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इससे अमेरिका में सामाजिक-कानूनी दायरे के अंदर ‘शरीर संबंधी स्वायत्तता’ को लेकर समझने के लिए ऐतिहासिक बहस शुरू हुई
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 1973 में रो बनाम वेड मामले में ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया था. अदालत ने कहा था कि गर्भपात को लेकर प्रशासन की ओर से बेवजह की पाबंदियां असंवैधानिक हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिका दाखिल करने वाले की राय से असहमति जताई थी. याचिकाकर्ता ने गर्भ को गिराने के पूर्ण अधिकार की मांग की थी. इसके बजाय सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार और अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के तहत मिले स्वतंत्रता के अधिकार के तहत गर्भपात को निर्देशित करने में राज्य के हितों के साथ संतुलन बनाने की कोशिश की थी. इससे अमेरिका में सामाजिक-कानूनी दायरे के अंदर ‘शरीर संबंधी स्वायत्तता’ को लेकर समझने के लिए ऐतिहासिक बहस शुरू हुई. इसके बाद 1992 और 2016 में दो अन्य फैसले आए, जिनमें रो बनाम वेड मामले के तहत मिले गर्भपात के अधिकारों को और स्पष्ट किया गया.
इनमें पहले मुकदमे को दक्षिणपूर्वी पेनसिल्वेनिया बनाम केसी, परिवार नियोजन के नाम से जाना जाता है. उसमें गर्भधारण के 24 हफ्त़े के अंदर महिलाओं के गर्भपात के अधिकार पर ज़ोर दिया गया. अदालतें गर्भपात कानून की भविष्य में जिन टेस्ट के आधार पर समीक्षा कर सकती हैं, उनमें भी संशोधन किया गया. इसके लिए, अदालत ने एक औपचारिक लेकिन अनिश्चित ‘अनड्यू बर्डेन’ स्टैंडर्ड का इस्तेमाल किया. अनड्यू बर्डेन स्टैंडर्ड अमेरिका में एक तरह की संवैधानिक परीक्षा है, जिसके चलन को वहां के सुप्रीम कोर्ट की ओर से बढ़ावा दिया गया. 19वीं सदी के आखिर में तैयार किए गए इस मानक का मतलब यह है कि संसद ऐसा कानून न बनाए, जो बहुत बोझिल हो या जिससे नागरिकों के बुनियादी अधिकारों पर पाबंदी लगती हो. दूसरा फैसला महिलाओं के संपूर्ण स्वास्थ्य बनाम हेलरस्टेड मामले में आया, जिसमें अनड्यू बर्डेन से जुड़ी अनिश्चितता को संतुलन की ख़ातिर इस्तेमाल करके दूर किया गया.
अमेरिका में सामाजिक-कानूनी दायरे के अंदर ‘शरीर संबंधी स्वायत्तता’ को लेकर समझने के लिए ऐतिहासिक बहस शुरू हुई. इसके बाद 1992 और 2016 में दो अन्य फैसले आए, जिनमें रो बनाम वेड मामले के तहत मिले गर्भपात के अधिकारों को और स्पष्ट किया गया.
