Published on Aug 01, 2022 Updated 26 Days ago
#कृषि: पश्चिम बंगाल के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में बेहतर जल उपयोग और पोषण उत्पादकता के लिए क्रॉप शिफ्टिंग!

कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की कमी से निपटते हुए खाद्यान्न की बढ़ती मांग को पूरा  करना है. इस आलेख में  भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में अनाज उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित कर क्रॉप शिफ्टिंग से पानी की खपत की मांग पर पड़ने वाले असर और पोषण उत्पादकता का परीक्षण किया गया है. इस विश्लेषण में पाया गया है कि ग्रीष्म उपज (बोरो राइस) की बजाय यदि प्रत्येक जिले में ज्वार/मक्का बोया जाए तो सिंचाई के लिए पानी की ज़रूरत को कम कर मैक्रो तथा माइक्रो न्यूट्रियंट्स की उत्पादकता में सुधार किया जा सकता है. इसका काफी प्रभाव देखा जा सकता है क्योंकि भविष्य में अनाज उत्पादन की स्थिरता भू-जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है. भू-जल इस क्षेत्र में अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए सबसे अहम संसाधन है.


एट्रीब्यूशन: प्रीति कपूरिया और सावन बैनर्जी, ‘क्रॉप शिफ्टिंग फॉर इम्प्रूव्ड वॉटर यूज एंड न्यूट्रीशनल प्रॉडक्टिविटी इन द लोअर इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स ऑफ वेस्ट बंगाल,’ ओआरएफ़ ओकेशनल पेपर नंबर 358, जून 2022, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन.


1. प्रस्तावना

खाद्य सुरक्षा एवं पोषण के लिए शुद्ध और पर्याप्त जल तक पहुंच होना बेहद आवश्यक है. हाल के वर्षों में प्राकृतिक वास अर्थात लोगों की बस्तियों में कमी और उसकी दुर्दशा की वजह से दुनियाभर के जल स्त्रोतों पर काफी गंभीर खतरा मंडरा रहा है. इसमें से कुछ खतरा तो भोजन करने के स्वरूप में आ रहे बदलाव की वजह से बढ़ती अनाज की मांग के कारण है.[1]

वैश्विक स्तर पर लगभग 70 प्रतिशत मीठे पानी को कृषि क्षेत्र के लिए निकाला जाता है,[2] मीठे पानी की अधिकांश निकासी सिंचाई के लिए ही होती है. इसमें भी सिंचाई के लिए निकाले गए मीठे जल का 40 प्रतिशत हिस्सा भू-जल का होता है.[3] भू-जल मीठे पानी का एक ऐसा स्त्रोत है, जिसकी निकासी हम सूखे मौसम में भी कर सकते हैं, जबकि भूतल पर सूखे के मौसम में मीठा पानी उपलब्ध नहीं रहता.

यह आलेख पश्चिम बंगाल के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में भू-जल संसाधनों की वर्तमान स्थिति की जांच करता है. इसके साथ ही सीमित संसाधनों की कमी को रोकने के लिए फसल परिवर्तन की वजह से होने वाले संभावित प्रभाव की जांच करता है. पश्चिम बंगाल राज्य में ही फसल की सर्वाधिक गहनता देखी जाती है. वहां का एक औसत किसान कुल जोतने योग्य भूमि का एक कृषि वर्ष में 1.85 गुना या फिर 2.5 गुना उपयोग करता है.

भारत दुनिया में भू-जल का सबसे बड़ा उपयोग करने वाला देश है है. यहां देश की सिंचाई की ज़रूरतों का 60 प्रतिशत मीठा पानी भू-जल से निकाला जाता है, जबकि 85 प्रतिशत भू-जल की निकासी से ही पेयजल की आवश्यकता को पूरा किया जाता है.[4] आज देश के अनेक महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में भू-जल का स्तर काफी तेजी से कम होता जा रहा है. हालांकि फसल की संख्या में बढ़ोतरी से खाद्य उत्पादकता में वृद्धि हुई है लेकिन इसके चलते भू-जल की निकासी में हो रही बेतहाशा वृद्धि के कारण भू-जल का स्तर तेजी से गिरता जा रहा है. अनुमान है कि सन् 2025 तक फसल क्षेत्र में देखी जा रही गहनता राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत कम हो जाएगी और जिन इलाकों में भू-जल स्तर की उपलब्धता तेजी से कम होगी, वहां इसकी गिरावट लगभग 68 प्रतिशत के आसपास होगी.[5] जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रभावित हो रहा बारिश का स्वरूप कृषि उत्पादकता के समक्ष उपलब्ध चुनौती को और भी गंभीर चिंता का विषय बनाता जा रहा है.

यह आलेख पश्चिम बंगाल के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में भू-जल संसाधनों की वर्तमान स्थिति की जांच करता है. इसके साथ ही सीमित संसाधनों की कमी को रोकने के लिए फसल परिवर्तन की वजह से होने वाले संभावित प्रभाव की जांच करता है. पश्चिम बंगाल राज्य में ही फसल की सर्वाधिक गहनता देखी जाती है. वहां का एक औसत किसान कुल जोतने योग्य भूमि का एक कृषि वर्ष में 1.85 गुना या फिर 2.5 गुना उपयोग करता है. बंगाल में सबसे ज्यादा धान की फसल उगाई जाती है. पूरे भारत में आमतौर पर हर घर में चावल यानी धान खाया जाता है. धान के कुल राष्ट्रीय उत्पादन में बंगाल का हिस्सा 15 प्रतिशत है. पश्चिम बंगाल ही 25 प्रतिशत आलू उत्पादन के साथ देश में दूसरे नंबर का आलू उत्पादक राज्य है.[6] धान उत्पादन में वृद्धि खरीफ सत्र के दौरान उगाए जाने वाले धान की वजह से हुई है, जिसमें उच्च उपज देने वाली किस्म के धान के लिए बड़ी मात्रा में सिंचाई, खाद और कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है.[7]

