Author : Shivam Shekhawat

Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 06, 2025 Updated 0 Hours ago

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में चल रहे तनाव को सुलझाने के लिए चीन सरपंच बनना चाहता था. इसी बहाने चीन की चाल अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा करने की थी, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान पर भारत के बढ़ते प्रभाव से चीन के मंसूबे नाकाम होते दिख रहे हैं.

काबुल–इस्लामाबाद संघर्ष: चीन का दखल कमजोर

यह 'चाइना क्रॉनिकल्स' श्रृंखला का 186वां लेख है.


सरकारों के बीच विवाद का एक बड़ा मुद्दा अफ़ग़ानिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान के सदस्यों की उपस्थिति  है. पाकिस्तान ये आरोप लगाता है कि तालिबान ने कभी भी टीटीपी को नियंत्रित करने की इच्छा नहीं दिखाई. पाकिस्तान ने ये भी दावा किया कि पिछले साल चीनी कामगारों पर हुए हमले के लिए अफ़ग़ानिस्तान के आतंकवादी जिम्मेदार थे. तालिबान ने इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज़ कर दिया, और पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वो अफ़ग़ानिस्तान-चीन के बीच जानबूझकर अविश्वास पैदा करने की कोशिश कर रहा है. चीन ने भी पाकिस्तान के दावों का खुलकर समर्थन करने से परहेज़ किया और दोनों पक्षों से हमलावरों को खोजने पर ध्यान केंद्रित करने को कहा.

  • चीन दोनों के तनाव में सरपंच बनना चाहता था।
  • रणनीतिक–आर्थिक हितों की सुरक्षा चीन का उद्देश्य था।
  • भारत के बढ़ते प्रभाव से चीन के लक्ष्य कमजोर पड़ रहे हैं।

नवंबर 2025 में, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच पिछले चार साल का सबसे तीव्र संघर्ष हुआ. पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के लिए वायुसेना का भी इस्तेमाल किया. इस दौरान चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोनों देशों से संयम बरतने, बातचीत और परामर्श के माध्यम से आपसी मतभेदों का समाधान करने की अपील की. चीन ने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से 'व्यापक हितों' पर ध्यान केंद्रित करने का अनुरोध किया. इतना ही नहीं, चीन ने ये भी कहा कि अगर दोनों देश तैयार हैं, तो वो विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करने को भी तैयार है. खास बात ये है कि बीजिंग के लिए, इस व्यापक तस्वीर में क्षेत्र में अपने खुद के रणनीतिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा भी शामिल थी. चीन के काबुल और इस्लामाबाद दोनों के साथ उसके अच्छे संबंध हैं, और चीन किसी एक देश का पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहता.

चीन के नागरिकों पर हमलों ने अफ़ग़ानिस्तान–पाकिस्तान में उसकी आर्थिक प्रगति को पटरी से उतार दिया है।


काबुल में चीन: शुरुआती फायदे से घटते प्रभाव तक
अगस्त 2021 में,  अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के शासन और इस्लामिक अमीरात की फिर से स्थापना हुई. इस परिवर्तन ने इस क्षेत्र के रणनीतिक संतुलन में भी बड़े बदलाव की शुरुआत की. तालिबान की वापसी के तुरंत बाद, चीन सहित कई देशों ने एक अफ़ग़ानिस्तान को लेकर एक ऐसी रणनीति अपनाने की कोशिश की, जो उनके अपने हितों को सुरक्षित रखे. हालांकि, इस दौरान इन देशों का ये भी प्रयास रहा कि, तालिबान के साथ जुड़ने के बावजूद वो इस समूह को कानूनी मान्यता देते हुए ना दिखें. तालिबान से जुड़ाव के बावजूद उसके ख़िलाफ़ दिखना इन देशों के लिए काफ़ी दुविधा भरी स्थिति रहा. इस टाल-मटोल के बीच, चीन उन पहले देशों में शामिल था, जिन्होंने तालिबान के नेतृत्व वाले शासन के प्रति सामान्य संबंध वाला दृष्टिकोण अपनाया. अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की वापसी से चीन को भी अफ़ग़ानिस्तान में अपनी चालबाजियां दिखाने का मौका मिल गया, भले ही इस घटनाक्रम ने उसकी सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया हो. बीजिंग ने पश्चिमी देशों से उनके द्वारा की गई हड़बड़ी में की गई गड़बड़ी का जायजा लेने का आग्रह किया. इसके साथ ही चीन ने अफ़ग़ानिस्तान में और ज़्यादा आर्थिक निवेश की अपील की, जिससे अफ़ग़ानिस्तान को फिर से दुनिया की मुख्यधारा में लाने के लिए मज़बूत केस बन सके. अफ़ग़ानिस्तान में काम करने की बीजिंग की इसी इच्छा को देखते हुए तालिबान भी चीन को अपना सबसे महत्वपूर्ण भागीदार मानता था. इसके बाद चीन, अफ़ग़ानिस्तान में एक नया राजदूत नियुक्त करने वाला और तालिबान द्वारा नियुक्त राजदूत को अपने यहां स्वीकार करने वाला पहला देश बन गया.