रो बनाम वेड मुकदमे में जो फ़ैसला आया था, उसने अमेरिकी समाज को दो सिरों में बांट दिया था और इसकी वजह बिल्कुल स्पष्ट थी. इस फैसले का समर्थन करने वालों का कहना था कि अदालत के फैसले में एक महत्वपूर्ण बुनियादी अधिकार को स्वीकृति दी गई है. दूसरी तरफ, इसके विरोधियों का कहना था कि अदालत ने खोज की एक ऐसे अधिकार की, जिसका कोई वैध आधार नहीं था. 19वीं सदी तक गर्भपात अमेरिका में सामान्य और वैध था, जिसके बाद धार्मिक और वैज्ञानिक आंदोलनों के कारण सरकारों ने इस पर पाबंदी लगा दी. रो बनाम वेड मामले में अदालती फैसला इस लिहाज़ से अहम था कि इसने करोड़ों महिलाओं को अपने शरीर के बारे में फ़ैसले करने को लेकर आज़ादी दी थी. इसने उनके निजता के अधिकार को भी माना था. अदालत ने रो के हक में जो फ़ैसला दिया था, उससे महिलाओं के जीवन और स्वायत्तता के अधिकारों की रक्षा हुई, जिन्हें सांस्कृतिक और धार्मिक कट्टरता के उभार से चुनौती मिल रही थी. एक और दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक और सुरक्षित तकनीकों के आने के बाद भी अमेरिका में गर्भपात की दर में गिरावट आई. 1981 में यह दर 29.3 प्रतिशत थी, जबकि 2017 में यह गिरकर 13.5 प्रतिशत पर आ गई थी. महिलाओं के अधिकार के लिहाज़ से दुनिया में रो बनाम वेड बहुत महत्वपूर्ण फैसला था और ऐसी मिसालें कम ही मिलती हैं. इसके बावजूद विरोधियों ने गर्भपात की राह में बेवजह की कानूनी बाधाएं खड़ी कीं. इतना ही नहीं, उन्होंने गर्भपात के डॉक्टरी के लिहाज़ से सुरक्षित होने के बावजूद इसे शैतानी कृत्य का नाम देकर बदनाम किया. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भी इसमें भागीदारी रही. उन्होंने कार्यपालिका और न्यायपालिका के स्तर पर गर्भपात के खिलाफ़ माहौल बनाया. चार साल के अपने कार्यकाल में उन्होंने गर्भपात से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं की फंडिंग में कटौती की और कंज़र्वेटिव जजों की नियुक्ति को बढ़ावा दिया. ट्रंप ऐसा इसलिए कर रहे थे ताकि रो के हक में आए फैसले के असर को कम कर सकें. अगले नवंबर में अमेरिका के मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स की अगुवाई वाली बेंच गर्भपात से जुड़े डॉब्स बनाम जैक्सन विमिन हेल्थ ऑर्गनाइजेशन मामले की सुनवाई करेगी. इसे 1940 और 1950 के शुरुआती दौर के बाद सबसे अधिक रूढ़िवादी माना जाता है. यह मुकदमा 2018 में मिसिसिपी के एक विवादित कानून के कारण सामने आया, जिसमें 15 हफ्ते के बाद के ज्य़ादातर गर्भपात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी. मेडिकल इमरजेंसी या गर्भस्थ शिशु के एब्नॉर्मल होने पर ही इस समयसीमा से छूट देने की अपील की गई थी.
जुलाई 2021 के आखिर में राज्य ने अदालत में रो मामले के कारण शुरू हुए चलन को रोकने की अपील की. अगर ऐसा होता तो केसी बनाम प्लांड पैरेंटहुड वाला फैसला भी बदल जाता. सच तो यह है कि इसी फ़ैसले के कारण राज्य 23-24 हफ्त़े तक के गर्भस्थ शिशु के मामले में महिलाओं पर फालतू की बंदिशें नहीं लगा पाए थे. राज्य के मुताबिक, इस मामले में अदालत ने उसके कानूनों पर जो बंदिशें लगाई हैं, वे उस पर सख्त़ी कम करें. इसके साथ उसका यह भी कहना है कि जिस समयसीमा तक गर्भपात किया जा सकता है, उस दौरान इस पर राज्य की ओर से सख्ती असंवैधानिक नहीं है. खैर, 1973 के रोड बनाम वेड मामले में फैसला आने के बाद पहली बार अदालत इस पर गौर करेगी कि सामान्य समय-सीमा के अंदर चुनिंदा गर्भपात असंवैधानिक है या नहीं.
अगले नवंबर में अमेरिका के मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स की अगुवाई वाली बेंच गर्भपात से जुड़े डॉब्स बनाम जैक्सन विमिन हेल्थ ऑर्गनाइजेशन मामले की सुनवाई करेगी. इसे 1940 और 1950 के शुरुआती दौर के बाद सबसे अधिक रूढ़िवादी माना जाता है.
