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AI को-पायलट अब सिर्फ मशीन नहीं, दफ्तरों का नया ‘ईमानदार सहायक’ बनकर उभर रहा है. यह ऐसा डिजिटल साथी है जो नियम समझाए, फॉर्म भरने में मदद करे, फाइल आगे बढ़ाए और फैसलों में डेटा-आधारित सलाह दे. न लाइन में लगना, न चक्कर काटना—AI को-पायलट काम को तेज़, सरल और पारदर्शी बनाने की दिशा में सरकारों का नया हथियार साबित हो सकता है.
तकनीक के साथ हमारा रिश्ता जितनी तेज़ी से बदल रहा है, उसका नया प्रतीक है एआई को-पायलट- एक ऐसा स्मार्ट सहायक, जो इंसानों की तरह बातचीत कर सकता है. यह केवल जवाब देने वाला चैटबॉट नहीं बल्कि ऐसा डिजिटल साथी है जो रास्ता दिखाता है, काम ऑटोमेट करता है और डेटा के आधार पर बेहतर फैसले लेने में मदद करता है.
AI को-पायलट दस्तावेज़ बनाने, कंटेंट तैयार करने, आंकड़ों का विश्लेषण करने और जटिल प्रक्रियाओं को आसान बनाने में हाथ बँटाता है. अगर इसे सरकारी कामकाज में शामिल किया जाए तो यह नियम समझाने, फॉर्म भरने में मदद करने और कई प्रशासनिक प्रक्रियाओं को खुद संचालित करने का साधन बन सकता है. इससे सरकारी सेवाएँ न केवल तेज़ और सरल होंगी बल्कि ज़्यादा लोगों तक आसानी से पहुँच पाएंगी.
नागरिकों के लिहाज़ से, यह आवेदन करने, शिकायतों को दूर करने और जनहितकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में लोगों की मदद कर सकता है. सरकारी इंटरफेस में एआई को-पायलट को शामिल करके सरकारें यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि जनहितकारी योजनाओं का लाभ तेज़, निष्पक्ष और अधिक पारदर्शी रूप से मिले. डिजिटल इंडिया और इंडियाएआई मिशन जैसे अभियानों से भारत का डिजिटल बुनियादी ढांचा सुधर रहा है. यह एआई को-पायलट के लिए उपजाऊ ज़मीन का काम करेगा. सरकारी सेवाओं में एआई को-पायलट को शामिल करना नागरिक-केंद्रित शासन की दिशा में अगली बड़ी छलांग हो सकती है जिससे नौकरशाही में टकराव कम होगा और लोक प्रशासन की दक्षता, सहभागिता और विश्वास में सुधार होगा.
“भारत में पहली बार सरकार-समर्थित एआई को-पायलट उत्तर प्रदेश में शुरू किया गया है, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आईआईटी, कानपुर में आयोजित डीपटेक इंडिया 2025 सम्मेलन में भारत का पहला एआई को-पायलट लॉन्च किया.”
भारत में एआई को-पायलट की हक़ीक़त और इससे जुड़ी कानूनी व्यवस्था
भारत विभिन्न क्षेत्रों में एआई को-पायलट को अपना रहा है. यह निष्क्रिय चैटबॉट्स से सक्रिय सहायकों की ओर बढ़ने जैसा है. भारत में केंद्र और राज्य, दोनों सरकारें इस दिशा में काम कर रही हैं, जिससे उनकी सेवाएं बेहतर ढंग से लोगों तक पहुंच सकती हैं और उनकी क्षमताएं भी बढ़ सकती हैं. भारत में पहली बार सरकार-समर्थित एआई को-पायलट उत्तर प्रदेश में शुरू किया गया है, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आईआईटी, कानपुर में आयोजित डीपटेक इंडिया 2025 सम्मेलन में भारत का पहला एआई को-पायलट लॉन्च किया. एक अन्य प्रमुख उदाहरण कर्नाटक का ‘शिक्षा’ है, जिसे माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च इंडिया ने VeLLM परियोजना के तहत विकसित किया है और 30 स्कूलों में इसका परीक्षण किया गया है. माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर ओपनएआई पर आधारित यह को-पायलट स्थानीय पाठ्यक्रम के अनुसार कई मॉडलों वाली पाठ योजनाएं तैयार करने में शिक्षकों की मदद करता है, जिससे तैयारी करने में उनका लगने वाला वक़्त बचता है. इसकी सफलता बताती है कि सरकारी शिक्षा की क्षमता और पाठ्य सामग्रियों की गुणवत्ता सुधारने में यह काफ़ी मददगार है. इसी तरह, इंडियाएआई एप्लीकेशन डेवलपमेंट इनिशिएटिव के तहत, ‘कृषि सहायक’ और ‘किसान को-पायलट’ जैसे वर्चुअल सहायक छोटे किसानों को खेती-बाड़ी से जुड़ी सलाहें कई भाषाओं में उपलब्ध करा रहे हैं.
