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एनएसएस 2025 सिर्फ अमेरिका की सुरक्षा रणनीति नहीं है बल्कि इसके पीछे पोस्टलिबरल सोच और घटती हुई महाशक्ति की हकीकत छिपी है। इस लेख से समझें, इसके पीछे की सोच और रणनीतिक तर्क क्या हैं!
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) 2025 दुनिया में अमेरिका की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करती है. यह दस्तावेज़ शीत युद्ध के बाद बनी नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के क्षय को लगभग स्वीकार करता है और प्रभाव-क्षेत्रों की राजनीति की वापसी का संकेत देता है. मुनरो सिद्धांत के ट्रंप संस्करण के तहत अमेरिका की प्राथमिकता अब इंडो-पैसिफिक के बजाय अपने देश और पश्चिमी गोलार्ध की सुरक्षा है जिससे चीन के खिलाफ क्षेत्रीय संतुलन की पिछली रणनीति कमजोर पड़ती दिखती है.
यह रणनीति पारंपरिक सैन्य खतरों के बजाय अवैध आप्रवासन, ड्रग कार्टेल और आपूर्ति शृंखला जैसी गैर-पारंपरिक चुनौतियों पर केंद्रित है. इंडो-पैसिफिक में अमेरिकी हितों को मुख्यतः आर्थिक रूप में देखा गया है जबकि चीन की सैन्य और दबाव की नीतियों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया है. सहयोगी देशों से अपनी रक्षा का अधिक बोझ उठाने और अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करने में योगदान की अपेक्षा की गई है.
NSS 2025 पोस्टलिबरल विचारधारा, सीमित यथार्थवादी संयम और कई आंतरिक विरोधाभासों का मिश्रण है जो अंततः अमेरिकी सुरक्षा और समृद्धि के लक्ष्यों को ही कमजोर कर सकता है.
भारत की भूमिका भी NSS में लेन–देन आधारित दिखाई देती है. अमेरिका भारत से क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री मार्गों की रक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति में सहयोग चाहता है लेकिन चीन के दबाव से निपटने के लिए किसी स्पष्ट रणनीतिक साझेदारी का उल्लेख नहीं करता. भारत-पाक संघर्ष में मध्यस्थता के दावों की पुनरावृत्ति भी नई दिल्ली को असहज कर सकती है.
कुल मिलाकर, NSS 2025 पोस्टलिबरल विचारधारा, सीमित यथार्थवादी संयम और कई आंतरिक विरोधाभासों का मिश्रण है जो अंततः अमेरिकी सुरक्षा और समृद्धि के लक्ष्यों को ही कमजोर कर सकता है.
ट्रंप के कभी-कभी अस्थिर बयानों से आगे, अमेरिका के सामाजिक अनुबंध को रूढ़िवादी रूप देने का एक अधिक संगठित और बौद्धिक प्रयास अब उभरती हुई पोस्टलिबरल विचारधारा से आ रहा है. इस सोच के समर्थक अमेरिका की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं की जड़ उदारवादी विचार में मानते हैं जो व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता पर ज़ोर देता है. उनके अनुसार, मुक्त बाज़ार वाली मध्यमार्गी उदारवादिता और पहचान-आधारित ‘वोक’ राजनीति- दोनों ने समाज को कमजोर किया है और कामकाजी वर्ग को नुकसान पहुँचाया है.
पोस्टलिबरल धारा के समाधान हैं- देश की औद्योगिक क्षमता को फिर से मज़बूत करने के लिए आर्थिक राष्ट्रवाद, संस्कृति और रोज़गार की रक्षा के लिए कड़ी आव्रजन नीतियाँ और परंपरागत परिवार, राष्ट्रवाद और धर्म जैसे मूल्यों पर ज़ोर. ट्रंप प्रशासन में उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस का ‘न्यू राइट’ विचारधारा से जुड़ाव इस सोच के बढ़ते प्रभाव को दिखाता है.
