-
CENTRES
Progammes & Centres
Location
अब हम अर्थव्यवस्था के उस दौर में पहुंच चुके हैं, जहां आर्थिक विकास का अर्थ जल, थल और वायु (अंतरिक्ष तकनीकी) में तरक्की करना है. इसीलिए अब महासागरीय अर्थव्यवस्था पर भी ध्यान दिया जा रहा है. समुद्री क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर टिकाऊ और समावेशी विकास में उद्योग जगत की भूमिका महत्वपूर्ण है.
समुद्री अर्थव्यवस्था का तेज़ी से विस्तार हो रहा है. दुनिया भर के देश बंदरगाहों, नवीकरणीय ऊर्जा, शिपिंग, मत्स्य पालन, पर्यटन और जलवायु संकट को झेलने में सक्षम बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहे हैं. मुंबई के कोली समाज के लोगों से लेकर अलास्का के इनुइट जैसे तटीय समुदायों के लिए महासागर एक जीवित विरासत और उनकी पहचान है. इतना ही नहीं, ये लोग समुद्र को अपनी आजीविका, स्थायी रोजगार और ज्ञान का स्रोत मानते हैं. इसके बावजूद, समुद्री अर्थव्यवस्था और उस पर निर्भर लोग, आम तौर पर शासन प्रणालियों और उभरते आर्थिक अवसरों के लिए हाशिये पर रहती है.
समुद्री अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है और देश बंदरगाह, ऊर्जा, शिपिंग व जलवायु-सक्षम ढाँचे में निवेश बढ़ा रहे हैं।
ब्लू इकोनॉमी के उभार के साथ दोहन-केंद्रित नज़रिये से समुद्री-न्याय की ओर बढ़ना आवश्यक है।
सीएसआर अभी भी कंपनियों की मुख्य रणनीति में हाशिए पर और खंडित रूप में मौजूद है।
जैसे ही समुद्री अर्थव्यवस्था यानी ब्लू इकोनॉमी विकास रणनीतियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है, वैश्विक और राष्ट्रीय ढांचे को अंधाधुंध दोहन वाले दृष्टिकोण से समुद्री न्याय की ओर बढ़ना चाहिए. समुद्री अर्थव्यवस्था को लेकर फिलहाल सबका नज़रिया दोहन का है. हर कोई कम से कम समय में समुद्र से ज़्यादा से ज़्यादा संसाधन निकाल लेना चाहता है. सतत विकास पर किसी का ध्यान नहीं है. ऐसे समय में उद्योग जगत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) सामाजिक और पर्यावरणीय विचारों को मुख्य संचालन और हितधारक जुड़ाव में एकीकृत करती है. सीएसआर के फंड से समुद्रों पर निर्भर स्थानीय समुदायों और महासागर के संरक्षण की कोशिशों का समर्थन किया जा सकता है.
वैश्विक स्तर पर कई सीएसआर पहलों ने मैंग्रोव नर्सरी, प्रशिक्षण कार्यक्रम, आपदा तैयारी और समुद्र तटों की सफाई अभियान जैसी परियोजनाओं के ज़रिए से तटीय समुदायों की मदद की है. इंडोनेशिया में, निजी क्षेत्र की कोशिशों से मैंग्रोव बहाली के काम में काफ़ी विस्तार हुआ है. केन्या में इसी तरह की पहल पर्यटन और मैंग्रोव बहाली का समर्थन करती है. फिर भी, कार्यकाल की असुरक्षा, बहाल क्षेत्रों पर सीमित सामुदायिक अधिकार और निरंतर विश्वास की आवश्यकता जैसी चिंताएं बरकरार हैं. ये बताता है कि सीएसआर, इस बात की गारंटी नहीं है कि, स्थानीय लोगों के लिए स्थायी प्रबंधन अधिकारों में तब्दील हो. उदाहरण के लिए, केन्या में, कई स्थानीय सामुदायिक संगठनों के पास बहाल क्षेत्रों पर औपचारिक प्रबंधन योजनाओं या कानूनी अधिकार का अभाव है, जबकि ये संगठन सीएसआर पहल के लाभार्थी रहे हैं.
