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AI हमारी दुनिया बदल रहा है लेकिन हर प्रोसेसिंग के पीछे लाखों लीटर पानी और गीगावॉट बिजली खर्च हो रही है. ऐसे में समझिए, पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए किन तरीकों से बेहतर डिजिटल भविष्य बनाया जा सकता है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में अपार संभावनाएं हैं पर पर्यावरण पर इसका प्रभाव भी खूब पड़ता है. अध्ययनों से पता चला है कि AI डेटा केंद्र इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करते हैं, बड़ी मात्रा में पानी की खपत करते हैं, महत्वपूर्ण खनिजों व दुर्लभ तत्वों पर निर्भर होते हैं और बिजली का काफ़ी उपयोग करते हैं. यह विरोधाभास ही है कि जैसे-जैसे AI की क्षमताएं हमारी उत्पादकता बढ़ाती हैं, वैसे-वैसे वे बिजली और पानी की खपत भी तेज़ करने लगती हैं. उदाहरण के लिए, चैटजीपीटी को प्रशिक्षित करने में हर घंटे 1.287 गीगावाट बिजली की खपत होती है जबकि इतनी बिजली से अमेरिका में लगभग 120 घर पूरे साल रोशन हो सकते हैं. इसी तरह, बड़े डेटा केंद्र पानी का भी अत्यधिक उपभोग करते हैं क्योंकि वहां मशीनों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में जल की ज़रूरत होती है.
“कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में अपार संभावनाएं हैं पर पर्यावरण पर इसका प्रभाव भी खूब पड़ता है.”
ऐसे में, पहले से ही जल संकट से जूझ रही दुनिया में, इनका सावधानीपूर्वक विश्लेषण ज़रूरी है क्योंकि डेटा केंद्रों ने कई जगहों पर तकनीकी तरक्क़ी और पर्यावरण संतुलन के बीच तनाव पैदा किया है. उदाहरण के लिए, 2019 में गूगल ने चिली के सैंटियागो में 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर के निवेश से दूसरा डेटा सेंटर बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे अपने सर्वरों को ठंडा रखने के लिए प्रति सेकंड 169 लीटर पानी की ज़रूरत होती. मगर इस परियोजना का स्थानीय लोगों ने विरोध किया. यह बताता है कि AI-आधारित बुनियादी ढांचों का विकास एक तरफ़ हमारे रोजाना के जीवन-अनुभवों को बेहतर बनाता है तो दूसरी तरफ़ जलवायु की चरम स्थितियों (जैसे- सूखा, भूजल की कमी आदि) को भी बढ़ा सकता है.
“AI डेटा केंद्र इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करते हैं, बड़ी मात्रा में पानी की खपत करते हैं, खनिजों व दुर्लभ तत्वों पर निर्भर होते हैं”
फ़्रांसीसी दार्शनिक ब्रूनो लाटूर कहते भी हैं, AI का ढांचा सर्वर, एल्गोरिदम, खनिज, जल, श्रमिक, ऊर्जा और पारिस्थितिकी का एक हाइब्रिड मिश्रण है जो सह-निर्माणकारी एजेंट के रूप में एक साथ काम करते हैं. इसलिए, पर्यावरण की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप AI को किस तरह विकसित किया जाए और उसके द्वारा संसाधनों की खपत हो, यह एक महत्वपूर्ण सवाल है.
तीन क्षेत्रों में AI पानी ख़र्च करता है- (1) डाटा सेंटर को ठंडा रखने में, (2) बिजली पैदा करने में, और (3) सेमीकंडक्टर बनाने में. आमतौर पर सबसे अधिक पानी बिजली पैदा करने में ख़र्च होता है, उसके बाद कूलिंग में. 11 अफ्रीकी देशों में ‘लामा-3-70बी’ और ‘जीपीटी-4’ की जल खपत के तुलनात्मक मूल्यांकन से पता चला है कि लामा-3-70बी से 10 पन्नों की रिपोर्ट तैयार करने में क़रीब 0.6 लीटर पानी ख़र्च होता है जबकि जीपीटी-4 से उसी रिपोर्ट को तैयार करने में क़रीब 53 लीटर. अभी दुनिया की लगभग 33 प्रतिशत आबादी ऑफलाइन है, इसलिए जैसे-जैसे वह ऑनलाइन होती जाएगी, मांग बढ़ेगी ही.
“तीन क्षेत्रों में AI पानी ख़र्च करता है- (1) डाटा सेंटर को ठंडा रखने में, (2) बिजली पैदा करने में, और (3) सेमीकंडक्टर बनाने में.”
AI द्वारा जल-ख़र्च मौसम और दिन के अनुसार बदलता रहता है. शोध से पता चलता है कि गर्मी में चूंकि कूलिंग की मांग बढ़ जाती है इसलिए जल की खपत सर्दियों की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक होती है. हालांकि, पानी की मांग बढ़ ही रही है जैसे गूगल के डेटा केंद्र ने 2023 में 5.6 अरब गैलन पानी ख़र्च किया जो 2022 की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक था. इन डेटा केंद्रों में हजारों सर्वर चौबीसों घंटे चलते रहते हैं जिनसे काफ़ी गर्मी पैदा होती है. उन्हें यदि पर्याप्त ठंडा न रखा जाए तो उनके ख़राब होने का ख़तरा रहता है. 2022 में ब्रिटेन में भीषण गर्मी के दौरान कूलिंग समस्या के कारण गूगल और ऑरेकल के लंदन स्थित डेटा केंद्रों को बंद करना पड़ा था. उल्लेखनीय है कि अमेज़न के दुनिया भर में 100 से अधिक डेटा केंद्र हैं जिनमें 50,000 सर्वर हैं.