धान की फसल को अन्य फसलों के मुकाबले पांच से छह बार सिंचाई का पानी देना पड़ता है. इतना पानी देकर ही भूमि को धान फसल के लिए तैयार किया जा सकता है और बाद में भूमि पर जमा पर्याप्त पानी में ही धान का पौधा बोया जा सकता है. बोरो धान की फसल और उच्च उपज देने वाली सब्जियों, विशेषकर आलू की फसल के लिए आवश्यक सिंचाई के लिए भू-जल की आवश्यकता में वृद्धि हुई है. परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में भू-जल स्तर ठंड के दिनों में तीन से 12 मीटर या उससे ज्यादा कम हो जाता है. यही स्थिति मानसून पूर्व के दिनों में देखी जाती है. पिछले एक दशक में ही बोरो धान किस्म की  रोपाई के तहत आने वाली कृषि भूमि में पांच से दस प्रतिशत की वृद्धि प्रतिवर्ष हुई है. इस वजह से निजी सतही टयूबवेल से भू-जल की अबाधित निकासी में भी तेजी आई है. ऐसे में अनेक टयूबवेल या तो सूख गए हैं या फिर उसमें से गर्मी के महीनों, खासकर मानसून पूर्व महीनों में बेहद कम पानी निकल पाता है.[8]

इस आलेख में निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स (गंगा के तराई वाले क्षेत्र) में उगाई जाने वाली अधिक पानी का उपयोग करने वाली बोरो धान की फसल के स्थान पर कम पानी का उपयोग करने वाले मक्के और जौ की खेती से होने वाली जल की बचत की संभावनाओं की जांच की गई है. 

मुर्शिदाबाद और बर्धमान जिलों के अनेक ब्लॉक्स में 1995 से 2004 के बीच भू-जल स्तर में 16 से 70 सेंटीमीटर तक की गिरावट देखी गई. टयूबवेल का सूखना अथवा भू-जल स्तर में गिरावट की वजह से इन जिलों में पेयजल का संकट भी उत्पन्न हुआ है. इसके अलावा यहां के जल स्त्रोतों में आर्सेनिक कन्टैमनेशन भी देखी गई है.[9] (पिछले दशक में पश्चिम बंगाल के जिलों में भू-जल स्तर में आए परिवर्तन की विस्तृत जानकारी अनुबंध 1 में दी गई है.)

इसी वजह से पश्चिम बंगाल खुद को एक महत्वपूर्ण केस स्टडी के रूप में पेश करता है. ताकि यह पता लगाया जा सके कि कृषि उपज में परिवर्तन का उपयोग, जल के उपयोग को कैसे लाभ पहुंचा सकता है. महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की उपज में धान ही ऐसा अनाज है  जो जल का बेहद कम कुशलता के साथ इस्तेमाल करता है.[10] धान को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी और उपयोगकर्ताओं को इस पर दी जाने वाली सब्सिडी की वजह से ही फसल और कम जल का उपयोग करने वाले आहार के अन्य पोषक तत्वों से भरपूर विकल्पों की अनदेखी हो रही है. इसी वजह से व्यापक तौर पर पोषक तत्वों की कमी देखी जा रही है.[11] सीमित जल संसाधनों और बदलती आहार संबंधी वरीयताओं को देखते हुए स्थायी खाद्य उत्पादन के लिए यह आवश्यक है कि जल उपयोग दक्षता को बढ़ाने के साथ जल उत्पादकता में भी सुधार किया जाए. इसके साथ ही लोगों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जाए. कृषि उपज, जल के उपयोग और पोषक तत्वों को जोड़ने से ही हम ऐसी फसल को अपनाने के बारे में विचार कर सकते हैं जो कि फसल, कम पानी का उपयोग करे और पोषक तत्वों से भरपूर भी हो.

इस आलेख में निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स (गंगा के तराई वाले क्षेत्र) में उगाई जाने वाली अधिक पानी का उपयोग करने वाली बोरो धान की फसल के स्थान पर कम पानी का उपयोग करने वाले मक्के और जौ की खेती से होने वाली जल की बचत की संभावनाओं की जांच की गई है. इस विश्लेषण में मुर्शिदाबाद, बीरभूम, बर्धमान, हुगली और उत्तरी 24 परगना जिलों का समावेश है. यह आलेख इस बात की जांच करता है कि क्या मीठे जल की उपलब्धता में सुधार और पोषक तत्वों में सुधार को एक साथ हासिल किया जा सकता है. यह उस स्थिति में जल संसाधनों की उपलब्धता में संभावित सुधार की खोज भी करता है जब धान, गेहूं और आलू की जगह वैकल्पिक फसल उगाई जाए और चयनित जिलों में उगाई जाने वाली मुख्य व वैकल्पिक फसल (अनाज और आलू) की पोषण उत्पादकता (न्यूट्रियंट यूनिट/एम−3 ऑफ वॉटर) का आकलन भी करता है.

2.पद्धति और जानकारी

    डेटा

लेखकों ने पश्चिम बंगाल के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स के नए और पुराने जलोढ़ इलाका यानी एलूवीयल क्षेत्र में आने वाले पांच जिलों की पांच मुख्य और विशिष्ट फसलों के उत्पादन से जुड़ी जानकारी) एकत्रित की. इसमें मुर्शिदाबाद, बीरभूम, बर्धमान, हुगली तथा उत्तरी 24 परगना जिले शामिल हैं, जबकि फसलों में बोरो धान, खरीफ धान, गेहूं, मक्का, जौ, बाजरा और आलू शामिल हैं. (देखें टेबल-1)

पश्चिम बंगाल में धान ही सबसे प्रमुख फसल है. राज्य में मिलने वाली धान की तीन मुख्य प्रजातियों में ऑस धान (ग्रीष्म काल और मानसून पूर्व रोपाई होती है और शरद ऋतु में कटाई होती है), खरीफ़ अथवा अमन धान (मानसून में रोपाई और ठंड में कटाई) तथा बोरो धान (ठंड में रोपाई और ग्रीष्म काल में कटाई) शामिल हैं. सबसे ज्यादा उत्पादन खरीफ धान का होता है, जिसके बाद क्रमश: बोरो और ऑस धान का नंबर आता है. [a]

    टेबल 1 : चयनित जिलों में फसल का पैटर्न

                                                                     स्त्रोत : स्वयं लेखक का

 

पद्धति 

1.आवंटन के लिए उपलब्ध जल संसाधन

प्रत्येक फसल के लिए निम्नलिखित संकेतक का मूल्यांकन किया जाता है: फसल के मौसम में मिमी में दिए गए पुन: आवंटन (डब्ल्यूआर) के लिए उपलब्ध जल संसाधन. पुन: आवंटन के लिए उपलब्ध जल संसाधनों का आकलन इस प्रकार है:

धान के खेत से असल में होने वाला वास्तविक वाष्पन-उत्सर्जन कहां है. मक्के के खेत से होने वाला अनुमानिक वाष्पन-उत्सर्जन कहां है. बाजरा और जौ के खेतों से होने वाला अनुमानित वास्तविक वाष्पन-उत्सर्जन. इसी प्रकार गेहूं, ज्वार और आलू समेत अन्य फसलों का भी आकलन किया गया है.