“भारत इस वक्त एक ऐसे दौर में है, जहां वो लचीली और दूरदर्शी नीली अर्थव्यवस्था को आकार देने के लिए महत्वपूर्ण फैसले ले रहा है.”
अपनी अच्छी नीयत और महान उद्देश्यों के बावजूद, सीएसआर अक्सर कंपनी की मुख्य व्यवसाय रणनीति के लिए स्वैच्छिक, खंडित और हाशिए पर रहता है. कंपनियां सीएसआर के तहत किए जाने वाले या किए गए कामों को बहुत गंभीरता से नहीं लेती. ये गहरे संरचनात्मक मुद्दों और प्रणालीगत कमजोरियों जैसे कि, कार्यकाल के अधिकार, असमान बाज़ार पहुंच, नियामक निकायों में कमज़ोर प्रतिनिधित्व, या योजना में सामुदायिक भागीदारी की कमी जैसे समस्याओं को संबोधित करने में विफल हो सकता है. एक समावेशी समुद्री अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के लिए ये ज़रूरी है कि, सीएसआर एक प्रभावी पर्यावरणीय सामाजिक प्रशासन (ईएसजी)संचालित दृष्टिकोण में विकसित हो. ऐसा शासन, जहां व्यावसायिक निर्णय लेने में स्थानीय समुदायों की आवाज़ को अहमियत दी जाए, वो राष्ट्रीय नीतियों द्वारा समर्थित हों और, कुछ मामलों में, वैश्विक मानकों के अनुरूप हों.
समुद्री अर्थव्यवस्था के विकास के लिए दूसरे मॉडलों से सबक सीखने में मदद मिल सकती है. अधिकार-आधारित दृष्टिकोण सामुदायिक संरक्षण कार्यक्रम को कानूनी और संस्थागत रूप से मान्यता देते हैं. यह ज़्यादा स्थायी पारिस्थितिकी और आर्थिक परिणाम दे सकते हैं. उदाहरण के लिए, न्यूजीलैंड का माओरी फिशरीज सेटलमेंट, एक संपन्न समुद्री भोजन उद्योग का समर्थन करते हुए कानूनी तौर पर स्वदेशी संरक्षकता को मान्यता देता है. नॉर्वे में, तटीय-क्षेत्र और मत्स्य पालन शासन में सामी समुदाय को भागीदारी देने के लिए पूरा संस्थागत तंत्र स्थापित किया गया है. फजॉर्ड फिशरीज़ बोर्ड छोटे स्तर पर शिकार करने वाले सामी मछुआरों को सलाह देता है, और समुद्री संसाधन अधिनियम सामी सांस्कृतिक आजीविका की सुरक्षा की गारंटी देता है. इसी तरह, कनाडा के स्वदेशी संरक्षक कार्यक्रम में समुदाय के नेतृत्व वाली पारिस्थितिक निगरानी और स्वामित्व को सक्षम करते हुए दूरदराज के स्वदेशी समुदायों में सम्मानजनक स्थानीय नौकरियां पैदा करने में मदद दी जाती है.
“अगर इन कमियों को दूर कर लिया जाए, तो एक ऐसी नीली अर्थव्यवस्था बनाने का मौका मिलेगा, जो विकास को समानता और लचीलेपन के साथ संतुलित करती है.”
