ईसाई बहुसंख्यकवाद को मानने वाले डेमोक्रैट वापिस से संस्थागत नस्लीय-धार्मिक पूर्वाग्रह वाली व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं, जो अमेरिकी लोकतंत्र के लिए ख़तरे की घंटी है.
“आदेश: हार्वर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना के प्रवेश कार्यक्रम 14वें संशोधन में वर्णित कानूनों के समान संरक्षण के अधिकार का उल्लंघन करते हैं.”
—ऑर्डर ऑफ सुप्रीम कोर्ट ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स, स्टूडेंट्स फॉर फेयर एडमिशंस वर्सेस प्रेसिडेंट एंड फेलोज़ ऑफ़ हार्वर्ड कॉलेज, 29 जून 2023
ध्यान से पढ़िए कि अमेरिकी की सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या कह रहा है. उसका कहना है कि हार्वर्ड की प्रवेश प्रक्रियाएं नस्लीय भेदभाव पर आधारित हैं जो ब्लैक और लैटिन अमेरिकी छात्रों के पक्ष में और भारतीय छात्रों के खिलाफ़ हैं, जिन्हें जबरन “एशियाई” वर्ग में शामिल किया गया है.
ईसाई बहुसंख्यकवाद को मानने वाले डेमोक्रैट (जिनके लिए “दुनिया” ईसाई वोटरों तक सीमित है) लोगों की क्षुद्र राजनीतिक समझ के हवाले से कहें, तो उनकी नज़र में भेदभाव की लड़ाई जितनी राजनीतिक है, उतनी ही धार्मिक भी. अमेरिकी जनगणना के आंकड़ों के साथ उनके नज़रिए को समझने की कोशिश करें तो एशियाई अमेरिकी देश की आबादी का महज़ 6.3 प्रतिशत हैं, वहीं 1.2 प्रतिशत आबादी भारतीय अमेरिकी (जिनमें से ज़्यादातर हिंदू हैं) लोगों की है, जो सांख्यकीय दृष्टिकोण से महत्त्वहीन हैं. यानी कि उनकी राजनीति के केंद्र में ईसाई आबादी है, जिसमें कैथोलिक प्रभुत्व वाले लैटिन अमेरिकी और प्रोटेस्टेंट वर्चस्व वाले ब्लैक अमेरिकी मतदाता शामिल हैं, जो अमेरिका की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा हैं. एक ईसाई बहुसंख्यकवादी सरकार और पार्टी के अधीन अमेरिका का लोकतंत्र ख़तरे में है, यह न केवल एशियाई समुदाय बल्कि हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म या शिंटो जैसे एशियाई धर्मों के खिलाफ़ खुलेआम भेदभाव कर रहा है. अतीत में यहूदियों को हाशिए पर रखा गया (न्यायिक आदेश की पृष्ठ संख्या 12, 2, 31 और 47 को पढ़ें); अब एशियाइयों की बारी है.
एक ईसाई बहुसंख्यकवादी सरकार और पार्टी के अधीन अमेरिका का लोकतंत्र ख़तरे में है, यह न केवल एशियाई समुदाय बल्कि हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म या शिंटो जैसे एशियाई धर्मों के खिलाफ़ खुलेआम भेदभाव कर रहा है.
इससे भी बुरी बात यह है कि यह भेदभाव कई तरीकों से भारतीय पहचान के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ा रहा है. इस फ़ैसले में दिसंबर 2022 की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार कॉलेज के एडमिशन काउंसलर एशियाई अमेरिकी लोगों को “कथित रूप से एशियाई गतिविधियों जैसे चीनी लैंग्वेज स्कूल, पियानो और भारतीय शास्त्रीय वाद्ययंत्रों” से दूर रखने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा, 20 जून 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एडमिशन काउंसलर भारतीय छात्रों को सलाह देते हैं कि “अगर वे ब्लैक या लैटिन मूल के नहीं हैं तो उन्हें आवेदन फॉर्म पर नस्लीय पहचान के कॉलम पर निशान नहीं लगाना चाहिए.”
