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Published on Nov 29, 2025 Updated 5 Days ago

भारत ने चिकित्सा विज्ञान में एक ऐसा कदम उठाया है जो सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं- सीधे जीवन बदलने की क्षमता रखता है. CRISPR तकनीक पर आधारित बिरसा-101 न सिर्फ एक थेरेपी है बल्कि उन समुदायों के लिए नई उम्मीद है जो पीढ़ियों से सिकल सेल रोग की मार झेल रहे हैं.

बिरसा-101: नया इलाज आपकी सेहत कैसे बदलेगा, पढ़िए


चिकित्सा के क्षेत्र में नवाचार में भारत ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. भारत ने सिकल सेल रोग के इलाज के लिए अपनी स्वदेशी CRISPR (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट्स) पर आधारित उपचार प्रणाली विकसित की है. इस स्वदेशी थेरेपी को 'बिरसा-101' नाम दिया गया है. ये नाम प्रसिद्ध आदिवासी नेता, भगवान बिरसा मुंडा के नाम पर दिया गया है. बिरसा-101 एक ऐसी आनुवंशिक बीमारी का किफायती इलाज है जो मुख्य रूप से भारत में कमज़ोर समुदायों को प्रभावित करती है. इस थेरेपी के अब तक के परीक्षण के नतीजे काफ़ी उत्साहजनक रहे हैं. इसका क्लीनिकल ट्रायल अगले साल से शुरू होने वाला है. इसके परीक्षण में शामिल होने वाले लोगों के मध्य और पूर्वी भारत से होने की संभावना है क्योंकि इस बीमारी से पीड़ितों में से ज़्यादातर इसी क्षेत्र में रहने वाले लोग हैं. 

  • भारत ने चिकित्सा विज्ञान में एक ऐसा कदम उठाया है जो सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं- सीधे जीवन बदलने की क्षमता रखता है.
  • बिरसा-101 सिकल सेल से जूझ रहे समुदायों के लिए नई उम्मीद.
  • थेरेपी का नाम बिरसा-101 रखा गया है.

सिकल सेल रोग क्या है?

सिकल सेल रोग (एससीडी) आनुवंशिक रूप से विरासत में मिले विकारों का एक समूह है जो हीमोग्लोबिन की शरीर में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता को प्रभावित करता है. हीमोग्लोबिन, लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद एक प्रकार का प्रोटीन है. आमतौर पर, सामान्य हीमोग्लोबिन वाली लाल रक्त कोशिकाएं (आरबीसी) डिस्क के आकार की होती हैं, जिससे वे रक्त वाहिकाओं में आसानी से घूम पाती हैं और ऑक्सीजन को कुशलतापूर्वक पहुंचा पाती हैं. सिक सेल रोग के मामले में, हीमोग्लोबिन के एक घटक को एन्कोड करने वाले जीन (एचबीबी जीन) में एक आनुवंशिक तब्दीली इसकी संरचना बदल देता है. डिस्क के आकार की आरबीसी, अपना रूप बदलकर अर्धचंद्राकार या दरांती के आकार की हो जाती हैं. दरांती के आकार की ये आरबीसी बहुत कठोर होती हैं, और आसानी से हिल नहीं पातीं. यही वजह है कि ये रक्त वाहिकाओं में आसानी से नहीं घूम पाती, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होती है.

“सिकल सेल रोग तब विकसित होता है, जब किसी व्यक्ति को एचबीबी जीन की दो म्यूटेंट कॉपीज़ (एक मां से-एक पिता से) विरासत में मिलती हैं.”

सिकल सेल रोग तब विकसित होता है, जब किसी व्यक्ति को एचबीबी जीन की दो म्यूटेंट कॉपीज़ (एक मां से-एक पिता से) विरासत में मिलती हैं. इसके लक्षण बहुत तीव्र होते हैं. इस बीमारी में इतनी दर्दनाक घटनाएं या संकट शामिल हैं, जिनके लिए अस्पताल में भर्ती होना ज़रूरी हो जाता है. सिकल रोग के लक्षणों की बात करें तो, एनीमिया, सूजन, बार-बार संक्रमण, स्ट्रोक, दृष्टि संबंधी समस्याएं और गुर्दे की बीमारी जैसी अन्य गंभीर जटिलताएं, इस बीमारी के संकेत हैं. जिन व्यक्तियों को एचबीबी जीन की एक म्यूटेंट कॉपी विरासत में मिलती है, उनमें आमतौर पर लक्षण विकसित नहीं होते हैं, क्योंकि इस रोग के लिए दो म्यूटेंट चाहिए, लेकिन उनसे ये विकार आनुवांशिक रूप से उनके बच्चों में जा सकता है.

