Author : Arya Roy Bardhan

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Published on Jul 15, 2025 Updated 0 Hours ago

भारत और इंडोनेशिया निकेल-टू-ईवी की एक मज़बूत आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण कर सकते हैं. ये किफायती कीमत पर इलेक्ट्रिक वाहनों को सुरक्षित करेगी और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था के लिए विकासशील देशों के मॉडल को स्थापित करेगी.

भारत-इंडोनेशिया EV गठजोड़: निकेल आपूर्ति से ग्लोबल ग्रीन मार्केट में बढ़त की तैयारी

Image Source: Getty

भारत ने अपनी EV30@30 पहल के तहत 2030 तक 30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की पहुंच हासिल करने का लक्ष्य रखा था. हालांकि इस पहल की धीमी रफ्तार की वजह से इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल दिख रहा है. लोगों द्वारा इलेक्ट्रिक वाहनों को ज़्यादा तेज़ी से नहीं अपनाने की सबसे बड़ी वजह ये है कि पारंपरिक ईंधन वाहनों की तुलना में इनकी शुरुआती लागत अधिक है. भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का निर्माण काफ़ी महंगा है, क्योंकि इस इनपुट लागत बहुत ज़्यादा है. ईवी उत्पादन लागत का एक बड़ा हिस्सा निकेल से जुड़ा है, जिसके लिए भारत पूरी तरह से आयात पर निर्भर है. हालांकि निकेल का घरेलू उत्पादन और भंडार निर्माण एक दीर्घकालिक विकल्प है, लेकिन अगर इसका तात्कालिक समाधान चाहिए तो भारत को अपने सदाबहार सहयोगी इंडोनेशिया की तरफ देखना चाहिए. इंडोनेशिया दुनिया में निकेल का सबसे बड़े उत्पादक है. ऐसे में इंडोनेशिया के साथ प्रत्यक्ष आर्थिक सहयोग भारत की निकेल की कमी की समस्या को दूर कर सकता है.

निकेल का घरेलू उत्पादन और भंडार निर्माण एक दीर्घकालिक विकल्प है, लेकिन अगर इसका तात्कालिक समाधान चाहिए तो भारत को अपने सदाबहार सहयोगी इंडोनेशिया की तरफ देखना चाहिए. इंडोनेशिया दुनिया में निकेल का सबसे बड़े उत्पादक है.

भारत ने नेट-ज़ीरो उत्सर्जन और सतत विकास को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है, लेकिन इसकी सफलता काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि देश पारंपरिक गाड़ियों से इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ कितनी तेज़ी से जाता है. परिवहन क्षेत्र भारत में ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है. देश में वाहनों, खासकर निजी गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. ऐसे में इलेक्ट्रिक गाड़िया इस क्षेत्र की एक तत्काल प्राथमिकता हैं. हालांकि, भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की एंट्री को मांग और आपूर्ति दोनों पक्षों की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. इलेक्ट्रिक गाड़ियों की उच्च लागत, सीमित चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, आयात पर बहुत अधिक निर्भरता और खंडित मूल्य श्रृंखलाएं इस क्षेत्र की बड़ी समस्याएं हैं. परिवहन क्षेत्र के विद्युतीकरण की इन कोशिशों का एक अहम् पहलू महत्वपूर्ण खनिज आयात पर निर्भरता को कम करके हल किया जा सकता है, विशेष रूप से निकेल का आयात. हालांकि इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरियां बनाने के लिए अब कुछ वैकल्पिक धातुओं का भी इस्तेमाल होने लगा है, लेकिन निकेल इसके लिए लंबे समय तक बहुमूल्य धातु बना रहेगा. निकेल इलेक्ट्रिक वाहन मूल्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण घटक बना रहेगा. इस संदर्भ में, भारत के सीमित निकेल भंडार को देखते हुए इंडोनेशिया के साथ समझौता करने की कोशिश करनी चाहिए. इसके माध्यम से मूल्य श्रृंखला को सुरक्षित करना एक अनुकूल नीतिगत विकल्प होगा. इस एजेंडे को संस्थागत रूप देने के लिए, दिल्ली और जकार्ता भारत-इंडोनेशिया संयुक्त आर्थिक और वित्तीय वार्ता (जेईएफडी) आयोजित करने पर सहमत हुए हैं. इस मंच के माध्यम से महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग सर्वोच्च प्राथमिकता हो सकती है.