2.पोषाहार जल उत्पादकता (पोषक इकाई/एम−3 पानी)

पोषक जल उत्पादकता का उपयोग जल-खाद्य-पोषण के गठजोड़ को मापने के लिए पैमाने के रूप में किया जा सकता है. बढ़ता खाद्य उत्पादन और उत्पादकता बड़ी तेजी के साथ पोषक तत्वों के घनत्व से जुड़ते जा रहे हैं.

पोषण संबंधी जल उत्पादकता[12] की गणना रेनो और वॉलेंडर (2000) के सूत्र के आधार पर की जा सकती है:[13]

जहां एनडब्ल्यूपी पोषाहार जल उत्पादकता है (पोषण इकाई. पानी वाष्पन-उत्सर्जन होने की एम-3), वास्तविक कटाई अनाज उपज (केजी.एचए.-1), वास्तविक वाष्पन-उत्सर्जन (एम3.एचए-1), है, और उत्पाद की प्रति किलो पोषक तत्व सामग्री है (न्यूट्रीशन यूनिट.केजी-1)

 

3.परिणाम और विश्लेषण

टेबल-2 पश्चिम बंगाल के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में उगाई जाने वाली विभिन्न फसलों की पानी की आवश्यकताओं को सारांशित करता है.[C] सभी फसलों के मुकाबले धान की फसल को ही सबसे ज्य़ादा जल की आवश्यकता होती है.

टेबल 2: पश्चिम बंगाल में फसलों की पानी की आवश्यकता

                                                           स्त्रोत : प्रसाद (2016)[14]

पुन: आवंटन के लिए उपलब्ध जल संसाधनों का आकलन करते वक्त वाष्पन-उत्सर्जन दर को मापा जाता है.
वाष्पन-उत्सर्जन नैचुरल इकोसिस्टम की एक महत्वपूर्ण भौतिक प्रक्रिया है. यह हायड्रोलॉजिकल साइकिल का अहम हिस्सा है, जिसके माध्यम से हम मिट्टी, भूमि की सतह और वातावरण के बीच पानी और ऊर्जा के आदान-प्रदान की व्याख्या करते हैं.
इसका उन्नत वर्णन करने से ही हम जल संसाधनों के प्रबंधन और उससे जुड़े इकोसिस्टम सर्विसेस का बेहतर प्रबंधन करने के साथ -साथ वैश्विक जलवायु परिवर्तन का मुकाबला कर सकते हैं. वाष्पन-उत्सर्जन की दर यानी इवैपोट्रान्सपिरेशन रेट को प्रभावित करने की वजह से ही वैश्विक जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की नमी, वनस्पति उत्पादकता, कार्बन चक्र  और जल बजट को बाधित करता है. [d],[15]

इवैपोट्रान्सपिरेशन रेट की गणना मिमी प्रति यूनिट टाइम में की गई है, जो इस केस स्टडी के मामले में प्रति दिन की दर है. इसे पूरे फसल सत्र में ऐवरेज आउट किया गया है. टेबल-3 में दिए गए वास्तविक इवैपोट्रान्सपिरेशन को देखने से साफ हो जाता है कि धान में ही इवैपोट्रान्सपिरेशन सबसे ज्यादा होता है. इसके बाद पश्चिम बंगाल की दो अन्य महत्वपूर्ण फसल जिसमें जूट का नंबर आता है. इवैपोट्रान्सपिरेशन में इसके बाद नंबर लगता है मक्का और आलू की फसल का. ये दरें अलग-अलग जिलों में अलग-अलग देखी गई हैं. धान के मामले में जहां पानी की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, वहीं जल का सर्वाधिक नुकसान भी धान की वजह से ही होता है. उच्च पैदावार वाले धान के साथ यह दर भी बढ़ती जाती है. फसलों की उपज दरों की तुलना इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि उत्पादन आंकड़ों की समयावधि में अंतराल है. पश्चिम बंगाल की पारंपरिक फसलों की तुलना में हाल के वर्षो में उगाई जाने वाली वैकिल्पक फसलों के मामले में यह बात खासतौर पर लागू होती है. हालांकि जिलों के भीतर होने वाली फसलों की पैदावार और इवैपोट्रान्सपिरेशन रेट की तुलना करने पर हम उन फसलों के बारे में अनुमान लगा सकते हैं, जिन फसलों को बोरो धान के स्थान पर यहां उगाया जा सकता है.

बारले अथवा जौ, जिसका वैज्ञानिक नाम होरडियम वलगेयर एल है, को दुनिया में धान, गेंहू और मक्के के बाद सबसे महत्वपूर्ण अनाज के रूप में पहचाना जाता है, ने पश्चिम बंगाल में बतौर न्यूट्रिशनली डेन्स अर्थार्त पोषक रूप से घने अनाज के रूप में अपनी पहचान खो दी है.[e] जौ का उत्पादन सन् 2011-12 के बाद से लगभग बंद हो गया है. आज जौ का उत्पादन केवल जलपाइगुड़ी, उत्तर दिनजापुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, बीरभूम और नादिया जिलों में बेहद कम मात्र में किया जा रहा है. ऐसे में जौ के खेत काफी कम हो गए हैं.

