Author : Arshia Roy

Expert Speak Young Voices
Published on Jan 08, 2026 Updated 1 Days ago

2026 में भारत के पास एआई को सबके लिए उपयोगी बनाने का बड़ा अवसर है- जानें कैसे भारत-एआई इम्पैक्ट समिट के ज़रिये एआई को विकास और जनकल्याण का साधन बनाकर इसे आम लोगों तक पहुँचाने की पहल कर रहा है.

2026 में भारत तय करेगा- एआई किसके लिए?

जैसे-जैसे दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग और उसके शासन को लेकर नियम-कायदे तय हो रहे हैं, वैसे-वैसे ग्लोबल साउथ के देशों के सामने यह चुनौती खड़ी हो गई है कि वे अपनी एक साझा और स्पष्ट सोच विकसित करें. यह सोच ऐसी होनी चाहिए जो देशों की अलग-अलग आर्थिक स्थिति, विकास की ज़रूरतों और सीमित संसाधनों को समझे ताकि एआई का फायदा सिर्फ़ कुछ चुनिंदा देशों तक ही न सिमट जाए.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में एआई की भूमिका 

एआई तेज़ी से वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदलने वाली तकनीक बन चुकी है. अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़ सकती है लेकिन चिंता की बात यह है कि इस आर्थिक लाभ का 84 प्रतिशत से अधिक हिस्सा उत्तरी अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों को मिलने की संभावना है. इससे वैश्विक तकनीकी व्यवस्था में नई असमानताएँ उभर रही हैं.

अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़ सकती है लेकिन चिंता की बात यह है कि इस आर्थिक लाभ का 84 प्रतिशत से अधिक हिस्सा उत्तरी अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों को मिलने की संभावना है.

आज एआई को राष्ट्रीय शक्ति का एक अहम आधार माना जाने लगा है. इसी कारण एआई से जुड़े हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और डेटा को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज़ हो गई है. व्यापारिक प्रतिबंध बढ़ रहे हैं और डेटा पर नियंत्रण की होड़ चल रही है. इसका नतीजा यह है कि कुछ ही देश एआई नवाचार और उसके नियम तय करने की स्थिति में हैं जबकि विकासशील देश तकनीक के उपभोक्ता बनकर रह जाने के जोखिम से जूझ रहे हैं.

अमेरिका एआई चिप निर्माण, कंप्यूटिंग क्षमता और वैश्विक क्लाउड ढांचे में आगे है. यूरोपीय संघ एआई के नियम और नैतिक मानक तय करने में नेतृत्व कर रहा है. वहीं चीन, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, अपने घरेलू एआई तंत्र को मज़बूत करने में लगातार निवेश कर रहा है. इसके विपरीत, ग्लोबल साउथ के कई देशों के पास न तो पर्याप्त कंप्यूटर संसाधन है और न ही पूंजी, जिससे वे एआई अर्थव्यवस्था में बराबरी की भागीदारी कर सकें.

भारत में एआई का उपयोग 

ऐसे समय में भारत 2026 में एक अहम मोड़ पर खड़ा है. एक ओर उसकी घरेलू एआई क्षमता तेज़ी से बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर उसकी वैश्विक भूमिका भी मज़बूत हो रही है. 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा और फरवरी में भारत-एआई इम्पैक्ट समिट की मेज़बानी करेगा. ये दोनों मंच भारत को यह अवसर देते हैं कि वह एआई को विकास और समावेशन के औज़ार के रूप में आगे बढ़ाने की पहल करें.

ग्लोबल साउथ के कई देशों के पास न तो पर्याप्त कंप्यूटर संसाधन है और न ही पूंजी, जिससे वे एआई अर्थव्यवस्था में बराबरी की भागीदारी कर सकें.

भारत ने पहले ही स्वास्थ्य, कृषि और सरकारी सेवाओं जैसे अहम क्षेत्रों में एआई का उपयोग करते हुए बड़े पैमाने पर प्रभावी समाधान लागू किए हैं, जिनका लाभ करोड़ों नागरिकों तक पहुँचा है. डिजिटल तकनीक को जनकल्याण से जोड़ने के इस अनुभव ने भारत को एक भरोसेमंद उदाहरण के रूप में स्थापित किया है. वर्ष 2023 में जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक सार्वजनिक संसाधन के रूप में प्रस्तुत कर विकासशील देशों के लिए समावेशी डिजिटल विकास का रास्ता दिखाया. इसके बाद 2025 में पेरिस एआई एक्शन समिट में भारत ने ज़िम्मेदार, सुरक्षित और मानव-केंद्रित एआई को लेकर वैश्विक विमर्श को दिशा देने में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व क्षमता और मजबूत हुई.

