Author : Sohini Bose

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 23, 2026 Updated 0 Hours ago

12 फरवरी को बांग्लादेश में बीएनपी की जीत ने देश में लोकतंत्र की नई दिशा दिखाई. जानें कैसे नई सरकार सुधार, विपक्ष और क्षेत्रीय दबावों के बीच संतुलन बनाकर लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है.

2026 का बांग्लादेश बीएनपी के साथ: क्या बदलेगा?

बांग्लादेश में एक नए दौर की शुरुआत करते हुए, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान के नेतृत्व में दल ने तेरहवाँ आम चुनाव जीत लिया. उसने जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले ग्यारह-दलीय गठबंधन को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया. 12 फ़रवरी 2026 को हुआ बहुप्रतीक्षित मतदान लोकतंत्र की बहाली की एक उथल-पुथल भरी प्रक्रिया का परिणाम था, जिसका मार्गदर्शन अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने किया. 299 निर्वाचन क्षेत्रों और 50 से अधिक राजनीतिक दलों वाले इस चुनाव में उत्साहपूर्ण भागीदारी देखी गई और मतदान प्रतिशत 60 से अधिक बताया गया. यह जनवरी 2024 के पिछले चुनाव के 42 प्रतिशत मतदान से काफ़ी अधिक है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जीतकर पाँचवाँ कार्यकाल प्राप्त किया था. अगस्त 2024 के जन आंदोलनों के बाद सत्ता से उनकी विदाई ने बांग्लादेश में लगभग स्थायी माने जाने वाले अवामी लीग शासन की धारणा को तोड़ दिया. उनके शासन की प्रमुख आलोचना लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने को लेकर रही, जिससे निष्पक्ष चुनावों की मांग तेज हुई.

एक ऐतिहासिक चुनाव

फ़रवरी का यह चुनाव केवल लोकतंत्र की वापसी का प्रतीक भर नहीं था, बल्कि कई दृष्टियों से ऐतिहासिक भी रहा. पहली बार चुनाव के साथ जुलाई घोषणापत्र पर जनमत-संग्रह कराया गया. यह संवैधानिक सुधारों का एक प्रस्तावित ढाँचा है, जिसे राष्ट्रीय सहमति आयोग ने तैयार किया. इसमें चुनावों के लिए निष्पक्ष अंतरिम सरकार की व्यवस्था, संसद को द्विसदनीय बनाना, महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना, न्यायपालिका की स्वतंत्रता मजबूत करना और प्रधानमंत्री के लिए दो कार्यकाल की सीमा तय करना शामिल है. अक्टूबर 2024 में अंतरिम सरकार और बीस से अधिक राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस पर हस्ताक्षर किए. हालांकि, अवामी लीग ने इसमें भाग नहीं लिया और उसे चुनाव लड़ने से भी रोका गया.

बांग्लादेश में एक नए दौर की शुरुआत करते हुए, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता तारिक रहमान के नेतृत्व में दल ने तेरहवाँ आम चुनाव जीत लिया. उसने जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले ग्यारह-दलीय गठबंधन को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया.

ये चुनाव बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक असाधारण मोड़ के रूप में देखे जा रहे हैं. पिछले तीन दशकों में यह पहली बार हुआ है जब चुनाव अवामी लीग और देश की राजनीति पर लंबे समय तक हावी रही दो प्रमुख महिला नेताओं-शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की खालिदा जिया -की अनुपस्थिति में संपन्न हुए. वर्ष 1996 के बाद से इन दोनों नेताओं ने बारी-बारी से सत्ता संभाली और बांग्लादेश की राजनीति को आकार दिया. उनके बीच चली राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को अक्सर देश की राजनीति का केंद्र माना जाता रहा है. हालिया घटनाक्रमों ने इस स्थापित ढांचे को पूरी तरह बदल दिया. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना वर्तमान में भारत में स्व-निर्वासन में रह रही हैं, जबकि खालिदा जिया का 30 दिसंबर 2025 को निधन हो गया. उनके निधन ने न केवल बीएनपी के लिए बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए एक युग के अंत का संकेत दिया.

खालिदा जिया के निधन के कुछ ही समय बाद उनके पुत्र और कार्यवाहक दल प्रमुख तारिक रहमान की देश वापसी हुई. उनकी वापसी को बीएनपी के पुनरुत्थान और राजनीतिक बदलाव की शुरुआत के रूप में देखा गया. इस बदले हुए परिदृश्य में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि बांग्लादेश में नेतृत्व परिवर्तन और राजनीति की नई दिशा का संकेत भी बने. सहानुभूति और दल के पुनरुत्थान की जनभावना ने चुनाव को मुख्यतः तारिक रहमान और जमात प्रमुख शफीकुर रहमान के बीच सीधा मुकाबला बना दिया.