कुल मिलाकर, NSS 2025 एक ऐसे अमेरिका की तस्वीर पेश करती है जो अपने पतन को पहचान तो रहा है लेकिन उससे निपटने के लिए पूरी तरह संतुलित और भरोसेमंद रणनीति पेश नहीं कर पा रहा है.
NSS में आर्थिक विकास पर अत्यधिक ज़ोर इस बात को दर्शाता है कि पोस्टलिबरल खेमे में आर्थिक राष्ट्रवादी और नव-व्यापारवादी (नियो-मर्केंटिलिस्ट) धारा का प्रभाव बहुत अधिक है. औद्योगिक नीति और तकनीकी नवाचार पर भरोसा, कुछ हद तक बाइडन प्रशासन की नीतियों से भी मेल खाता है लेकिन NSS में सांस्कृतिक शिकायतों और उनके समाधानों को जिस तरह प्रमुखता दी गई है, वह पोस्टलिबरल विचारकों के एजेंडा-निर्धारण की ताकत को साफ़ दिखाता है.
उदाहरण के तौर पर, NSS राष्ट्रीय मनोबल की जड़ को पारंपरिक परिवार व्यवस्था की बहाली से जोड़ता है. यूरोप के उदारवादी नेतृत्व को वहाँ उभर रही दक्षिणपंथी ताक़तों का विरोध करने के लिए आलोचना का निशाना बनाया गया है. जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फ़्यूर डॉयचलैंड (AfD) के लिए जे.डी. वेंस का समर्थन अब रणनीतिक सोच का हिस्सा बन चुका है. दस्तावेज़ में दक्षिणपंथी ‘देशभक्त’ दलों के उभार को सकारात्मक रूप में दिखाया गया है. खुले आव्रजन को यूरोपीय सभ्यता के लिए खतरा बताकर, अमेरिका यूरोपीय देशों के भीतर ही मौजूदा नीतियों के खिलाफ विरोध को बढ़ावा देना अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हित में मानता है. घरेलू स्तर पर, आर्थिक प्रगति के नाम पर ‘वोक’ और योग्यता-विरोधी मानी जाने वाली DEI (विविधता, समानता और समावेशन) नीतियों को सीमित करने की बात कही गई है.
वैश्विक व्यवस्था के आकलन में यह पोस्टलिबरल सोच पारंपरिक विल्सनवादी उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पूरी तरह खारिज करती है. NSS न तो नियम-आधारित व्यवस्था का ज़िक्र करता है और न ही लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद की भाषा अपनाता है. शीत युद्ध के बाद जिस तरह दुनिया को अपने जैसा बनाने की उदारवादी कोशिशें हुई थीं, उनसे अलग हटते हुए यह दस्तावेज़ गैर-उदार संस्कृतियों और अलोकतांत्रिक शासन प्रणालियों की वैधता को भी स्वीकार करता है.
सैन्य शक्ति के इस्तेमाल से जुड़े मुख्य रणनीतिक मुद्दों पर NSS, पोस्टलिबरल सोच से आगे बढ़कर यथार्थवादी संयम की नीति से मेल खाती दिखती है. यह सोच लंबे समय से अमेरिका के प्रमुख विश्वविद्यालयों और थिंक टैंकों के रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच लोकप्रिय रही है. इन यथार्थवादी विचारकों ने लगातार अमेरिका की उस नीति की आलोचना की है जिसमें उदारवादी वर्चस्व के नाम पर बलपूर्वक लोकतंत्र फैलाने और आर्थिक आपसी निर्भरता से शांति लाने की उम्मीद की जाती रही है.
मध्य पूर्व में लंबे और महंगे युद्धों तथा चीन के एक गैर-उदार शक्ति के रूप में उभार ने अमेरिका के भीतर इस ‘संयम’ वाली सोच को और मज़बूती दी है. इस दृष्टिकोण के समर्थक आम तौर पर मध्य पूर्व और यूरोप से अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटाने, इंडो-पैसिफिक में चीन के संतुलन पर ध्यान देने और सहयोगी देशों से अपनी रक्षा का ज़्यादा बोझ उठाने की मांग करते हैं.
