-
CENTRES
Progammes & Centres
Location
प्रोजेक्ट मेवेन ने युद्धक्षेत्र में AI की मदद से कमांडरों की नजर और सोच बदल दी. इस आर्टिकल से समझें कैसे हर लक्ष्य और खतरे को पहचानना अब पहले से तेज़ और सटीक हो गया.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल आज तेज़ी से विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ रहा है और सैन्य क्षेत्र भी इससे अलग नहीं है. दुनिया के कई देश अब रक्षा योजना और रणनीतिक निर्णयों में AI को शामिल कर रहे हैं जिनमें अमेरिका, इज़राइल और चीन अग्रणी हैं. हालांकि, वास्तविक समय के युद्धक्षेत्रों में AI की भूमिका को अक्सर गलत ढंग से समझा जाता है या बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है. इसकी प्रमुख भूमिका विशाल मात्रा में उपलब्ध सूचनाओं का विश्लेषण कर स्थिति की सटीक समझ विकसित करना और सैन्य कमांडरों को युद्धक्षेत्र की समग्र तस्वीर उपलब्ध कराना है ताकि बेहतर और अधिक सूचित निर्णय लिए जा सके.
अप्रैल 2017 में अमेरिकी रक्षा विभाग (DoD) ने एल्गोरिदमिक वॉरफेयर क्रॉस-फंक्शनल टीम की स्थापना की जिसे प्रोजेक्ट मेवेन के नाम से जाना जाता है. इस पहल का उद्देश्य रक्षा अभियानों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के उपयोग को बढ़ाना और अमेरिका की रणनीतिक व तकनीकी बढ़त बनाए रखना था.
अप्रैल 2017 में अमेरिकी रक्षा विभाग (DoD) ने एल्गोरिदमिक वॉरफेयर क्रॉस-फंक्शनल टीम की स्थापना की जिसे प्रोजेक्ट मेवेन के नाम से जाना जाता है. इस पहल का उद्देश्य रक्षा अभियानों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के उपयोग को बढ़ाना और अमेरिका की रणनीतिक व तकनीकी बढ़त बनाए रखना था. शुरुआत में गूगल के सहयोग से शुरू हुई इस परियोजना का लक्ष्य मध्य पूर्व में सक्रिय अमेरिकी ड्रोन से प्राप्त विशाल मात्रा में डेटा का विश्लेषण करना था. AI मॉडल की मदद से ड्रोन निगरानी फुटेज में संभावित सैन्य लक्ष्यों की पहचान की जाती थी जिसे अंतिम निर्णय और कार्रवाई से पहले मानवीय सत्यापन के लिए सैन्य अधिकारियों तक पहुँचाया जाता था.
2018 में गूगल ने प्रोजेक्ट मेवेन को लेकर अमेरिकी रक्षा विभाग (DoD) के साथ अपना सहयोग आगे न बढ़ाने का फैसला किया. कंपनी के भीतर AI के सैन्य उपयोग को लेकर कर्मचारियों के व्यापक विरोध के बाद यह निर्णय लिया गया. गूगल के हटने से परियोजना की प्रगति में कुछ समय के लिए खालीपन आया जिसे अन्य नागरिक रक्षा प्रौद्योगिकी कंपनियों ने भरना शुरू किया. इनमें पालैनटीर टेक्नोलॉजीज़ प्रमुख ठेकेदार के रूप में उभरी जिसने डेटा एकीकरण और विश्लेषण में अपनी विशेषज्ञता के बल पर प्रोजेक्ट मेवेन की परिचालन क्षमताओं को आगे बढ़ाया और अमेरिकी रक्षा उद्देश्यों के लिए इसकी निरंतरता सुनिश्चित की.
आधुनिक युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का परिवर्तनकारी प्रभाव मानव निर्णय-क्षमता को प्रतिस्थापित करने में नहीं बल्कि उसे अधिक सक्षम बनाने में निहित है.
प्रोजेक्ट मेवेन ने कम समय में उल्लेखनीय परिचालन सफलता हासिल की और इराक व सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिकी सैन्य खुफिया अभियानों को महत्वपूर्ण समर्थन दिया. फरवरी 2024 तक, इस परियोजना की मदद से इन क्षेत्रों में 85 से अधिक सटीक हवाई हमले किए जाने की सूचना है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी शुइलर मूर के अनुसार, यह प्रणाली केवल लक्ष्यों की पहचान और आकलन तक सीमित रही है जबकि किसी भी हमले का अंतिम निर्णय मानवीय पुष्टि के बाद ही लिया गया. वर्तमान में यह परियोजना अमेरिकी नेशनल जियोस्पेशियल-इंटेलिजेंस एजेंसी के नेतृत्व में संचालित हो रही है, जहाँ इसका उपयोग वैश्विक स्तर पर सैन्य और रणनीतिक मानचित्रण के लिए किया जा रहा है.
