Author : Arpan Tulsyan

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Published on May 08, 2026 Updated 3 Days ago

भारत ने कक्षा 3 से AI और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग पढ़ाने की शुरुआत की है ताकि बच्चे शुरुआती उम्र से ही भविष्य की डिजिटल दुनिया के लिए तैयार हो सकें. जानें कैसे यह कदम शिक्षा को तकनीक और सोचने की नई क्षमता से जोड़ने की दिशा में बड़ा बदलाव है.

कक्षा 3 से स्मार्ट सोच की एंट्री: जानें बड़ा बदलाव

अक्टूबर 2025 में भारत के शिक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग (AI & CT) को कक्षा 3 से स्कूल विषयों के रूप में शुरू किया जाएगा. इसका प्रभाव देश के सभी CBSE (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड), KVS (केंद्रीय विद्यालय) और NVS (नवोदय विद्यालय) स्कूलों पर पड़ेगा. इसके छह महीने बाद, अप्रैल 2026 में सीबीएसई ने NCF-SE (राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा–स्कूली शिक्षा), 2023 के अनुरूप एक संरचित पाठ्यक्रम लॉन्च किया. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे ‘भविष्य-उन्मुख शिक्षा की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम’ बताया, जो ‘स्कूल शिक्षा प्रणाली में बड़े पैमाने पर संरचित AI शिक्षा को औपचारिक रूप से शामिल करता है.’

इस पहल को परिवर्तनकारी बनाने वाले तीन प्रमुख बदलाव हैं-

पहला, यह भारत की स्कूल शिक्षा प्रणाली में बुनियादी सार्वभौमिक कौशलों की समझ को नए तरीके से परिभाषित करता है. अब आधारभूत कौशल केवल पढ़ने-लिखने और गणना तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इनमें तार्किक रूप से सोचना, पैटर्न पहचानना, समस्याओं को छोटे हिस्सों में विभाजित करना, डेटा का सावधानीपूर्वक उपयोग करना और तकनीक के साथ जिम्मेदारी से जुड़ना भी शामिल है.

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे ‘भविष्य-उन्मुख शिक्षा की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम’ बताया, जो ‘स्कूल शिक्षा प्रणाली में बड़े पैमाने पर संरचित AI शिक्षा को औपचारिक रूप से शामिल करता है.

दूसरा, यह पहले की उस शिक्षण पद्धति से अलग है जिसमें AI तैयारी को वैकल्पिक कौशल मॉड्यूल, कोडिंग या उच्च कक्षाओं में AI टूल्स के परिचय तक सीमित रखा जाता था. नए पाठ्यक्रम में कक्षा 6–8 तक भी AI केवल एक हिस्सा है-40 घंटे उन्नत कम्प्यूटेशनल थिंकिंग के लिए, 20 घंटे AI अवधारणाओं के लिए और 40 घंटे अंतर्विषयक परियोजनाओं के लिए निर्धारित किए गए हैं. इस डिजाइन की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘CT-first’ दृष्टिकोण है, जो AI तैयारी को केवल तकनीकी उपकरणों के उपयोग के रूप में नहीं बल्कि तर्कपूर्ण सोच की ऐसी आदत के रूप में देखता है जिसे बच्चे शुरुआती उम्र से विकसित कर सकते हैं.

तीसरा, शुरुआती कक्षाओं में कम्प्यूटेशनल थिंकिंग को अलग तकनीकी विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जाएगा. इसके बजाय इसे ऐसी सोच के रूप में देखा गया है जिसे विभिन्न विषयों के माध्यम से विकसित किया जा सकता है. कक्षा 3 से बच्चों में पहेलियों, दृश्य-आधारित तर्क, पैटर्न, विभाजन और चरणबद्ध समस्या-समाधान के माध्यम से इन क्षमताओं का विकास करने की अपेक्षा की गई है.

शिक्षा मंत्रालय और CBSE का यह कदम तेजी से बदलते वैश्विक नीतिगत परिदृश्य की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, जहाँ स्कूली शिक्षा वैश्विक AI दौड़ की तैयारी का एक महत्वपूर्ण आधार बनती जा रही है.

स्कूल से एआई रेस की शुरुआत

कई देश अब AI शिक्षा को आर्थिक प्रतिस्पर्धा के लिए एक रणनीतिक निवेश के रूप में देख रहे हैं और कम उम्र से ही AI-तैयार प्रतिभा विकसित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्था बना रहे हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की नौकरियों का भविष्य रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2030 तक 17 करोड़ नई नौकरियाँ पैदा होने का अनुमान है, जिनमें AI और बिग डेटा से जुड़े कौशल सबसे तेज़ी से बढ़ती क्षमताएँ होंगी. 1.4 अरब आबादी वाले भारत, जहाँ 15.5 प्रतिशत जनसंख्या 0–9 वर्ष आयु वर्ग की है, के लिए यह राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का प्रश्न बन जाता है.

AI प्रतिभा निर्माण अब केवल उच्च स्तर के कौशल प्रशिक्षण का विषय नहीं रह गया है. AI का शुरुआती परिचय भविष्य के कौशल, रोजगार, नवाचार और उत्पादकता का माध्यम बनता जा रहा है, जो अंततः किसी देश की आर्थिक और तकनीकी नेतृत्व क्षमता को मजबूत करता है.

