बायोहैकिंग और पेप्टाइड्स को सोशल मीडिया पर तेजी से 'हेल्थ शॉर्टकट' की तरह पेश किया जा रहा है लेकिन इनके ज्यादातर दावों के पीछे मजबूत वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं. इन्हें बिना सही निगरानी के इस्तेमाल करने से फायदे के साथ-साथ गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी हो सकते हैं. पढ़ें विश्लेषण.
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2023 में, संयुक्त राज्य अमेरिका (US) के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने सुरक्षा चिंताओं के कारण कुछ पेप्टाइड्स के उपयोग पर कंपाउंडिंग फार्मेसीज़-ऐसी इकाइयाँ जो मरीजों के लिए विशेष रूप से दवाएं तैयार करती हैं-के माध्यम से प्रतिबंध लगा दिया. इन पेप्टाइड्स को अक्सर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा स्वास्थ्य और वेलनेस लाभ देने के दावों के साथ प्रचारित किया जाता है, जैसे चोट के बाद तेजी से रिकवरी या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना. हालांकि वेलनेस सर्कल में ये पेप्टाइड्स लोकप्रिय हैं, लेकिन इनके उपयोग का समर्थन करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य सीमित हैं. लेकिन फरवरी 2026 में, स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग (HHS) के सचिव रॉबर्ट एफ. केनेडी जूनियर ने इन प्रतिबंधों को हटाने का प्रस्ताव रखा. FDA ने कहा कि वह जुलाई में एक सलाहकार समिति के तहत समीक्षा करेगा कि क्या इन पेप्टाइड्स में से कुछ का उत्पादन अमेरिका के भीतर किया जा सकता है. ये कदम ऐसे अणुओं को, जिनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, आम जनता के लिए अधिक सुलभ बना सकते हैं.
पेप्टाइड्स अमीनो एसिड की छोटी श्रृंखलाएँ होती हैं, जो शरीर में प्राकृतिक रूप से बनती हैं और मेटाबोलिज्म, प्रतिरक्षा और ऊतकों की संरचनात्मक मजबूती जैसे कार्यों में योगदान देती हैं. डायग्नोस्टिक्स और उपचार में इनके व्यापक उपयोग के कारण, जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से इनके सिंथेटिक रूप विकसित किए गए हैं. टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज-जिसमें रक्त में ग्लूकोज का स्तर अधिक होता है-के उपचार में सिंथेटिक इंसुलिन का उपयोग किया जाता है, जो प्राकृतिक इंसुलिन की तरह काम कर रक्त शर्करा को कम करता है. हाल के वर्षों में, ग्लूकागोन-लाइक पेप्टाइड-1 (GLP-1) रिसेप्टर एगोनिस्ट जैसे सेमाग्लूटाइड, टाइप 2 डायबिटीज और मोटापे के इलाज में लोकप्रिय हुए हैं. यह दिखाता है कि जब पेप्टाइड्स वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित होते हैं और नियंत्रित स्वास्थ्य प्रणालियों के भीतर उपयोग किए जाते हैं, तो वे परिवर्तनकारी साबित हो सकते हैं.
इन पेप्टाइड्स को अक्सर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा स्वास्थ्य और वेलनेस लाभ देने के दावों के साथ प्रचारित किया जाता है, जैसे चोट के बाद तेजी से रिकवरी या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना. हालांकि वेलनेस सर्कल में ये पेप्टाइड्स लोकप्रिय हैं, लेकिन इनके उपयोग का समर्थन करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य सीमित हैं.
बायोहैकिंग एक स्पेक्ट्रम पर मौजूद है-कम जोखिम वाले तरीकों में खानपान में बदलाव, उपवास और वियरेबल्स के जरिए नींद की निगरानी शामिल है, जबकि अधिक जोखिम वाले तरीकों में इंजेक्टेबल पेप्टाइड्स का स्वयं उपयोग शामिल है.
जहाँ कुछ पेप्टाइड्स को FDA जैसे नियामकों द्वारा क्लिनिकल उपयोग के लिए मंजूरी मिली है, वहीं स्वास्थ्य और वेलनेस क्षेत्र में ऐसे कई सिंथेटिक पेप्टाइड्स मौजूद हैं जिन्हें क्लिनिकल उपयोग की अनुमति नहीं है. इस क्षेत्र के लोकप्रिय पेप्टाइड्स में GHK-CU, BPC-157, CJC-1295 और SS-31 शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश इंजेक्टेबल हैं. बायोहैकर्स ‘डू-इट-योरसेल्फ’ (DIY) दृष्टिकोण अपनाते हुए तकनीकी ज्ञान और वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से जीवनशैली प्रयोग करते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य यह समझना होता है कि शरीर और मस्तिष्क को बेहतर तरीके से कैसे कार्य कराया जा सकता है.