यहां इसका भी ध्यान रखना होगा कि पानी की मांग और खपत किस तरह किसी इलाके के जल-भूगोल को प्रभावित करती है क्योंकि एक लीटर पानी का मूल्य स्थान के अनुसार और जल संकट के स्तर पर निर्भर करता है. नीचे चित्र-1 बताता है कि अधिकांश डेटा सेंटर उन इलाकों में बनाए जा रहे हैं जो पहले से ही जल संकट, सूखे और गिरती जल गुणवत्ता जैसी समस्याओं से लड़ रहे हैं.
चित्र 1- जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में डेटा केंद्र

Source: The Guardian
डिजिटलीकरण, क्लाउड तकनीक के उपयोग और डेटा सेंटर नीति जैसे प्रयासों के चलते भारत में भी डेटा केंद्रों के निर्माण में तेज़ी आने की संभावना है जिससे पहले से ही जल संकट से जूझ रहे इस देश के बुनियादी ढांचे पर और दबाव पड़ने की आशंका है. मुंबई, चेन्नई और हैदराबाद जैसे महानगर पहले से ही जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पानी की बढ़ती मांग से लड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में पानी ख़र्च करने वाले ढांचों का विस्तार पारिस्थितिकी को लेकर चिंताएं पैदा करता है.
AI द्वारा पानी की खपत को देखते हुए यूरोपीय संघ और अमेरिका ने कानून बनाने शुरू किए हैं. हालांकि ऐसी नीतियां अब भी अपवाद ही हैं. दरअसल, डेटा केंद्रों में उपयोग होने वाले पानी का क़रीब 80 प्रतिशत हिस्सा वाष्प बन जाता है जबकि बाकी अपशिष्ट जल. इनका अगर फिर से उपयोग किया जाए तो जल की कुल खपत कम की जा सकती है.
“2023 में गूगल के डेटा केंद्र ने 5.6 अरब गैलन पानी ख़र्च किया जो 2022 की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक था.”
वाशिंगटन राज्य में डेटा केंद्रों से निकलने वाले बेकार पानी को फिर से उपयोग लायक बनाने के लिए क्विंसी वाटर रियूज यूटिलिटी बनाने की साझेदारी माइक्रोसॉफ्ट और क्विंसी शहर ने की है. इसी प्रकार, गूगल जॉर्जिया के डगलस काउंटी में नगरपालिका के अपशिष्ट जल का उपयोग अपने डेटा केंद्र को ठंडा रखने के लिए करता है. अमेज़न वेब सर्विसेज (AWS) के 20 केंद्र भी उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग कूलिंग के लिए करते हैं. उसकी योजना 2030 तक अमेरिका के 120 स्थानों पर ऐसा ही करने की है.
कुछ जगहों पर, वर्षा जल से यह ज़रूरत पूरी हो सकती है जिससे वहां बरसाती जल की बर्बादी भी रुक सकती है. डेटा केंद्रों से बहने वाले पानी का उपयोग खेती में हो सकता है जैसे मेटा ने अमेरिका के इडाहो में गैर-खाद्य फ़सलों के लिए किया है. इसी प्रकार, डेनमार्क का ओडेंस डेटा सेंटर वाष्पीकरण शीतलन तकनीक के माध्यम से कूलिंग के लिए बाहरी हवा का उपयोग करता है. सर्वरों को ठंडा करने के बाद गर्म हवा का उपयोग पानी को गर्म करने में किया जाता है और उसे स्थानीय लोगों तक पहुंचाया जाता है. इससे हर साल 1,00,000 मेगावाट-घंटे बिजली बचाई जा सकती है, जो 6,900 घरों को गर्म कर सकती है.
“अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में क्लोज्ड-लूप कूलिंग सिस्टम, बेकार पानी का पुनः उपयोग और वर्षा जल संचयन जैसे तरीके लागू किए गए, वहां स्वच्छ जल को 50-70 प्रतिशत तक बचाया जा सकता है.”
ये उदाहरण बताते हैं कि AI इकोसिस्टम में चक्रीय जल पद्धति को शामिल करन संभव है और ज़रूरी भी. अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्रों में क्लोज्ड-लूप कूलिंग सिस्टम, बेकार पानी का पुनः उपयोग और वर्षा जल संचयन जैसे तरीके लागू किए गए, वहां स्वच्छ जल को 50-70 प्रतिशत तक बचाया जा सकता है.
साफ़ है, आज एक तरफ़ पानी के कुशल, स्मार्ट और चक्रीय उपयोग से AI में जल-खपत को कम करना ज़रूरी है तो दूसरी तरफ़, जल संकट और शासन संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा-आधारित फ़ैसले लेने में AI की क्षमताओं का लाभ उठाया जाना आवश्यक है. ऐसे में, तकनीकी तरक्क़ी को पर्यावरणीय प्रबंधन और जल संरक्षण के साथ संतुलित करना होगा क्योंकि यह हमारे डिजिटल भविष्य से जुड़ा मामला है.
(सोमा सरकार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अर्बन स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं)
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Soma Sarkar is an Associate Fellow with ORF’s Urban Studies Programme. Her research interests span the intersections of environment and development, urban studies, water governance, Water, ...
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