Author : Soma Sarkar

Expert Speak Urban Futures
Published on Nov 26, 2025 Updated 19 Hours ago

इनोवेशन यानी नवाचार एक शक्तिशाली ताक़त है जो तरक्क़ी लाती है पर साथ में रुकावट भी पैदा करती है. इसी विरोधाभास में इसकी ताक़त छिपी है क्योंकि इसके फ़ायदे इसके नुक़सान से जुड़े होते हैं.

2035 का भारत : क्या भविष्य के शहर खुद फ़ैसले लेंगे?

इनोवेशन यानी नवाचार एक शक्तिशाली ताक़त है जो तरक्क़ी लाती है पर साथ में रुकावट भी पैदा करती है. इसी विरोधाभास में इसकी ताक़त छिपी है क्योंकि इसके फ़ायदे इसके नुक़सान से जुड़े होते हैं. अल्फ्रेड नोबेल की याद में आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में दिया जाने वाला स्वेरिग्स रिक्सबैंक पुरस्कार इस साल जिन तीन लोगों को मिला है, उन्होंने एक बार फिर हमारा ध्यान नवाचार और लंबी अवधि वाले विकास से जुड़े सवालों की ओर खींचा है. पुरस्कार विजेताओं का मानना है कि जोसेफ शुम्पीटर की रचनात्मक विनाश की अवधारणा की तरह, नवाचार विकास को गति ज़रूर देता है लेकिन मौजूदा व्यवस्थाओं को नुक़सान भी पहुंचाता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)  के संदर्भ में इसे देखें तो हम क्षेत्रीय बदलाव और प्रतिस्पर्धा में तेज़ी ज़रूर देख रहे हैं पर दो प्रमुख चुनौतियां भी उभर रही हैं- पहली, एआई कई नियमित कामों को खुद-ब-खुद कर सकती है जिससे रोज़गार की सुरक्षा और जीवन-यापन से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं और दूसरी, यह इंसानों की क्षमता बढ़ा सकती है, जिससे निर्माण में तेज़ी लाने, काम स्मार्ट तरीके से करने और नए अवसर बनाने में मदद मिल सकती है.

  • नवाचार तरक्की भी लाता है और रुकावटें भी पैदा करता है.
  • शहरी नियोजन में AI कई नई संभावनाएँ खोलता है.
  • मुख्य सवाल—AI क्षमता बढ़ाए, लेकिन लोकतांत्रिक शासन भी मज़बूत करे.

शहरी प्रशासन के लिहाज़ से व्यवस्था बनाने और नियोजन के कामों में एआई को शामिल करने से संभावनाओं के कई दरवाज़े खुलते हैं. मौजूदा तकनीकों और स्मार्ट सिटी से जुड़ी गतिविधियों से शहरी व्यवस्थाओं की जटिलता से जुड़ी जानकारियां व डेटा बड़ी मात्रा में पैदा होती हैं. इनका विश्लेषण करने, डेटा आधारित फ़ैसले लेने और पूर्वानुमान मॉडल बनाने में AI की मदद ली जा सकती है. हालांकि, सिर्फ़ इसी तकनीकी बदलाव से आर्थिक विकास नहीं हो सकता. तरक्क़ी पाने के लिए इसे सहायक संस्थानों में शामिल करना होगा. इतना ही नहीं, एआई के इस्तेमाल से स्वचालन और कुशलता में मदद मिलेगी, लेकिन सेवा वितरण से जुड़े पूर्वाग्रहों, निजता, कानूनी व नैतिक मुद्दों जैसी नियामक चुनौतियां भी सामने आएंगी, जिन पर विचार करना ज़रूरी होगा.

“विश्व में शहरी जल प्रबंधन करने वाली कई संस्थाएं मांग का अनुमान लगाने और रिसाव की पहचान करने के लिए मशीन लर्निंग (ML) का उपयोग कर रही हैं.”

