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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR की हवा को “स्वास्थ्य आपातकाल” कहा है और प्रदूषण रोकने के लिए जल्दी कदम उठाने की बात कही है.
Image Source: Getty Images
दिल्ली में वायु प्रदूषण हर साल बढ़ता स्वास्थ्य संकट है जिसे न मौसम अकेले समझा सकता है, न पराली. तो फिर जानें असली वजहें क्या हैं, नीतियाँ कहाँ चूक रही हैं और समाधान का रास्ता आखिर जाता कहाँ से है!
दिल्ली की हवा अब सिर्फ “मौसम” नहीं रही, यह हर साल लौटने वाली स्वास्थ्य चेतावनी बन चुकी है. सर्दियाँ आते ही आसमान धुंधला हो जाता है और लोग ऐसी हवा में साँस लेने को मजबूर होते हैं जो शरीर के लिए ज़हर जैसी है. इस हवा में छिपे होते हैं बेहद बारीक कण - PM2.5 - जो आँखों से दिखते नहीं लेकिन फेफड़ों और दिल तक असर डालते हैं. जब ये कण बढ़ते हैं तो AQI का आंकड़ा भी उछल जाता है और खतरे की घंटी बजने लगती है.
दिल्ली ही नहीं, पूरा उत्तर भारत इस अदृश्य दुश्मन से जूझ रहा है. अब ज़रूरत सिर्फ़ चेतावनी देने की नहीं है बल्कि तुरंत और ठोस कदम उठाने की है. सही डेटा, सख़्त नियम और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर सीधी कार्रवाई करने की है. वरना हर साल हम सिर्फ़ यही कहते रह जाएंगे, “हवा फिर बिगड़ गई है.”
सर्दियों में दिल्ली का AQI कई कारणों से बढ़ जाता है. खराब मौसम प्रदूषकों को हवा में फँसा देता है. गाड़ियों का धुआँ, कचरा जलाना, धूल, पटाखे और निर्माण कार्य इसके मुख्य कारण हैं. पहले पराली जलाने को सबसे बड़ा कारण माना जाता था लेकिन CPCB के 2025 के नए आँकड़ों के अनुसार दिल्ली के PM2.5 में इसका योगदान बहुत कम है.

Source: Central Pollution Control Board (CPCB)
2021 से पराली जलाने में 77.5 प्रतिशत की कमी आने के बावजूद, इस सर्दी में दिल्ली की हवा पिछले पाँच सालों में सबसे ज़्यादा खराब रही. अब PM2.5 में पराली जलाने का योगदान बहुत कम रह गया है. CPCB की रिपोर्ट में साल के सबसे ज़्यादा प्रदूषित कुछ दिनों को शामिल नहीं किया गया, फिर भी 2021 के बाद से पराली जलाने की हिस्सेदारी लगातार घटी है. हाल के CSE आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण अब गाड़ियों और अन्य स्थानीय स्रोतों से निकलने वाला धुआँ है.
दिल्ली की बनावट कटोरे जैसी है. सर्दियों में ठंडी हवा नीचे फँस जाती है और ऊपर गर्म हवा रहती है. इससे गंदी हवा बाहर नहीं जा पाती.
सर्दी के महीनों में प्रदूषण ज़मीन के बहुत पास रहता है. हवा कम चलती है और नमी भी कम होती है जिससे प्रदूषण और बढ़ जाता है. हाल ही में दीवाली के समय दिल्ली-NCR में ग्रीन पटाखों की इजाज़त दी गई थी. इससे सर्दियों में प्रदूषण और बढ़ने का खतरा है. इसके अलावा, अरावली पहाड़ियों को लेकर नए फ़ैसले से ज़्यादातर हिस्से से सुरक्षा हट गई है. इससे खनन बढ़ सकता है और हरियाली कम हो सकती है. अरावली पहाड़ियाँ रेगिस्तान की धूल और प्रदूषण को रोकने में मदद करती हैं. इनके नुकसान से दिल्ली की हवा और खराब हो सकती है. आज स्थिति यह है कि स्थानीय प्रदूषण और खराब मौसम मिलकर लोगों की सेहत को नुकसान पहुँचा रहे हैं और जलवायु बदलाव का असर भी बढ़ा रहे हैं.
हवा का प्रदूषण लोगों की सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा है, खासकर उत्तर भारत में. यहाँ ज़्यादातर लोग ऐसी हवा में रहते हैं जो WHO के मानकों से कहीं ज़्यादा गंदी है. PM2.5 सबसे खतरनाक प्रदूषक होता है. यह सीधे हमारे फेफड़ों के अंदर चला जाता है और साँस और दिल की बीमारियाँ पैदा करता है. इससे दमा, COPD और यहाँ तक कि धूम्रपान न करने वालों में भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है. WHO के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लगभग 42 लाख लोगों की समय से पहले मौत गंदी हवा के कारण होती है. 2023 में दिल्ली में हुई कुल मौतों में से 15 प्रतिशत मौतें हवा के प्रदूषण से जुड़ी थीं. यह संख्या 17,118 थी, जो 2018 से और बढ़ गई है. गंदी हवा सिर्फ दिल और फेफड़ों को ही नहीं बल्कि दिमाग को भी नुकसान पहुँचाती है. इससे याददाश्त कमजोर हो सकती है, स्ट्रोक और डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है. बच्चों के लिए यह और भी खतरनाक है. उनके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते इसलिए प्रदूषण से उनकी बढ़त रुक सकती है और उन्हें जीवन भर साँस की बीमारी हो सकती है.