2021 में, अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका समेत पश्चिम देशों की वापसी के बाद चीन ने जितनी तेज़ी से राजनयिक गतिविधियां की, उसका बीजिंग का फायदा भी मिला, लेकिन पिछले चार साल में चीन ने अफ़ग़ानिस्तान में जो छूट हासिल की थीं, वह कम हो गई हैं. अफ़ग़ानिस्तान को चीन कोई ठोस लाभ देने में विफल रहा है क्योंकि सुरक्षा हितों को लेकर उसकी चिंताएं काफ़ी हद तक जस की तस बनी हुई हैं. सुरक्षा के मोर्चे पर, अफ़ग़ानिस्तान में ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) के सदस्यों की मौजूदगी के बारे में चीन की आशंकाएं बनी हुई हैं. ये संगठन चीन के पश्चिमी शिनजियांग के उइगरों मुसलमानों से बना हुआ है, और इस समूह के पास चीन को अस्थिर करने की क्षमता है. यही वजह है कि चीन ने अफ़ग़ानिस्तान से इनके ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई तेज करने की अपील की है. इस तरह की भी रिपोर्ट्स हैं कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) ईटीआईएम के सदस्यों को अपने यहां भर्ती करने की कोशिश कर रहा है. चीन के नागरिक अक्सर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दोनों जगह आतंकी हमलों के निशाने पर आते रहे हैं. आईएसकेपी ने जनवरी 2025 में, अफ़ग़ानिस्तान के तख़र प्रांत में  एक चीनी कर्मचारी पर हमले का दावा किया. इससे पहले दिसंबर 2022 में काबुल के उस होटल पर भी हमला हुआ था, जहां चीनी व्यापारियों को अक्सर देखा जाता था. इसके अलावा, पाकिस्तान में भी चीन के कर्मचारियों, परियोजनाओं और उसके हितों को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा निशाना बनाया गया है, विशेष रूप से पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में चल रही दासू जलविद्युत परियोजना में काम कर रहे चीनी कर्मचारियों पर हमले हुए हैं.

तालिबान सुप्रीम लीडर से न मिल पाना दिखाता है कि अफ़ग़ानिस्तान पर चीन का असर काफ़ी घट चुका है।

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में चीनी नागरिकों पर हो रहे इन हमलों ने आर्थिक मोर्चे पर हुई प्रगति को भी पटरी से उतार दिया है. अगस्त 2025 में, अफ़ग़ानिस्तान के खनिज और पेट्रोलियम मंत्रालय ने अमु दरिया तेल क्षेत्र में अन्य कारणों के अलावा, गारंटीकृत निवेश देने और अफ़ग़ानी नागरिकों को रोजगार देने में नाकामी की वजह से चीनी कंपनी, अफचिन का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म कर दिया. हालांकि, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को अफ़ग़ानिस्तान तक विस्तारित करने सहमति बनी है. इसके अलावा खनन और अन्य क्षेत्रों में चीन द्वारा निवेश बढ़ाने की चर्चा को अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ते चीनी आर्थिक हितों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवादी समूहों द्वारा उत्पन्न सुरक्षा ख़तरे ने ऐसी प्रगति को बहुत मुश्किल बना दिया है. चीन कुछ परियोजनाओं को शुरू करने में विफल रहा है.

पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के बीच कैसे फंसा चीन?
काबुल और इस्लामाबाद की पिछले साल जैसे ही पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच तनाव बढ़ा, चीन ने दोनों के लिए बातचीत की मेज पर लौटने के रास्ते बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 21 मई 2025 को, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तीन देशों के विदेश मंत्रियों के बीच एक अनौपचारिक बैठक की अध्यक्षता की. इसके बाद अगस्त 2025 में विदेश मंत्रियों की बैठक के छठे संस्करण का आयोजन किया गया. बैठकों की इस श्रृंखला की शुरुआत 2022 में की गई. विदेश मंत्रियों की बैठक के माध्यम से तीनों देशों ने अफ़ग़ानिस्तान में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विस्तार करने और सीमा पार आतंकवाद का मुकाबला करने पर सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता जताई. इस साल, जब पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए, तब चीन ने दोनों देशों से सुरक्षा सहयोग बढ़ाने, बाहरी हस्तक्षेप का मुकाबला करने और अपने क्षेत्रों का इस्तेमाल दूसरों के हितों को कमज़ोर करने के लिए नहीं करने का अनुरोध किया. चीन की मध्यस्थता के बाद पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान ने भी अपने संबंधों को राजदूत स्तर तक बढ़ाया. मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के विदेश मंत्रियों के साथ हाल की बैठकों में, चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने सुरक्षा संबंधी मामलों में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान पर सहयोग बढ़ाने का मामला उठाया. जून 2025 में, सभी पांच मध्य एशियाई देशों के नेताओं ने शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध अफ़ग़ानिस्तान के लिए चीन के साथ एक संयुक्त बयान जारी किया और आतंकवाद से निपटने पर सहयोग करने पर सहमति व्यक्त की.