पिछले साल दुनिया भर में कोरोना महामारी के फैलने पर अमेरिका में सभी राज्यों ने ‘गैर-ज़रूरी या चुनिंदा’ मेडिकल प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी थी. उसके बाद न्यू मेक्सिको, मैसाचुसेट्स और वॉशिंगटन ने जहां परिवार-नियोजन, गर्भधारण संबंधी मामलों में अस्पताल आने और गर्भपात से जुड़ी देखभाल को जरूरी सेवाएं मानना जारी रखा, वहीं दूसरी ओर कई राज्यों ने इस मामले में अस्पष्ट नीति अपनाई या उन्होंने इनकी अनदेखी की. महामारी के बाद मेडिकल प्रक्रियाओं पर बंदिश का मामला राज्यों पर छोड़े जाने पर अलाबामा, टेक्सस, ओहायो, ओक्लाहोमा, टेनेसी, अरकनसास, लुज़ियाना, वेस्ट वर्जिनिया में सरकारी अधिकारियों और दूसरों ने गर्भपात विरोधी रुख़ अपनाया. उन्होंने इस बहाने गर्भपात विरोधी राजनीतिक एजेंडा को हवा देने की कोशिश की और गर्भपात से जुड़ी कुछ देखरेख या समूची देखरेख पर रोक लगा दी. वैसे इस बात से हैरान होने की जरूरत नहीं है. ये सभी राज्य ऐतिहासिक तौर पर कंज़र्वेटिव माने जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के गढ़ रहे हैं और इनमें गर्भपात को लेकर कहीं अधिक सख्त़ नियम लंबे समय से चलते आ रहे हैं. हालांकि, कोरोना महामारी के दस्तक देने के बाद मेडिकल प्रक्रियाओं पर पाबंदी के कारण 11 राज्यों में 16.3 प्रजनन वाले आयु समूह में 1.63 करोड़ महिलाओं की जिंदगी प्रभावित हुई. वहीं, गुटमाकर इंस्टिट्यूट ने अलग से बताया कि 33 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को एसआरएच (सेक्सुअल और रीप्रोडक्टिव हेल्थ) केयर और बर्थ कंट्रोल संबंधी सेवाएं हासिल करने में परेशानी हुई. नस्ली और सेक्सुअल माइनॉरिटीज के बीच यह संख्या और 10 प्रतिशत अधिक है. यह बात सही है कि अदालतों की ओर से ऐसी कई बाधाओं को ख़त्म किया गया, लेकिन इस पूरे मामले के कारण अनिश्चितता बढ़ने से भी इनकार नहीं किया जा सकता.
2017 में अस्पतालों से बाहर दवाओं के ज़रिये हुए गर्भपात का ऐसे कुल मामलों में योगदान 40 प्रतिशत था. इसके लिए महिलाएं Mifepristone और Misoprostol नाम की दवाओं का इस्तेमाल करती हैं. इनमें से Mifepristone अमेरिकी फूड और ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) के जोखिम मूल्यांकन और बचाव रणनीति (आरईएमएस) प्रोग्राम में शामिल है. इसका मतलब यह है कि यह दवा मान्यताप्राप्त स्वास्थ्यकर्मी ही लिख सकते हैं और इसे आप यूं ही दवा दुकान में जाकर नहीं ले सकते. ना ही इसे ऑनलाइन ऑर्डर देकर मंगाया जा सकता है. इसलिए गर्भपात में इस दवा की भूमिका सीमित हुई. गर्भपात के लिए महिलाओं को तय समय में दवा की जरूरत होती है. हालांकि, गर्भपात के लिए घर बैठे दवा का ऑर्डर देने पर सप्लाई चेन में आई बाधाओं का भी इसकी डिलिवरी पर असर पड़ा. कोरोना महामारी के बाद लगाई गई इन बंदिशों में एक साल बाद यानी अप्रैल 2021 में जाकर ढील दी गई. बाइडेन सरकार ने तब कहा कि इन दवाओं को ऑर्डर देकर मंगाने के लिए संबंधित व्यक्ति का निजी तौर पर पेश होना जरूरी नहीं है. लेकिन क्या महामारी संबंधी बंदिशें ख़त्म होने के बाद भी अमेरिका में यह छूट जारी रहेगी, इस बारे में पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता.
कोरोना महामारी के दस्तक देने के बाद मेडिकल प्रक्रियाओं पर पाबंदी के कारण 11 राज्यों में 16.3 प्रजनन वाले आयु समूह में 1.63 करोड़ महिलाओं की जिंदगी प्रभावित हुई. वहीं, गुटमाकर इंस्टिट्यूट ने अलग से बताया कि 33 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को एसआरएच (सेक्सुअल और रीप्रोडक्टिव हेल्थ) केयर और बर्थ कंट्रोल संबंधी सेवाएं हासिल करने में परेशानी हुई.
