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Published on Nov 29, 2025 Updated 0 Hours ago

शुरुआत से ही भारत की तरक्की का ज़्यादातर सफ़र पश्चिमी तट के इर्द-गिर्द घूमता रहा लेकिन अब विकास की नई दिशा पूर्व की ओर मुड़ रही है. ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर इस बदलाव का इंजन है जो बंदरगाहों, उद्योगों और शहरों को एक मज़बूत श्रृंखला में जोड़ने की कोशिश है.

भारत का नया कॉरिडोर मिशन- जानें क्या है ईसीईसी?

आज़ादी के बाद से ही, भारत की आर्थिक गतिविधियां मुख्य रूप से देश के पश्चिमी तट के आसपास केंद्रित रही हैं. महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु का विकास इसका प्रमाण हैं. ऐसे में अब पूर्वी तट के विकास के लिए, एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के सहयोग से भारत सरकार, ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर (ईसीईसी) का विकास कर रही है. ये एक समग्र विकास परियोजना है, जिसका उद्देश्य पूर्वी तट को विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धी विनिर्माण और व्यापारिक केंद्र में बदलना है. जब हम एक आर्थिक कॉरिडोर की बात करते हैं तो इसका अर्थ सिर्फ एक राजमार्ग या रेलवे लाइन नहीं है. ये औद्योगिक उत्पादन केंद्रों, शहरी समूहों और बंदरगाहों जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रवेशद्वारों को जोड़ने वाला बेहतर तरीके से नियोजित बुनियादी ढांचा नेटवर्क है. इस योजना के पीछे मुख्य विचार एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है, जहां माल का उत्पादन और परिवहन करना आसान, तेज़ और सस्ता हो. 

  • आज़ादी के बाद से ही, भारत की आर्थिक गतिविधियां मुख्य रूप से देश के पश्चिमी तट के आसपास केंद्रित रही हैं.
  • ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर (ईसीईसी) पूर्वी तट को विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धी विनिर्माण और व्यापारिक केंद्र में बदलना है.
  • ईसीईसी भारत का पहला तटीय आर्थिक गलियारा होगा जिससे देश की विकास रणनीति को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.


ईसीईसी भारत का पहला तटीय आर्थिक गलियारा होगा जिससे देश की विकास रणनीति को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. इसकी परिकल्पना "एक्ट ईस्ट पॉलिसी" और मेक इन इंडिया पहल के तहत भारत की निर्माण महत्वाकांक्षाओं की रीढ़ के रूप में की गई है. पूर्वी तट आर्थिक गलियारा सिर्फ एक बुनियादी ढांचा नहीं है. ये क्षेत्रीय विकास का एक मल्टी मॉडल दृष्टिकोण है जिसे भारत के पूर्वी तटीय राज्यों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण और व्यापार केंद्र में बदलने के लिए डिज़ाइन किया गया है. कोलकाता से कन्याकुमारी तक फैली इस परियोजना के पहले चरण के रूप में विशाखापट्टनम-चेन्नई औद्योगिक गलियारा (वीसीआईसी) को विकसित किया जा रहा है. ये गलियारा इस महत्वाकांक्षी मॉडल के लिए एक परीक्षण मॉडल के तौर पर काम करेगा.

Assessing Port Industry Synergy In India S East Coast Economic Corridor Ecec

Asian Development Bank, VCIC compilation

पूर्वी तट आर्थिक गलियारा की सफलता का केंद्रीय सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि ये आधुनिक बंदरगाहों और उनके आस-पास विकसित विशिष्ट उत्पादन समूहों या नोड्स के बीच एक शक्तिशाली, परस्पर लाभकारी संबंध बनाने में सक्षम है. अब ये बात पूरी दुनिया में अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है कि किसी भी देश के विकास में बंदरगाह महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वास्तविक आर्थिक परिवर्तन सिर्फ भौतिक निकटता से नहीं आता बल्कि इसके लिए एक गहन रूप से एकीकृत और सहजीवी पारिस्थितिकी तंत्र की ज़रूरत होती है. ऐसा इकोसिस्टम, जहां समुद्री लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक उत्पादन बिना किसी रुकावट के सामंजस्य में काम करें.