टेबल 3 : वास्तविक (मिमी में मान)

                                                           स्त्रोत: लेखकों की गणना

टेबल4 वास्तविक इवैपोट्रांसपिरेशन रेट यानी वाष्पन उत्सर्जन के साथ जिलों में फसल की पैदावार का मोटा आकलन दर्शाता है. इवैपोट्रान्सपिरेशन रेट के निर्धारण से फसलों के लिए प्रयुक्त किए जा रहे जल अथवा खेतों के लिए आवश्यक जल का अनुमान लगाने का एक उपयोगी साधन मिल सकता है. इस तरह की जानकारी का उपयोग फसल के लिए आवश्यक जल की गणना करने के साथ सिंचाई परियोजनाओं की योजना बनाते वक्त जल का उपयोग निपुणता से करने की दिशा में किया जा सकता है.
नक़द फसल के रूप में तेज़ी से लोकप्रिय हो रही मक्के की फसल उच्च पैदावार वाली फसल है, ठीक धान की तरह या उससे भी ज्यादा. इसी प्रकार इसके लिए ज्यादा वॉटर ट्रांसपिरेशन की ज़रूरत होती है. इसी कारण इसमें धान से थोड़ा कम इवैपोट्रांसपिरेशन होता है, लेकिन गेहूं, जौ, बाजरा, ज्वार, आलू और सरसों की तुलना में अधिक इवैपोट्रांसपिरेशन होता है.  [f]

टेबल 4 : वास्तविक इवैपोट्रांसपिरेशन रेट और चयनित फसलों की उपज


                                                    स्रोत: लेखकों की गणना

टेबल 3 में दर्शाये गए वास्तविक इवैपोट्रान्सपिरेशन रेट के आधार पर अनेक जिला स्तरीय वैकल्पिक फसल के विकल्प टेबल 5 में दिए गए हैं.  कम वाष्पीकरण हानि (इ) और क्रॉप ट्रान्सपिरेशन (टी) से उपलब्ध होने वाला जल अन्य कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. यह विकल्प कम खपत वाले पानी की मांग को दर्शाता है, विशेषत: उस वक्त जब बोरो धान की जगह कोई वैकल्पिक फसल उगाई जाती है.

टेबल 5: पुन: आवंटन के लिए उपलब्ध जल संसाधन (मिमी में मान)

                                                     स्रोत: लेखकों की गणना

फसलों में बदलाव करने से न केवल हम जल संरक्षण का लाभ ले सकते हैं बल्कि यह कुपोषण के विभिन्न प्रकार से निपटने के भी काम आ सकता है. कृषि उपज के न्यूट्रिशनल कन्टेंट की गणना न्यूट्रिशन-सेंसिटिव कृषि की दिशा में जाने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है. इसके अलावा वर्तमान में खाद्य उपज को लेकर सोच में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब इसकी ओर केवल खाद्य संसाधन के उपयोग की दक्षता की दृष्टि से देखने की अपेक्षा अब पोषण संबंधी लाभ या पोषण संबंधी उपयोगिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है.

पश्चिम बंगाल के निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में उगाई जाने वाली फसलों में धान और आलू में सबसे कम माइक्रो और मैक्रो न्यूट्रियन्ट्स पाए जाते हैं. (देखें टेबल 6) मक्के में फास्फोरस की मात्रा सर्वाधिक होती है, जिसकी वजह से यह मैक्रो न्यूट्रियन्ट्स से भरपूर होता है. इसी प्रकार जौ में फाइबर की मात्रा सर्वाधिक होती है, जबकि बाजरा भी माइक्रोन्यूट्रियन्ट्स से भरा होता है. वैकल्पिक फसल में न्यूट्रियन्ट्स जैसे प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम और आयरन की मात्रा ज्यादा होती है.

टेबल 6: न्यूट्रियन्ट कन्टेंट (पोषक तत्व) (प्रति किलो उत्पाद)

स्त्रोत : सी. गोपालन, बी. वी. रामा शास्त्री और एस. बालसुब्रमण्यम[16]

इन लेखकों ने न्यूट्रियन्ट की मात्रा की प्रति किलो उपज के मुकाबले जल के एम−3 यूनिट में पाए जाने वाले न्यूट्रियन्ट की गणना करते हुए विभिन्न अनाजों की उपज में चुनिंदा पोषक तत्वों की पैदावार के लिए आवश्यक वॉटर फूटप्रिंट (डब्ल्यूएफपी) का परीक्षण किया. अन्य रबी फसलों के मुकाबले धान की फसल जल उपयोग में सबसे ज्यादा अकुशल या अक्षम पायी गई. (देखें टेबल 7) जिलावार तुलना करने से यह दिखाई देता है कि मक्के की उच्च पैदावार का संबंध उच्च जल उत्पादकता (डब्ल्यूपी) के साथ जुड़ा है.

सबसे कम डब्ल्यूएफपी अथवा उच्चतम डब्ल्यूपी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मक्का अपनी उच्च पैदावार और जल उत्पादकता की वजह से धान से बेहतर होता है. हालांकि इसमें भी जिलावार स्तर पर भिन्नताएं देखी गई हैं. पांच चयनित जिलों में से केवल दो में उगाई जाने वाली जौ की फसल की पैदावार भी कम है और जल उत्पादकता भी. हालांकि जौ का डब्ल्यूएफपी धान के बराबर पाया गया, लेकिन जहां धान में जल की बहुत ज्यादा हानि देखी जाती है, वहीं जौ में जल की हानि कम दिखाई देती है. जौ की पैदावार भी कम होती है. इसके बावजूद इसकी डब्ल्यूएफपी ज्यादा होती है, बावजूद इसके कि इसकी फसल को धान के मुकाबले कम जल की आवश्यकता होती है. इसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन और जल का एम-3 भी कम ही होता है. जैसा कि उम्मीद है धान की फसल ज्यादा भूमि पर उगाई जाती है, उसके लिए पानी भी ज्यादा लगता है तथा इसका उत्पादन भी बड़ी मात्रा में होता है, अत: इसकी डब्ल्यूएफपी भी उच्च होती है.

