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Published on Jul 02, 2025 Updated 0 Hours ago

अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के गठबंधन (AUKUS) की नए सिरे से समीक्षा करने का फ़ैसला किया है, ताकि ये पता लगाया जा सके कि क्या ये गठबंधन प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ के एजेंडे से मेल खाता है या नहीं. इस वजह से इस गठबंधन के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं.

AUKUS पर ट्रंप की नजर: क्या ‘अमेरिका फर्स्ट’ से डगमगाएगा हिंद-प्रशांत का सुरक्षा संतुलन?

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हिंद-प्रशांत क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में तेज़ी से बढ़ती होड़ ने ही 2021 में ऑकस (AUKUS) को जन्म दिया था. ये ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच एक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता है. तीनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे सुरक्षा क्षेत्र के सहयोग की बुनियाद पर खड़े किए गए AUKUS ने दो लक्ष्य साधने की कोशिश की थी: i) ऑस्ट्रेलिया की नौसेना के लिए परमाणु शक्ति से चलने वाली और पारंपरिक हथियारों से लैस पनडुब्बियों की ख़रीद और उनका विकास करना, और ii) इन्फॉर्मेशन और टेक्नोलॉजी को आपस में साझा करते हुए क्षमताओं के विकास में सहयोग को और आगे बढ़ाना. इस गठबंधन को सामरिक मक़सद से बनाया गया था औऱ इसका मुख्य लक्ष्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति के संतुलन की ज़रूरत को पूरा करना और इलाक़े में चीन के आक्रामक रवैए के प्रति एक मज़बूत प्रतिरोधक और टिकाऊ दीवार खड़ी करना था. हालांकि, जब अमेरिका ने इस समूह को समीक्षा के दायरे में डाल दिया, तो इस पर अनिश्चितताओं के बादल मंडराने लगे. अमेरिका ये मूल्यांकन कर रहा है कि AUKUS प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के अनुरूप है या नहीं.

AUKUS बनाने के रणनीतिक तर्क

AUKUS का गठन, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों की प्रतिक्रिया स्वरूप किया गया था. क्योंकि, चीन की वजह से इलाक़े की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था का ढांचा कमज़ोर पड़ता नज़र आ रहा था. चीन ने पारासेल द्वीपों में लगभग 20 चौकियां बनाकर और स्पार्टली द्वीपसमूह के इर्द गिर्द सात कृत्रिम द्वीप विकसित करके दक्षिणी चीन सागर में अपनी सैन्य उपस्थिति को काफ़ी बढ़ा लिया है. 2016 में पर्मानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) ने फिलीपींस बनाम चीन के विवाद में चीन के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाया था. फिर भी चीन ने दक्षिणी चीन सागर में अपना दबदबा जताने का सिलसिला जारी रखा और वो इस समुद्री क्षेत्र में आक्रामक और विवादित गतिविधियों, बंदरगाह के निर्माण और कृत्रिम द्वीपों का विकास करके इसके एक बड़े हिस्से पर दावा करता है, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ गई है. इसी तरह, ताइवान जलसंधि में चीन द्वारा लगातार सैन्य अभ्यास करने की वजह से भी चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ा है. इस साल फ़रवरी में ही चीन ने ताइवान के समुद्र तट से चालीस समुद्री मील की दूरी पर एक युद्धाभ्यास किया था. ताइवान के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक़, ऐसा लगता है कि चीन ने बिना पूर्व सूचना के गोलीबारी करने के लिए इस समुद्री क्षेत्र में एक ‘विशेष शूटिंग ज़ोन’ भी बना लिया है. क्योंकि चीन की सेना (PLA) और नौसेना (PLA Navy) के ‘युद्ध की साझा तैयारी की गश्त’ के तहत के 22 लड़ाकू विमानों ने ताइवान जलसंधि में मध्यमान रेखा और इसकी विस्तारित सीमा को पार किया था.