“सफलता: आधुनिक बंदरगाह + औद्योगिक नोड्स का परस्पर लाभकारी संबंध।”

औद्योगिक नोड योजना के साथ बंदरगाहों का आधुनिकीकरण

सबसे बड़ा सवाल ये है कि ईसीईसी योजना प्रमुख निर्माण क्षेत्रों के लिए लॉजिस्टिक दक्षता को कैसे सुधार सकती है. इसे समझने के लिए विशाखापट्टनम-चेन्नई औद्योगिक गलियारा का उदाहरण लिया जा सकता है. वीसीआईसी का डिज़ाइन आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में लगभग 800 किलोमीटर तक फैला है. ये चार नोड रणनीति पर आधारित है: विशाखापट्टनम, काकीनाडा, कृष्णापट्टनम, और येरपेडू-श्रीकालाहस्ती.

 

पूर्वी तट आर्थिक गलियारा की रणनीति में बंदरगाहों की वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के मुख्य द्वार के रूप में पहचान की गई है. एशियाई विकास बैंक और भारत सरकार के सागरमाला कार्यक्रम के समर्थन से महत्वपूर्ण निवेश मुख्य बंदरगाहों के आधुनिकीकरण में किया जा रहा है. इसी का नतीजा है कि, विशाखापट्टनम बंदरगाह प्राधिकरण ने अपनी क्षमता में विस्तार किया है. जहाजों के खड़े होने की जगह यानी बर्थ्स का यांत्रिकीकरण किया है. बड़े कंटेनर जहाजों के आने-जाने के लिए चैनलों को गहरा किया है, जिससे प्री-बर्थिंग डिटेंशन समय कम हो गया है. प्री-बर्थिंग डिटेंशन का मतलब उस समय से है, जिस दौरान एक जहाज अपने संचालन के लिए डॉक पर पहुंचने से पहले पार्किंग में खड़ा रहता है. डिटेंशन टाइम की गणना उस समय से की जाती है, जब जहाज पोर्ट के रिपोर्टिंग स्टेशन पर पहुंचता है, और फिर वापस संचालन के लिए डॉक तक नहीं पहुंच जाता. डिटेंशन समय से ही किसी बंदरगाह की क्षमता का पता चलता है. जिस बंदरगाह में डिटेंशन टाइम जितना कम होता, उसे उतना ही ज़्यादा दक्ष माना जाता है. इसी तरह चेन्नई के आसपास के बंदरगाह समूह, जिसमें चेन्नई पोर्ट और कामराजर पोर्ट (एनोरे) शामिल हैं, का भी आधुनिकीकरण किया जा रहा है. इसका लक्ष्य माल ढुलाई की मात्रा बढ़ने पर उसे ज़्यादा कुशलता से संभालना है. ये आधुनिकीकरण पहल भारत की अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण हिस्से को संबोधित करने के लिए है, और ये हिस्सा है लॉजिस्टिक्स लागत. भारत की लॉजिस्टिक लागत करीब 13-14 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत 8 प्रतिशत से लगभग दोगुनी है.

 

सागरमाला कार्यक्रम के एक प्रमुख घटक के रूप में, ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर एक बड़ी योजना का हिस्सा है. सागरमाला कार्यक्रम भारत की विशाल तटरेखा की संभावनाओं का पूर्ण दोहन करने के लिए राष्ट्रीय मास्टर प्लान है. इसका उद्देश्य बंदरगाहों को आधुनिक बनाना, औद्योगिक क्षेत्रों से बेहतर परिवहन संबंध स्थापित करना, और तट के किनारे नए विनिर्माण केंद्र विकसित करने को प्रोत्साहित करना है. ईसीईसी वो स्थान है, जहां सागरमाला के विचार को सबसे महत्वाकांक्षी स्तर पर लागू किया जा रहा है. इस पर इतना ज़ोर इसलिए दिया जा रहा है, क्योंकि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (आसियान) के साथ व्यापार की दिशा में ये महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. भौगोलिक रूप से आसियान देश भारत के पूर्वी तट के काफ़ी नजदीक हैं.