 

टेबल 7: उपज और जल उत्पादकता (औसत मूल्य)


                                               स्रोत: लेखकों की गणना

टेबल 8 और 9 जल की प्रति एम3 यूनिट न्यूट्रिशनल कन्टेंट को संक्षेप में दर्शाते हैं. टेबल 8 में चयनित फसलों के लिए ऊर्जा अथवा कैलरी (kcal. एम-3) उत्पादकता को दर्शाता है.

पोषक जल उत्पादकता के आधार पर विकल्प तय करते हुए यह देखा गया है कि आलू में कम कैलरी कन्टेंट होने के बावजूद अधिकतम एनडब्ल्यूपी (कैलरीज) है. उधर मक्के में जहां धान और गेहूं के बराबर कैलरी कन्टेंट होता है, लेकिन वह एनडब्ल्यूपी (कैलरीज) के मामले में दूसरे स्थान पर आता है. धान के मुकाबले में कम कैलरी कन्टेंट वाले जौ में धान की तुलना में बेहतर एनडब्ल्यूपी (कैलरी) है.

मुख्यत: जिस तरह एनडब्ल्यूपी की गणना की जाती है, उसके आधार पर आलू में उच्च पैदावार और कम पानी की आवश्यकता देखी जाती है. इसी वजह से इसमें कम न्यूट्रिशनल कन्टेंट होने के बावजूद इसकी एनडब्ल्यूपी सर्वश्रेष्ठ पायी गई है.

टेबल 8: चयनित फसलों के लिए पोषण जल उत्पादकता (एनडब्ल्यूपी): एनर्जी यूनिट : एम3 (Unit:kcal.एम-3)


स्रोत: लेखकों की गणना

टेबल 9 चयनित फसलों की अनुमानित प्रोटीन उत्पादकता को दर्शाता है. यह खरीफ धान के लिए 29.6 g. m-3 से लेकर आलू के लिए 202.2 g. m-3 है. ऐसे में आलू ही प्रोटीन उत्पादन का सबसे अच्छा स्त्रोत साबित होता है, जिसके बाद नंबर आता है मक्के का.

टेबल 9: चयनित फसलों के लिए न्यूट्रिशनल वॉटर प्रॉडक्टीविटी (पोषण जल उत्पादकता) (एनडब्ल्यूपी):प्रोटीनयूनिट.एम-3 (Unit: g.m-3)

स्रोत: लेखकों की गणना

कैल्शियम के लिए प्रति घन मीटर जल के पोषण उत्पादन को आधार बनाकर देखा जाए तो बाजरा, बोरो धान की वैकल्पिक फसल हो सकता है. इसके बाद मक्का ज्यादा बेहतर फसल दिखाई देता है. (देखें टेबल 10) मक्के की फसल की सबसे अच्छी बात इसकी उच्च पैदावार है. मक्के के मुकाबले आलू की पैदावार ज्य़ादा उच्च और कम होने के साथ अपने उच्च एनडब्ल्यूपी के दम पर सबसे जुदा दिखाई देता है, भले ही इसकी उपज में प्रति किलो न्यूट्रियन्टस सभी मामलों में काफी कम होते हैं.

टेबल 10: चयनित फसलों के लिए न्यूट्रिशनल वॉटर प्रॉडक्टीविटी (एनडब्ल्यूपी): कैल्शियम यूनिट.एम-3(Unit: mg.एम-3)

                                                                   स्रोत: लेखकों की गणना

टेबल 11 चयनित फसलों की अनुमानित लौह जल उत्पादकता दर्शाती है. आयरन की दृष्टि से गेहूं की एनडब्ल्यूपी धान और मक्के के मुकाबले में काफी ज्यादा है : प्रति किलो गेहूं  में न केवल बहुत अधिक मात्रा में आयरन होता है, बल्कि इसमें प्रति घन मीटर पानी में भी आयरन की मात्रा सर्वश्रेष्ठ होती है.

टेबल 11 : चयनित फसलों के लिए न्यूट्रिशनल वॉटर प्रॉडक्टीविटी (एनडब्ल्यूपी): आयरन यूनिट.एम-3(Unit: mg.एम-3)

                                                              स्रोत: लेखकों की गणना

और अंत में, टेबल 12 और 13 बोरो धान की वैकल्पिक फसल के परिदृश्य पर नज़र डालते हैं. कुछ जिलों में जानकारी की अनुपलब्धता की वजह से पांच में से केवल तीन जिलों में इस परिदृश्य की कल्पना की जा सकती है जब बोरो धान की जगह मक्के की फसल लेती है और दो जिलों में जौ को विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है. बोरो धान की जगह मक्के की फसल लेने से सिंचाई के लिए आवश्यक जल की मांग कम होती है और पोषक तत्वों के उत्पादन में सुधार होता है. उधर जौ की फसल उगाने पर पानी की मांग में कमी को लेकर उम्मीद के मुताबिक परिणाम दिखाई नहीं देता, लेकिन इसमें आयरन के अलावा अन्य पोषक तत्वों के उत्पादन में सुधार की क्षमता दिखाई देती है.


टेबल 12: बोरो धान की जगह वैकल्पिक फसल का परिदृश्य. (औसत प्रतिशत मान): बोरो धान के मुकाबले मक्का.

                                                       स्रोत: लेखकों की गणना

टेबल 13: बोरो धान की जगह वैकल्पिक फसल का परिदृश्य. (औसत प्रतिशत मान): बोरो चावल के मुकाबले जौ.

                                                        स्रोत: लेखकों की गणना

चर्चा

इस विश्लेषण का निष्कर्ष यह निकलता है कि पश्चिम बंगाल के लिए सबसे अच्छा यह होगा कि वह जिला विशेष को ध्यान में रखकर कृषि नीति बनाए ताकि धान और आलू के स्थान पर वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा दिया जा सके. सिंचाई के ज्यादा जल का उपयोग कर उगाई जाने वाली धान और आलू की फसल की उपज में वृद्धि की वजह से ही निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में आने वाले चयनित जिलों के भू-जल स्तर में गिरावट आई है. फसल उगाते वक्त होने वाली जल की हानि का पता लगाने के लिए इवैट्रान्सपिरेशन रेट का आकलन महत्वपूर्ण साबित होता है. कृषि क्षेत्र में इवैट्रान्सपिरेशन मिट्टी और जल के संतुलन का घटक है जो संभावित पैदावार का अनुमान लगाने में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.[17] इवैट्रान्सपिरेशन रेट के आधार पर हम यह पता लगा सकते हैं कि फसल उगाने के लिए कितनी मात्रा में पानी की आवश्यकता होगी. फसल के स्वरूप से जुड़ा फैसला लेने में भी इवैट्रान्सपिरेशन रेट का आधार लिया जा सकता है, जहां इवैट्रान्सपिरेशन का कम रेट यह सुझाता है कि एक फसल के स्थान पर दूसरी फसल लेने से जल संसाधन उपलब्ध करवाया जा सकता है.