 2018 में जहां चीन के पास लगभग 200 परमाणु हथियार थे. वहीं, 2024 के मध्य तक उनकी तादाद बढ़कर 600 से अधिक हो गई थी, और अनुमान है कि 2035 तक चीन के पास 1500 परमाणु हथियार होंगे. रूस ने अपनी परमाणु नीति में तब्दीली करके परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की सीमा कम कर दी है.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बड़ी ताक़तों द्वारा अपनी परमाणु क्षमताओं का विस्तार करने से इस इलाक़े में परमाणु शक्ति से भय दिखाने की अहमियत का अंदाज़ा होता है. चीन, अमेरिका, उत्तर कोरिया और रूस जैसे देश इस नाज़ुक संतुलन को बनाए रखने का काम करते हैं, जिससे परमाणु युद्ध होने के ख़तरे पर लगाम लगती है. इन देशों द्वारा किसी अन्य देश के क़दम से ख़तरा महसूस होने की सूरत में भय बनाए रखने और अस्थिरता के बीच जो नाज़ुक संतुलन बना हुआ है, उसके बिखर जाने का डर है. अमेरिका के रक्षा विभाग की 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ चीन लगातार अपने एटमी हथियारों का ज़ख़ीरा बढ़ा रहा है. 2018 में जहां चीन के पास लगभग 200 परमाणु हथियार थे. वहीं, 2024 के मध्य तक उनकी तादाद बढ़कर 600 से अधिक हो गई थी, और अनुमान है कि 2035 तक चीन के पास 1500 परमाणु हथियार होंगे. रूस ने अपनी परमाणु नीति में तब्दीली करके परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की सीमा कम कर दी है. वहीं, उत्तर कोरिया और परमाणु हथियारों का संयुक्त ख़तरा तो हमेशा ही मंडराता रहता है. वहीं दूसरी ताक़तें दुनिया के अलग अलग सामरिक मोर्चों पर संघर्षों में फंसी हुई हैं. ऐसे में सुरक्षा के विचार में परमाणु हथियारों की मौजूदगी का डर एक अहम स्तंभ बन गया है. इस वजह से हिंद-प्रशांत में एक बारीक़ संतुलन नज़र आता है, जो भय दिखाने के विचार पर आधारित है.  

इसी वजह से AUKUS के जिस एक फ़ौरी लाभ की अनदेखी की जाती है, वो ये है कि इसके ज़रिए ऑस्ट्रेलिया, परमाणु शक्ति से चलने वाली पांच पनडुब्बियों (SSN) को आने वाले वर्षों में तैनात करने वाला है. AUKUS के साझीदार, 2030 के मध्य तक अग्रिम मोर्चे पर तैनात परमाणु शक्ति से लैस पनडुब्बियों की तादाद बढ़ाकर के दो गुना करना चाहते हैं. इससे सहयोगी देशों की दुश्मन को भय में रखने की क्षमता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सामूहिक सुरक्षा को काफ़ी बढ़ावा मिलेगा. इस क्षेत्र में युद्ध की तैयारी के प्रति भय की स्थिति बनाए रखने का व्यापक तर्क, चीन को एक बड़े संभावित ख़तरे के तौर पर देखने का है. इसी वजह से संघर्ष भड़कने से रोकने के लिए परमाणु शक्ति की तैनाती को वाजिब ठहराया जाता है और इस तरह दोनों पक्षों की तबाही के भय से सुरक्षा और शांति बने रहने का तर्क दिया जाता है.

अमेरिका की नीतियों में आ रहे बदलाव

अमेरिका लंबे समय से हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए सुरक्षा का एक व्यापक ढांचा खड़ा करने की ज़रूरत को स्वीकार करता आया है. चीन की वजह से समुद्री सुरक्षा के लिए लगातार तेज़ होते ख़तरों को देखते हुए AUKUS जैसे गिने चुने देशों के समूह क्षेत्र की स्थिरता बनाए रखने के माध्यम के तौर पर उभरे हैं. AUKUS के पीछे ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन दोनों का अपने हित अमेरिका के साथ जोड़ने का तर्क नज़र आता है. इसके अलावा, अमेरिका भी ऑस्ट्रेलिया की समुद्री भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दुश्मन से निपटने की तैयारी को मज़बूती देना चाहता है.

AUKUS की समीक्षा का मक़सद ये सुनिश्चित करना है कि अमेरिका सबसे पहले अपनी हथियारों की ज़रूरतें पूरी करे. चूंकि अमेरिका ख़ुद के लिए भी परमाणु शक्ति से संचालित पनडुब्बियां बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है. ऐसे में AUKUS की समझौते की और भी ज़्यादा समीक्षा की जा रही है. 

कई तरह से डॉनल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी ने अमेरिका की विदेश नीति में महत्वपूर्ण बदलावों को जन्म दिया है. इससे दुनिया भर में और ख़ास तौर से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के प्रयासों में अमेरिका की भागीदारी और उसके स्वरूप को नए सांचे में ढाला जा रहा है. AUKUS और अमेरिका के व्यापक सुरक्षा हितों के नज़रिए से इसकी समीक्षा, इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण है. अमेरिका ये पता लगाना चाहता है कि AUKUS, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति से मेल खाता है या फिर नहीं. AUKUS की समीक्षा का मक़सद ये सुनिश्चित करना है कि अमेरिका सबसे पहले अपनी हथियारों की ज़रूरतें पूरी करे. चूंकि अमेरिका ख़ुद के लिए भी परमाणु शक्ति से संचालित पनडुब्बियां बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है. ऐसे में AUKUS की समझौते की और भी ज़्यादा समीक्षा की जा रही है. 

ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति ने तमाम क्षेत्रों में दुनिया के साथ अमेरिका के रिश्तों को नया आकार दिया है. इसमें व्यापार, कूटनीति, सुरक्षा, ऊर्जा और अप्रवास नीति जैसे मुद्दे शामिल हैं. ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की लेन-देन वाली नीति, बहुपक्षीय संगठनों को मोटा-मोटी अप्रासंगिक बना देते हैं. तब उनकी अहमियत कुछ ख़ास हित साधने वाले अस्थायी गठबंधनों तक सीमित रह जाती है, जिससे AUKUS जैसी साझेदारियों के लिए जोखिम बढ़ जाता है. हालांकि, इस समझौते का सबसे बड़े लाभार्थी ऑस्ट्रेलिया ने संकेत दिया है कि वो अमेरिकी समीक्षा के प्रति लचीलापन और धैर्य दिखाएगा. ऑस्ट्रेलिया ने स्वीकार किया है कि नए प्रशासन द्वारा पिछली सरकार की नीतियों की समीक्षा करना ‘तार्किक’ है. इसके लिए ऑस्ट्रेलिया ने पिछले साल  ब्रिटेन द्वारा की गई इसी तरह की समीक्षा की मिसाल भी दी है.

AUKUS की स्थायी उपयोगिता

अमेरिका इस समझौते की समीक्षा इसलिए कर रहा है क्योंकि इसके बारे में कहा जाता है कि ये सभी देशों के लिए समान रूप से फ़ायदे का सौदा नहीं है. अमेरिका ने अपने साझीदार देशों से कहा है कि वो अपने सैन्य व्यय में बढ़ोत्तरी करें और ग्राहक व संरक्षक के रिश्ते से आगे बढ़कर उसके साथ अधिक संतुलित और समानता वाली भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ें. ऑस्ट्रेलिया ने AUKUS कार्यक्रम के लिए अगले तीन दशकों में 368 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है, जो इस समझौते और दुश्मन को भय से क़ाबू में रखने की नीति को लेकर उसकी दूरगामी प्रतिबद्धता का ही सुबूत है. लेकिन, अमेरिका ये दबाव बना रहा है कि ऑस्ट्रेलिया अपना रक्षा ख़र्च अपने GDP के 3.5 प्रतिशत तक बढ़ाए. इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों द्वारा सुरक्षा का कुछ बोझ अमेरिका के कंधे से हटाकर अपने ऊपर लेने की अमेरिकी अपेक्षा का पता चलता है. ऑस्ट्रेलिया ने अगले चार वर्षों में अपने रक्षा व्यय में 10 अरब डॉलर की बढ़ोत्तरी का वादा किया है. वहीं, ब्रिटेन अपने अनुमानित रक्षा बजट 2027 में GDP के 2.5 फ़ीसद और 2034 तक इसे और बढ़ाकर तीन प्रतिशत करने की वचनबद्धता भी दोहराई है. इससे गठबंधन की व्यापक प्रतिबद्धताओं के मुताबिक़ रक्षा बजट में धीरे धीरे बढ़ोत्तरी करने की सधी हुई नीति का पता चलता है. इसीलिए, अपने साझीदार देशों के साथ सुरक्षा की समानता वाली भागीदारी बनाने का अमेरिका का मक़सद भी सधता दिख रहा है. 

इसीलिए, AUKUS की समीक्षा वैसे तो सतर्क होने की वजह है, पर इसको लेकर बहुत फ़िक्रमंद होने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि, ऑस्ट्रेलिया हमेशा से ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी हितों का समर्थक रहा है और क्षेत्र के व्यापक समुद्री सुरक्षा ढांचे में उसकी केंद्रीय भूमिका रही है. चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और इलाक़े में अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने की अमेरिका की ज़रूरत को देखते हुए, 2021 में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों के मंत्रिस्तरीय संवाद के दौरान सैन्य बलों की मोर्चेबंदी में सहयोग के लिए 2014 फोर्स पोश्चर एग्रीमेंट के तहत कई नई पहलों को लागू करने पर सहमत हुए थे. ये पहलें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया की सामरिक स्थिति का लाभ उठाकर अमेरिका की तैनाती को और मज़बूत करने वाली थीं. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य उपस्थिति को देखते हुए शांति बनाए रखने, सुरक्षा ढांचे में योगदान देने और इलाक़े में परमाणु शक्ति का भय बनाए रखने में AUKUS की अहमियत और भी बढ़ने वाली है.


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