यह स्पष्ट है कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अमेरिकी सहयोगी और साझेदार समझौते पर बातचीत करके ट्रम्प की मनमानी नीतियों के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे विशेष रूप से अमेरिकी नेतृत्व के ख़िलाफ़ काफ़ी विरोध पैदा हुआ है.
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जब से ट्रंप व्हाइट हाउस में दोबारा चुनकर आए हैं, दुनिया भर में बहुत कुछ बदल गया है. चाहे वह यूक्रेन-रूस युद्ध के लिए अमेरिका (USA) का विरोध हो या ईरान पर इजरायल के हमले का समर्थन, विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे वैश्विक बहुपक्षीय शासन संस्था का कमज़ोर होना हो या गहरे समुद्र में खनन के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन, दुनिया भर में बहुत कुछ बदला है. इन सभी परिवर्तनों ने वैश्विक स्तर पर अमेरिका की धारणा को सीधे प्रभावित किया है और इन विरोधाभासों को देखते हुए अमेरिका के हिंद-प्रशांत सहयोगियों और साझेदारों के बीच उनका प्रभाव दिलचस्प पड़ाव पर है. इसके अलावा, ट्रंप ने अमेरिका के गठबंधनों और साझेदारियों को नए सिरे से परिभाषित करने और अपने व्यापार और सुरक्षा हितों को विशेषाधिकार देने के साथ, दूसरों के लिए अमेरिका के साथ जुड़े रहना और रिश्तों को पहले जैसे जारी रखना अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है. इस बदलाव को देखते हुए, इस नई अवधारणा के प्रभावों की जांच करना और अमेरिका के लिए इसके क्या मायने हैं, इसका पता लगाना महत्वपूर्ण है.
जनता के मूड का पता लगाने का एक बेहतर तरीका सर्वेक्षणों या ओपिनियन पोल्स के आधार पर किया जा सकता है जिनमें विदेश नीति पर केंद्रित सर्वेक्षण भी शामिल हैं. हालांकि ये धारणाएं हमेशा सटीक नहीं होती फिर भी ये वास्तविकता का एक नमूना प्रस्तुत ज़रूर करती हैं. उदाहरण के लिए, इन सर्वेक्षणों से इस बात का पता चल सकता है कि किसी सार्वजनिक कूटनीति या कार्यों को दुनिया के अन्य हिस्सों में कितनी सफ़लता मिलती है. इससे राजनयिकों और विदेश नीति संस्थानों को अपने काम की बारीकी पर ध्यान केंद्रित करने और यहां तक कि अपनी दिशा बदलने का अवसर भी मिलता है. साथ ही, यह, सर्वेक्षण, बदलती हुई धारणा अमेरिका के सहयोगियों और साझेदारों के बीच अमेरिका की विदेश नीति के प्रति उनके विचारों के आकलन के लिए एक अनुमानात्मक उपकरण या ह्यूरिस्टिक डिवाइस के रूप में कार्य करती है. ये बातें अमेरिका की विश्वसनीयता और आकर्षण को भी दर्शाती हैं.
ट्रंप के इस शासन उनके साथ उनका अनुभव अपेक्षा से कहीं अधिक अशांत रहा है, जिसका उनके मित्रों के बीच ट्रंप की अनुकूल बर्ताव की उम्मीद पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ा है.
इस वर्ष 21 जनवरी को व्हाइट हाउस में प्रवेश करने के बाद से, राष्ट्रपति ट्रम्प ने आर्थिक, सुरक्षा और तकनीकी मोर्चे पर सहयोगियों, साझेदारों और विरोधियों, सभी के विरुद्ध कई नीतिगत निर्णयों की घोषणा की है. उनके प्रशासन की शुरुआत 2 अप्रैल को सभी देशों के विरुद्ध टैरिफ दरों का खुलासा करके हुई जिसके बाद चीन के साथ टैरिफ दरों में थोड़ी वृद्धि हुई. जबकि कई सहयोगियों और मित्रों ने ट्रम्प 2.0 यानी उनके दूसरे शासनकाल के दौरान एक सुगम यात्रा की उम्मीद की थी. लेकिन ट्रंप के इस शासन उनके साथ उनका अनुभव अपेक्षा से कहीं अधिक अशांत रहा है, जिसका उनके मित्रों के बीच ट्रंप की अनुकूल बर्ताव की उम्मीद पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ा है.
दक्षिण कोरिया, जापान और भारत सहित हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के प्रमुख सहयोगियों और साझेदारों के बीच, हाल के टैरिफ को लेकर की गई कार्रवाइयों के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप की अनुकूलता बहुत ज़्यादा बनी हुई है. जापान, भारत और दक्षिण कोरिया में ट्रंप की अनुकूलता 38, 52 और 33 प्रतिशत है, जैसा कि चित्र 1 में दर्शाया गया है. जब वैश्विक मामलों पर सही काम करने के लिए अमेरिकी और चीनी नेताओं पर विश्वास की बात की गई , तो राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति शी के बीच केवल एक प्रतिशत का अंतर दिखाई देता है.