उदाहरण के लिए, हार्वर्ड की प्रवेश प्रक्रिया के माध्यम से भारतीय अमेरिकियों के प्रति भेदभाव को संस्थागत रूप दे दिया गया, जिसने दशकों से उनके साथ हो रहे घृणित अपराध पर पर्दा डालने का काम किया है और दुनिया को इस धोखे में रखा है कि हार्वर्ड में सिर्फ़ योग्यता देखी जाती है. इस फ़ैसले से हम जानते हैं कि ये मामला नहीं है. इसके अलावा, संस्थान को शोध के लिए कुल 80 करोड़ डॉलर का अनुदान मिलता है, जिसमें से 70 प्रतिशत राशि का वहन ईसाई वर्चस्व वाली संघीय सरकार करती है, यानी इससे यह भी पता चलता है कि अमरीकी करदाताओं से मिलने वाले सार्वजनिक धन को यूं अपमानजनक तरीके से खर्च किया जाता रहा है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने “हार्वर्ड की नस्लीय भेदभाव की घृणित परंपरा” का अंत किया है, जो अमेरिकी आदर्शों के खिलाफ़ थी.
अगर इस फ़ैसले को अलग नज़रिए से देखें, तो अगर एक भारतीय छात्रा को योग्यता के आधार पर हार्वर्ड में दाखिला मिलता है, तो वह संभवतः अपने समूह की सर्वश्रेष्ठ छात्रा होगी. विशेषाधिकार प्राप्त समूहों, अमीरों और ताक़तवर लोगों से लड़ने के अलावा, उसे अपनी भारतीय हिंदू पहचान के खिलाफ़ नस्लीय और धार्मिक पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ता है, और फिर भी इस विश्वविद्यालय में पहुंचने का मतलब संस्थान के भीतर हर संभावित बाधाओं से लड़ना है, जो कथित रूप से दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक संस्थान है. यह बहुत बड़ी बात है. लेकिन यह और बात है कि पिछले एक दशक में, हार्वर्ड की रैंकिंग लगातार गिर रही है, जहां 2013 और 2016 में यह दूसरे नंबर पर था, वहीं 2023 में यह पांचवें नंबर पर है.
| QS World University Rankings | |
| Year | Ranking |
| 2013 | 2 |
| 2014 | 3 |
| 2015 | 4 |
| 2016 | 2 |
| 2017 | 3 |
| 2018 | 3 |
| 2019 | 3 |
| 2020 | 3 |
| 2021 | 3 |
| 2022 | 5 |
| 2023 | 5 |
इस फ़ैसले के साथ, केवल नस्लीय पूर्वाग्रह ही 2024 में इसकी रैंकिंग को और नीचे (कम से कम 50 से नीचे) ले जाने के लिए पर्याप्त होगा. किस तरह से संस्थागत नस्लवाद से विश्वविद्यालयों की रैंकिंग प्रभावित होती है, यह रैंकिंग तैयार करने वालों को सोचना चाहिए. हालांकि, यह इस नस्लवाद और धार्मिक भेदभाव से पीड़ित लोगों, विशेष रूप से भारतीय मूल के छात्रों को प्रभावित करता है. विश्वविद्यालयों की वरीयता तय करने वाले पश्चिमी मूल के इन संस्थाकर्मियों को अपनी सहूलियत के हिसाब से आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ करने के लिए जाना जाता है. उदाहरण के लिए, लोकतंत्र की रैंकिंग देखें जिसे फ्रीडम हाउस, इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट और गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय ने तैयार किया है.
यह न्यायिक आदेश छह बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए दिया गया है. पहला बिंदु प्रक्रिया को लेकर है. (पृष्ठ संख्या 2, न्यायिक आदेश) दूसरा बिंदु 14वें संशोधन (पृष्ठ संख्या 3) के तहत समान सुरक्षा नियम (इक्वल प्रोटेक्शन क्लॉज) की व्याख्या से जुड़ा है, जिसके अनुसार, “अमेरिका में जो कानून श्वेत लोगों के लिए हैं, वही काले लोगों के लिए भी होंगे; चाहे कोई श्वेत हो, अश्वेत हों या फिर काले हों, अमेरिका के कानून के समक्ष सभी बराबर होंगे.” इसलिए भारतीय अमेरिकी लोग भी बराबर हैं.