कई आकलन चीन की इन 'पहलों' को अपने हितों को मज़बूत करने वाले तंत्र बनाने की एक व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में देखते हैं. उनका कहना है कि इस क्षेत्र में तेज़ी से बदल रही सामरिक स्थितियों को देखते हुए चीन के लिए अस्थायी इंतज़ाम करने की बजाए दीर्घकालिक रणनीति बनाना ज़रूरी हो गया है. जून में कुनमिंग में चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच हुई बैठक में भी इसकी झलक दिखी. चीन ने इस क्षेत्र में आतंकवाद के ख़तरे का मुकाबला करने के लिए द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय दोनों तरह से प्रतिबद्धताओं को सुरक्षित करने की कोशिश की है.

भारत–अफ़ग़ानिस्तान नज़दीकी ने चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए नई रणनीतिक मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।

मध्य एशिया में तेज़ी से बदल रही परिस्थितियों में फिलहाल चीन एक मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण मानता है, वहीं पाकिस्तान भी तहरीक-ए-तालिबान का मुकाबला करने के लिए चीन को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहता है. इस्लामाबाद की कोशिश है कि, वो टीटीपी को चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए ख़तरे के रूप में पेश करे. हालांकि, अभी बीजिंग पाकिस्तान की बहुत ज़्यादा मदद कर पाने की स्थिति में नहीं है. पिछले साल नवंबर में, एक चीनी प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान पर टीटीपी के लगातार हमलों को रोकने के लिए कंधार में तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्ला अखुंदज़ादा से मिलने का इरादा किया था, लेकिन इस चीनी प्रतिनिधिमंडल की अखुंदजादा के साथ बैठक नहीं हो सकी. इस डेलिगेशन को सिर्फ कंधार के गवर्नर और तालिबान के प्रवक्ता से ही मिलने का मौका मिला. अमीर अखुंदज़ादा से मिलने में चीन की नाकामी दिखाती है कि अफ़ग़ानिस्तान पर उसका प्रभाव बहुत कम रह गया है.

चीन अब प्रमुख खिलाड़ी नहीं रहा?
इस बात में कोई शक नहीं कि पहले तालिबान के दूसरे अमीरात के आसपास की चर्चा में चीन का प्रभुत्व था. इसकी वजह ये थी कि, तब चीन दूसरे देशों की बात अफ़ग़ानिस्तान से कराने में सक्षम था और उसकी इसी भूमिका ने चीन को प्रमुख खिलाड़ी बनाया. लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही. हालांकि, चीन अभी भी अफ़ग़ानिस्तान के सामान्यीकरण का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन तालिबान अब अपने फायदे के हिसाब से काम कर रहा है. वो अफ़ग़ानिस्तान की महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाने में सफल रहा है. काबुल लगातार अन्य देशों के साथ जुड़ रहा है. तालिबान अर्थव्यवस्था-केंद्रित, लेन-देन वाली विदेश नीति दृष्टिकोण की अवधारणा के आधार पर अपनी साझेदारी में विविधता ला रहा है.

 
2025 की शुरुआत में, भारत के विदेश सचिव ने दुबई में तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री, अमीर खान मुत्ताकी से मुलाकात की. ये मीटिंग दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता थी. पहलगाम में हमले के बाद और मई में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में गिरावट आई. इससे भारत-अफ़ग़ानिस्तान के रिश्तों को और तेज़ी मिली. मुत्ताकी और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच टेलीफोन पर बातचीत और अक्टूबर में मुत्ताकी की भारत यात्रा, ये सभी घटनाक्रम दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़े पुनर्गठन का संकेत देते हैं. तालिबान के व्यापार मंत्री की हाल ही में संपन्न भारत यात्रा के दौरान किए गए वादों और आर्थिक मोर्चे पर सहयोग का विस्तार करने की सहमति ने भी संबंध प्रगाढ़ करने में योगदान दिया है. तालिबान ने आर्थिक और अन्य प्रकार के सहयोग को आगे बढ़ाते हुए मध्य एशियाई देशों के साथ भी अपनी भागीदारी बढ़ा दी है.

काबुल–इस्लामाबाद के टकराव के बीच चीन की मध्यस्थता की कोशिशें नाकाम होती दिख रही हैं।


अफ़ग़ानिस्तान के साथ भारत के बढ़ते जुड़ाव ने चीन और पाकिस्तान के लिए मुश्किल पैदा कर दी है. उनके लिए अब तालिबान के साथ काम करना कठिन हो रहा है. अगर तालिबान, भारत समेत दूसरे देशों के प्रति अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को पूरा करता है, तो इससे चीन को फायदा होगा, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान पर बढ़ते भारतीय प्रभाव को चीन के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदायक माना जाएगा. अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान के संबंधों में गिरावट के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. काबुल और इस्लामाबाद उकसाने वाली कार्रवाइयों में बढ़ा रहे हैं, ऐसी स्थिति में दीर्घकालिक समाधान के लिए मध्यस्थता करने के बीजिंग की कोशिश असफल होती प्रतीत होती है. अगर इन दोनों देशों के बीच शांति नहीं होती तो अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में चीन के हित अधर में लटके रहेंगे.


शिवम शेखावत ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.

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