जनमत आकलनों में तारिक रहमान आगे माने जा रहे थे क्योंकि बीएनपी को शासन का अनुभव रखने वाला पारंपरिक विकल्प समझा जाता है, फिर भी जमात बहुत पीछे नहीं थी. प्रतिबंध हटने के बाद उसने सरकार-विरोधी आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की और अवामी लीग विरोधी माहौल का लाभ उठाया. उसने कई प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में छात्र चुनाव भी जीते. छात्र आंदोलन से निकले नेताओं द्वारा बनाए गए नागरिक दल के साथ उसके गठबंधन ने युवाओं में उसकी स्वीकार्यता बढ़ाई, जो कुल मतदाताओं का लगभग 44 प्रतिशत हैं. पिछले डेढ़ वर्ष में उसे कुछ प्रमुख साझेदार देशों से बाहरी समर्थन भी मिला.

विदेशी प्रभाव

अंतरिम सरकार की अस्थायी प्रकृति को देखते हुए कई देशों ने विभिन्न राजनीतिक दलों से संपर्क बढ़ाया. चीन, जो बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और विकास सहायता का प्रमुख स्रोत है, ने जमात से संपर्क मजबूत करने के प्रयास किए. चीन के राजदूत ने सितंबर 2024 में जमात प्रमुख से मुलाकात की और दल के संगठन की सराहना की. इसके बाद कई पारस्परिक दौरे हुए. संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी राजनीतिक अस्थिरता से निपटने के लिए दल से संपर्क किया. इसके विपरीत, नई दिल्ली ने इस ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान समर्थक और भारत-विरोधी रुख रखने वाले दल से दूरी बनाए रखी.

विदेशी सहायता और व्यापार पर निर्भर देश होने के कारण निर्वाचित सरकार को बाहरी समर्थन मिलने से उसकी राजनीतिक वैधता मजबूत होगी, जबकि खराब द्विपक्षीय संबंध चुनौतियां भी पैदा कर सकते हैं. दक्षिण एशिया के संदर्भ में इस चुनाव का महत्व है, पर इसे अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए.

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खालिदा जिया के निधन के बाद तारिक रहमान से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की और दोनों देशों की साझेदारी आगे बढ़ने की आशा जताई. यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत था क्योंकि भारत और बीएनपी के संबंध पहले तनावपूर्ण रहे हैं. हाल के समय में अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरों और जमात की कठोर विचारधारा को देखते हुए बीएनपी को अधिक व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है. तारिक रहमान ने भी भारत के साथ संबंध सुधारने की आवश्यकता बताई है. चीन और बीएनपी के बीच भी पुराने राजनीतिक संबंध रहे हैं.

विदेशी सहायता और व्यापार पर निर्भर देश होने के कारण निर्वाचित सरकार को बाहरी समर्थन मिलने से उसकी राजनीतिक वैधता मजबूत होगी, जबकि खराब द्विपक्षीय संबंध चुनौतियां भी पैदा कर सकते हैं. दक्षिण एशिया के संदर्भ में इस चुनाव का महत्व है, पर इसे अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए. यह एक उपलब्धि अवश्य है, लेकिन इससे केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा बहाल हुई है. अवामी लीग की अनुपस्थिति के कारण यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या परिणाम पूरी जन-इच्छा को दर्शाते हैं. गोपालगंज जैसे क्षेत्रों में, जो अवामी लीग का गढ़ माने जाते हैं, बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदान नहीं किया. प्रतिबंधित पार्टी ने नागरिकों को तथाकथित ’मतदाता-विहीन’ चुनाव को अस्वीकार करने के लिए X पर धन्यवाद व्यक्त किया. प्रतिबंधित दल ने इसे मतदाताओं से रहित चुनाव बताया.

फिर भी, जब अंतरिम सरकार चुनी हुई सरकार को सत्ता दे रही है, तब बांग्लादेश एक अहम मोड़ पर खड़ा है. असली लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नई सरकार विपक्ष से बात करके चलें, जरूरी सुधार लागू करे और बाहरी दबावों को समझदारी से संभाले. चुनाव दोबारा होना अंत नहीं है, बल्कि देश में लोकतंत्र के नए दौर की शुरुआत है.


सोहिनी बोस ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.