भारत सरकार ने इंडिया एआई मिशन के तहत 10,300 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की है. इसके अंतर्गत हज़ारों जीपीयू की तैनाती और सैकड़ों एआई डेटा लैब स्थापित की जा रही हैं. स्वास्थ्य, कृषि और टिकाऊ शहरों के लिए उत्कृष्टता केंद्र बनाए गए हैं. आने वाले वर्षों में भारत में एआई से जुड़े कुशल पेशेवरों की संख्या दोगुनी होने की उम्मीद है.

वर्ष 2023 में जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक सार्वजनिक संसाधन के रूप में प्रस्तुत कर विकासशील देशों के लिए समावेशी डिजिटल विकास का रास्ता दिखाया.

ये सभी प्रयास भारत को इस स्थिति में ले आते हैं कि वह ग्लोबल साउथ के लिए एआई का एक व्यावहारिक और विकासोन्मुख मॉडल प्रस्तुत कर सके. यह मॉडल केवल तकनीकी उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षमता निर्माण, कौशल विकास और संस्थागत मज़बूती पर आधारित है. इसमें साझा शोध और सहयोग के ज़रिये ज्ञान का आदान–प्रदान, कंप्यूटर और डेटा जैसे संसाधनों तक समान और किफ़ायती पहुँच, तथा सुरक्षित, पारदर्शी और नैतिक एआई शासन पर विशेष ज़ोर दिया गया है. ऐसा दृष्टिकोण एआई को प्रतिस्पर्धा के औज़ार के बजाय समावेशी और टिकाऊ विकास का माध्यम बनाने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है. 

‘विज़न से एक्शन’ की परीक्षा

भारत-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 की थीम-‘विज़न से एक्शन’- आज के वैश्विक एआई विमर्श में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देती है. अब तक एआई पर अंतरराष्ट्रीय चर्चाएँ अधिकतर सिद्धांतों, नैतिक घोषणाओं और साझा इरादों तक सीमित रही हैं लेकिन तेजी से बदलती तकनीकी और भू-राजनीतिक परिस्थितियों में केवल संकल्प पर्याप्त नहीं हैं. आवश्यकता इस बात की है कि एआई को लेकर लिए गए वादों को ज़मीन पर उतारा जाए और उन्हें ठोस नीतियों, संस्थागत ढाँचों और व्यावहारिक समाधानों में बदला जाए.

यदि भारत इस दिशा में सफल होता है, तो 2026 केवल एक सम्मेलन वर्ष नहीं रहेगा, बल्कि वह वर्ष बन सकता है जब ग्लोबल साउथ ने एआई के भविष्य को अपने विकास और प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालना शुरू किया.

इस संदर्भ में भारत-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 विशेष महत्व रखती है. ‘लोग, धरती और प्रगति’ के सिद्धांतों पर आधारित यह पहल एआई को केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के रूप में देखने का आग्रह करती है. समिट का उद्देश्य ऐसे सहयोगी मॉडल विकसित करना है, जिनसे एआई का लाभ आम नागरिक तक पहुँचे, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो और विकास अधिक न्यायसंगत तथा टिकाऊ बने.

ग्लोबल साउथ के देशों के लिए यह समिट एक अहम अवसर है. एआई के क्षेत्र में संसाधनों, कंप्यूटिंग क्षमता और पूंजी की असमानता ने विकासशील देशों को अक्सर पीछे धकेला है. ऐसे में भारत की पहल यह परखने का अवसर देगी कि क्या साझा निवेश, क्षमता निर्माण, कौशल विकास और तकनीकी सहयोग के ज़रिये इस खाई को पाटा जा सकता है. यदि एआई को स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, शहरी प्रबंधन और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह करोड़ों लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकता है.

भारत के लिए भी यह समिट एक नेतृत्व परीक्षा है. घरेलू स्तर पर एआई अवसंरचना, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रतिभा निर्माण में किए गए निवेश तभी सार्थक होंगे, जब उन्हें वैश्विक सहयोग और ठोस परिणामों से जोड़ा जाए. यदि भारत इस दिशा में सफल होता है, तो 2026 केवल एक सम्मेलन वर्ष नहीं रहेगा, बल्कि वह वर्ष बन सकता है जब ग्लोबल साउथ ने एआई के भविष्य को अपने विकास और प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालना शुरू किया.


अर्शिया रॉय ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.

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