अब जबकि दबी-छुपी लड़ाई अब खुलकर हो रही है तो नेतन्याहू और ख़ामेनेई के सामरिक समीकरणों से उस इलाक़े में संघर्ष अब आम बात हो जाएगी, जहां छद्म युद्ध और एटमी युद्ध की चिंता पहले से मौजूद थी.
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ईरान और इज़राइल के बीच चल रहे युद्ध के पहले 96 घंटों ने पहले से ही उथल-पुथल के शिकार मध्य पूर्व को तबाही के कगार पर पहुंचा दिया है. इस बार इज़राइल के रक्षा बलों (IDF) और मोसाद ने ईरान के बेहद भीतर जाकर उसके सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले किए, जिससे अगर ईरान के परमाणु शस्त्र कार्यक्रम की पूरी तरह से तबाही नहीं भी हुई, तो उसको तगड़ा झटका ज़रूर लगा है. इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमले को ये कहते हुए जायज़ ठहराया है कि उन्होंने ख़तरा बढ़ने से पहले ही उसे नष्ट करने के लिए ये हमला किया. नेतन्याहू ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने देश के अस्तित्व के लिए ख़तरा बताते हैं. वहीं, ईरान ने इस हमले को जंग का एलान क़रार दिया.
इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर हमले को ये कहते हुए जायज़ ठहराया है कि उन्होंने ख़तरा बढ़ने से पहले ही उसे नष्ट करने के लिए ये हमला किया. नेतन्याहू ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने देश के अस्तित्व के लिए ख़तरा बताते हैं.
ईरान और इज़राइल के बीच पिछले कई दशकों से दबी छुपी लड़ाई चल रही है, जो इस क्षेत्र के भू-राजनीतिक तनावों की धुरी है. भले ही अभी ये उम्मीद पूरी नहीं हुई है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप इस इलाक़े के सामरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल डालने वाला दांव चलेंगे और शायद यही वजह थी कि इज़राइल के नेतृत्व ने सैन्य कार्रवाई करने का फ़ैसला किया. इस युद्ध की वजह से ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता अधर में लटक गया है. ऐसे में आने वाले हफ़्तों और महीनों के दौरान मध्य पूर्व के दो सबसे अहम नेताओं के निर्णयों पर दुनिया की नज़र होगी: इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह़ अली हुसैनी ख़ामेनेई.
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह़ ख़ामेनेई देश की सारी ताक़तों के आग़ाज़ से लेकर अंजाम तक सब कुछ हैं. 86 साल के धर्म गुरू ख़ामेनेई के हाथ में ईरान के सबसे ताक़तवर सैन्य तंत्र इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की कमान है. और, इस वक़्त यक़ीनन इस शिया मुल्क के सामने इराक़ के साथ 1980 से 1988 तक चले युद्ध के बाद का सबसे बड़ा संकट खड़ा है. उस वक़्त ईरान को इराक़ के सामने युद्ध विराम के लिए झुकना पड़ा था. उस अपमान के घाव ईरान के ज़हन पर आज भी ताज़ा हैं.
इज़राइल के हमलों ने ईरान की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है. इन हमलों में IRGC, ख़ुफ़िया एजेंसियों और सेना के दर्जनों सैन्य नेता मारे गए हैं. ये सटीक हमले एक तरफ़, बड़ी बात ये है कि ईरान की सेना और परमाणु व्यवस्था में पिछले कई वर्षों से दुश्मनों ने भारी सेंध लगा रखी है. ये बात इसलिए साफ़ है क्योंकि इज़राइल को ये पता था कि उसे किन इमारतों और कंपाउंड पर हमले करने थे. अपने देश से हज़ारों किलोमीटर दूर चलकर ईरान पर हमला करने आए इज़राइली लड़ाकू विमानों का पता लगाकर उनको चुनौती देने के नितांत अभाव से ये सच्चाई रेखांकित होती है कि ईरान की सेना काग़ज़ी शेर ज़्यादा थी, हक़ीक़त में बेहद कमज़ोर थी. ये नतीजे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहीं ज़्यादा ईरान की जनता को सदमा देने वाले हैं. ये एहसास ईरान के सामरिक योजना निर्माण की कमज़ोरी को खुलकर सामने ले आया है कि मुल्क के पास अपने परमाण्विक मूलभूत ढांचे की रक्षा के लिए ज़रूरी ताक़त नहीं है.