ट्रंप प्रशासन में इस सोच के समर्थकों में एल्ब्रिज कॉल्बी, एलेक्स वेलेज-ग्रीन, ऑस्टिन डाहमर और पहले डैन कैल्डवेल शामिल रहे हैं. इसी यथार्थवादी दृष्टिकोण के अनुरूप NSS यह मानती है कि अमेरिका का स्थायी हित किसी भी क्षेत्रीय या वैश्विक महाशक्ति के उभार को रोकने में है जो उसकी श्रेष्ठता को चुनौती दे सके. दस्तावेज़ में राष्ट्र-राज्य को वैश्विक राजनीति की मूल इकाई मानना भी इसी सोच को दर्शाता है. बहुपक्षीय संस्थाओं के प्रति अमेरिकी रवैये में भी अब वैश्विक सार्वजनिक हितों के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है.
चीन यदि विनिर्माण क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखता है तो नव-व्यापारवादी (नियो-मर्केंटिलिस्ट) नीतियों के ज़रिए अमेरिकी विनिर्माण को फिर से खड़ा करने का लाभ फिलहाल अनिश्चित ही दिखाई देता है.
गठबंधन राजनीति के मामले में भी NSS यथार्थवादी संयम के अनुरूप है. इसमें यूरोप से अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी खुद उठाने, जापान और दक्षिण कोरिया से अधिक योगदान देने और ऑस्ट्रेलिया व ताइवान से रक्षा खर्च बढ़ाने की अपेक्षा की गई है. यूरोप के संदर्भ में, संयमवादी विचारधारा का तर्क है कि नाटो का लगातार विस्तार रूस की असुरक्षा बढ़ाने और टकराव को भड़काने का कारण बना. ऐसे में NSS द्वारा नाटो की ‘ओपन डोर’ नीति को समाप्त करने की स्पष्ट प्रतिबद्धता इस यथार्थवादी सोच के लिए एक अहम सफलता मानी जा सकती है.
अपनी विशिष्ट वैचारिक प्राथमिकताओं के कारण NSS अमेरिकी सुरक्षा और समृद्धि के घोषित लक्ष्यों को कमजोर कर सकती है. विशेष रूप से आव्रजन पर अपनाया गया कठोर रुख उस महत्वाकांक्षा से टकराता है, जिसके तहत अमेरिका उन्नत तकनीक और नवाचार में फिर से वैश्विक नेतृत्व स्थापित करना चाहता है. आधुनिक तकनीकी बढ़त केवल पूंजी या बुनियादी ढांचे से नहीं आती बल्कि वह दुनिया भर से आने वाली सर्वोत्तम प्रतिभा पर निर्भर करती है. यदि अमेरिका अपनी सीमाओं को प्रतिभाशाली प्रवासियों के लिए बंद करता है तो वह वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च शिक्षा, स्टार्ट-अप संस्कृति और अत्याधुनिक उद्योगों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को स्वयं ही सीमित कर देगा. इस तरह, वैचारिक आग्रह से प्रेरित नीतियाँ दीर्घकाल में उसी आर्थिक और रणनीतिक शक्ति को कमजोर कर सकती हैं जिसे मजबूत करने का दावा NSS करती है.
इसके अलावा, जलवायु संकट और हरित ऊर्जा की वैश्विक दिशा के बावजूद जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक ज़ोर देना अमेरिका की आर्थिक गतिशीलता और रणनीतिक बढ़त—दोनों को नुकसान पहुँचा सकता है. नवीकरणीय ऊर्जा में संघीय स्तर पर रुचि की कमी अमेरिका को उभरते ऊर्जा क्षेत्रों में पीछे छोड़ सकती है, खासकर तब जब विकासशील देश तेज़ी से चीन की ओर देख रहे हैं.
