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मई 2019 लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद यह देखना होगा कि अगले पांच साल में सरकार सहकारी संघवाद के क्षेत्र में क्या एजेंडा तय करती है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में कामकाज संभालने के बाद कहा था कि वह केंद्र और राज्यों के बीच की खाई को पाटना चाहते हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान के अपने तज़ुर्बे की ओर इशारा करते हुए उन्हें राज्यों से ऐसा ढांचा बनाने की अपील की थी, जिससे केंद्र और राज्य के बीच कम से कम टकराव हों. मोदी ने उनसे सहकारी या सहयोगात्मक, प्रतिस्पद्धी संघवाद (को-ऑपरेटिव, कॉम्पिटिटिव फेडरलिज्म) के ज़रिये प्रगति और समृद्धि की राह पर मिलकर चलने का आह्वान किया था. इस मामले में उनके पहले कार्यकाल का रिकॉर्ड कैसा रहा है, क्या मोदी इसकी मुख्य चुनौती को दूर कर पाए?
इस मामले में सरकार का पहला यादगार कदम योजना आयोग को 2014 में ख़त्म करने का फैसला था, जो सेंट्रलाइज्ड पॉलिसी बनाने में तब तक प्रमुख भूमिका निभाता आया था. प्रधानमंत्री ने इस सिलसिले में अपने भाषण में कहा था कि राज्यों को योजना आयोग से बहुत शिकायतें रही हैं. मोदी ने कहा था, ‘मुख्यमंत्री रहने के दौरान मुझे भी ऐसा ही एक्सपीरियंस हुआ था.’ इसके तुरंत बाद योजना आयोग की जगह सरकारी थिंकटैंक नीति आयोग का गठन हुआ और उसे केंद्रीय योजनाओं को लागू करने में राज्यों के साथ ‘तालमेल’ बनाने को कहा गया.
नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) सरकार का केंद्र और राज्यों के संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में दूसरा बड़ा कदम 14वें वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को स्वीकार करना था, जिसमें राज्यों को केंद्र की तरफ से मिलने वाली रकम में भारी बढ़ोतरी की बात कही गई थी. इससे एक झटके में टैक्स से केंद्र को होने वाली आमदनी में राज्यों का हिस्सा 2015 में 32 से बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया. सरकार ने केंद्र की फंडिंग से चलने वाली योजनाओं में भी कुछ बदलाव किए, जिससे राज्यों की इनके बजट को लेकर स्वायत्तता बढ़ी.
तीसरा और शायद सबसे निर्णायक कदम 2016 में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) कानून को पास करना और अगले साल जुलाई में उसे लागू करना था. अप्रत्यक्ष कर के बंटवारे से जुड़े फैसले लेने के लिए जीएसटी काउंसिल बनाई गई, जो सहकारी संघवाद की एक और मिसाल थी. इसमें कोई शक नहीं है कि जीएसटी को कहीं बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता था, लेकिन इसके बावजूद यह सही दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम था.
इन कदमों का देश के संघीय ढांचे को मजबूत बनाने पर सकारात्मक और टिकाऊ असर हुआ है. इनके ज़रिये राज्यों को मिलने वाले संसाधनों में बढ़ोतरी हुई, उन्हें अपनी सामाजिक-आर्थिक योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने की आज़ादी मिली. साथ ही, जीएसटी काउंसिल जैसा नया मंच भी मिला. इन सबके बावजूद मोदी सरकार के पहले पांच साल के कार्यकाल में कई क्षेत्रों में केंद्र के बढ़ते दखल के ट्रेंड भी दिखे.
एनडीए सरकार के पहले पांच साल के कार्यकाल में सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ. राज्यों को अधिक संसाधन मिले और खर्च करने के मामले में भी उन्हें अधिक आज़ादी मिली. इसके साथ ही राज्यों के अधिकार में आने वाले क्षेत्रों में केंद्र का दखल भी बढ़ा है. मई 2019 लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद यह देखना होगा कि अगले पांच साल में सरकार सहकारी संघवाद के क्षेत्र में क्या एजेंडा तय करती है. योजना आयोग के ख़त्म होने के बाद राज्यों के हाथ से वह संस्थागत मंच निकल गया है, जिसके ज़रिये वह केंद्र के ख़िलाफ़ अपनी शिकायतें या विरोध दर्ज़ कराते थे. ऐसे में केंद्र और राज्यों के बीच खाई पाटने के लिए और संस्थानों की ज़रुरत है. इसलिए सरकार को मरणासन्न पड़े ISC को पुनर्जीवित कर और उसे सशक्त बनाकर उसके ज़रिये सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना चाहिए.था. ये इस कड़ी का तीसरा आर्टिकल है.
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