चीन में पिछले वर्ष शिक्षा मंत्रालय ने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में AI शिक्षा के लिए दो विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए. इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने कार्यान्वयन योजनाएँ तैयार कीं. उदाहरण के लिए, बीजिंग में स्कूलों के लिए प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर हर वर्ष कम-से-कम आठ घंटे की AI शिक्षा देना अनिवार्य किया गया है.

2025–2026 शैक्षणिक सत्र से संयुक्त अरब अमीरात ने किंडरगार्टन से लेकर ग्रेड 12 तक AI को एक औपचारिक विषय के रूप में शामिल कर लिया है. वहीं सऊदी अरब ने आर्थिक विविधीकरण और राष्ट्रीय विकास के उद्देश्य से ‘सऊदी विजन 2030’ के अनुरूप 60 लाख छात्रों को लक्षित करते हुए देशव्यापी AI पाठ्यक्रम शुरू किया है.

सिंगापुर में राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम के तहत प्राथमिक छात्रों को कम्प्यूटेशनल थिंकिंग, कोडिंग, साइबर वेलनेस, उभरती तकनीकों और ‘मनोरंजन के लिए कोड‘ कार्यक्रम के माध्यम से नियंत्रित रूप से AI टूल्स से परिचित कराया जाता है. 2025 से ‘मनोरंजन के लिए एआई‘ मॉड्यूल के जरिए प्राथमिक छात्रों को जनरेटिव AI और स्मार्ट रोबोट्स पर अतिरिक्त 5–10 घंटे की शिक्षा दी जाएगी. उच्च प्राथमिक स्तर पर छात्रों को कम्प्यूटेशनल थिंकिंग, कोडिंग और AI सहित उभरती तकनीकों पर 10 घंटे की शिक्षा मिलती है.

संयुक्त राज्य अमेरिका में 2025 के एक कार्यकारी आदेश में AI शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभिक परिचय, शिक्षक प्रशिक्षण और कार्यबल की आवश्यकताओं के साथ तालमेल पर जोर दिया गया है. AI प्रतिभा निर्माण अब केवल उच्च स्तर के कौशल प्रशिक्षण का विषय नहीं रह गया है. AI का शुरुआती परिचय भविष्य के कौशल, रोजगार, नवाचार और उत्पादकता का माध्यम बनता जा रहा है, जो अंततः किसी देश की आर्थिक और तकनीकी नेतृत्व क्षमता को मजबूत करता है.

भारत कहाँ पिछड़ने का जोखिम उठा रहा है

भारत का दृष्टिकोण केंद्रीकृत पाठ्यक्रम-आधारित मॉडल और विकेंद्रीकृत पारिस्थितिकी तंत्र आधारित मॉडल के बीच स्थित है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका विशाल पैमाना और शुरुआती तकनीकी विशेषज्ञता के बजाय आधारभूत सोच पर जोर देना है. जैसे-जैसे प्राथमिक कक्षाओं के छात्र चैटबॉट, इमेज जनरेटर और कोडिंग टूल्स जैसे AI साधनों से अधिक जुड़ रहे हैं, कम्प्यूटेशनल थिंकिंग (CT) उन्हें इन प्रणालियों को समझने की बुनियादी क्षमता प्रदान करेगी. हालांकि, भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मौजूद तीन प्रमुख संदर्भगत कमियाँ परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं.

पहला, CBSE का फोकस न्यूनतम अवसंरचना सुनिश्चित करता है, क्योंकि संबद्धता नियमों के तहत कंप्यूटर लैब और इंटरनेट कनेक्टिविटी आवश्यक हैं. लेकिन न्यूनतम अवसंरचना का अर्थ सार्थक पहुँच नहीं है. स्कूलों में कार्यशील उपकरणों, इंटरनेट बैंडविड्थ, शिक्षक तैयारी, लैब समय, रखरखाव और रोज़मर्रा की शिक्षा में तकनीक के उपयोग की क्षमता में भारी अंतर है.

पाठ्यक्रम का बोझ, भाषाई विविधता और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ जैसे व्यापक प्रणालीगत मुद्दे भी यह तय करेंगे कि छात्र AI से कैसे जुड़ते हैं. यदि स्थानीय भाषाओं में संसाधन, आयु-उपयुक्त डेटा साक्षरता और नैतिकता व सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो AI शिक्षा बच्चों द्वारा AI टूल्स के उपयोग से जुड़े जोखिमों को प्रभावी ढंग से संबोधित नहीं कर पाएगी.

इसके अलावा, इस प्रकार के पाठ्यक्रम सुधार की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि शिक्षक इसे कैसे समझते और पढ़ाते हैं. यद्यपि CBSE ने CT और AI को शिक्षक प्रशिक्षण की प्राथमिकता बताया है और शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से क्षमता निर्माण की बात कही है. भारत ने जल्दी शुरुआत तो की है, लेकिन अभी तक अपनी मंशा को व्यवहार में पूरी तरह नहीं बदल पाया है.