“ईसीईसी वो स्थान है, जहां सागरमाला के विचार को सबसे महत्वाकांक्षी स्तर पर लागू किया जा रहा है.”

पूर्वी तट आर्थिक गलियारा की भौगोलिक स्थिति इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति है. चेन्नई बंदरगाह से निकलने वाला एक जहाज कुछ ही दिनों में सिंगापुर या मलेशिया पहुंच सकता है, जो यूरोप या उत्तरी अमेरिका के बंदरगाहों से आने वाले समय का एक बहुत ही छोटा अंश है. ये निकटता भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के लिए पूर्वी तट को प्राकृतिक और स्वाभाविक लॉन्चपैड बनाती है

 

ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर मॉडल की प्रभावशीलता का सबसे अच्छी तरह से विश्लेषण करने का आसान तरीका है. इसके लिए ये देखा जाना चाहिए कि कॉरिडोर में जिन विशिष्ट, उच्च-मूल्य वाले निर्माण क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है, उन पर इसका कितना असर पड़ेगा.

 

  • इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण: ये क्षेत्र, येरपेडू-श्रीकालहस्ती औद्योगिक समूहों के केंद्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है. इसमें विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त श्री सिटी शामिल है. ये क्षेत्र समय-संवेदनशील, कम से कम बर्बादी में ज़्यादा से ज़्यादा दक्षता देने वाले आपूर्ति श्रृंखलाओं पर काम करता है. फॉक्सकॉन, हुंडई, रेनॉल्ट-निसान और सैमसंग जैसी कंपनियों के लिए, कृष्णापट्टनम या चेन्नई जैसे आधुनिक बंदरगाह का नजदीक होना महत्वपूर्ण है.

 

  • दवाइयां: विशाखापट्टनम शहर भारत की फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री का एक प्रमुख केंद्र है. तैयार फार्मूलों और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स (एपीआई) के निर्यात के लिए अक्सर विशेष लॉजिस्टिक्स की ज़रूरत होती है. इसमें तापमान नियंत्रित "रीफर" कंटेनर और सख्त हैंडलिंग प्रोटोकॉल शामिल हैं.

 

गोदाम और वितरण केंद्र

पूर्वी तट आर्थिक गलियारा एकल संस्था नहीं है, बल्कि ये अलग-अलग औद्योगिक नोड्स का समूह है. इनमें से हर एक नोड्स की अपनी विशेषता है. इसके बंदरगाहों से गुजरने वाले उत्पाद भारत के विनिर्माण आधार की विविधता और बढ़ती परिपक्वता का प्रमाण हैं.  शिपिंग उद्योग में, "नोड्स" का अर्थ आपूर्ति श्रृंखला नेटवर्क में उन जगहों से है, जहां इन्वेंट्री रखी जाती है, या जहां उत्पाद तैयार किए जाते हैं और भेजे जाते हैं. इनमें गोदाम, वितरण केंद्र, या रिटेल स्टोर शामिल हो सकते हैं जो सामान का प्रबंधन और भेजने के लिए हब के रूप में काम करते हैं. व्यापक अर्थ में, नोड्स का मतलब प्रमुख बंदरगाहों से भी हो सकता है, जहां सामान को विभिन्न जहाजों या परिवहन मोड के बीच स्थानांतरित किया जाता है. 