उभरती अर्थव्यवस्थाओं को स्थानीय वास्तविकताओं से उत्पन्न होने वाली गंभीर विकासात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. बहुत बार ऐसा होता है कि, समुदाय की ज़रूरतें और आकांक्षाएं और सरकार की प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं होती. स्थानीय समुदाय को आजीविका चाहिए, जबकि सरकार की प्राथमिकता संरक्षण हो सकता है. फिर भी, ये अंतर नवाचार के लिए मूल्यवान अवसर खोल सकते हैं. चिली में, मत्स्य पालन के लिए "क्षेत्रीय उपयोग अधिकार" स्थिरता में सुधार और आय को स्थिर करने पर ज़ोर देता है. इसके तहत मछली पकड़ने के संघों को विशेष इस्तेमाल के अधिकार प्रदान किए जाते हैं. दूसरी ओर, फिलीपींस अपने समुदाय-आधारित तटीय संसाधन प्रबंधन मॉडल के माध्यम से, मछुआरों को योजना, निगरानी और संरक्षण में एकीकृत करता है. ये अंधाधुंध दोहन की प्रथाओं को कम करता है, और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करता है. फिजी का स्थानीय रूप से संचालित समुद्री क्षेत्र नेटवर्क स्वदेशी समुदायों को समुद्री प्रबंधन के केंद्र में रखता है. इससे प्रशांत क्षेत्र में एक स्थायी समुदाय के नेतृत्व वाली संरक्षण प्रणाली का निर्माण होता है. इंडोनेशिया के गांव-आधारित मैंग्रोव कार्यक्रम, समुदायों को सामूहिक रूप से मैंग्रोव का प्रबंधन करने और स्थानीय नियमों को लागू करने, वैकल्पिक आजीविका प्रदान करने की मंजूरी देते हैं. इसी तरह सेनेगल में, मछुआरा सहकारी समितियां सह-प्रबंधन के माध्यम से एक मज़बूत भूमिका प्राप्त कर रही हैं. वे समुद्र तक पहुंच और आराम की अवधि के लिए नियम निर्धारित करने, मछलियों के शिकार की निगरानी करने और शासन के फैसलों में भाग लेने में मदद करते हैं. इससे मत्स्य पालन टिकाऊ और आजीविका बेहतर होती है.
भारत के लिए निर्णायक पल: समुद्री अर्थव्यवस्था बदलाव के दौर में
भारत इस वक्त एक ऐसे दौर में है, जहां वो लचीली और दूरदर्शी नीली अर्थव्यवस्था को आकार देने के लिए महत्वपूर्ण फैसले ले रहा है. राष्ट्रीय नीति पहल, तेज़ी से बंदरगाह के नेतृत्व वाला विकास, और नॉर्वे जैसे भागीदारों के साथ हाल ही में समुद्री स्थानिक योजना सहयोग बड़े बदलाव और उज्जवल संभावनाओं का संकेत देते हैं. सावधानीपूर्वक योजना बनाकर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि, मछली पकड़ने वाले समुदायों, महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को समुद्री प्रशासन और विकास के केंद्र में रखा जाए.
“समान विकास के लिए वित्तीय उपकरणों का लाभ उठाएं: ब्लू बॉन्ड, ईएसजी-लिंक्ड प्रोत्साहन और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन समुदाय के नेतृत्व वाले विकास को मज़बूत कर सकते हैं.”
विकास परियोजनाओं की वजह से स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदायों को दबाव का सामना करना पड़ रहा है. बुनियादी ढांचे के विस्तार, तटीय पुनर्ग्रहण और बंदरगाह आधुनिकीकरण से उनकी आजीविका और काम पर असर पड़ रहा है. इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन की समस्या इसमें अनिश्चितता की नई परतें जोड़ती है. फसल की कटाई के बाद के कामों में महिलाएं केंद्रीय भूमिका निभाती हैं, लेकिन उनकी आजीविका को प्रभावित करने वाले निर्णयों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित है. पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को भी योजना और नीति में केवल आंशिक रूप से मान्यता प्राप्त है, जबकि तटीय संसाधनों के स्थायी रूप से प्रबंधन के लिए पारिस्थितिकी का ज्ञान होना बहुत महत्वपूर्ण है.
अगर इन कमियों को दूर कर लिया जाए, तो एक ऐसी नीली अर्थव्यवस्था बनाने का मौका मिलेगा, जो विकास को समानता और लचीलेपन के साथ संतुलित करती है. मुंबई के कोली मछुआरे इस बात का स्पष्ट उदाहरण पेश करते हैं कि, भागीदारी वाला दृष्टिकोण अपनाने से कितना फर्क पड़ सकता है. कोली समुदाय के लोगों को ज्वार-भाटा, धारा, प्रजनन स्थल और मौसमी चक्रों को लेकर गहरा और पीढ़ीगत ज्ञान होता है. मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन के लिए उनका ये ज्ञान महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है. ऐसे में अगर कोली समाज को योजना और शासन में शामिल किया जाए, तो तटीय विकास को एक साझा प्रयास में बदल दिया जा सकता है. एक साथ मिलकर काम करने का फायदा ये होगा कि तटीय समाज की आजीविका और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा होगी, साथ ही पर्यावरण के संरक्षण का लक्ष्य भी पूरा होगा. भारत भर में तटीय समुदाय, अपनी विविध सामाजिक गतिशीलता और आंतरिक संरचनाओं से आकार लेते हुए अपने साथ समृद्ध जीवन अनुभव लाते हैं.