भारत की डिजिटल नीति पर जिस तरह से ध्यान दिया जा रहा है, उससे एआई को-पायलट मज़बूती से उभर रहा है. नीति आयोग की राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता रणनीति, 2018 एआई के इस्तेमाल के लिए बुनियाद तैयार करती है. यह नवाचार, नैतिकता, निष्पक्षता और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाने पर ज़ोर देती है. इसमें पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां एआई-संचालित विकास की ज़रूरत समझी गई है. ये क्षेत्र हैं- स्वास्थ्य सेवा, कृषि, शिक्षा, स्मार्ट शहर और ‘मोबिलिटी’, यानी लोगों का बेरोकटोक एक से दूसरी जगह आना-जाना. एआई को-पायलट को लेकर भारत में चल रहे प्रयास इन्हीं ज़रूरतों व क्षेत्रों के अनुसार होते दिख रहे हैं, जो विकास के कामों और सरकारी सेवाओं के बंटवारे व सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बेहतर बनाने में उन्नत तकनीक के इस्तेमाल के प्रति प्रतिबद्धता दिखाता है.
“सिंगापुर का ‘पेयर’ सरकारी अधिकारियों का एआई सहायक है. यह 100 से ज़्यादा विभागों के 11,000 से अधिक सरकारी अधिकारियों को रिसर्च के कामों में, उसे तैयार करने में और संचार में मदद करता है.”
दुनिया भर में, सरकारें आम लोगों से अपने संबंध मज़बूत बनाने, नियमों के पालन को व्यवस्थित करने और सरकारी सेवाओं के बंटवारे में सुधार लाने के लिए एआई को-पायलट तेज़ी से अपना रही हैं. ‘ब्यूरोक्रेट’ की शुरुआत करके यूरोपीय देश एस्टोनिया इस मामले में अगुवा बन गया है. ‘ब्यूरोक्रेट’ 18 संगठनों में फैले एआई सहायकों का एक अंदरूनी नेटवर्क है, जो नागरिकों को संवाद करने वाले एक ही इंटरफेस से कई सरकारी सेवाओं तक पहुंचने की सुविधा देता है. इसमें अब संदर्भ (जैसे पिछली बातचीत या व्यवहार) के अनुसार जवाब देने के लिए लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) और रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जेनरेशन (RAG) को जोड़ने की दिशा में काम हो रहा है, जिससे न केवल सरकारी क्षेत्र में, बल्कि सीमा-पार भी बेरोकटोक संवाद हो सकेगा.
“सबसे बड़ी चिंता डेटा की निजता और उसकी सुरक्षा है.”
एशिया में भी इस तरह के बदलाव हो रहे हैं. सिंगापुर का ‘पेयर’ सरकारी अधिकारियों का एआई सहायक है. यह 100 से ज़्यादा विभागों के 11,000 से अधिक सरकारी अधिकारियों को रिसर्च के कामों में, उसे तैयार करने में और संचार में मदद करता है. इससे प्रशासन के कामकाज में सुधार होता है. संयुक्त अरब अमीरात ने भी ‘TAMM’ नामक प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जो अबू धाबी की 950 से अधिक सरकारी सेवाओं के लिए एक ही एआई-संचालित एप उपलब्ध करता है, जिससे लोगों को कामकाज में सहूलियत मिलती है. चीन में भी ‘शेन जियाओ I’ और ‘गुआंगझोउ एआई असिस्टेंट’ जैसे को-पायलट कारोबार और नागरिक सेवाओं में मदद कर रहे हैं. वे व्यवसाय के रजिस्ट्रेशन के कामों और सरकारी सेवाओं को स्वचालित बना रहे हैं, जिससे उनकी स्वीकृति में लगने वाला समय काफ़ी कम हो रहा है और डिजिटल शासन अधिक व्यापक बन रहा है.
यह सही है कि एआई को-पायलट सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की पूरी क्षमता रखते हैं, फिर भी भारत में इनको बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले कुछ चुनौतियों का समाधान निकालना बेहतर होगा.