 

  • तमिलनाडु नोड (चेन्नई, एनोर, तूतीकोरिन): इसे अक्सर "एशिया का डेट्रायट" कहा जाता है. ये क्षेत्र भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग का केंद्र है. ह्युंडई, फोर्ड, बीएमडब्ल्यू, और रेनॉल्ट-निसान जैसी प्रमुख वैश्विक कार कंपनियों के यहां बड़े पैमाने पर उत्पादन संयंत्र हैं. हर साल, ये बंदरगाह यूरोप, लैटिन अमेरिका और विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के बाज़ारों के लिए सैकड़ों हजारों वाहनों का निर्यात संभालते हैं. ऑटोमोबाइल के अलावा, ये क्लस्टर इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण (फॉक्सकॉन और साल्कॉम्प द्वारा मोबाइल फोन और घटक निर्मित), वस्त्र, गारमेंट और चमड़ा उत्पादों का भी केंद्र है.

 

  • आंध्र प्रदेश नोड (विशाखापट्टनम-चेन्नई औद्योगिक गलियारा): ये ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर का पहला और सबसे विकसित चरण है. विशाखापट्टनम (या विज़ाग) भारी उद्योग और संसाधनों का एक केंद्र है. विज़ाग बंदरगाह ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारी मात्रा में सामान को हैंडल किया. इसमें जापान और दक्षिण कोरिया के स्टील प्लांट्स के लिए लोह अयस्क (81.09 मिलियन टन), अपनी बड़ी रिफाइनरी से पेट्रोलियम उत्पाद, और क्षेत्र के समृद्ध जलीय कृषि क्षेत्र से समुद्री भोजन शामिल हैं.

 

  • ओडिशा नोड (पारादीप, धामरा): ये क्षेत्र खनिज संसाधनों से समृद्ध है, जिससे ये धातुओं और पेट्रोकेमिकल्स के लिए एक प्राकृतिक केंद्र बनता है. पारादीप बंदरगाह बल्क कार्गो (44.04 प्रतिशत) और तरल बल्क कार्गो (33.80 प्रतिशत) के लिए एक विशाल केंद्र है. ये बंदरगाह हज़ारों टन तापीय कोयला (तटीय विद्युत संयंत्रों के लिए), इंडियन ऑयल रिफाइनरी के लिए कच्चा तेल, और लौह अयस्क पेलेट्स को संभालता है.

 

  • पश्चिम बंगाल नोड (कोलकाता, हल्दिया): पूर्वी भारत के पारंपरिक प्रवेश द्वार के रूप में, इस केंद्र में जूट और चाय जैसी उद्योगों में एक विरासत है. हल्दिया बंदरगाह पेट्रोकेमिकल्स (लगभग 21.2 प्रतिशत), रासायनिक पदार्थों और खाने योग्य तेलों के आयात-निर्यात का एक प्रमुख केंद्र है.

 

भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच का पुल

ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत की विदेश नीति, विशेष रूप से उसकी 'एक्ट ईस्ट' नीति का एक शक्तिशाली उपकरण हो सकता है. इस नीति के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ गहरे आर्थिक और रणनीतिक जुड़ाव पर ज़ोर दिया गया है. एक्ट ईस्ट नीति का महत्व कई अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के दृष्टिकोण से देखा जा सकता है. 

 

  • आर्थिक कूटनीति और आपूर्ति श्रृंखला की मज़बूती: कोविड-19 महामारी ने साबित किया कि किसी एक देश पर बहुत ज़्यादा निर्भर करने वाले वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं कमज़ोर होती हैं. इसने अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को चीन के अलावा अन्य देशों में अपने उत्पादन के विकल्प खोजने के लिए प्रेरित किया है. वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे आसियान देश इन आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहराई से जुड़े हैं. भारत में एक उत्पादक और कुशल आर्थिक गलियारा इन देशों को कलपुर्जों की आपूर्ति और माल के संयोजन के लिए एक नया और विश्वसनीय साझेदार प्रदान करता है. भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता नीति के लिए रूपरेखा पेश करता है. इतना ही नहीं, ईसीईसी संभावनाओं को साकार करने के लिए ये एक भौतिक साधन प्रदान करता है.