तीसरा बिंदु (पृष्ठ संख्या 5) उस नियम का है, जो विश्वविद्यालयों को दोहरे आरक्षण को लागू करने से रोकता है, जिसके तहत “एक ख़ास जातीय समुदाय के व्यक्तियों के लिए कुछ सीटों को आरक्षित किया जाता है.” आदेश के अनुसार, किसी व्यक्ति विशेष के मामले में उसकी ‘नस्लीय पहचान’ को एक अतिरिक्त पहचान के रूप में ही देखा जाएगा और फिर भी, “हर एक आवेदक की विशिष्ट योग्यता के आकलन के बाद विविधता के हर पहलू पर विचार करते हुए” इस पहचान की तुलनात्मक जांच की जाएगी.
चौथा बिंदु (पृष्ठ संख्या 5 और 6) ग्रैट्ज़ बनाम बोलिंगर मामले में दिए गए फ़ैसले से निकला हुआ है, जो दो तरह से इस बिंदु का समर्थन करता है. पहली मुद्दा सतही दृष्टिकोण का है. प्रवेश कार्यक्रमों को इस विश्वास के आधार पर संचालित नहीं किया जा सकता कि “अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र किसी मुद्दे को हमेशा (या अक्सर) किसी ख़ास दृष्टिकोण (जो अल्पसंख्यकों को केंद्र में रखता हो) से देखते हैं.” और दूसरा मुद्दा नस्ल को एक अतिरिक्त पहचान के रूप में नहीं देखा जाएगा बल्कि उसे दूसरे नस्लीय समुदाय (उदाहरण के लिए भारतीय अमेरिकी छात्र समूह) के खिलाफ़ इस्तेमाल किया जाएगा, जिन्हें नस्ल के आधार पर कोई लाभ नहीं दिया जाता. समाधान के रूप में इन नियमों की एक समयसीमा (25 साल) तय की गई थी, “न्यायालय को उम्मीद है कि आज से 25 साल बाद, वर्तमान में स्वीकृत हितों के विस्तार के लिए नस्लीय प्राथमिकताओं का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं होगी.” इस फ़ैसले की पड़ताल ज़रूरी है, जिसे भारत की आरक्षण व्यवस्था के साथ जोड़कर देखना चाहिए, संवैधानिक रूप से दोनों व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही योग्यता के खिलाफ़ एकजुट हैं.
हार्वर्ड की प्रवेश व्यवस्था हर मानदंडों पर विफल है. उससे भी बुरी बात यह है कि हार्वर्ड नस्लीय श्रेणीकरण की एक ऐसी व्यवस्था का पालन करता है, जहां मनमाने या अपरिभाषित ढंग से कुछ श्रेणियां ईजाद की गई हैं
पांचवां बिंदु 25 साल की इस समय सीमा की पड़ताल करता है (पृष्ठ संख्या 6-8). ग्रैट्ज़ बनाम बोलिंगर मामले में “केवल सीमित दायरे के भीतर ही” नस्ल के आधार पर कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति दी गई.
हार्वर्ड की प्रवेश व्यवस्था हर मानदंडों पर विफल है. उससे भी बुरी बात यह है कि हार्वर्ड नस्लीय श्रेणीकरण की एक ऐसी व्यवस्था का पालन करता है, जहां मनमाने या अपरिभाषित ढंग से कुछ श्रेणियां (“हिस्पैनिक” श्रेणी का इस्तेमाल) ईजाद की गई हैं; या अति-व्यापक श्रेणी (उदाहरण के लिए दक्षिण एशियाई या पूर्वी एशियाई छात्रों को एक “एशियाई” पहचान के अंतर्गत समेट दिया गया है और उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला या नहीं, इस बात की परवाह नहीं की गई) का इस्तेमाल किया गया है; या कुछ समुदायों के लिए कोई श्रेणी नहीं है (मध्य-पूर्वी छात्रों की कोई विशिष्ट श्रेणी नहीं है).” एक ऐसा विश्वविद्यालय, जिसका लॉ स्कूल दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है, वहां कानूनी निरक्षता का होना हैरान करने वाली बात है.