भारत में सीएसआर पहल शुरू से ही दिखाती है कि, समुदायों को ध्यान में रखकर की गई कॉर्पोरेट कोशिशें कैसे बदलाव ला सकते हैं. मैंग्रोव संरक्षण कार्यक्रमों के तहत जागरूकता कार्यशालाओं का आयोजन किया गया. मैंग्रोव इकोसिस्टम ने स्थानीय समूहों को प्रशिक्षित करके तटीय क्षेत्रों के पास मैंग्रोव को बचाए रखने में मदद की है. मछली पकड़ने वाले समुदायों की महिलाओं के लिए कौशल निर्माण कार्यक्रमों ने वित्तीय जागरूकता को मज़बूत किया, और साथ ही आजीविका के नए अवसर भी उपलब्ध कराए हैं.
“सीएसआर इस काम में मदद कर सकता है, लेकिन स्थायी प्रभाव मज़बूत नीति और सार्थक सामुदायिक नेतृत्व के नेतृत्व से ही आएंगे.”
अगर भविष्य की बात करें तो, सीएसआर और ईएसजी से जुड़ी कोशिशें आपदा तैयारियों और ज़ोखिमों में कमी लाने की पहल के माध्यम से तटीय लचीलेपन को मजबूत कर सकते हैं. इसके तहत स्वयंसेवक को प्रशिक्षण देना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और चक्रवात संभावित क्षेत्रों में मैंग्रोव की बहाली शामिल है. बड़ी पुनर्स्थापन परियोजनाओं ने पहले ही 20 लाख से ज़्यादा मैंग्रोव के पौधे लगाए हैं. इसके अलावा, मछली पालन और केकड़ा पालन जैसी नई आजीविका का समर्थन किया है, जबकि नर्सरी कार्य, बीज संग्रह और वृक्षारोपण गतिविधियों में कई महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को शामिल किया है. अब इन प्रयासों का विस्तार करने और उन्हें सामुदायिक नेतृत्व के साथ निकटता से जोड़ने की ज़रूरत है. इससे भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी और टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है.
सामुदायिक अधिकारों और भागीदारी को मज़बूत करें: समुद्री अर्थव्यवस्था को वास्तव में समावेशी बनाने के लिए, कारीगर और स्वदेशी समुदायों की कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त अधिकारों तक पहुंच होनी चाहिए. भारत, तटीय समूहों के लिए मछली पकड़ने की जगह और समुद्र के आसपास के स्थानों पर औपचारिक अधिकार देने की व्यवस्था को मज़बूत कर सकता है. मछुआरा परिषद और गुजरात के सौराष्ट्र तट पर संसाधन-प्रबंधन समितियों जैसे सह-प्रबंधन निकाय ने शासन को सामुदायिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने की अनुमति दी. नीतियों को सुनिश्चित करने के लिए सहभागी योजना को भी मज़बूत किया जाना चाहिए. इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय समुदाय की आवाज़ भी सुनी जा सकेगी और एक आदर्श समावेशी व्यवस्था बनेगी. सीएसआर प्रयास प्रशिक्षण, आजीविका के अवसरों और बहाली कार्य के माध्यम से इन पहलों का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन सार्थक और स्थायी परिवर्तन लाने के लिए इन्हें स्थानीय शासन संरचनाओं से जोड़ा जाना चाहिए.