 

इसीलिए, हमारे सामने सवाल यही है कि शहर कैसे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि एआई न केवल उनकी क्षमता बढ़ाए, बल्कि लोकतांत्रिक शासन को भी बढ़ावे दे. इतना ही नहीं, यह पारदर्शिता को आगे बढ़ाने और जनता का भरोसा कमाने में भी मददगार बने. यह समझना होगा कि नागरिकों का जुड़ाव और विश्वास तभी बनता है, जब शहरों द्वारा जुटाए गए डेटा की प्रकृति व उसके उद्देश्यों के बारे में लोगों को पारदर्शिता के साथ सही-सही बताया जाए. इससे नागरिक और डेटा के बीच एक मज़बूत संबंध बनाने में मदद मिलती है, जिस कारण डेटा एक निगरानी उपकरण के बजाय नागरिक संपत्ति बन जाता है.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए, शहरों में AI के शुरुआती उपयोग के कुछ क्षेत्र इस प्रकार हैं-

 

शहरी जल व्यवस्था में एआई

विश्व में शहरी जल प्रबंधन करने वाली कई संस्थाएं मांग का अनुमान लगाने और रिसाव की पहचान करने के लिए मशीन लर्निंग (ML) का उपयोग कर रही हैं. मगर स्मार्ट सेंसर तकनीक, ड्रोन व उपग्रह से प्राप्त चित्र और SCADA से मिले समय-शृंखला डेटा का उपयोग करके एआई डेटा-आधारित व्यवस्था को बेहतर बना सकती है. वह न सिर्फ़ प्रभाव की पड़ताल करने में, बल्कि योजना बनाने व निर्णय लेने की गति भी बढ़ा सकती है. शहरी जल प्रणालियां काफ़ी जटिल होने लगी हैं, क्योंकि शहरों तक पानी लाने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता है. इसके बाद उसे साफ़ किया जाता है और फिर पाइपों के माध्यम से शहरवासियों के बीच बांटा जाता है. जैसे- मुंबई में 100 से 175 किलोमीटर दूर से पानी आता है. इसमें रिसाव और गैर-राजस्व जल (आपूर्ति किए गए पानी की मात्रा और उपभोक्ताओं को बिल किए गए पानी की मात्रा में अंतर), यानी NRW चिंता का एक बड़ा मसला है. इसमें सेंसर लगी एआई निगरानी प्रणालियां मददगार साबित हो सकती हैं.

“ट्रैफिक को सुगम बनाने और सड़कों पर भीड़भाड़ का प्रबंधन करने में एआई से चलने वाले यातायात नियंत्रण तंत्रों (ATCS) से मदद मिल सकती है.”

 

एशियाई विकास बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, एशिया के शहरों में औसतन 35 प्रतिशत गैर-राजस्व जल है और यह आगे बढ़ भी सकता है. एआई-संचालित जल रिसाव पहचान प्रणाली में आवाज से रिसाव का पता लगाया जा सकता है. इसमें मोबाइल एप के माध्यम से एक मॉडल तैयार किया जाता है, जो रिसाव के प्रबंधन में मददगार होता है. यह ऑपरेटर को बताता है कि पानी का पाइप कहां से रिस रहा है. उदाहरण के लिए, एम्स्टर्डम ने पानी के मीटर से जुड़ी एक स्मार्ट परियोजना लागू की है, जो पानी के असामान्य उपभोग, रिसाव व अन्य समस्याओं की पहचान करने के लिए एआई एल्गोरिदम का उपयोग करती है. इसी प्रकार, शहरों में जल गुणवत्ता का पता लगाने और निगरानी करने के लिए एआई का उपयोग किया जा सकता है. स्पेक्ट्रोस्कोपिक सेंसर सिस्टम के साथ एआई को जोड़ देने से पानी में मौजूद गंदगी और प्रदूषण का पता लगाने में मदद मिल सकती है, जिससे जल गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों को बेहतर बनाया जा सकता है. यह लोगों तक साफ़ पानी पहुंचाने और शहरी स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण साबित होगा.

