एवियन इन्फ्लुएंजा सिर्फ पक्षियों की बीमारी नहीं है, यह हमारी सेहत और खाने-पीने को भी प्रभावित करती है. जानें कैसे ‘वन हेल्थ’ हमें भविष्य की महामारियों से बचा सकता है.
एवियन इन्फ्लुएंजा या बर्ड फ्लू (H5N1 वायरस) एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से घरेलू और जंगली पक्षियों को प्रभावित करती है और कभी-कभी स्तनधारी जानवरों में भी फैल जाती है. दिसंबर के अंत में केरल में इसका प्रकोप सामने आया, जिससे कई पोल्ट्री फार्म प्रभावित हुए. पक्षी इस वायरस के प्राकृतिक वाहक होते हैं लेकिन संक्रमित पक्षियों के संपर्क में आने या पोल्ट्री फार्म और बाजार जैसी दूषित जगहों के कारण यह बीमारी इंसानों में भी फैल सकती है. यही कारण है कि मानव-पशु संपर्क से पैदा होने वाली बीमारियों को समझना और उनसे निपटना बहुत ज़रूरी है और इसके लिए ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अहम है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल फ्लू से लगभग 100 करोड़ लोग संक्रमित होते हैं. इनमें से 30 से 50 लाख लोगों की हालत गंभीर हो जाती है और लाखों लोगों की मौत हो जाती है. फ्लू कोई नई बीमारी नहीं है; इसका पहला बड़ा प्रकोप 1510 में दर्ज किया गया था. इन्फ्लुएंजा वायरस के कई प्रकार होते हैं जिनमें इन्फ्लुएंजा-ए और बी इंसानों के लिए सबसे खतरनाक हैं. 1918 की स्पेनिश फ्लू महामारी जो H1N1 वायरस से फैली थी, ने दुनिया की एक-तिहाई आबादी को प्रभावित किया और लगभग 5 करोड़ लोगों की जान ली. हर साल फ्लू के नए प्रकार सामने आते हैं जिससे मौसमी फ्लू फैलता है.
बर्ड फ्लू, जो इन्फ्लुएंजा-ए का ही एक प्रकार (H5N1) है, 1996 में चीन में पहली बार सामने आया था और तब से इसके मामले दुनिया भर में बढ़े हैं. WHO के अनुसार, 2003 से 2024 के बीच इंसानों में H5N1 के लगभग 900 मामले सामने आए जिनमें लगभग आधे मरीजों की मौत हुई. 2021 से शुरू हुए मौजूदा प्रकोप में अब तक करोड़ों पक्षी प्रभावित हो चुके हैं. अमेरिका में यह बीमारी डेयरी गायों तक भी फैल चुकी है और इंसानों में भी कुछ मामले दर्ज हुए हैं.
इन्फ्लुएंजा वायरस के कई प्रकार होते हैं जिनमें इन्फ्लुएंजा-ए और बी इंसानों के लिए सबसे खतरनाक हैं. 1918 की स्पेनिश फ्लू महामारी जो H1N1 वायरस से फैली थी, ने दुनिया की एक-तिहाई आबादी को प्रभावित किया और लगभग 5 करोड़ लोगों की जान ली.
भारत में हाल ही में केरल में बड़ी संख्या में मुर्गियों और बत्तखों की मौत के बाद H5N1 की पुष्टि हुई. इसके बाद त्वरित कार्रवाई दलों ने संक्रमित पक्षियों को नष्ट करने और सख्त सुरक्षा उपाय लागू किए. जनवरी 2025 में महाराष्ट्र में चिड़ियाघर में रखे गए तीन बाघ और एक तेंदुए की मौत भी इसी वायरस से हुई जो भारत में वन्यजीवों में इस बीमारी से मौत का पहला मामला था. यह स्थिति दिखाती है कि एवियन इन्फ्लुएंजा न केवल स्वास्थ्य बल्कि खाद्य सुरक्षा, आजीविका और पर्यावरण के लिए भी एक गंभीर चुनौती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, H5N1 से आम लोगों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम कम है जबकि पोल्ट्री फार्मों या संक्रमित जानवरों के संपर्क में रहने वाले लोगों के लिए यह जोखिम कम से मध्यम स्तर का माना जाता है. इंसानों के लिए H5N1 का कोई व्यावसायिक टीका उपलब्ध नहीं है क्योंकि इसके मामले अभी बहुत कम हैं और बड़े स्तर पर टीकाकरण की ज़रूरत नहीं मानी जाती. साथ ही, सामान्य मौसमी फ्लू के टीके बर्ड फ्लू से सुरक्षा नहीं देते.