यह भी याद रखने लायक बात है कि बाइडेन सरकार के ऐसी छूट देने के बावजूद एरिजोना, मॉन्टाना, ओहायो, ओक्लाहोमा, इंडियाना और टेक्सस ने इसी साल कानून पास करके दवाओं से गर्भपात के लिए टेलीमेडिसिन सेवा पर रोक लगा दी. महिलाओं को टेलीमेडिसिन से काफी मदद मिलती थी. उन्हें गर्भपात के लिए कई बार क्लिनिक जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. इससे औरतों पर बोझ घटता था. कई बार तो क्लिनिक दूरदराज के इलाकों में होता है, जहां बार-बार जाना संभव नहीं होता. टेलीमेडिसिन एक और मायने में महिलाओं के लिए मददगार है. उन्हें गर्भपात की प्रक्रिया के लिए अलग से अपनी जगह की ज़रूरत पड़ती है और इससे उन्हें निजता के अधिकार को भी बचाए रखने में मदद मिलती है, वह भी सामाजिक परिणाम की चिंता किए बगैर. टेलीमेडिसिन पर बंदिशों से उनके लिए गर्भपात बहुत मुश्किल हो गया. ऐसे में अगर रो बनाम वेड मामले में फैसला पलटता है तो कानूनी संकीर्णता और बढ़ेगी. इससे गर्भपात कराने वाली महिलाओं को प्रताड़ित किए जाने का डर सताएगा.
महामारी और आवागमन सेवाओं के बाधित होने से जो आर्थिक मंदी आई है, उससे मातृ स्वास्थ्य संबंधी मानक और खराब हो सकते हैं. महामारी के कारण बेरोजगारी बढ़ी है और इंश्योरेंस कवरेज घटने से एसआरएच केयर तक पहुंच सीमित हुई है. असल में, महामारी के कारण रोज़गार छिनने से अधिक महिलाएं बीमा के दायरे से बाहर हुईं और इस बीच, क्लीनिक में मेडिकल सेवाओं की मांग भी बढ़ी. 2015-17 के बीच हेल्थ स्टैटिस्टिक्स पर नेशनल सेंटर का सर्वे एक तरह से राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व वाला सर्वेक्षण था. इस सर्वे से पता चला कि 15-44 साल की 4.45 करोड़ महिलाओं को यौन या जनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरत पड़ी थी और इनमें से 57 प्रतिशत का इंश्योरेंस कवरेज उनकी नौकरी या परिवार के किसी सदस्य की नौकरी से जुड़ा था. ऐसे में जब कोरोना महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियां बंद हो गईं तो महिलाओं पर उसका कहीं अधिक बुरा असर हुआ. इससे स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई.
स्वास्थ्य मामलों की पत्रिका ने अनुमान लगाया है कि रोज़गार छिनने के कारण एसआरएच केयर का लाभ लेने वाली 40 लाख महिलाओं का इंश्योरेंस कवर खत्म हो जाएगा. इससे इन सेवाओं का इस्तेमाल करने वालीं हर 10 में से तीन महिलाएं प्रभावित होंगी. इतना ही नहीं, इन 40 लाख में से करीब 12 लाख महिलाएं बीमा के दायरे से बाहर बनी रहेंगी और 19 लाख के मेडिक-एड या इस तरह की दूसरी सेवाओं को अपनाने की उम्मीद है. जो महिलाएं बीमा के दायरे से बाहर होंगी और मेडिक-एड को चुनने वालीं महिलाओं की निर्भरता सरकारी फंडिंग से चलने वाले क्लिनिकों पर बढ़ेगी, जिन पर महामारी के कारण पहले ही काफी बोझ है. नई परिस्थितियों में इन स्वास्थ्य केंद्रों पर 17 लाख अतिरिक्त मरीज़ों का बोझ बढ़ सकता है. इससे उनपर वित्तीय बोझ तो बढ़ेगा ही, इतनी बड़ी संख्या में मरीजों को सेवा देने में भी उन्हें परेशानी होगी.