 

  • सामरिक संतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में मददगार: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कई महाशक्तियों में एक अनकही प्रतिस्पर्धा चल रही है. ऐसे में ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर, चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के लिए एक जटिल लेकिन महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में काम करता है. भारत की कोशिश ईसीईसी को विकास के एक अधिक स्थायी और साझेदारी-आधारित मॉडल के रूप में पेश करने की है. दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ मज़बूत आर्थिक जुड़ाव स्थापित करके, ईसीईसी क्षेत्रीय देशों को एक व्यावहारिक आर्थिक और लॉजिस्टिक विकल्प प्रदान करता है. इसकी वजह से इन देशों की चीन-केंद्रित अवसंरचना पर निर्भरता कम होती है.

 

  • क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देना: ईसीईसी बहुपक्षीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं जैसे भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग के लिए महत्वपूर्ण स्थलीय कड़ी है. इस आर्थिक गलियारे में उत्पादित सामान को चेन्नई या विज़ाग से म्यांमार या थाईलैंड के बंदरगाहों तक भेजा जा सकता है. इसके बाद इस सामान को सड़क मार्ग से भेजा या मंगाया जा सकता है.

“ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत की विदेश नीति, विशेष रूप से उसकी 'एक्ट ईस्ट' नीति का एक शक्तिशाली उपकरण हो सकता है.”

संभावना से प्रदर्शन तक

पूर्वी तट ऑर्थिक गलियारा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. इससे देश ने बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं, और इसे उन पर ख़रा उतरना होगा. इसकी सफलता मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को मज़बूत करने और कस्टम प्रणाली को सामंजस्यपूर्ण बनाने पर निर्भर करती है. इसके अलावा, विशाखापट्टनम, चेन्नई, पारादीप जैसे प्रमुख नोड्स और चटग्राम (बांग्लादेश), सितवे (म्यांमार) जैसे भागीदार बंदरगाहों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी स्थापित करना इसकी कामयाबी का प्रमाण होगा. सबसे महत्वपूर्ण ये है कि, इसे सफल बनाने के लिए भारत को एक पारदर्शी, नियम-आधारित विकास मॉडल बनाना होगा, जो इसे संस्थागत रूप से लागू करने में सक्षम हो. एक ऐसा मॉडल, जो स्थायी निजी निवेश को आकर्षित कर सके, और जो क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भारी ऋण वाली प्रथाओं का एक विश्वसनीय विकल्प पेश कर सके.

 

इसके साथ ही, पूर्वी तट आर्थिक गलियारा भारत की व्यापक सुरक्षा रणनीति के अनुरूप होना चाहिए. आधुनिक बंदरगाह और तटवर्ती संरचना सिर्फ  औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा नहीं देती बल्कि नौसैनिक संचालन और समुद्री क्षेत्र जागरूकता को भी मज़बूत करती है. एक सफल आर्थिक गलियारा हिंद महासागर में भारत की एक भरोसेमंद सुरक्षा प्रदाता की भूमिका को मज़बूत कर सकता है. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ईस्ट कोस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर सिर्फ एक बुनियादी ढांच परियोजना नहीं है, ये भारत के आर्थिक परिवर्तन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने के लिए एक रणनीतिक साधन भी है.


अंसुआ बसु चौधरी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के नेबरहुड इनिशिएटिव में सीनियर फेलो हैं.

श्रीरूपा बसु ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, कोलकाता में  सलाहकार हैं.

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Authors

Anasua Basu Ray Chaudhury

Anasua Basu Ray Chaudhury

Anasua Basu Ray Chaudhury is Senior Fellow with ORF’s Neighbourhood Initiative. She is the Editor, ORF Bangla. She specialises in regional and sub-regional cooperation in ...

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Sreerupa Basu

Sreerupa Basu

Sreerupa Basu is a Research Intern at the Observer Research Foundation. ...

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