एवियन इन्फ्लुएंजा को अक्सर केवल पशुओं, विशेषकर पक्षियों की बीमारी के रूप में देखा जाता है लेकिन वास्तव में इसका प्रभाव इससे कहीं अधिक व्यापक और बहुस्तरीय है. यह रोग खाद्य सुरक्षा, वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और जैव विविधता तीनों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है. जब एवियन इन्फ्लुएंजा का प्रकोप फैलता है तो बड़े पैमाने पर मुर्गियों और अन्य पक्षियों को नष्ट करना पड़ता है जिससे अंडे और पोल्ट्री उत्पादों की उपलब्धता सीधे प्रभावित होती है.
इसका एक स्पष्ट उदाहरण अमेरिका में देखा गया, जहां हाल के प्रकोप के कारण अंडों की भारी कमी उत्पन्न हुई और उनकी कीमतों में तेज़ वृद्धि हुई. यह स्थिति न केवल उपभोक्ताओं की जेब पर असर डालती है बल्कि पोषण सुरक्षा को भी प्रभावित करती है क्योंकि अंडे सस्ते और प्रोटीन-समृद्ध खाद्य स्रोत माने जाते हैं.
जब एवियन इन्फ्लुएंजा का प्रकोप फैलता है तो बड़े पैमाने पर मुर्गियों और अन्य पक्षियों को नष्ट करना पड़ता है जिससे अंडे और पोल्ट्री उत्पादों की उपलब्धता सीधे प्रभावित होती है.
इसके अलावा, एवियन इन्फ्लुएंजा का प्रभाव केवल पक्षियों तक सीमित नहीं रहा है. हालिया अध्ययनों और घटनाओं से पता चलता है कि यह वायरस डेयरी गायों को भी प्रभावित कर सकता है जिससे उनके दूध उत्पादन में कमी आती है. इसका परिणाम यह होता है कि कुल दूध उत्पादन घट जाता है जिससे डेयरी उद्योग और उससे जुड़े किसानों की आजीविका पर नकारात्मक असर पड़ता है.
साथ ही, जंगली पक्षियों में संक्रमण जैव विविधता के लिए भी खतरा पैदा करता है क्योंकि इससे कई प्रजातियों की संख्या घट सकती है. इस प्रकार एवियन इन्फ्लुएंजा एक समग्र संकट है जिसे केवल पशु स्वास्थ्य नहीं, बल्कि वन हेल्थ दृष्टिकोण के तहत मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के आपसी संबंधों को ध्यान में रखते हुए समझना और नियंत्रित करना आवश्यक है.
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि एवियन इन्फ्लुएंजा वायरस में ऐसे बड़े आनुवंशिक बदलाव हो सकते हैं जिनसे यह प्रजातियों की सीमा पार कर सीधे इंसानों को संक्रमित करने लगे. इन्फ्लुएंजा वायरस RNA वायरस होते हैं जिनमें समय-समय पर छोटे-छोटे बदलाव (म्यूटेशन) होते रहते हैं. यही कारण है कि हर साल नए फ्लू टीकों की ज़रूरत पड़ती है.
कभी-कभी ये बदलाव बहुत बड़े हो सकते हैं जिससे वायरस एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में फैलने की क्षमता हासिल कर लेता है. इसे ‘जीनोम री-असॉर्टमेंट’ कहा जाता है. यह तब होता है, जब किसी इंसान या जानवर की कोशिका एक साथ दो अलग-अलग फ्लू वायरस से संक्रमित हो जाए. ऐसे में दोनों वायरस की आनुवंशिक सामग्री आपस में मिलकर एक नया वायरस बना सकती है जो इंसानों को संक्रमित करने में सक्षम हो सकता है और जिसके खिलाफ कोई टीका उपलब्ध नहीं होता.
भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, यदि H5N1 के 2 से 10 लोग संक्रमित हो जाते हैं, तो इंसान से इंसान में इसके लगातार फैलने की संभावना बन सकती है.