NCDC (नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल) के आँकड़ों के अनुसार, 2022 से 2024 के बीच दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में साँस की बीमारी (ARI) के 2 लाख से ज़्यादा मामले आए. इनमें से 30 हज़ार से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. इससे साफ़ पता चलता है कि गंदी हवा दिल्ली के लोगों की सेहत को बहुत नुकसान पहुँचा रही है.
नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) भारत की एक योजना है जिसका मकसद 131 शहरों की हवा को साफ़ करना है. इसका लक्ष्य 2026 तक हवा में धूल और प्रदूषण को कम करना है. इस योजना के बावजूद, दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा में PM10 और PM2.5 का स्तर अब भी बहुत ज़्यादा है. भारत के हवा के मानक (NAAQS), WHO के बताए सुरक्षित स्तर से काफ़ी ढीले हैं. इसका मतलब है कि नियम पूरे होने पर भी हवा सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है. NCAP (नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम) के ज़्यादातर पैसे सड़कों की धूल कम करने में खर्च हो रहे हैं. बहुत कम पैसा प्रदूषण को मापने और रोकने की तैयारी पर लगाया जा रहा है.
सिर्फ़ धूल साफ़ करना काफ़ी नहीं है. गाड़ियों के धुएँ और कचरा जलाने पर रोक लगाने से प्रदूषण ज़्यादा कम हो सकता है.
एक जाँच में पता चला कि दिल्ली के लगभग 22 हवा मापने वाले स्टेशन नियमों का सही पालन नहीं कर रहे थे. कुछ स्टेशन पेड़ों या दीवारों के पास लगे थे, जिससे सही माप नहीं हो पाता. कई जगह मशीनों की ठीक से देखभाल भी नहीं की गई. इससे हवा से जुड़े आँकड़े भरोसेमंद नहीं रह जाते. दिल्ली में प्रदूषण का अंदाज़ा लगाने के लिए तकनीक भी बनाई गई है ताकि पहले से चेतावनी देकर लोगों की सेहत बचाई जा सके. 2021 में सरकार ने हवा से होने वाली बीमारियों से बचाव के लिए एक स्वास्थ्य योजना बनाई. इसमें AQI बढ़ने पर अस्पतालों को तैयार रखना, दवाइयों का इंतज़ाम करना और लोगों को सावधान करना शामिल है लेकिन सही और समय पर आँकड़े न मिलने से ये योजनाएँ ठीक से काम नहीं कर पातीं. कई शहरों को समय से चेतावनी नहीं मिलती. GRAP नाम की योजना में प्रदूषण बढ़ने पर निर्माण कार्य, गाड़ियों और फैक्ट्रियों पर रोक लगाई जाती है. इससे थोड़ी राहत मिलती है लेकिन यह समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाती. कुल मिलाकर, नियम और योजनाएँ तो हैं लेकिन उन्हें सही तरह से लागू नहीं किया जा रहा. दिल्ली की गंदी हवा और लोगों की सेहत को बचाने के लिए अब तुरंत और ठोस कदम उठाने ज़रूरी हैं.
अब सभी मानने लगे हैं कि गंदी हवा से सेहत को बहुत नुकसान हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR की हवा को “स्वास्थ्य आपातकाल” कहा है और प्रदूषण रोकने के लिए जल्दी कदम उठाने की बात कही है. दूसरे देशों के अनुभव बताते हैं कि साफ़ हवा पर किया गया खर्च फायदेमंद होता है. अमेरिका में एक डॉलर खर्च करने पर लगभग 30 डॉलर का फायदा हुआ जैसे इलाज का खर्च कम होना, लोग बेहतर काम कर पाना और ज़्यादा समय तक जीना इसलिए साफ़ हवा को सिर्फ़ पर्यावरण नहीं बल्कि सेहत और अर्थव्यवस्था की बड़ी ज़रूरत मानना चाहिए. अभी के लिए ज़रूरी है कि NCAP, स्वास्थ्य योजना और GRAP मिलकर काम करें. हवा के आँकड़ों के आधार पर पर्यावरण और स्वास्थ्य विभाग दोनों को एक साथ कार्रवाई करनी चाहिए. इसके लिए एक ही जगह पर डेटा देखने और फैसले लेने की व्यवस्था होनी चाहिए. लंबे समय में, प्रदूषण को सच में कम करने के लिए कई कदम उठाने होंगे. GRAP के नियम प्रदूषण बढ़ने पर मदद करते हैं लेकिन स्थायी समाधान के लिए गाड़ियों के धुएँ को कम करना ज़रूरी है. इसके लिए साफ़ ऊर्जा अपनानी होगी, बस-मेट्रो जैसी सुविधाएँ बेहतर करनी होंगी और बिना धुआँ छोड़ने वाले साधन बढ़ाने होंगे.
निमिषा चड्ढा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में सेंटर फ़ॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी के साथ रिसर्च असिस्टेंट के रूप में काम करती हैं.
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Nimisha Chadha is a Research Assistant with ORF’s Centre for New Economic Diplomacy. She was previously an Associate at PATH (2023) and has a MSc ...
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