब्लू बॉन्ड्स के ज़रिए अगर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और पुनर्स्थापन को सुनिश्चित करते हुए ऑफशोर विंड एंनर्जी फार्म्स जैसी स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं को वित्तपोषित किया जाता है तो यह ब्लू परियोजनाओं के क्षेत्र में एक मिसाल बन सकता है. ऐसा होने पर अन्य राज्य भी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के इस मॉडल से सीख लेकर इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं.


लाबण्य प्रकाश जेना लंदन स्कूल ऑप इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (LSE) के विजिटिंग सीनियर फेलो हैं और क्लाइमेट सस्टेनेबिलिटी इनीशिएटिव (CSI) के डायरेक्टर हैं.

प्रसाद अशोक ठाकुर आईआईटी बॉम्बे और आईआईएम अहमदाबाद के एलुमनी हैं.

 

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Authors

Labanya Prakash Jena

Labanya Prakash Jena

Labanya Prakash Jena is Director at the Climate and Sustainability Initiative (CSI) and a visiting senior fellow at the London School of Economics and Political ...

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Prasad Ashok Thakur

Prasad Ashok Thakur

Prasad Ashok Thakur is a CIMO scholar and has authored a book and several articles published with The World Bank Asian Development Bank Institute United ...

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