चित्र 1: अमेरिकी सहयोगियों, साझेदारों और मित्रों के बीच ट्रंप बनाम शी जिनपिंग की लोकप्रियता

Source: Pew Survey
जिन देशों को ट्रंप पर शी जिनपिंग से ज़्यादा भरोसा है, वे अमेरिका को अपना पसंदीदा आर्थिक साझेदार मानते हैं. जापान, दक्षिण कोरिया और भारत (78, 81 और 60 प्रतिशत) आर्थिक साझेदार के रूप में चीन की तुलना में अमेरिका को ज़्यादा पसंद करते हैं. इसके ठीक विपरीत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में, स्थिति बिल्कुल उलट है, जहाँ 69 और 53 प्रतिशत लोग चीन को अपना पसंदीदा आर्थिक साझेदार मानते हैं.
ओशिनिया (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड) क्षेत्र में, ट्रंप के हालिया बयानों और कार्यों के कारण हमने धारणा में उल्लेखनीय बदलाव देखा है. ऑस्ट्रेलिया में अमेरिका के प्रति विश्वास में 20 अंकों की भारी गिरावट आई है, और न्यूजीलैंड में यह 5 अंकों की गिरावट के साथ 38 से 33 प्रतिशत रह गया है (चित्र 2). इसी प्रकार, ASEAN देशों में अमेरिका और चीन के बीच एक बड़ा अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहाँ इसके कुछ सदस्य चीन (56.4 प्रतिशत) को अमेरिका (15.4 प्रतिशत) की तुलना में एक पसंदीदा आर्थिक साझेदार मानते हैं. हालांकि, चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव के चलते ये अधिकांश देश इस क्षेत्र में एक प्रमुख रणनीतिक और राजनैतिक शक्ति के रूप में अमेरिका की भूमिका का भी स्वागत करते हैं.
चित्र 2: दुनिया भर में ज़िम्मेदारी से काम करने के लिए आप अमेरिका पर कितना भरोसा करते हैं (नकारात्मक धारणाएँ %)?

Sources: Lowy Institute Poll and Perceptions of Asia Survey
इंडो-पैसिफिक सर्वेक्षणों के अलावा अन्य क्षेत्रों को कवर करने वाले प्यू रिसर्च सर्वेक्षण से इस बात को बल मिलता है कि ये भावनाएँ व्यापक रूप से साझा की गई हैं. उदाहरण के लिए, अमेरिका के प्रति अनुकूल राय घटकर 35 प्रतिशत रह गई है, जबकि चीन के लिए यह घटकर अब 32 प्रतिशत है. इससे पता चलता है कि अनुकूलता का अंतर कम हो रहा है, जिससे लोगों के लिए सही काम के लिए किसी एक पर भरोसा करना मुश्किल हो गया है.
सहयोगियों और साझेदारों के इस क्षेत्र की भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक वास्तविकताओं को देखने के उनके दृष्टिकोण को समझने में मदद मिलती है जब अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के प्रति देश के विशिष्ट दृष्टिकोणों को उनकी प्रतिक्रिया के साथ संदर्भित किया जाता है. इसके अलावा चीन के प्रति बढ़ती निर्भरता के संदर्भ में ये अंतर ख़तरे की धारणा के स्तर पर भी ज़ोर देते हैं. इन ख़तरे की धारणाओं के आधार पर, अमेरिका के सहयोगियों और साझेदारों के वर्गीकरण को मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है.
कैटेगरी 1: वे देश जो अमेरिका को अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए एक रणनीतिक सहयोगी और चीन को एक रणनीतिक ख़तरे के रूप में देखते हैं.
कैटेगरी 2: वे देश जो अमेरिका को अपनी सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी और चीन को व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखते हैं.