दुनिया भर में लगभग 77 लाख लोग सिकल सेल बीमारी से पीड़ित है. इनमें से 80 प्रतिशत मामले उप-सहारा अफ्रीका में हैं. 2021 में एससीडी के कारण 81,000 से ज़्यादा मौतें हुईं, जिसने पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में काफ़ी योगदान दिया. भारत के संदर्भ में, एससीडी का बोझ भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग है. भारत में आदिवासी समूहों में सिकल-सेल लक्षण का प्रचलन 1-40 प्रतिशत के बीच है, और एससीडी का प्रचलन 1 प्रतिशत है. ध्यान देने योग्य बात ये है कि, इस लक्षण से ग्रस्त 73 प्रतिशत भारतीय मूलनिवासी समुदायों से हैं, जो कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत हैं.

सिकल सेल रोग के प्रभाव को कम करने के लिए हाइड्रॉक्सीयूरिया, ब्लड ट्रांसफ्यूज़न और एंटीबायोटिक दवाओं के माध्यम से उपचार किया जा सकता है, जबकि अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (बोन मैरो ट्रांसप्लांट) ही एकमात्र उपचारात्मक विकल्प है. भारत में इस बीमारी से ग्रस्त लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. इस पृष्ठभूमि में जीन थेरेपी, सिकल सेल रोग के इलाज के लिए एक अन्य विकल्प के रूप में उभर रही है. CRISPR पर शोध 1987 में शुरू हुआ, लेकिन जीन-एडिटिंग उपकरण के रूप में इसका एप्लिकेशन पहली बार 2012 में प्रदर्शित किया गया. इसके बाद जीन थेरेपी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसका परिणाम 2020 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार था. इस साल रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार CRISPR-Cas9 जीन-एडिटिंग तकनीक विकसित करने के लिए इमैनुएल चार्पेंटियर और जेनिफर डूडना को दिया गया.

“2021 में एससीडी के कारण 81,000 से ज़्यादा मौतें हुईं, जिसने पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में काफ़ी योगदान दिया.”



सिकल सेल रोग के इलाज के लिए पहली जीन-एडिटिंग थेरेपी को अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने 2023 में मंजूरी दी. इसे कैसगेवी थेरेपी भी कहा जाता है. कैसगेवी थेरेपी, सिकल सेल रोग और ट्रांसफ्यूज़न पर आधारित बीटा थैलेसीमिया जैसे गंभीर रक्त विकारों के लिए एक जीन-संपादन उपचार है, लेकिन इसमें एक बड़ी दिक्कत है. उच्च लाइसेंसिंग फीस की वजह से एससीडी के लिए क्रिस्पर-आधारित जीन-एडिटिंग थेरेपी की लागत कथित तौर पर प्रति मरीज़ 20-25 करोड़ रुपये है. इतना महंगा इलाज कराना हर किसी के बस की बात नहीं है. भारत में नए विकसित स्वदेशी प्लेटफ़ॉर्म की लागत लगभग 50 लाख रुपये होने की उम्मीद है. स्वदेशी जीन थेरेपी का विकास भारत के राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन का हिस्सा है, जिसे 2023 में शुरू किया जाएगा. इस मिशन का लक्ष्य 2047 तक एससीडी को ख़त्म करना है.

भारत की स्वदेशी चिकित्सा

बिरसा-101 को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान संस्थान, जीनोमिक्स और एकीकृत जीव विज्ञान (सीएसआईआर-आईजीआईबी) द्वारा विकसित किया गया है. ये CRISPR तकनीक पर आधारित है. इस महीने की शुरुआत में, सीएसआईआर-आईजीआईबी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) के बीच एक औपचारिक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सहयोग समझौते को अंतिम रूप दिया गया था. सीएसआईआर-आईजीआईबी द्वारा इसके क्लीनिकल ट्रायल शुरू करने की दिशा में काम पहले से ही प्रगति पर है. इसके लिए उसने जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारतीय औषधि महानियंत्रक, सीएसआईआर और जनजातीय मामलों के मंत्रालय सहित कई संस्थानों के साथ सहयोग किया है. 