इस विश्लेषण का निष्कर्ष यह निकलता है कि पश्चिम बंगाल के लिए सबसे अच्छा यह होगा कि वह जिला विशेष को ध्यान में रखकर कृषि नीति बनाए ताकि धान और आलू के स्थान पर वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा दिया जा सके. सिंचाई के ज्यादा जल का उपयोग कर उगाई जाने वाली धान और आलू की फसल की उपज में वृद्धि की वजह से ही निचले इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में आने वाले चयनित जिलों के भू-जल स्तर में गिरावट आई है.

जिन फसलों की यहां चर्चा की गई है, उसमें मक्का, जो मैक्रो और माइक्रो न्यूट्रियन्ट्स से संपन्न होता है, की पैदावार क्षमता अन्य अनाज की फसलों के मुकाबले सर्वाधिक होती है. इसी प्रकार मक्के की न्यूट्रिशनल प्रॉडक्टीविटी भी बोरो धान के मुकाबले अधिकांश मामलों में अधिक देखी गई. ‘पोल्ट्री फीड’ के रूप में मक्के का अपना महत्वपूर्ण स्थान है, जिसका उपयोग खाद्य प्रसंस्करण और जैव ईंधन बनाने में भी किया जाता है.[18] पश्चिम बंगाल में मक्के की खेती अपनी उच्च पैदावार के साथ बड़ी तेजी से बढ़ रही है. किसान अब धान की बजाय मक्के की खेती को पसंद कर रहे हैं, क्योंकि धान की खेती में जल की बहुत ज्यादा जरूरत होती है.[19] इसके अलावा, धान के स्थान पर मक्के की खेती को बढ़ावा देने से भू-जल स्तर में सुधार किया जा सकता है. इसका कारण यह है कि धान उगाने के लिए जितना पानी लगता है उसके सिर्फ पांचवें हिस्से के पानी से ही मक्के की खेती की जा सकती है. इसके अलावा मक्के की खेती करने वाले किसान को आय भी ज्यादा होती है.[20]

केंद्र सरकार ने मक्के के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित कर दिया है. हालांकि किसानों को उचित और लाभकरी मूल्य मिलना सुनिश्चत कर मक्के की खेती को और भी आकर्षक बनाने के लिए निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच भागीदारी बेहद आवश्यक हैं. 2010-11 में 880 रुपए प्रति क्विंटल की एमएसपी के मुकाबले 2013-14[21] की एमएसपी में की 1310 रुपए प्रति क्विंटल और फिर 2020[22] में 1760 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि ने मक्के की बुआई के तहत आने वाली भूमि को बढ़ाया है. किसान इसके मुनाफे को देखकर इसकी ओर आकर्षित हो रहे है. हालांकि अन्य फसलों के लिए उपलब्ध भूमि की कमी को देखते हुए मक्के के तहत आने वाली भूमि इसकी क्षमता के हिसाब से काफी कम ही कही जाएगी. सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में मक्के का उपयोग सीमित है, जिसकी वजह से मक्के का दाम हमेशा से एमएसपी  से कम ही रहता है. इसके अलावा खेती के स्तर पर ढांचागत सुविधाओं और कोल्ड स्टोरेज के अभाव (फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया और पश्चिम बंगाल के राज्य वेयरहाऊसिंग कार्पोरेशन दोनों के स्तर पर) में मक्के की गुणवत्ता को अंतिम उपयोगकर्ता तक पहुंचने से पहले सुरक्षित रखना भी एक चुनौती बन जाता है. इसके साथ ही मक्के की भारत भर में वैल्यू चेन यानी मूल्य श्रृंखला के बड़े हिस्से की गुणवत्ता वैश्विक स्तर के मक्का उत्पादकों से काफी कम है. यह कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिनकी ओर नीतिगत स्तर पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है.[23]

एक और फसल, जिसमें पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़ने की क्षमता है वह है जौ की फसल. यह नमक प्रतिरोधी है. इसे रेतीली से लेकर मध्यम भारी चिकनी मिट्टी में भी उगाया जा सकता है. ऐसे में इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स के साथ-साथ सुंदरबन के तटीय क्षेत्रों की मिट्टी जौ की फसल के लिए बेहद उपयुक्त मानी जा सकती है

एक और फसल, जिसमें पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़ने की क्षमता है वह है जौ की फसल. यह नमक प्रतिरोधी है. इसे रेतीली से लेकर मध्यम भारी चिकनी मिट्टी में भी उगाया जा सकता है. ऐसे में इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स के साथ-साथ सुंदरबन के तटीय क्षेत्रों की मिट्टी जौ की फसल के लिए बेहद उपयुक्त मानी जा सकती है.[24] जौ का उत्पादन कम सिंचाई वाली, बारिश पर आधारित और सीमित सिंचाई व्यवस्था के साथ भी किया जा सकता है. इसके लिए धान के लिए जरूरी जल से भी कम सिंचाई की आवश्यकता होती है. जौ का उपयोग पशु आहार, माल्ट उत्पादों और मनुष्य खाद्य के लिए भी किया जा सकता है. इसे गेंहू के लिए एक प्रतिस्पर्धी फसल माना जा सकता है जो न्यूट्रिशनल सिक्यूरिटी का हिस्सा बन सकती है, क्योंकि माल्ट बारले के लिए इसकी मांग बढ़ रही है. माल्ट बारले को बेहतर पैदावार के लिए तीन सिंचाई की जरूरत होती है, लेकिन जौ के उत्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज की आवश्यकता है जो उद्योगों की मांग को पूरा कर सके. जौ के लिए 2020-21 के रबी सत्र में एमएसपी 1525 रुपए प्रति क्विंटल की थी. 2013-14 से इसकी एमएसपी में लगातार वृद्धि हो रही है. इसके बावजूद इसकी एमएसपी गेहूं (1925 रुपए प्रति क्विंटल) से कम ही है.[25]