समान विकास के लिए वित्तीय उपकरणों का लाभ उठाएं: ब्लू बॉन्ड, ईएसजी-लिंक्ड प्रोत्साहन और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन समुदाय के नेतृत्व वाले विकास को मज़बूत कर सकते हैं. इसके साथ ही, ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वित्तीय निवेश में लैंगिंक समावेशन, पारंपरिक ज्ञान और लाभ के उचित साझाकरण को प्राथमिकता दी जाए. इस बात का ध्यान रखा जाए कि, समर्थन उन लोगों तक पहुंचे, जो तटीय संसाधनों पर सबसे ज़्यादा निर्भर हैं. सीएसआर मूल्यवान सहायता मुहैया करा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव तभी बढ़ सकता है, जब इसका मज़बूत कानूनों और व्यापक सुधारों के साथ सही तालमेल हो. सेशेल्स का ब्लू बॉन्ड इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि, कैसे इस तरह के वित्तीय उपकरण स्थायी मत्स्य पालन में आर्थिक मदद कर सकते हैं. इससे सामुदायिक क्षमता का निर्माण भी होता है. इसी तरह, सुरक्षित कार्यकाल अधिकारों और स्पष्ट नीति ढांचे द्वारा समर्थित महिला सहकारी समितियां या समुदाय-संचालित बहाली परियोजनाएं काफ़ी सफल रही हैं.
कॉर्पोरेट संचालन में समानता को शामिल करें: सीएसआर के तहत रोजमर्रा के संचालन में समानता और पारदर्शिता इस पूरी कार्रवाई को और अधिक सार्थक बना सकती है. उदाहरण के लिए, डीपी वर्ल्ड ने भारत के एर्नाकुलम में अपने समुदाय-उन्मुख बहाली कार्यक्रम के माध्यम से लगभग 100,000 मैंग्रोव पौधे लगाए हैं. इसने टिकाऊ समुद्री परिवहन, बंदरगाह के उन्नत बनाने, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा का समर्थन करने के लिए 100 मिलियन डॉलर के ब्लू बॉन्ड भी जारी किए हैं. दूसरी ओर, मलेशिया में तंजुंग पेलेपास बंदरगाह ने लैंगिक संतुलन को बढ़ावा देने और बंदरगाह रसद और समुद्री व्यवसायों में समावेशन के लिए सहयोगात्मक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है. इसके अलावा, ईएसजी शिपिंग अवॉर्ड्स जैसी पहल से पता चलता है कि, समुद्री क्षेत्र में ज़्यादातर कंपनियों ने अपने मुख्य शासन ढांचे में समानता और स्थिरता को एकीकृत करना शुरू कर दिया है. ये मामले पहले से चल रहे प्रभावी कदमों को दर्शाते हैं, इन पर और काम किया जा सकता है.
समुद्री अर्थव्यवस्था को लोगों और समुद्री संसाधनों दोनों के लिए निष्पक्षता, सम्मान और साझा संरक्षण पर आधारित होना चाहिए. तटीय समुदायों ने पीढ़ियों से इन पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा की है, और उनका ज्ञान सतत विकास के लिए ज़रूरी है. जैसे-जैसे भारत का समुद्री क्षेत्र विकसित हो रहा है, सामाजिक समानता को आर्थिक, पर्यावरण और जलवायु लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ाने के लिए निर्णयों का मार्गदर्शन करना चाहिए. समावेशी नीली अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देशों को मज़बूत करना और समुदाय के नेतृत्व वाले सलाहकार मंच बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होंगे.
सीएसआर इस काम में मदद कर सकता है, लेकिन स्थायी प्रभाव मज़बूत नीति और सार्थक सामुदायिक नेतृत्व के नेतृत्व से ही आएंगे. इसके अलावा, मुख्य व्यावसायिक प्रथाओं और ईएसजी प्रतिबद्धताओं में समानता-पारदर्शिता को एकीकृत करना होगा. आगे का रास्ता सामुदायिक अधिकारों, जवाबदेही और सहयोग को समुद्री प्रशासन का केंद्र बनाना है. अगर ऐसा हो पाया तो, भारत और व्यापक रूप ग्लोबल साउथ को अधिक न्यायपूर्ण, लचीला और भविष्य के लिए तैयार समुद्री अर्थव्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी.
अनुषा केसरकर गवनकर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Dr. Anusha Kesarkar-Gavankar is Senior Fellow at the Observer Research Foundation. Her research spans the maritime economy, with a focus on sustainability, infrastructure, port-led development, ...
Read More +