 

चित्र 1: विभिन्न बैटरियों की संरचना

An India Indonesia Nickel To Ev Global Value Chain

स्रोत: विजुअल कैपिटलिस्ट

इंडोनेशियाई ‘निकेल क्रांति’

इंडोनेशिया में निकेल का सबसे बड़ा भंडार है और वैश्विक निकेल आपूर्ति में आधे से ज़्यादा हिस्सा इसी का है. इंडोनेशियाई सरकार भी इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी मूल्य श्रृंखला पर अपने पकड़ मज़बूत बनाना चाहती है. इसीलिए उसने निकेल उत्पादन में बढ़त हासिल करने के लिए अप्रसंस्कृत (अनप्रोसेस्ड) निकेल अयस्क के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है. इसका नतीजा ये हुआ कि निकेल प्रसंस्करण संयंत्रों की स्थापना के दूसरे देशों ने यहां निवेश करना शुरू किया. चीन इसमें सबसे आगे है. इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्ति श्रृंखला पर अपना दबदबा बनाने के उद्देश्य से चीन से इंडोनेशिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का महत्वपूर्ण प्रवाह हुआ है. इसके अलावा दूसरे देशों और उनके बड़े समूहों के साथ सहयोग ने इंडोनेशिया को इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्ति श्रृंखला में एक मज़बूत आधार प्रदान किया है. इंडोनेशिया को वैश्विक हरित ऊर्जा परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के रूप में स्थापित किया है. हालाँकि, इंडोनेशिया के विशाल बाज़ार आकार का विपरीत प्रभाव तब पड़ा जब उसने निकेल की आपूर्ति बढ़ा दी.

इंडोनेशिया से प्रसंस्कृत निकेल की बहुत ज़्यादा आपूर्ति से इसकी वैश्विक कीमतों में गिरावट आई. निकेल की कीमतों में गिरावट से इसका निर्यात करने वाले दूसरे देशों के लिए शुरुआत में प्रतिस्पर्धा में बने रहना मुश्किल हो गया, लेकिन आखिरकार इस संकट का असर ने इंडोनेशिया पर भी पड़ा. इंडोनेशियाई स्मेल्टरों के लिए काम जारी रखने में कठिनाई हो रही है और उन्हें जल्द ही उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है. स्मेल्टर उन फैक्ट्रियों का कहा जाता है, जहां निकेल समेत कच्चे लौह अयस्क या इसी तरह की दूसरी धातुओं को गलाकर उन्हें शुद्ध रूप दिया जाता है. इसके अलावा, लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरियों की बढ़ती मांग और इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री की धीमी रफ्तार भी कीमतों पर और दबाव डाल सकती है. एक और चिंता ‘डच डिज़ीज’ जैसी स्थिति के उभरने की है. डच डिज़ीज उस स्थिति को कहते हैं, जिसमें अर्थव्यवस्था के एक क्षेत्र का इतना अधिक विकास किया जाता है कि दूसरे क्षेत्र पीछे रह जाते हैं, खासकर उत्पादन के क्षेत्र में. अगर इंडोनेशिया अपनी घरेलू इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन योजना का लाभ नहीं उठा पाता है, तो क्षेत्रीय स्तर पर उसकी दीर्घकालिक वृद्धि पटरी से उतर सकती है.

I+I साझेदारी

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो इस साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे. भारत की राजकीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता हुई. इस दौरान दोनों नेताओं ने “निकेल और अन्य रणनीतिक खनिजों के लिए संयुक्त खोज और डाउनस्ट्रीम परियोजनाओं में रुचि व्यक्त की” अपनी प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत भारत 50 गीगावाट घंटे की बैटरी और सेल बनाने वाली फैक्ट्रियों को सब्सिडी दे रहा है. इन फैक्ट्रियों को काफ़ी बड़ी मात्रा में निकेल की ज़रूरत होती है. ये लंबे समय तक निकेल की मांग को बनाए रखेंगे. हालांकि, बाद में उत्पादन धीरे-धीरे निकेल-मुक्त बैटरियों की ओर स्थानांतरित हो सकता है. इंडोनेशिया निकेल की मांग को सुरक्षित रखने और मूल्य जोखिमों से बचने के लिए भारतीय कंपनियों के साथ वायदा अनुबंध कर सकता है. निकेल अयस्क निर्यात पर प्रतिबंध के कारण इंडोनेशिया की निकेल प्रगलन और शोधन क्षमताओं (स्मेल्टिंग और रिफाइनमेंस कैपिसिटी) में चीन का भारी निवेश हुआ, जिससे समय के साथ उत्पादन लागत में कमी आई है. इस काम में एक ही देश पर निर्भरता से ख़तरा बढ़ता है. इंडोनेशिया अपने वित्तपोषण पोर्टफोलियो में विविधता लाकर इस ख़तरे के काम कर सकता है.

इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्ति श्रृंखला पर अपना दबदबा बनाने के उद्देश्य से चीन से इंडोनेशिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का महत्वपूर्ण प्रवाह हुआ है.

खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (केएबीआईएल) जैसे भारतीय निवेशक इंडोनेशिया को विविध और अधिक टिकाऊ निवेश हासिल करने में मदद कर सकते हैं. ‘काबिल’ एक सरकारी स्वामित्व वाली खनिज खरीद कंपनी है. ये निकेल मूल्य श्रृंखला के अन्य प्रमुख हितधारक, विशेष रूप से बैटरी निर्माण में प्रमुख भूमिका निभा सकता है. इस कंपनी के साथ साझेदारी से इंडोनेशिया की सौदेबाजी की ताकत बनी रहेगी. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में तेज़ी आएगी और उसे भारत के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार तक बेहतर पहुंच प्रदान करेगी. इसका अगला तार्किक कदम दुनिया के सबसे बड़े लिथियम उत्पादक देश ऑस्ट्रेलिया के साथ त्रिपक्षीय आपूर्ति श्रृंखला सहयोग है. इंडोनेशिया के साथ ऑस्ट्रेलिया का पहले से ही ट्रांसपोर्ट-डीकार्बोनाइजेशन समझौता है. ऑस्ट्रेलियाई लिथियम, इंडोनेशियाई निकेल और भारतीय सेल-निर्माण उद्योग को जोड़कर एक इंडो-पैसिफिक बैटरी कॉरिडोर बनाया जा सकता है.

नई दिल्ली और जकार्ता दोनों ने सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता को पहचाना. यही वजह है कि भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के आचे प्रांत के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए एक परियोजना शुरू की गई. आचे में सबांग गहरे समुद्र बंदरगाह के विकास से व्यापार समय और माल ढुलाई लागत में काफ़ी कमी आ सकती है। भारत-इंडोनेशिया के बीच मज़बूत हुए इस संपर्क को भी निकेल व्यापार के लाभों में शामिल किया जाना चाहिए. जहां तक सतत विकास की बात है तो दोनों देशों ने जी-20 में नई खनन परियोजनाओं को वैश्विक पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक (ईएसजी) मानदंडों के अनुरूप बनाने का संकल्प लिया है. भारत की "लाइफ" पहल कम कार्बन आपूर्ति श्रृंखलाओं पर ज़ोर देती है, जबकि इंडोनेशिया चाहता है कि उसके "ग्रीन-निकेल" लेबल को पश्चिमी खरीदारों द्वारा मान्यता मिले. दोनों देशों को महत्वपूर्ण और उभरती हुई तकनीक पर ज़ोर देना चाहिए. जी-20 वर्किंग ग्रुप और क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स पार्टनरशिप (क्यूसीएमपी) जैसे उभरते-तकनीकी मंचों में और अधिक समन्वय करना चाहिए. इससे बैटरी आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए ईएसजी और ट्रेसेब्लिटी मानकों का सह-मसौदा तैयार करने की गुंजाइश बनेगी. ईवी बैटरी आपूर्ति श्रृंखला के लिए भारत-इंडोनेशिया के संयुक्त मानकों से रियायती जलवायु वित्त का उपयोग आसान हो जाएगा और निवेश पोर्टफोलियो में और विविधता आएगी. दोनों देशों के बीच सहयोग उन्हें अपने तुलनात्मक लाभ का उपयोग करने और बाजार दक्षता बनाए रखने में मदद करेगा. इतना ही नहीं इससे दुनिया को एक किफायती और जिम्मेदार विद्युतीकरण के लिए दक्षिण-दक्षिण (ग्लोबल साउथ) का रास्ता भी दिखेगा.

निष्कर्ष

निकेल की कीमतों के संदर्भ में इंडोनेशिया को स्थिरता की आवश्यकता है. भारत को भी घरेलू स्तर पर उत्पादित बैटरी इनपुट की मांग पूरी करनी है. ये दोनों चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. जहां इंडोनेशियाई खनन कंपनियां भारतीय सेल निर्माताओं के साथ अनुबंध  हासिल कर सकती हैं, वहीं भारत सरकार भी इंडोनेशियाई निकेल का इस्तेमाल करने वाले उत्पादकों को सब्सिडी दे सकती है. इसके अलावा इंडोनेशिया से सेल इनपुट आयात पर सीमा शुल्क कम कर सकती है. दोनों देशों के बीच सहयोगात्मक वित्तपोषण, अनुसंधान एवं विकास, और मूल्य श्रृंखला पर कब्ज़ा वैश्विक इलेक्ट्रिक वाहन बाज़ार में उन्हें बढ़त दिला सकता है. इंडोनेशिया से मिले निकेल का इस्तेमाल करके भारत में बने इलेक्ट्रिक वाहन जल्द ही जर्मन ऑटोबान (जर्मन हाइवे) पर दौड़ सकते हैं.


आर्य रॉय बर्धन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में रिसर्च असिस्टेंट हैं.

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