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और ‘मेक अमेरिका हेल्दी अगेन’ (MAHA) जैसे आंदोलनों के प्रभाव से, बायोहैकर्स अब वजन घटाने, खेल प्रदर्शन बढ़ाने, उत्पादकता सुधारने और लंबी उम्र के लिए पेप्टाइड्स के साथ प्रयोग कर रहे हैं.
उदाहरण के लिए, BPC-157 को ऊतक मरम्मत में मदद करने और कोलेजन उत्पादन बढ़ाने के लिए जाना जाता है, जिससे उम्र बढ़ने के प्रभाव धीमे हो सकते हैं. BPC-157 और TB-500 का संयोजन एथलीट्स द्वारा प्रदर्शन और रिकवरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसे ‘वूल्वरिन स्टैक’ कहा जाता है-यह नाम मार्वल कॉमिक्स के किरदार की तेज़ हीलिंग क्षमता से प्रेरित है. इसी तरह, कॉपर युक्त पेप्टाइड GHK-Cu का इंजेक्टेबल रूप, जो घाव भरने और कोलेजन पुनर्जनन से जुड़ा माना जाता है, कॉस्मेटिक उद्योग में एंटी-एजिंग ट्रेंड को बढ़ावा देता है. हालांकि GHK-Cu का उपयोग टॉपिकल कॉस्मेटिक्स में किया जाता है, इसका इंजेक्टेबल रूप FDA द्वारा स्वीकृत नहीं है, जिससे प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं का जोखिम बढ़ता है.
इन पेप्टाइड्स को अक्सर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा स्वास्थ्य और वेलनेस लाभ देने के दावों के साथ प्रचारित किया जाता है, जैसे चोट के बाद तेजी से रिकवरी या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना. हालांकि वेलनेस सर्कल में ये पेप्टाइड्स लोकप्रिय हैं, लेकिन इनके उपयोग का समर्थन करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य सीमित हैं.
इन अनियमित पेप्टाइड्स पर उपलब्ध अधिकांश वैज्ञानिक अध्ययन प्रीक्लिनिकल स्तर के हैं-यानी लैब या पशु परीक्षण-और क्लिनिकल ट्रायल डेटा बहुत कम या नहीं के बराबर है. अक्सर इनके काम करने के तरीके स्पष्ट नहीं होते और शरीर पर इनके दीर्घकालिक प्रभाव भी ठीक से समझे नहीं गए हैं.
सुरक्षा जोखिमों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाएँ, इंजेक्शन स्थल पर संक्रमण, मेटाबोलिज्म में गड़बड़ी, हार्मोन सिग्नलिंग और हृदय क्रिया पर प्रभाव, तथा ट्यूमर वृद्धि का खतरा शामिल है. उदाहरण के लिए, MK-677 (आइबुटामोरेन) एक गैर-पेप्टाइड सिंथेटिक अणु है, जिसका उपयोग बायोहैकिंग में किया जाता है और यह ग्रोथ हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाता है. इसे मांसपेशियों को बढ़ाने, वसा घटाने और ऊर्जा बढ़ाने के रूप में प्रचारित किया जाता है. लेकिन इसे वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी ने प्रतिबंधित किया है और ऑस्ट्रेलियाई पॉइजन स्टैंडर्ड में इसे विष के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. सीमित क्लिनिकल ट्रायल्स में इसे हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट फेलियर से जोड़ा गया, जिसके कारण इसके शोध को बंद करना पड़ा.
इसके अलावा, गलत डोज़िंग और एंडोटोक्सीन या अन्य अशुद्धियों की मौजूदगी इंजेक्टेबल पेप्टाइड्स के लिए गंभीर गुणवत्ता नियंत्रण जोखिम पैदा करती है. मजबूत क्लिनिकल डेटा की कमी के कारण, डॉक्टर और स्वास्थ्य प्रणाली इनसे होने वाले दुष्प्रभावों की पहचान और प्रबंधन करने में सक्षम नहीं हो सकते.
अनियमित पेप्टाइड्स उपभोक्ताओं को इसलिए आकर्षित करते हैं क्योंकि इन्हें अत्याधुनिक उपचार के रूप में पेश किया जाता है और ये उन लोगों के लिए विकल्प देते हैं जो पारंपरिक इलाज से संतुष्ट नहीं हैं. स्पोर्ट्स मेडिसिन के डॉक्टरों ने देखा है कि चोट के बाद मरीज पेप्टाइड्स की ओर रुख करते हैं, क्योंकि पारंपरिक इलाज में समय लगता है, दर्द हो सकता है और वह महंगा भी होता है. इसके अलावा, ‘ऑप्टिमाइजेशन‘ की संस्कृति-जहाँ बेहतर दिखने, अधिक उत्पादक और ऊर्जावान बने रहने का दबाव होता है-भी लोगों को आकर्षित करती है.