चीन यदि विनिर्माण क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रखता है तो नव-व्यापारवादी (नियो-मर्केंटिलिस्ट) नीतियों के ज़रिए अमेरिकी विनिर्माण को फिर से खड़ा करने का लाभ फिलहाल अनिश्चित ही दिखाई देता है.
एक स्तर पर देखें तो NSS 2025 ट्रंप प्रशासन की पहले की बयानबाज़ी और नीतिगत प्रतिबद्धताओं को ही दोहराती है. लेकिन संभावित वैश्विक प्रतिक्रियाओं के संदर्भ में यह दस्तावेज़ यूरोप और एशिया—दोनों ही क्षेत्रों में चिंता पैदा करता है. यूरोप में रणनीतिक वर्ग के लिए यह नीति एक झटके की तरह हो सकती है क्योंकि इसमें यूरोपीय देशों के प्रति अमेरिका का रुख स्पष्ट रूप से टकरावपूर्ण और आलोचनात्मक दिखाई देता है. अमेरिका अब यूरोप को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार की बजाय बोझ के रूप में देखने लगा है जिससे ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव बढ़ना तय है.
संरचनात्मक यथार्थवाद (structural realism) के दृष्टिकोण से देखें तो एक घटती हुई महाशक्ति के लिए गैर-ज़रूरी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से पीछे हटना एक तार्किक कदम माना जा सकता है. इस लिहाज़ से NSS 2025 को अमेरिका की सीमित क्षमताओं के अनुरूप रणनीतिक समायोजन के रूप में भी देखा जा सकता है.
एशियाई देशों के लिए भी NSS आश्वस्त करने वाली नहीं है. हालाँकि चीन को एक संभावित प्रतिस्पर्धी माना गया है लेकिन रणनीति का मुख्य फोकस पश्चिमी गोलार्ध पर है. चीन की चुनौती को मुख्य रूप से आर्थिक रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि व्यापक रणनीतिक या सैन्य खतरे के तौर पर. इसके साथ ही, सहयोगी देशों से लेन–देन के आधार पर रियायतें निकालने की अमेरिकी कोशिशें एशिया में भरोसे को कमजोर कर सकती हैं. अमेरिका के पारंपरिक साझेदारों को यह डर हो सकता है कि संकट की स्थिति में वॉशिंगटन उनकी सुरक्षा प्राथमिकताओं को पीछे रख देगा.
संरचनात्मक यथार्थवाद (structural realism) के दृष्टिकोण से देखें तो एक घटती हुई महाशक्ति के लिए गैर-ज़रूरी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से पीछे हटना एक तार्किक कदम माना जा सकता है. इस लिहाज़ से NSS 2025 को अमेरिका की सीमित क्षमताओं के अनुरूप रणनीतिक समायोजन के रूप में भी देखा जा सकता है.
लेकिन इसके विपरीत, पश्चिमी गोलार्ध में खतरों की अतिरंजित व्याख्या, महान शक्ति प्रतिस्पर्धा के ढाँचे को कमजोर करना और सहयोगियों के प्रति अत्यधिक लेन–देन आधारित रवैया.ये सभी संरचनात्मक दबावों के प्रति अमेरिका की अधूरी और कमज़ोर प्रतिक्रिया को दर्शाते हैं. कुल मिलाकर, NSS 2025 एक ऐसे अमेरिका की तस्वीर पेश करती है जो अपने पतन को पहचान तो रहा है लेकिन उससे निपटने के लिए पूरी तरह संतुलित और भरोसेमंद रणनीति पेश नहीं कर पा रहा है.
संजीत कश्यप नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी के शोधार्थी हैं. इसके अलावा, उन्होंने ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में इंटर्नशिप भी की है.
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Sanjeet Kashyap is a PhD candidate in International Politics at Jawaharlal Nehru University, New Delhi. He has also interned with the Strategic Studies Programme, Observer ...
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