 

आवागमन और यातायात प्रबंधन में एआई

ट्रैफिक को सुगम बनाने और सड़कों पर भीड़भाड़ का प्रबंधन करने में एआई से चलने वाले यातायात नियंत्रण तंत्रों (ATCS) से मदद मिल सकती है. ये सेंसर, कैमरों और अन्य स्रोतों से मिलने वाले वास्तविक समय वाले डेटा का उपयोग करके यातायात के दबाव व उसकी गति पर नज़र रखते हैं और बदलती यातायात परिस्थितियों के अनुसार ट्रैफिक सिग्नल का समय तय करते हैं. बेंगलुरु में पहले से ही 41 जगहों पर ATCS का उपयोग हो रहा है, जिससे मैन्युअल तरीके से यातायात प्रबंधन की ज़रूरत कम हो गई है. एआई खुद-ब-खुद नंबर प्लेट की पहचान करने (ANPR) और लाल बत्ती उल्लंघन करने के साथ-साथ अन्य नियमों का तोड़ने वालों की पहचान करने लगी है, जैसे- बिना हेलमेट के गाड़ी चलाने वाले, दोपहिया गाड़ी पर तीन लोगों के सवार होने, सीट बेल्ट न बांधने जैसी गलतियां यह पकड़ने लगी है. दिल्ली परिवहन अवसंरचना विकास निगम भी 19 जगहों पर इसे लागू करने जा रहा है, जिसमें यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले को पकड़ने के लिए एआई लगे कैमरों का इस्तेमाल किया जाएगा. इस मॉडल को देश के अन्य शहरों में भी लागू किया जा सकता है.

“एआई कचरा प्रबंधन में क्रांति ला सकती है.”



स्मार्ट ऊर्जा तंत्र में एआई

स्मार्ट ग्रिड और मांग का पूर्वानुमान लगाने वाले सिस्टम में एआई का उपयोग करने से ऊर्जा क्षेत्र को बदला जा सकता है. स्मार्ट ग्रिड वास्तविक समय में आपूर्ति व मांग को संतुलित करने और खराबी या कमी का पता लगाने के लिए एआई का इस्तेमाल करती है. इससे बिजली के वितरण और खपत में सुधार होता है. इसमें बिजली की बर्बादी भी कम होती है और पूरी व्यवस्था में सुधार होता है. जैसे, ग्रिड4ईयू एक एआई-आधारित स्मार्ट ग्रिड परियोजना है, जो ग्रिड के संचालन में मदद करती है. यह पूरे यूरोप में अक्षय ऊर्जा के स्रोतों को भी आपस में जोड़ती है.

 

शहरी कचरा प्रबंधन में एआई

एआई कचरा प्रबंधन में क्रांति ला सकती है. यह अपशिष्ट को जमा करने, उसके प्रसंस्करण और वर्गीकरण में प्रभावी भूमिका निभा सकती है. एआई की मदद से तैयार इंटेलिजेंट कचरापेटी, कचरा बांटने वाले रोबोट, पूर्वानुमान लगाने वाले मॉडल और पहचान के वायरलेस तंत्र न सिर्फ़ कचरा-डिब्बे की निगरानी करने, बल्कि कचरा जमा करने की ज़रूरतों का पूर्वानुमान लगाने और अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं को बेहतर बनाने में भी मदद कर सकते हैं. एआई एल्गोरिदम और वास्तविक समय के ट्रैफिक डेटा का मिलान करने से कचरा जमा करने वाली गाड़ियों के लिए सबसे छोटे रास्ते का पता चल सकता है, जिससे ईंधन की खपत कम हो सकती है, कार्बन उत्सर्जन कम हो सकता है और समय की बचत हो सकती है. भोपाल में ऐसा हो भी रहा है, जहां नगर निगम ने कचरा जमा करने वाले ट्रकों पर जीपीएस और सेंसर का उपयोग करके ऐसी एआई आधारित अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली बनाई है, जिससे रास्ते की जानकारी, कचरे का लोड और ईंधन की खपत का पता चलने लगा है. इस व्यवस्था ने शहर में कचरा जमा करने की क्षमता 30 प्रतिशत तक बढ़ा दी है. पुणे में भी, एआई आधारित अपशिष्ट छंटाई प्रणाली से प्लास्टिक, धातु और जैविक कचरे की 95 प्रतिशत तक सफल छंटाई हो जाती है. इसके अलावा, एआई वास्तविक समय में आंकड़ों और बदलती परिस्थितियों के आधार पर कचरा जमा करने की योजना बनाने में भी मदद कर सकती है.