निश्चय ही, भारत का डिजिटल और नीतिगत माहौल एआई को-पायलटों के लिए उपजाऊ ज़मीन जैसा है, फिर भी इनको ज़िम्मेदारीपूर्वक और प्रभावी रूप से अपनाने के लिए कुछ समस्याओं का समाधान ज़रूरी है. सबसे बड़ी चिंता डेटा की निजता और उसकी सुरक्षा है. शासन के काम में यदि एआई को-पायलट का इस्तेमाल होता है, तो नागरिकों और कारोबारियों से जुड़ी ‘संवेदनशील’ व्यक्तिगत और आर्थिक जानकारियां भी यह प्रसंस्कृत या विश्लेषित करेगा. ऐसे में, पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना, इससे जानकारियों के दुरुपयोग, अनधिकृत पहुंच और निगरानी का ख़तरा बढ़ सकता है. डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 डेटा फिड्युशरीज़ पर, यानी डेटा का इस्तेमाल करने वाले लोगों या तंत्रों पर व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा का दायित्व डालता है और एक मज़बूत कानूनी ढांचा बनाता है, फिर भी निजता को संरक्षित करने वाले सैंडबॉक्स की, पहचान संबंधी विवरण से अलग प्रशिक्षण डेटासेट की और एआई-संचालित इंटरफेस के लिए एक स्पष्ट सहमति तंत्र की ज़रूरत है. इसके अलावा, भारत में मौजूद डिजिटल विभाजन को दूर करने और सभी तक डिजिटल पहुंच सुनिश्चित करने के लिए, सेवा-केंद्रों में ‘भाषिनी’ जैसे एआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से ध्वनि-आधारित, विभिन्न भाषाओं वाले एआई को-पायलट इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इससे एआई समाधान व्यापक हो सकेगा और अधिक से अधिक भारतीय नागरिक उसे अपना सकेंगे. इससे भारत में डिजिटल विभाजन कम हो सकेगा.
एक गंभीर चुनौती एल्गोरिदम संबंधी पूर्वाग्रह और निष्पक्षता भी है. यदि एआई को-पायलटों को असंतुलित या गैर-प्रतिनिधि डेटासेट पर प्रशिक्षित किया जाता है, तो वे भाषायी, लैंगिक या क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों को बढ़ावा दे सकते हैं. इससे हाशिये पर पड़े उपयोगकर्ताओं को नुक़सान हो सकता है. इस असमानता को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी है कि सभी सरकार-प्रायोजित को-पायलटों में निष्पक्षता, ऑडिट, एल्गोरिदम संबंधी पारदर्शिता और समझने योग्य ढांचा बनाना जाए. सभी के लिए इसे सुलभ बनाना होगा, तभी अलग-अलग भाषाओं और डिजिटल संदर्भों के बावजूद वह भारतीय व्यवस्था का हिस्सा बन सकेगा.
“यह सही है कि एआई को-पायलट सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की पूरी क्षमता रखते हैं, फिर भी भारत में इनको बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले कुछ चुनौतियों का समाधान निकालना बेहतर होगा.”
एआई तंत्र के लिए एकसमान नियामक ढांचे का न होना भी एक अन्य चुनौती है. जवाबदेही, प्रमाणन और नैतिक अनुपालन की निगरानी के लिए संसदीय अधिनियम वाले किसी एकीकृत प्राधिकरण का होना ज़रूरी है, अन्यथा को-पायलटों द्वारा गलती करने या गलत सूचना देने पर ज़िम्मेदार ठहराना मुश्किल हो सकता है.
डिजिटल शासन और नियम-प्रबंधन के क्षेत्र में एआई को-पायलट देश में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं. सरकारी इंटरफेस पर समझदारी भरा संवाद करके वे नागरिकों की भागीदारी बढ़ा सकते हैं. इतना ही नहीं, वे सरकारी सेवाओं को तेज़, सरल और अधिक पारदर्शी बना सकते हैं. कुल मिलाकर, कक्षाओं में पाठ योजना बनाने से लेकर विभिन्न भाषाओं में खेती-बाड़ी संबंधी सलाह देने तक, भारत में उभरते एआई को-पायलट यही बता रहे हैं कि AI शिक्षकों, किसानों और अधिकारियों, सभी की समान रूप से मदद कर सकता है. विश्व में एस्टोनिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और चीन जैसे उदाहरण भी हैं, जो बताते हैं कि अच्छी तरह तैयार को-पायलट नौकरशाही में टकराव दूर करने और नागरिकों को राज्य के साथ सहज तरीके से संवाद करने में सक्षम बना सकते हैं.
हालांकि, इस सोच को हक़ीक़त में बदलने के लिए, ढांचागत क्षमता को मज़बूत करना, विभागों में तालमेल बनाना और को-पायलट के निर्माण में पारदर्शिता लाना ज़रूरी होगा. अगर नीतियां सही होंगी और लोगों का भरोसा जमेगा, तो एआई को-पायलट भारतीय शासन-व्यवस्था में ज़रूरी साझेदार बन सकते हैं और अपनी बुद्धिमानी, पहुंच व जवाबदेही के माध्यम से आम नागरिकों, व्यवसायों और राज्य के बीच पुल का काम कर सकते हैं.
(देबज्योति चक्रवर्ती ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर डिजिटल सोसाइटीज में शोध सहायक हैं)
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Debajyoti Chakravarty is a Research Assistant at ORF’s Center for New Economic Diplomacy (CNED) and is based at ORF Kolkata. His work focuses on the use ...
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