प्रोजेक्ट मेवेन का दीर्घकालिक उद्देश्य विभिन्न स्रोतों से प्राप्त खुफिया सूचनाओं के निरंतर विश्लेषण के लिए एक स्थायी प्रणाली विकसित करना है. यह व्यवस्था ऐसे फेडरेटेड ढांचे पर आधारित होगी, जिसमें लगातार सीखने वाली विश्लेषणात्मक प्रणालियाँ शामिल होंगी. इसका अंतिम लक्ष्य एक बहु-डोमेन टार्गेटिंग सिस्टम तैयार करना है, जो थल, जल, वायु, साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्रों से प्राप्त सूचनाओं को एकीकृत कर समन्वित, सूचना-आधारित सैन्य अभियानों को अधिक प्रभावी बना सके.
कई विशेषज्ञों का मानना है कि रूस–यूक्रेन युद्ध आधुनिक युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस्तेमाल का एक तरह का परीक्षण क्षेत्र बन गया है. इस संघर्ष के दौरान हथियारों, खुफिया जानकारी और साइबर सुरक्षा में AI का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है क्योंकि दोनों देश तकनीकी बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. इस संदर्भ में, अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा विकसित प्रोजेक्ट मेवेन ने युद्ध की शुरुआत से ही यूक्रेन की रक्षा तैयारियों को अहम समर्थन दिया.
विशेष रूप से, प्रोजेक्ट मेवेन की भूमिका अमेरिकी सेना के XVIII एयरबोर्न कॉर्प्स के साथ इसके जुड़ाव के ज़रिये सामने आई जिसकी कमान जनरल क्रिस्टोफर डोनह्यू के पास थी. शुरुआत में सिक्योरिटी असिस्टेंस ग्रुप–यूक्रेन (SAG-U) का काम केवल कमांड सहायता, लॉजिस्टिक योजना और सैन्य सामान पहुँचाने तक सीमित था लेकिन बाद में इसका ध्यान सीधे युद्धक्षेत्र में मदद देने, खासकर लक्ष्यों की पहचान और निशाना साधने जैसे कार्यों पर केंद्रित हो गया.
यूक्रेन में प्रोजेक्ट मेवेन के इस्तेमाल से ‘फाइंड, फ़िक्स, फ़िनिश’ यानी लक्ष्य खोजने से उसे नष्ट करने तक का समय घटकर दस मिनट से भी कम रह गया.
प्रोजेक्ट मेवेन के तहत विकसित AI मॉडल, जो संभावित सैन्य लक्ष्यों की पहचान कर उन्हें कमांडरों तक पहुँचाते थे, यूक्रेनी सेना द्वारा किए गए कई जवाबी हमलों में बेहद अहम साबित हुए. ये सिस्टम केवल लक्ष्य पहचान तक सीमित नहीं थे बल्कि युद्धक्षेत्र में निर्णय सहायता प्रणाली के रूप में काम करते हुए कमांडरों को एक तरह की डिजिटल युद्धक्षेत्र तस्वीर उपलब्ध कराते थे. सीमित संख्या में उपलब्ध सेंसरों से जुटाए गए डेटा को जोड़कर ये मॉडल दुश्मन बलों की गतिविधियों और उनके ठिकानों पर नज़र रखने में मदद करते थे जिससे स्थिति की बेहतर समझ और तेज़ फैसले संभव हो सके. बाद में अमेरिकी नेशनल जियोस्पेशियल-इंटेलिजेंस एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से बताया कि यूक्रेन में प्रोजेक्ट मेवेन के इस्तेमाल से ‘फाइंड, फ़िक्स, फ़िनिश’ यानी लक्ष्य खोजने से उसे नष्ट करने तक का समय घटकर दस मिनट से भी कम रह गया.