भूमि की कम उपलब्धता और बाजार की असुविधाओं की वजह से जौ की सीमित फसल ही उगाई जाती है. इसके बाद भी पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि अधिकांश किसान जौ की पुरानी प्रजाति के बीज की सहायता से ही इसकी फसल उगाते हैं. जौ के बीज की न तो ताजा प्रजाति उपलब्ध है और न ही इससे जुड़ी तकनीक ही मिलती है. घरेलू बाजार के माल्टिंग उद्योग में बढ़ती मांग की वजह से किसानों के पास इस लाभकारी फसल को अपनाने का बेहतरीन अवसर उपलब्ध है. ऐसा करते वक्त उन्हें माल्टिंग उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार ही फसल उगानी होगी.[26]

इस स्टडी ने यह दर्शाया है कि वैकिल्पक फसल अथवा फसल विविधिकरण को अपनाकर हम न्यूट्रिशन और पर्यावरणीय परिणाम हासिल कर सकते हैं. ऐसा करने से हमें सिंचित व्यवस्थाओं में जल के उपयोग को कम करने में सहायता मिलेगी, जैसा कि इंडो-गैंजेटिक प्लेन्स में धान और आलू की प्रणाली के अध्ययन में देखा गया है.

हालांकि, यह सच है कि जल उपयोग, भूमि उपयोग और न्यूट्रियन्ट प्रॉडक्शन के अलावा भी अन्य कई बातें हैं, जिन पर विचार करने के बाद ही हम फसल के विकल्पों को तय कर सकेंगे. इसमें कृषि लागत मूल्य, जलवायु के हिसाब से लचीली वेरायटीज्, उच्च गुणवत्ता वाले बीज की उपलब्धता, सुनिश्चित बाजार और मूल्य, क्षेत्र विस्तार, कैपेसिटी बिल्डिंग, भंडारण और परिवहन लागत और श्रमिकों की उपलब्धता और आवश्यकता का समावेश है. इन सभी पहलुओं पर और भी गहरे अध्ययन की आवश्यकता है. इसके बाद ही हम न्यूट्रिशनल सिक्यूरिटी  और नैचुरल रिर्सोर्स कर्न्‍सवेशन के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो सकेंगे.

4.निष्कर्ष

यह अध्ययन कृषि उत्पादकता को लेकर वर्तमान में चल रही चर्चाओं में योगदान देने की एक कोशिश है. यह चर्चा अब प्रति हेक्टेयर होने वाली पैदावार की बजाय प्रति घन मीटर पानी की खपत के सवाल पर होने लगी है. इस चर्चा के केंद्र में आया बदलाव जलवायु परिवर्तन की वजह से कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव की दृष्टि से सामायिक है, जहां जलवायु परिवर्तन के साथ वाष्पीकरण की दर में होने वाले स्थान विषयक तथा थोड़े समय के परिवर्तन से जल की उपलब्धता और भू-जल पुर्नभरण में भिन्नता देखी जा रही है. इन बातों का असर फसल की वृद्धि पर पड़ता है. इसके अलावा बढ़ती आबादी और जल को लेकर अन्य क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धी मांग के कारण भी पारंपारिक फसल के चयन को लेकर पुनर्विचार की ज़रूरत दिखाई देती है.

भू-जल की वजह से पश्चिम बंगाल अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर पाया है, लेकिन इस वजह से वहां के जल स्त्रोतों का बहुत अधिक दोहन हो रहा है, जो भविष्य की फसल के उत्पादन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. ऐसे में अब आवश्यकता एक ऐसे अनुसंधान की है, जो पानी बचाने वाली कृषि प्रबंधन व्यवस्था के साथ-साथ जलवायु और एडैफिक फैक्टर्स (मिट्टी से जुड़े) के बारे में भी पता लगाए जो पोषक तत्व और पोषण करने वाले जल की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं.

पश्चिम बंगाल राज्य में रबी की सबसे महत्वपूर्ण फसल बोरो धान और आलू की फसल उगाने के लिए भारी मात्रा में सिंचाई की आवश्यकता होती है. यह अध्ययन साबित करता है कि बोरो धान के स्थान पर जौ अथवा मक्के की फसल उगाने से न केवल मीठे पानी के उपयोग में कमी आ सकती है, बल्कि पौष्टिक लाभ भी हासिल किया जा सकता है. हालांकि, निरंतर पौष्टिक लाभ हासिल करने के लिए उपज की स्थिरता अहम है. भू-जल की वजह से पश्चिम बंगाल अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर पाया है, लेकिन इस वजह से वहां के जल स्त्रोतों का बहुत अधिक दोहन हो रहा है, जो भविष्य की फसल के उत्पादन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. ऐसे में अब आवश्यकता एक ऐसे अनुसंधान की है, जो पानी बचाने वाली कृषि प्रबंधन व्यवस्था के साथ-साथ जलवायु और एडैफिक फैक्टर्स (मिट्टी से जुड़े) के बारे में भी पता लगाए जो पोषक तत्व और पोषण करने वाले जल की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं.

एनेक्स 1 (अनुलग्नक) 

टेबल 1: भू-जल स्तर में परिवर्तन, जिले के अनुसार 10 साल का मध्यमान (जनवरी 2011-जनवरी 2020)

 

स्त्रोत: http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/groundwater%20yearbook%20of%20west%20bengal%202020.pdf

एनेक्स 2

कैल्यक्यूलेशन ऑफ क्रॉप ईटी:

अध्ययन के तहत विभिन्न खेत की वास्तविक फसल की गणना निम्नलिखित समीकरण का उपयोग करके की गई थी:

उपरोक्त समीकरण में, कई मापदंड (जैसे वायुमंडलीय दबाव, लेटेन्ट हीट ऑफ वेपोराइजेशन, साइकोमेट्रिक कॉन्सटंट आदि आदि) अन्य ज्ञात मापदंडों से प्राप्त किए गए थे. जैसा कि यूएफ/आईएफएएस एक्सटेंशन में अनुशंसित है। [29] चयनित स्थानों का मौसम डेटा आईएमडी के माध्यम से एग्रोमेट एडवाइजरी सर्विस प्रोजेक्ट, जो अनुसंधान निदेशालय, बीसीकेवी, कल्याणी में संचालित होती है, के माध्यम से जुटाया गया था.