दूसरा, AI और CT अभी भी मुख्य मूल्यांकन प्रणाली के केंद्र में नहीं हैं. चूँकि इन्हें उच्च-दांव वाली परीक्षाओं में लगातार शामिल नहीं किया गया है, यह असंतुलन AI और CT के लिए शिक्षण समय, ध्यान और जवाबदेही को कम कर सकता है, जिससे कार्यान्वयन कमजोर पड़ सकता है.

इसलिए, सीबीएसई द्वारा ‘सोचने की प्रक्रिया’ को महत्व देने पर जोर महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए पाठ्यपुस्तकों, शिक्षक मार्गदर्शन और मूल्यांकन प्रणालियों के बीच समन्वय आवश्यक होगा. OECD और यूरोपीय आयोग के संयुक्त एआई साक्षरता फ्रेमवर्क ने भी स्पष्ट और मापनीय मूल्यांकन मानकों के महत्व पर बल दिया है, ताकि AI शिक्षा से वास्तविक सीखने के परिणाम प्राप्त हो सकें. अंततः, पाठ्यक्रम का बोझ, भाषाई विविधता और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ जैसे व्यापक प्रणालीगत मुद्दे भी यह तय करेंगे कि छात्र AI से कैसे जुड़ते हैं. यदि स्थानीय भाषाओं में संसाधन, आयु-उपयुक्त डेटा साक्षरता और नैतिकता व सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो AI शिक्षा बच्चों द्वारा AI टूल्स के उपयोग से जुड़े जोखिमों को प्रभावी ढंग से संबोधित नहीं कर पाएगी.

इस प्रकार, वैश्विक तुलना में भारत ने जल्दी शुरुआत की है, लेकिन अभी तक वह अपनी नीतिगत मंशा को व्यावहारिक रूप में पूरी तरह लागू नहीं कर पाया है. बड़े स्तर पर संकेत दिए गए हैं, पर सहायक व्यवस्था अब भी असमान बनी हुई है.

नीतिगत सुझाव

इस पहल का दीर्घकालिक महत्व AI प्रतिभा निर्माण में इसके योगदान की क्षमता में निहित है. प्रारंभिक स्तर पर CT, डिजिटल साक्षरता, डेटा साक्षरता और AI नैतिकता का परिचय विभिन्न क्षेत्रों में विश्लेषणात्मक क्षमता को मजबूत कर सकता है और उन्नत AI कौशलों के लिए व्यापक आधार तैयार कर सकता है.

अब अगली चुनौती इसे ऐसी कार्यान्वयन व्यवस्था में बदलने की है जो विभिन्न कक्षाओं, स्कूल प्रणालियों और क्षेत्रों में निरंतर सीखने को संभव बना सके. यदि यह सफल रहा, तो कक्षा 3 से AI शिक्षा की शुरुआत भविष्य में व्यापक AI शिक्षा मार्ग का आधार बन सकती है.

हालांकि वर्तमान में यह अभी भी एक आकांक्षा भर है और परिस्थितिगत सीमाओं के कारण इसके केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाने का खतरा है. बड़े स्तर पर प्रणालीगत परिवर्तन के लिए इस पहल को राष्ट्रीय AI शिक्षा ढाँचे के पहले चरण के रूप में देखा जाना चाहिए, जो चार प्रमुख प्राथमिकताओं पर आधारित हो.

पहला, शिक्षकों की क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी जाए. इसके लिए निरंतर और व्यवहार-आधारित प्रशिक्षण आवश्यक है, जिससे यह दिखाया जा सके कि CT को विभिन्न विषयों और भाषाओं में रोज़मर्रा की कक्षा गतिविधियों के माध्यम से कैसे पढ़ाया जा सकता है. दूसरा, स्कूलों में AI के उपयोग के लिए बाल-केंद्रित शासन ढाँचा विकसित करने की आवश्यकता है,जो डिजिटल वातावरण में बच्चों के अधिकारों से संबंधित वैश्विक सिद्धांतों तथा DPDPA 2023 के अनुरूप हों. 

तीसरा, सार्वजनिक, कम लागत वाले और बहुभाषी शिक्षण संसाधनों में निवेश किया जाए, ताकि महंगे निजी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम हो और AI साक्षरता केवल संसाधन-संपन्न स्कूलों तक सीमित न रहे. चौथा, मूल्यांकन प्रणाली को तर्क और समस्या-समाधान आधारित बनाया जाए, ताकि छात्रों का आकलन रटने के बजाय व्याख्या, निर्णय क्षमता और विश्लेषणात्मक सोच के आधार पर हो.

भारत ने सही समय पर सही नीति लागू की है. अब अगली चुनौती इसे ऐसी कार्यान्वयन व्यवस्था में बदलने की है जो विभिन्न कक्षाओं, स्कूल प्रणालियों और क्षेत्रों में निरंतर सीखने को संभव बना सके. यदि यह सफल रहा, तो कक्षा 3 से AI शिक्षा की शुरुआत भविष्य में व्यापक AI शिक्षा मार्ग का आधार बन सकती है.


अर्पण तुलस्यान ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फेलो हैं.
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