तालिका 1: अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के प्रति अमेरिकी सहयोगियों और साझेदारों की धारणा
स्रोत: प्यू रिसर्च सेंटर और फिलीपींस गणराज्य का राष्ट्रीय सर्वेक्षण, अप्रैल-मई 2025
गठबंधन का नेचर चाहे जो भी हो, कैटेगरी 1 के देश सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन को प्राथमिकता देते हैं जबकि आर्थिक संबंधों पर कुछ हद तक रणनीतिक लचीलापन के लिए तैयार रहते हैं. उदाहरण के लिए, 53.2 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई लोगों का अब भी मानना है कि अमेरिका चीन से ज़्यादा मजबूत बना रहेगा, और 85.8 प्रतिशत लोग अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा में (सुरक्षा और आर्थिक मामलों में) अमेरिका का समर्थन करते हैं. इसी तरह, जापान में, 47 प्रतिशत बनाम 1 प्रतिशत लोग चीन की तुलना में अमेरिका का समर्थन करते हैं, जबकि 42 प्रतिशत लोग संतुलन बनाए रखने की वकालत करते हैं. कैटेगरी 2 के अंतर्गत आने वाले देशों, जैसे भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लिए स्थिति जटिल लगती है क्योंकि उनकी आर्थिक निर्भरता, विदेश नीति का रुख़, ख़तरे की धारणा और विरासत से जुड़े मुद्दे अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बारे में उनकी धारणा को प्रभावित करते हैं. अमेरिका के दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र के सहयोगी जैसे फिलीपींस के लिए अमेरिका पर भरोसा सबसे ज़्यादा (66.5 प्रतिशत) पाया गया है. जबकि 52 प्रतिशत लोग पश्चिम-समर्थक विदेश नीति का समर्थन करते हैं. इन देशों का चीन के प्रति अविश्वास (69.4 प्रतिशत) भी सबसे ज़्यादा बना हुआ है. ये सभी आंकड़े दो रुझानों को सामने रखते हैं. अमेरिका की कार्रवाइयों के बावजूद, कुछ सहयोगी देश उस पर भरोसा करना जारी रखे हुए हैं जबकि कुछ अन्य अपनी आर्थिक निर्भरता को देखते हुए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
विदेशी सरकारों के साथ बातचीत करते समय अपनी विदेश नीतियों पर खुलकर बातचीत और आलोचना की अपेक्षा करना कूटनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा नहीं माना जाता है खासकर जब कोई गहन बातचीत चल रही हो. इसलिए इस संदर्भ में विदेश नीति सर्वेक्षण इस महत्वपूर्ण अंतर को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और अमेरिका के दिग्गजों को आवश्यक फीडबैक प्रदान करते हैं. बहुध्रुवीयता के युग में यदि अमेरिका इस क्षेत्र में समान विचारधारा वाले देशों के साथ अपने मजबूत गठबंधन और साझेदारी को जारी रखना चाहता है तो अपने सहयोगियों और साझेदारों के बीच बदलती धारणा पर ध्यान देना उसके लिए समझदारी ही होगी.
बहुध्रुवीयता के युग में यदि अमेरिका इस क्षेत्र में समान विचारधारा वाले देशों के साथ अपने मजबूत गठबंधन और साझेदारी को जारी रखना चाहता है तो अपने सहयोगियों और साझेदारों के बीच बदलती धारणा पर ध्यान देना उसके लिए समझदारी ही होगी.
यह स्पष्ट है कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अमेरिकी सहयोगी और साझेदार समझौते पर बातचीत करके ट्रम्प की मनमानी नीतियों के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे विशेष रूप से अमेरिकी नेतृत्व के ख़िलाफ़ काफ़ी विरोध पैदा हुआ है. इसी तरह चीन के धमकी भरे व्यवहार ने भी शी जिनपिंग के प्रति बढ़ती प्रतिकूल धारणा में योगदान दिया है. इन सब के बावजूद अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन या साझेदारी के लिए समर्थन प्राथमिकता बना हुआ है और बढ़ भी रहा है. ऐसा होने के मुख्यतः दो कारण है. पहला यह कि चीन की कार्रवाइयों के कारण उसके प्रति ख़तरा बोध बढ़ गया है और अमेरिका के साथ निरंतर मजबूत होते संस्थागत सहयोग, जिसने संबंधों को कुछ हद तक ट्रंप फैक्टर से बचाए रखा है. हालांकि बदलती धारणाएं एक उभरती हुई वास्तविकता को उजागर करती हैं लेकिन ट्रंप के अनिश्चित व्यवहार ने अमेरिका के मित्रों के बीच काफ़ी चिंता और पुनर्विचार के कारण पैदा किए हैं जिसका सीधा असर अमेरिका के आकर्षण (सॉफ्ट पावर) और विश्वसनीयता पर पड़ रहा है. इस बात से चीन के लिए जगह बन रही है, खासकर आर्थिक क्षेत्र में, जो किसी संघर्ष की स्थिति में अमेरिकी गठबंधन को और कमज़ोर बनाता है. इसलिए, जबकि बदलती धारणा गठबंधन की ताकत को प्रभावित नहीं कर सकती है, यह उसके मित्रों को आर्थिक मुद्दों पर चीन के साथ सहयोग करने के लिए मजबूर करती है, जिससे उनकी चीन के साथ निर्भरता और गहरी हो सकती हैं. यह अपने आप में अमेरिका के लिए एक बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए.
अभिषेक शर्मा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एक जूनियर फेलो हैं.
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Abhishek Sharma is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the Indo-Pacific regional security and geopolitical developments with a special ...
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