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पहुँच को आसान बनाते हैं, जिससे लोग बिना डॉक्टर, प्रिस्क्रिप्शन या किसी निगरानी के इन्हें खरीद सकते हैं. इन्हें अक्सर ‘रिसर्च-ग्रेड’ के नाम से बेचा जाता है, यानी मानव उपयोग के लिए नहीं, लेकिन वास्तव में इन्हें उसी उद्देश्य से खरीदा जाता है.
सोशल मीडिया इस प्रवृत्ति को और बढ़ाता है, जहाँ पेप्टाइड्स को आत्म-सुधार के शॉर्टकट के रूप में प्रचारित किया जाता है. ‘पेप्टाइड्स’ शब्द से यह धारणा बनती है कि ये प्राकृतिक हैं और इसलिए सुरक्षित हैं, जबकि ‘दवाओं’ के प्रति लोगों में नकारात्मक सोच होती है. साथ ही, GLP-1 एगोनिस्ट्स के बढ़ते उपयोग ने इंजेक्शन लेने के मानसिक डर को भी कम कर दिया है, जिससे इंजेक्टेबल उपचार अब सामान्य होते जा रहे हैं.
जहाँ नियामक एजेंसियों द्वारा स्वीकृत पेप्टाइड्स फार्मेसी के माध्यम से उपलब्ध होते हैं, वहीं अनियमित पेप्टाइड्स ग्रे मार्केट के जरिए जनता तक पहुँचते हैं. यह एक कानूनी और नियामकीय ‘ग्रे ज़ोन‘ है, जिसमें ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, कंपाउंडिंग फार्मेसी (अमेरिका में) और वेलनेस क्लीनिक शामिल हैं.
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पहुँच को आसान बनाते हैं, जिससे लोग बिना डॉक्टर, प्रिस्क्रिप्शन या किसी निगरानी के इन्हें खरीद सकते हैं. इन्हें अक्सर ‘रिसर्च-ग्रेड’ के नाम से बेचा जाता है, यानी मानव उपयोग के लिए नहीं, लेकिन वास्तव में इन्हें उसी उद्देश्य से खरीदा जाता है. अधिकतर अनियमित पेप्टाइड्स चीन के निर्माताओं से आते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन और नियमों के पालन में चुनौतियाँ पैदा होती हैं.
यह भी समझना जरूरी है कि पेप्टाइड्स का बढ़ता चलन शरीर की छवि, उत्पादकता और उम्र बढ़ने को लेकर मानसिक दबाव को भी बढ़ाता है. इस तरह के प्रयोग लोगों को अपने शरीर को एक ‘प्रयोगशाला‘ की तरह देखने के लिए प्रेरित करते हैं. ये मुद्दे केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत जैसे देशों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं.
हाल ही में एक पॉडकास्ट में HHS के सचिव ने संकेत दिया कि वे पहले से प्रतिबंधित पेप्टाइड्स पर लगी रोक को कम करना चाहते हैं, ताकि फार्मेसी इन्हें तैयार कर सकें. इसके बाद FDA ने घोषणा की कि वह जुलाई में समीक्षा करेगा कि क्या इन पेप्टाइड्स का उत्पादन अमेरिका के भीतर किया जा सकता है. यदि ये प्रतिबंध हटाए जाते हैं, तो इससे ऐसे पेप्टाइड्स का उत्पादन बढ़ सकता है जिनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं. साथ ही, कंपाउंडिंग फार्मेसी के माध्यम से इनकी उपलब्धता बढ़ने से इन तक पहुँच और आसान हो सकती है.
अनियमित पेप्टाइड्स स्वास्थ्य और वेलनेस के क्षेत्र में एक जटिल स्थिति पैदा करते हैं. इनके लाभों के लिए वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं और इनके सुरक्षित होने के बारे में भी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. FDA द्वारा लगाए गए वर्तमान प्रतिबंध इन्हीं चिंताओं पर आधारित हैं, लेकिन इन्हें पुनर्विचार किया जा सकता है. यदि इनकी उपलब्धता बढ़ती है, तो ‘केवल शोध के लिए’ बनाए गए उत्पादों को मानव उपयोग के लिए प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए. साथ ही, यह भी समझना जरूरी है कि पेप्टाइड्स का बढ़ता चलन शरीर की छवि, उत्पादकता और उम्र बढ़ने को लेकर मानसिक दबाव को भी बढ़ाता है. इस तरह के प्रयोग लोगों को अपने शरीर को एक ‘प्रयोगशाला‘ की तरह देखने के लिए प्रेरित करते हैं. ये मुद्दे केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत जैसे देशों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं. अमेरिका के दवा नियमों का असर दुनिया भर में पड़ता है, इसलिए उनमें बदलाव होने पर दूसरे देशों में लोगों के व्यवहार पर भी असर पड़ सकता है. इसलिए, स्वस्थ जीवन के लिए सरल और वैज्ञानिक तरीके अपनाना बहुत ज़रूरी है.
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Lakshmy is an Associate Fellow with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. Her work focuses on the intersection of biotechnology, health, and international relations, with a ...
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