प्रीति कपूरिया, ओआरएफ़, कोलकाता में फेलो हैं.

सावन बनर्जी एग्रोमेट्रोलॉजी में एआईसीआरपी, अनुसंधान निदेशालय, बिधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय (बीसीकेवी), मोहनपुर, नादिया, पश्चिम बंगाल में प्रोफेसर हैं.


Endnotes:

[1] Claudia Ringler and Paulo Dias, Water and Nutrition, Discussion Paper, United Nations System Standing Committee on Nutrition (UNSCN). February 2020, Rome.

[2] FAO, Water for Sustainable Food and Agriculture, Food and Agriculture Organization of the United Nations, 2017, Rome.

[3] Meha Jain, Ram Fishman, Pinki Mondal, Gillian L Galford, Nishan Bhattarai, Shahid Naeem, Upmanu Lall, Balwinder Singh  and Ruth S DeFries,   2021, “Groundwater Depletion will Reduce Cropping Intensity in India,”  Science Advances 7, no.9 (2012)  DOI: 10.1126/sciadv.abd2849

[4] World Bank, India Groundwater: A Valuable but Diminishing Resource, The World Bank.  March 6, 2012.

[5] Jain, Fishman, Mondal, Galford , Bhattarai, Naeem, Lall, Singh  and  DeFries, “Groundwater Depletion will Reduce Cropping Intensity in India”

[6] IPNI, West Bengal-Region Profile, South Asia Program, International Plant Nutrition Institute, Canada.

[7] Biman Nandi, “Exploring Some Issues for Sustainable Agriculture in West Bengal,” Heteroglossia: A Multidisciplinary Research Journal 1, no.1 (2016).

[8] S.B.Goswami and S.Saha, “On-farm Water Management for Higher Crop Water burdwaBProductivity in Tube well Commands of Lower Indo-Gangetic Plains,”  PAP004910, AICRP on Water Management, Bidhan Chandra Krishi Viswavidyalaya.

[9] Goswami and Saha, “On-farm Water Management for Higher Crop Water Productivity in Tube well Commands of Lower Indo-Gangetic Plains”

[10] Kyle Frankel Davis, Davide Danilo Chiarelli, Maria Cristina Rulli, Ashwini Chhatre, Brian Richter, Deepti Singh and Ruth S DeFries, “Alternative Cereals can Improve Water Use and Nutrient Supply in India,Science Advances, 4, no.7 (2018).

[11] Davis,  Chiarelli,  Rulli,  Chhatre,  Richter,  Singh and  Defries, “ Alternative Cereals Can Improve Water Use and Nutrient Supply in India,”

[12] Tendai Polite Chibarabada, Albert Thembinkosi Modi and Tafadzwanashe Mabhaudhi, “Nutrient Content and Nutritional Water Productivity of Selected Grain Legumes in Response to Production Environment,” International Journal of Environmental Research and Public Health. Oct 26;14, no.11:1300 (2017). doi: 10.3390/ijerph14111300. PMID: 29072620; PMCID: PMC5707939.

[13] Daniel Renault and W.W.Wallender, “Nutritional Water Productivity and Diets,Agricultural Water Management 45 (2000): 275-296.

[14] Rajendra Prasad, Textbook of Field Crops Production-Foodgrain Crops, Volume 1 and 2, Indian Council of Agricultural Research, New Delhi

[15] Ana Ochoa-Sánchez, Patricio Crespo, Galo  Carrillo-Rojas, Adrián Sucozhañay, Rolando  Célleri,  “Actual Evapotranspiration in the High Andean Grasslands: A Comparison of Measurement and Estimation Methods,” Frontiers in Earth Science, Vol.7 (2019) DOI=10.3389/feart.2019.00055

[16] C.Gopalan, B.V.Rama Sastri and S Balasubramanian,  Nutritive Value of Indian Foods, National Institute of Nutrition, Indian Council of Medical Research (ICMR), Hyderabad, 2012

[17] Rajan Bhatt and Akbar Hossain. “Concept and Consequence of Evapotranspiration for Sustainable Crop Production in the Era of Climate Change,” in Advanced Evapotranspiration Methods and Applications, ed. Daniel Bucur (London: IntechOpen, 2019).

[18] Sutanuka Ghoshal, “West Bengal Government to Raise Cultivation of Maize by 33%,”  The Economic Times, November 08, 2019,

[19] Chintu Das, “Maize and Barley, Farmers First Choice in  this Rabi Season,Krishi Jagran, January 21, 22.

[20] FICCI, India Maize Summit ’14, New Delhi.

[21] FICCI, India Maize Summit ’15, New Delhi.

[22] Swaraj India, https://swarajindia.org/press-release/swaraj-india-launches-mass-movement-of-maize-farmers-of-bengal-for-msp/ 2020

[23] “India Maize Summit ’15”

[24] Randhir Singh, Anuj Kumar, A.S. Kharuh, Vishnu Kumar, R.S. Chhokar, R. Selvakumar, Ramesh Chand and Indu Sharma, Barley Cultivation in India (Pocket Guide). Extension Bulletin, Directorate of Wheat Research, Karnal, 53 (2014) :18.

[25] Ministry of Agriculture & Farmers’ Welfare, Government of India.

[26] R Sendhil, Randhir Singh, Anuj Kumar, Ramesh Chand, J K Pandey, Rajendra Singh, Ravindran, A S Kharub and R P S Verma, “Adoption Level, Yield and Constraints in Indian Barley (Hordeum vulgare) Cultivation: Insights from Baseline Data for Identifying Livelihood Prospects,” Indian Journal of Agricultural Sciences 88 (8) (2018): 1233–40.

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