वैज्ञानिकों की चिंता यह है कि H5N1 वायरस के कई प्रकार इस समय पोल्ट्री, जंगली पक्षियों और डेयरी गायों में फैल रहे हैं, और साथ ही मौसमी फ्लू वायरस भी मौजूद हैं. ऐसे में किसी नए और खतरनाक वायरस के उभरने की संभावना बढ़ जाती है. भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, यदि H5N1 के 2 से 10 लोग संक्रमित हो जाते हैं, तो इंसान से इंसान में इसके लगातार फैलने की संभावना बन सकती है. हालांकि री-असॉर्टमेंट की घटनाएं दुर्लभ होती हैं लेकिन ऐसे संभावित बदलावों पर नज़र रखने के लिए मानव, पशु और पर्यावरण-तीनों स्तरों पर लगातार निगरानी रखना बेहद आवश्यक है.
चित्र 1. फ्लू वायरस के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया का आरेखीय रूप

Source: Scientific American
दुनिया में अब तक H5N1 एवियन इन्फ्लुएंजा के इंसान से इंसान में फैलने का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है. बावजूद इसके, अलग-अलग प्रजातियों और भौगोलिक क्षेत्रों में वायरस का तेज़ी से फैलाव एक गंभीर चेतावनी है. जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आवागमन और कोविड-19 महामारी के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक स्वास्थ्य नीतियाँ अब ज़ूनोटिक बीमारियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. ऐसे में ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है. भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया मॉडलिंग अध्ययन में यह दिखाया गया है कि H5N1 के मामले में, जब 2 से 10 लोग संक्रमित हो जाते हैं तो उसके बाद मनुष्य से मनुष्य में लगातार संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है.
इसी पृष्ठभूमि में मई 2025 में विश्व स्वास्थ्य सभा ने ऐतिहासिक महामारी समझौते को अपनाया. इस समझौते की खास बात यह है कि इसमें मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा मानते हुए नीति-निर्माण की बात कही गई है.
यदि दुनिया को भविष्य की महामारियों से वास्तव में बचना है, तो ‘वन हेल्थ’ को केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा मानना पर्याप्त नहीं होगा. इसे वैश्विक स्वास्थ्य शासन की बुनियाद बनाना आवश्यक है.
महामारी समझौते का एक अहम हिस्सा पैथोजन एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (PABS) तंत्र है. इसका उद्देश्य महामारी की संभावना वाले रोगाणुओं से जुड़ी जानकारी का समय पर साझा होना और उनके खिलाफ टीके व दवाइयाँ विकसित करना है. हालांकि, इस तंत्र के कई पहलुओं पर अभी सहमति बननी बाकी है. जैविक नमूनों तक पहुँच और लाभ-साझेदारी (PABS) के मसौदा पाठ पर कार्य करने वाला अंतर-सरकारी कार्य समूह (IGWG) इस महीने पुनः बैठक करेगा, ताकि PABS के संचालन से जुड़े पहलुओं पर विचार-विमर्श किया जा सके, जिसमें ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण के प्रभावी कार्यान्वयन से संबंधित मुद्दे भी शामिल होंगे.
यह कहना गलत नहीं होगा कि अगला वैश्विक स्वास्थ्य संकट किसी ऐसी बीमारी से उत्पन्न हो सकता है जो जानवरों से इंसानों में फैलती है. इतिहास और वर्तमान दोनों ही इस आशंका की पुष्टि करते हैं. मौजूदा H5N1 एवियन इन्फ्लुएंजा प्रकोप ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसी बीमारियाँ केवल मानव या पशु स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इनके प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होते हैं. ये संक्रमण जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं, खाद्य सुरक्षा को कमजोर करते हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में गंभीर व्यवधान पैदा करते हैं.
ऐसे परिदृश्य में, यदि दुनिया को भविष्य की महामारियों से वास्तव में बचना है, तो ‘वन हेल्थ’ को केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा मानना पर्याप्त नहीं होगा. इसे वैश्विक स्वास्थ्य शासन की बुनियाद बनाना आवश्यक है, जहाँ मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानकर नीतियाँ, निगरानी प्रणालियाँ और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाए.
लक्ष्मी रामकृष्णन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में एसोसिएट फेलो हैं.
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Lakshmy is an Associate Fellow with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. Her work focuses on the intersection of biotechnology, health, and international relations, with a ...
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