“भोपाल में ऐसा हो भी रहा है, जहां नगर निगम ने कचरा जमा करने वाले ट्रकों पर जीपीएस और सेंसर का उपयोग करके ऐसी एआई आधारित अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली बनाई है, जिससे रास्ते की जानकारी, कचरे का लोड और ईंधन की खपत का पता चलने लगा है. इस व्यवस्था ने शहर में कचरा जमा करने की क्षमता 30 प्रतिशत तक बढ़ा दी है.”

शहरों में नागरिक सहभागिता के लिए एआई

तकनीकी प्रगति और विकास संबंधी योजनाओं को निवासियों की ज़रूरतों के मुताबिक बनाने और लोगों में समावेशिता, विश्वास व पारदर्शिता बढ़ाने के लिए जनता की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है. समुदायों और प्रशासनों के बीच की खाई को पाटने के लिए एआई का लाभ उठाया जा सकता है, जिससे शहरी शासन व्यवस्था अधिक सहभागी व न्यायसंगत बन सकती है. उदाहरण के लिए, चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी नागरिकों से जुड़ाव बढ़ाने और उन्हें केंद्रशासित शासन व्यवस्था व नगर निगम द्वारा दी जाने वाली सेवाओं की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए बीरबल नामक एक एआई चैटबॉट इस्तेमाल कर रहा है. यह नागरिक सेवाओं, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं, ऑनलाइन भुगतान सेवाओं और अन्य सेवाओं से जुड़ी शिकायतों को दूर करने और सूचनाएं उपलब्ध कराने के लिए वन स्टॉप प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है. इसी प्रकार, बार्सिलोना का एआई-संचालित एप decidim.barcelona ऐसा डिजिटल और लोकतांत्रिक प्लेटफॉर्म है, जो नागरिकों की भागीदारी बढ़ाता है. इसके माध्यम से सहभागी व्यवस्था बनाने, उसे बेहतर करने और प्रस्तावों के लिए नागरिकों से सुझाव लिए जाते हैं. इन प्रस्तावों पर बहस होती है, और कुछ मामलों में उन पर कानून भी बनाया जाता है.

 

एआई की असली चुनौती

शहरी शासन-व्यवस्था में एआई को लेकर निश्चय ही कई संभावनाएं हैं लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि एआई प्रणालियां तभी भरोसेमंद होती हैं, जब वे डेटा विश्वसनीय हों, जिन पर उनको प्रशिक्षित किया गया है. इसीलिए, नगरपालिका से जुड़े आंकड़ों की गड़बड़ियों या कमियों को लेकर हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि उनसे गुमराह करने वाले नतीजे मिल सकते हैं. दूसरा, एआई शहरी प्रशासन में ज़रूर मदद कर सकती है, लेकिन समानता, पहुंच, हितधारकों के हितों की रक्षा व जवाबदेही जैसे गंभीर मुद्दों का समाधान इंसानों के फ़ैसलों पर ही टिके होते हैं. और तीसरा, शहरी समस्याओं का एआई से समाधान ढूंढ़ने के दौरान हमें जल संसाधनों का भी ख़्याल रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि इसमें पानी की इतनी ही खपत हो कि यह लोगों व धरती के लिए नुक़सानदेह न बने.

भारतीय शहरों में आवागमन, सुविधाएं, सुरक्षा, आवास व अन्य नागरिक सेवाओं को बेहतर बनाने में एआई एक शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन इसकी क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए सिर्फ़ तकनीकी उपकरणों की ही ज़रूरत नहीं है. इसके लिए मानकों, संस्थागत क्षमताओं और नैतिक सुरक्षा उपायों के साथ एक ऐसी योजना भी बनानी होगी, जिसमें नागरिकों की सहभागिता, उनके अधिकारों की रक्षा और सावधानीपूर्वक तरक्क़ी की सोच ईमानदारी से शामिल हो.


(सोमा सरकार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अर्बन स्टडीज प्रोग्राम की एसोसिएट फेलो हैं)

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