और आखिर में, छठा बिंदु इस शक्तिशाली कथन के साथ समाप्त होता है, “लंबे समय से कई विश्वविद्यालय इस आधार पर काम करते रहे हैं कि किसी व्यक्ति की पहचान की कसौटी चुनौतियों से पार पाने की उसकी क्षमता, कौशल या अर्जित ज्ञान नहीं, बल्कि उसके त्वचा का रंग है. इस देश का संवैधानिक इतिहास पहचान की इस कसौटी को बर्दाश्त नहीं कर सकता.”
एक आख़िरी सवाल रह जाता है: क्या हार्वर्ड अपनी नीतियों में सुधार करेगा या फिर उन राजनेताओं और कॉरपोरेट नेतृत्वकर्ताओं, जो इसके छात्र नेटवर्क का हिस्सा रह चुके हैं, से सुप्रीम कोर्ट में ‘सुधार’ लाने के लिए कहेगा? अभी एक हफ़्ता भी नहीं गुजरा है, लेकिन देश के द्विपक्षीय लोकतंत्र से कई आवाजें उठने लगी हैं.
राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा, “कोर्ट ने कॉलेजों में प्रवेश से जुड़ी सकारात्मक कार्रवाईयों को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया है. और मैं कोर्ट के इस फ़ैसले से पूरी तरह असहमत हूं.” वह अब न्याय को कुचलने के लिए शब्दावलियों का सहारा ले रहे हैं: “संकट” शब्द भेदभाव को जारी रखने का एक नया उपकरण बन सकता है.
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा (जो हार्वर्ड लॉ स्कूल के छात्र रह चुके हैं) ने कहा, “समाज को और अधिक न्यायपूर्ण बनाने के लिए सकारात्मक भेदभाव की रणनीति पूरी तरह कारगर सिद्ध नहीं हो सकती. लेकिन जिन्हें पीढ़ियों से अमेरिका के प्रमुख संस्थानों से दूर रखा गया, इससे हमें यह दिखाने का मौका मिला कि हम इन संस्थानों में महज़ प्रवेश लेने से कहीं ज्य़ादा योग्यता रखते हैं.” उन्होंने अपनी पत्नी मिशेल ओबामा (वह भी हार्वर्ड लॉ स्कूल में पढ़ चुकी हैं) का उदाहरण देते हुए हार्वर्ड की भेदभावपूर्ण नीतियों के खिलाफ़ न्यायालय के फ़ैसले की आलोचना की. हितों के टकराव का मुद्दा कभी इतने स्पष्ट रूप में सामने नहीं आया था.
इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि यह फ़ैसला सही दिशा में उठाया गया एक कदम है. इसका प्रभाव केवल हार्वर्ड या नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी पर ही नहीं, उन सभी विश्वविद्यालयों पर भी पड़ेगा जो अपनी प्रवेश प्रक्रियाओं में हेरफेर करते रहे हैं.
रिपब्लिकन नेता ट्रंप की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, “यह अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है. असाधारण क्षमता वाले लोगों और सफ़लता के लिए आवश्यक बाकी सभी पहलुओं, जो हमारे देश के उज्जवल भविष्य के लिए आवश्यक हैं, को आख़िरकार सम्मान मिल रहा है. ऐसे किसी फ़ैसले का सभी इंतज़ार कर रहे थे और उम्मीद कर रहे थे. और इसका परिणाम काफ़ी सुखद रहा.”
इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि यह फ़ैसला सही दिशा में उठाया गया एक कदम है. इसका प्रभाव केवल हार्वर्ड या नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी पर ही नहीं, उन सभी विश्वविद्यालयों पर भी पड़ेगा जो अपनी प्रवेश प्रक्रियाओं में हेरफेर करते रहे हैं. दरअसल, सभी विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रियाओं में नस्लीय भेदभाव के मामले जांच के दायरे में आएंगे. इस फ़ैसले का कॉरपोरेट कंपनियों पर भी प्रभाव पड़ेगा और इन विश्वविद्यालयों से पढ़कर निकलने वाले छात्रों के प्रति उनके रवैए में भी तब्दीली आयेगी. अगर योग्यता कोई मानदंड है, और इन विश्वविद्यालयों से किसी एशियाई छात्रा ने आवेदन किया है तो उन्हें यह एहसास होगा कि तमाम बाधाओं के बावजूद वह वहां तक पहुंची है, और इसलिए वह योग्यता सूची में शीर्ष पर है.
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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