आगे चलकर ईरान की सरकार शायद अमेरिका के साथ कूटनीति करने और उसके साथ साथ अपने अवाम के जज़्बात को राष्ट्रवाद के इर्द गिर्द जुटाने की मिली जुली कोशिश करेगा और शायद उन लोगों को भी अपने साथ लाने का प्रयास करेगा, जो अयातुल्लाह़ की अगुवाई वाली हुकूमत के कट्टर विरोधी हैं. ग़ज़ा में इज़राइल की कार्रवाई से पहले ही पूरे इलाक़े की जनता बेहद ग़ुस्से में है और उशका ईरान के प्रति झुकाव है. अयातुल्लाह़ की हुकूमत इस जज़्बे को अपने लिए समर्थन में तब्दील करने की कोशिश करेगी. तमाम अटकलों के बावजूद आधिकारिक तौर पर विरासत की कोई योजना नहीं है कि उम्रदराज़ हो चुके अयातुल्लाह़ की जगह देश की कमान कौन संभालेगा. इससे ईरान के इस्लामिक गणराज्य के भविष्य के सामने परेशान करने वाले सवाल खड़े हो गए हैं. एक काल्पनिक परिस्थिति जिसकी संभावना कम है, लेकिन सवाल ये है कि अगर ईरान की मज़हबी हुकूमत का पतन होता है, तो क्या पहले से अधिक कट्टरपंथी और विचारधारा से प्रेरित ईरान सामने आएगा, जिसका व्यवहारिकता पर और कम विश्वास होगा.
नेतन्याहू के नेतृत्व में इज़राइल का ईरान पर हमला जितना लोगों के लिए हैरान करने वाला है, उतना वास्तव में है नहीं. नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाने की बातें करते रहे हैं. 2000 के दशक की शुरुआत से ही ईरान का एटमी कार्यक्रम इज़राइल की सामरिक चिंता का विषय रहा है.
ईरान में 1979 से ही मज़हबी शक्तियां इज़राइल की तबाही की मांग करती रही हैं. अगर ऐसे देश के पास परमाणु ताक़त आ जाएगी, तो इससे इलाक़े का शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा और इज़राइल को अपने बेहद उन्नत सैन्य और औद्योगिक ढांचे की वजह से जो सामरिक बढ़त अभी हासिल है, वो कमज़ोर पड़ जाएगी.
ईरान में 1979 से ही मज़हबी शक्तियां इज़राइल की तबाही की मांग करती रही हैं. अगर ऐसे देश के पास परमाणु ताक़त आ जाएगी, तो इससे इलाक़े का शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा और इज़राइल को अपने बेहद उन्नत सैन्य और औद्योगिक ढांचे की वजह से जो सामरिक बढ़त अभी हासिल है, वो कमज़ोर पड़ जाएगी. ख़ुद इज़राइल की एटमी शक्ति को लेकर अभी जो दुविधा की स्थिति है उसके लिए भी चुनौती पैदा हो जाएगी: माना जाता है कि इज़राइल अघोषित परमाणु ताक़त है. विडंबना ये है कि ईरान की एटमी इरादों को को लेकर इज़राइल आजकल जो सवाल उठा रहा है, वो वही हैं, जो 1960 के दशक में अमेरिका इज़राइल के अपने परमाणु कार्यक्रम के बारे में उठाता रहा था. परमाणु शक्ति के दम पर डराने के लिए न केवल तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी दुश्मन को भयभीत करने की क्षमता का निर्माण करना होता है. बल्कि इस ताक़त का इस्तेमाल अपने सामरिक हित वाले क्षेत्र में ये सुनिश्चित करने के लिए भी किया जाता है कि विरोधी ताक़तें ये परमाणु क्षमता हासिल न कर सकें.