महामारी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को लेकर महिलाओं की अनिश्चितता बढ़ी है. इस बीच, गर्भधारण और शिशु के जन्म के तुरंत बाद मेडिकल खर्च में बढ़ोतरी हो रही है, जो उनके लिए चिंता की बात है. 1990 में जहां बच्चे के जन्म के दौरान मां की मृत्यु दर हर 1,00,000 में 14 थी, वह 2017 में बढ़कर 30 हो गई. अमीर देशों में इस लिहाज़ से अमेरिका सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल है. नीचे दिए गए ग्राफ से भी संकेत मिलता है कि गर्भधारण के वक्त स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन पर काफी पैसा खर्च होता है, लेकिन 1996 से 2016 के बीच स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित खर्च में तेज़ बढ़ोत्तरी पोषण की कमियों (7.36 प्रतिशत) को दूर करने और मातृत्व के दौरान होने वाली बीमारियों (5.99 प्रतिशत) के इलाज में हुई है.
अगर मातृ मृत्यु दर के शीर्ष कारणों पर नजर डालें तो गर्भवास्था के आखिरी दौर में परोक्ष कारण अधिक दिखते हैं. नीचे दिए गए टेबल में गहरा रंग अप्रत्याशित तौर पर अधिक मौत दिखाता है। इससे पता चलता है कि ज्यादातर मौतें 25 से 39 साल के आयु वर्ग के बीच हुईं और इनके कारण वहीं हैं, जिनका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है.
एसआरएच से जुड़ा एक और अहम संकेतक शिशु के जन्म लेने के बाद की बीमारियां हैं. शिशु के जन्म लेने के बाद हर उम्र के महिलाओं की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च में 6.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
अमेरिका में करीब 7.5 करोड़ महिलाएं गर्भधारण की योग्यता रखती हैं. ऐसे में अगर रो बनाम वेड वाला फ़ैसला बदलता है तो इनमें से 50 फीसदी से अधिक के लिए गर्भपात मुश्किल हो जाएगा. कुछ विद्वानों का मानना है कि रो बनाम वेड मामले में फ़ैसला आने के बाद अमेरिका में गर्भपात को लेकर काफी असमानता दिखी क्योंकि देश में इस फैसले पर अलग-अलग ढंग से अमल हुआ. असल में, डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से इस सिलसिले में काफी बदलाव आया. वह गर्भपात के विरोधी थे. उनकी इस सोच ने अमेरिकी समाज में गहरी जड़ें जमा लीं. इसलिए रो बनाम वेड मामले के फैसले के प्रति विरोध बढ़ता गया. एलाबामा, अरकनसास, मिशिगन, मिसिसिपी, ओक्लाहोमा और विसकॉन्सिन ने 1973 के इस फैसले से पहले वाली बंदिशें गर्भपात पर लगाईं. इसलिए अगर यह फ़ैसला बदला जाता है तो उस दौर की वापसी हो जाएगी. उदाहरण के लिए, विसकॉन्सिन ने 1849 में एक कानून पास कर गर्भपात करने को अपराध घोषित कर दिया था. इस प्रांत में गर्भपात पर पहले से कई कई पाबंदियां हैं. जैसे, किसी भी महिला को इसके लिए डॉक्टर के पास दो बार जाना पड़ता है और दोनों के बीच 24 घंटे का अंतर होना चाहिए. वहीं, 20 हफ्त़े का गर्भ हो तो उसके बाद गर्भपात नहीं कराया जा सकता. इसी तरह से रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत वाले टेक्सस, जॉर्जिया और आइडाहो जैसे राज्यों ने ‘फीटल हार्टबीट लॉ’ पास किया है. यह कानून कहता है कि गर्भस्थ शिशु के दिल की धड़कनों का पता लगने के बाद गर्भपात नहीं कराया जा सकता. इनमें से कुछ कानून में गर्भपात कराने वालों को जेल में डालने का भी प्रावधान है. वैसे, अभी तक इन कानूनों पर अमल नहीं हुआ है. इन कानूनों पर अमल होगा या नहीं, उनकी तकदीर रो बनाम वेड मामले की समीक्षा से तय होगी. टेक्सस में गर्भपात को रोकने का एक नया तरीका निकाला गया है ताकि अदालती फ़ैसले से टकराव न हो. यहां आम लोगों को यह अधिकार दिया गया है कि अगर कोई डॉक्टर गर्भधारण के 6 हफ्ते के बाद गर्भपात कराता है तो वे उनके ख़िलाफ मुकदमा कर सकते हैं. इस तरह से वहां गर्भपात विरोधी लोगों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है ताकि वे गर्भपात में मदद करने वालों को रोकें.