माना जाता है कि प्रोजेक्ट मेवेन ने 1 मई 2022 को रूस के रक्षा स्टाफ प्रमुख और राष्ट्रपति पुतिन के करीबी सैन्य सलाहकार जनरल वैलेरी गेरासिमोव को निशाना बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जनरल गेरासिमोव की एक रूसी सैन्य मुख्यालय यात्रा के दौरान उस स्थान पर यूक्रेनी तोपखाने से हमला किया गया, जिसमें अमेरिका से प्राप्त HIMARS प्रणाली के इस्तेमाल की खबरें आईं. इसी तरह, मारियिवका में रूसी बैरकों पर हुए हमलों और रूसी तेल रिफाइनरियों पर जारी यूक्रेनी हमलों में भी प्रोजेक्ट मेवेन से मिलने वाली लक्ष्य-निर्धारण सहायता के उपयोग की संभावना जताई जाती है. इन अभियानों में इस्तेमाल किए गए ड्रोन साधारण AI मॉडल से लैस थे जो सटीक निशाना साधने और दुश्मन की जैमिंग कोशिशों से बचने में मदद करते हैं.
आधुनिक युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की वास्तविक भूमिका, प्रोजेक्ट मेवेन जैसी पहलों से स्पष्ट होती है. आम धारणा के विपरीत, AI का मुख्य काम स्वचालित रूप से घातक हमले करना नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध सूचनाओं का विश्लेषण कर युद्धक्षेत्र की बेहतर समझ विकसित करना है. व्यवहार में, AI निर्णय प्रक्रिया को तेज़ और अधिक सटीक बनाकर सैन्य कमांडरों के लिए एक फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करता है.
आम धारणा के विपरीत, AI का मुख्य काम स्वचालित रूप से घातक हमले करना नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध सूचनाओं का विश्लेषण कर युद्धक्षेत्र की बेहतर समझ विकसित करना है.
सैन्य क्षेत्र में AI का सबसे बड़ा योगदान आधुनिक सेंसर नेटवर्क, ड्रोन निगरानी, साइबर खुफिया और अन्य स्रोतों से आने वाले विशाल डेटा को प्रोसेस और विश्लेषित करने की उसकी क्षमता है. AI सिस्टम स्वयं हमले का फैसला नहीं लेते बल्कि निर्णय सहायता प्रणालियों के रूप में काम करते हैं, जो कमांडरों को स्थिति की स्पष्ट तस्वीर, संभावित खतरों की पहचान और लक्ष्यों की प्राथमिकता तय करने में मदद करते हैं. प्रोजेक्ट मेवेन इसी मॉडल का उदाहरण है, जहाँ AI ड्रोन फुटेज और अन्य खुफिया सूचनाओं से संभावित लक्ष्यों की पहचान करता है, लेकिन अंतिम निर्णय मानवीय ऑपरेटर ही लेते हैं.
संक्षेप में, आधुनिक युद्ध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का परिवर्तनकारी प्रभाव मानव निर्णय-क्षमता को प्रतिस्थापित करने में नहीं बल्कि उसे अधिक सक्षम बनाने में निहित है. AI युद्धक्षेत्र से मिलने वाली सूचनाओं की गति, सटीकता और समझ को बेहतर बनाकर सैन्य निर्णयकर्ताओं को अधिक प्रभावी और सूचित फैसले लेने में मदद करता है. प्रोजेक्ट मेवेन के पहले निदेशक जैक शैनहन के शब्दों में, यह पारंपरिक हथियार प्रणालियों और अत्याधुनिक वाणिज्यिक तकनीकों का एक अनोखा मिश्रण है जिसमें वही पक्ष बढ़त हासिल करता है जो इन तकनीकों के संयोजन को नए, अलग और रचनात्मक तरीकों से इस्तेमाल करना सीख लेता है.
यह दृष्टिकोण युद्ध के बदलते स्वरूप को रेखांकित करता है, जहाँ सूचना की श्रेष्ठता एक महत्वपूर्ण रणनीतिक ताकत बनकर उभर रही है. उन्नत डेटा विश्लेषण और AI से संचालित प्रणालियाँ अब युद्धक्षेत्र में केवल सहायक उपकरण नहीं रहीं बल्कि रणनीतिक बढ़त का आधार बनती जा रही हैं. ऐसे में AI की भूमिका स्वचालित रूप से घातक कार्रवाई करने की नहीं बल्कि सूचनाओं का विश्लेषण कर उन्हें निर्णय-सहायक रूप में प्रस्तुत करने की है. यही कारण है कि आधुनिक सैन्य अभियानों में AI को मानव नियंत्रण और जवाबदेही के साथ, एक सक्षम सहायक के रूप में अपनाया जा रहा है, न कि मानव विवेक के विकल्प के रूप में.
The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Pranoy Jainendran is a Research Assistant with ORF’s Centre for Security, Strategy & Technology. His work examines how technology shapes State institutions, national and international affairs, ...
Read More +