नेतन्याहू ने ईरान पर हमला करने का फ़ैसला कई वजहों से किया. पहला, ये हमले इस डर की वजह से हुए कि ट्रंप कहीं ईरान के साथ परमाणु समझौता न कर लें. नेतन्याहू की नज़र में इससे इज़राइल हाशिए पर चला जाएगा और ईरान को यूरेनियम संवर्धन करने का और मौक़ा मिल जाएगा. दूसरी वजह ये थी कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकी ने ईरान पर हमले के लिए नेतन्याहू को राजनीतिक कारण मुहैया करा दिया. ख़ास तौर से इसलिए भी क्योंकि इलाक़े में ईरान के मोहरों, जिनमें हमास और हिज़्बुल्लाह भी शामिल हैं, को इज़राइल की जवाबी कार्रवाई से भारी नुक़सान पहुंचा है. उल्लेखनीय है कि हिज़्बुल्लाह ने संकेत दिया है कि वो ईरान पर इज़राइल के हमले के जवाब में इज़राइल पर कोई हमला नहीं करेगा. नेतन्याहू के लिए ये बड़ी उपलब्धि है. क्योंकि हिज़्बुल्लाह अभी भी लेबनान में ईरान के वैचारिक, राजनीतिक और सैन्य दबदबे का अहम चेहरा है.
वैसे तो इज़राइल ने ईरान के ख़िलाफ़ फ़ौरी सफलता पाने के दावे किए हैं. लेकिन, उसके दूरगामी सामरिक लक्ष्य अभी स्पष्ट नहीं हैं. ईरान के साथ लंबे समय तक संघर्ष करना, इज़राइल की बेहद उन्नत मगर छोटी सेना के ऊपर काफ़ी भारी पड़ेगा. इज़राइल की सेना अभी भी ग़ज़ा में फंसी हुई है और सीरिया में नई हुकूमत को लेकर भी सतर्कता बरत रही है और उसको ये भी सुनिश्चित करना होगा कि हिज़्बुल्लाह, हमास और ईरान के दूसरे मोहरे समय के साथ साथ फिर से न ताक़तवर हो जाएं, अब तक तो इराक़ का कताइब हिज़्बुल्लाह संगठन ही वो इकलौता छद्म संगठन है, जिसने खुलकर ईरान का समर्थन किया है. वहीं, नेतन्याहू की घरेलू लोकप्रियता औऱ राजनीतिक अस्तित्व लंबे समय से आलोचना का शिकार रहा है. हालांकि, कम से कम अभी तो उन्हें युद्ध के दौर के नेता के तौर पर देखा जा रहा है.
अब जबकि इस क्षेत्र का सबसे लंबे समय से चला आ रहा टकराव इस तरह से बढ़ता जा रहा है, तो इससे पूरे मध्य पूर्व की प्रगति, समृद्धि, और साझेदारियां ख़तरे में पड़ गई हैं.
अमेरिका ही ऐसी इकलौती ताक़त है, जो इस संघर्ष पर गहरा असर डाल सकती है. ये भी एक विरोधाभास है. क्योंकि ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव विदेशी युद्धों में अमेरिका की भागीदारी की आलोचना करने के आधार पर जीता था. अगर ट्रंप इस मामले में दख़ल देते हैं और नेतन्याहू को ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले में मदद करते हैं, तो वो राजनीतिक तौर पर अपने समर्थकों के एक बड़े तबक़े के साथ साथ अमेरिका के एक प्रभावी समूह को भी नाराज़ कर लेंगे और अपनी राजनीतिक विरासत पर एक दाग़ लगा लेंगे. वहीं दूसरी ओर, अगर ट्रंप चुपचाप बैठे रहते हैं और लंबे समय तक युद्ध चलने की सूरत में इज़राइल पर दबाव बढ़ता है, तो ट्रंप को अमेरिका के लंबे समय से चले आ रहे विदेश नीति के लक्ष्य की हिफ़ाज़त यानी इज़राइल की रक्षा करने में नाकामी का आरोप भी झेलना पड़ेगा. ये मामला इसलिए और भी जटिल हो जाता है क्योंकि ट्रंप अक्सर नीति के ऊपर अपनी छवि को तरज़ीह देने लगते हैं, जिसमें किसी दूरगामी इच्छाशक्ति या रणनीति का अभाव होता है.
अमेरिका के दख़ल के बाद भी ये संघर्ष जितना मिसाइलों और हथियारों का है उतना की इच्छाशक्ति और विचारों का है. अब जबकि इस क्षेत्र का सबसे लंबे समय से चला आ रहा टकराव इस तरह से बढ़ता जा रहा है, तो इससे पूरे मध्य पूर्व की प्रगति, समृद्धि, और साझेदारियां ख़तरे में पड़ गई हैं.
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