2026 में शुरू होने वाले इन क्लीनिकल ट्रायल्स में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के प्रतिभागियों को शामिल किया जाएगा. नैदानिक परीक्षण सीएसआईआर-आईजीआईबी, एसआईआई और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली द्वारा मिलकर आयोजित किए जाएंगे. इसका फायदा ये होगा कि, देश को स्वदेशी तकनीक का एक विकसित और किफायती चिकित्सीय विकल्प मिलेगा. भारत में ही विकसित इस उपचार का मरीजों पर परीक्षण संभव हो सकेगा. इसके अलावा, थैलेसीमिया का इलाज करना भी इस तकनीक का एक लक्ष्य है. थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें हीमोग्लोबिन का उत्पादन कम होता है. या हीमोग्लोबिन होता ही नहीं है. आईजीआईबी और एसआईआई थैलेसीमिया के लिए एक समानांतर चिकित्सा विकसित कर रहे हैं, जिसमें एससीडी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रिया के समान ही उपचार पद्धति का इस्तेमाल किया जाएगा.

अब आगे क्या किया जाना चाहिए?

 जैसे-जैसे बिरसा-101 जैसी CRISPR-आधारित चिकित्सा पद्धतियां आगे बढ़ रही हैं, ज़िम्मेदार वैज्ञानिक संचार ज़रूरी होता जा रहा है. शोध करने वालों और संस्थानों को जीन चिकित्सा के संबंध में पारदर्शी अपडेट्स, आसान और सुलभ व्याख्याएं और समुदायों के साथ सक्रिय जुड़ाव को प्राथमिकता देनी चाहिए. उदाहरण के लिए, अगर कमज़ोर समुदायों में क्लीनिकल ट्रायल के लिए सहमति चाहिए तो, सांस्कृतिक रूप से आधारित संचार, स्थानीय भाषाओं में अनुवाद, सामुदायिक नेताओं और अग्रिम मोर्चे पर तैनात स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ निरंतर संवाद की आवश्यकता होती है. जनसंवाद को मज़बूत करना और जिम्मेदार मीडिया कवरेज सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है. इससे गलत सूचनाओं का मुकाबला करने और जीन-संपादन तकनीकों में विश्वास पैदा करना आसान होगा, क्योंकि ये थेरेपी अब प्रयोगशालाओं से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में उपयोग के लिए आगे बढ़ रही है.

 
जीन-संपादन चिकित्सा के लिए विशिष्ट बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित कर्मियों, सख्त जैव सुरक्षा और उपचार प्रोटोकॉल की ज़रूरत होती है. रोगी का उपचार भी काफ़ी जटिल है, जिसके लिए नैदानिक मूल्यांकन, शुरूआती उपाय और दीर्घकालिक निगरानी आवश्यक है. हालांकि प्रमुख स्वास्थ्य सेवा केंद्र उपचार में निरंतर देखभाल का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन दूरस्थ और आदिवासी जिलों में ऐसा करना बड़ी चुनौती बनी हुआ है, जबकि इन्हीं इलाकों में सिकल सेल रोग से पीड़ितों की संख्या ज़्यादा है.

 “भारत में नए विकसित स्वदेशी प्लेटफ़ॉर्म की लागत लगभग 50 लाख रुपये होने की उम्मीद है.”



भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से भी देखें तो, एससीडी के लिए जीन थेरेपी का स्वदेशी उत्पादन जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है. अगर ये स्वदेशी तकनीक सफल हो जाती है, तो ये भारत को निम्न और मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) के लिए किफायती जीन थेरेपी के निर्माता के रूप में स्थापित कर सकता है. इसके अलावा, थैलेसीमिया के लिए प्लेटफॉर्म का समानांतर विकास भारत में साझा जीन थेरेपी इकोसिस्टम की मज़बूत संभावना की ओर इशारा करता है. ये रोग के निदान, दवा के विनिर्माण और नैदानिक परीक्षणों तक फैला हुआ है. इससे अन्य आनुवंशिक विकारों के लिए उपचार विकल्पों का विस्तार करने का रास्ता भी साफ होगा.

“2026 में शुरू होने वाले इन क्लीनिकल ट्रायल्स में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के प्रतिभागियों को शामिल किया जाएगा.”

कुल मिलाकर, बिरसा-101 ना सिर्फ एक प्रमुख वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि भारत की जैव प्रौद्योगिकी क्षमताओं में एक व्यापक बदलाव का भी प्रतीक है. एक स्वदेशी और किफायती CRISPR प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाकर, भारत ने जीन थेरेपी में दीर्घकालिक नेतृत्व की नींव रखनी शुरू कर दी है. जैसे-जैसे क्लीनिकल ट्रायल आगे बढ़ेंगे, निरंतर निवेश, सामुदायिक विश्वास निर्माण और न्यायसंगत पहुच ये निर्धारित करेगी कि इस नवाचार से उस आबादी को कितना फायदा होता है, जिन्हें इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.


लक्ष्मी रामाकृष्णन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में एसोसिएट फेलो हैं.

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