स्वास्थ्य मामलों की पत्रिका ने अनुमान लगाया है कि रोज़गार छिनने के कारण एसआरएच केयर का लाभ लेने वाली 40 लाख महिलाओं का इंश्योरेंस कवर खत्म हो जाएगा. इससे इन सेवाओं का इस्तेमाल करने वालीं हर 10 में से तीन महिलाएं प्रभावित होंगी.
इसी तरह से, रो बनाम वेड मामले में अदालती फैसले के पलटने की उम्मीद की वजह से राज्यों में सिर्फ़ इस साल गर्भपात विरोधी रिकॉर्ड 90 कानून पास किए गए हैं. यह साल 2011 के गर्भपात में 89 बंदिशों के पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक है. इनमें से 90 प्रतिशत बंदिशों को गर्भपात के अधिकार के ख़िलाफ माना गया है. इनके ज़रिये महिलाओं की राह में वित्तीय, लॉजिस्टिक संबंधी और एसआरएच केयर हासिल करने में कानूनी बाधाएं खड़ी की जा रही है. ऐसे में वह क्षेत्र जहां रूढ़िवादी राज्यों की संख्या अधिक है, वहां गर्भपात कराना और भी मुश्किल होता जा रहा है.
दुनिया के ज्य़ादातर हिस्सों में भी गर्भपात कानूनी तौर पर अवैध बना हुआ है या इस पर पाबंदियां लगी हुई हैं. दूसरे स्त्रीवादी आंदोलन में स्वायत्तता और निजता की जो लहर आई थी, उसमें रो बनाम वेड फैसला एक निर्णायक मोड़ था. सुप्रीम कोर्ट की दिवंगत जस्टिस गिंसबर्ग ने कहा था कि किसी महिला के लिए संतति का अधिकार उसकी स्वायत्तता से जुड़ा है. यह उसे अपनी जिंदगी के बारे में फैसला करने का हक देता है. इससे औरतों को समान नागरिक अधिकार भी मिलते हैं. इधर, एसआरएच पर महिलाओं की ओर से ख़र्च में बेवजह बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसके साथ शिशु को जन्म देते वक्त मातृ मृत्यु दर को लेकर जोख़िम से राहत नहीं मिली है. ऐसे में महिलाओं पर एक बेवजह का बोझ बढ़ा है. किफ़ायती और सम्माननीय गर्भ संबंधी स्वास्थ्य सेवा औरतों के लिए बुनियादी अधिकार और मानवाधिकार है.
रो बनाम वेड मामले में अदालती फैसले के पलटने की उम्मीद की वजह से राज्यों में सिर्फ़ इस साल गर्भपात विरोधी रिकॉर्ड 90 कानून पास किए गए हैं. यह साल 2011 के गर्भपात में 89 बंदिशों के पिछले रिकॉर्ड से भी अधिक है. इनमें से 90 प्रतिशत बंदिशों को गर्भपात के अधिकार के ख़िलाफ माना गया है.
अगर रो बनाम वेड मामले में फैसला बदलता है तो उसका असर महिलाओं के अपने शरीर और जीवन के अधिकार पर भी पड़ेगा. ये दोनों ही राज्यों के अधिकार में आ जाएंगे. यह ख़ासतौर पर ऐसे वक्त़ में ठीक नहीं होगा, जब पहले ही महामारी ने उनकी जिंदगी में उथलपुथल मचा रखी है. महामारी के कारण पहले ही औरतों को उनकी पारंपरिक लैंगिक भूमिका में धकेला जा रहा है. ऐसे दौर में कम से कम उनके शरीर को लेकर सियासत नहीं होनी चाहिए. रो बनाम वेड फैसले को बने रहना चाहिए, ताकि लोग एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकें, जहां कानून उनकी पसंद को मज़बूती देता हो.
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Mona is a Junior Fellow with the Health Initiative at Observer Research Foundation’s Delhi office. Her research expertise and interests lie broadly at the intersection ...
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Kuber Bathla a student studying Bachelor of Arts at St Stephen's College University of Delhi
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