Author : Ishika Ranjan

Expert Speak Young Voices
Published on Sep 24, 2025 Updated 2 Days ago

परख 2024 के आंकड़े पूरे भारत में दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की पढ़ाई में लगातार बनी हुई कमी को रेखांकित करते हैं. इससे शिक्षण के तौर तरीक़ों, नीतियों और सबके लिए समावेशी शिक्षा में समता पर केंद्रित व्यापक क़दम उठाने की फ़ौरी ज़रूरत उजागर होती है

परख 2024 रिपोर्ट: भारत में शैक्षणिक असमानता और समान शिक्षा की चुनौती

Image Source: Pexels

संविधान की धारा 46, शिक्षा के अधिकार क़ानून (2009) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) के ज़रिए प्रकट होने वाली भारत की संवैधानिक और नीतिगत प्रतिबद्धताएं, सबके लिए समावेशी और समान रूप से अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने का वादा करती हैं. हालांकि, इन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 से हाल ही में प्राप्त हुए आंकड़े ये बताते हैं कि पूरे देश में दलित (SC), आदिवासी (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के छात्र शिक्षा के मामले में बेहद पिछड़े हुए हैं. इस लेख में हम छात्रों की उपलब्धियों के पैटर्न, राष्ट्रीय औसत और बड़े भारतीय राज्यों के तमाम सामाजिक समूहों के बीच, ख़ास तौर से भाषा और गणित के मामले में असमानताओं की पड़ताल कर रहे हैं.

परख के आंकड़े किस पर रौशनी डालते हैं?

परख 2024 के आंकड़े ज़्यादातर राज्यों के अधिकतर दर्जों और विषयों में लगभग एक जैसे पैटर्न को रेखांकित करते हैं: इनमें ऊंच-नीच का एक अनुक्रम नज़र आता है. जहां ‘अन्य’ [1] छात्र, OBC छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं ,और OBC छात्र दलित छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं और फिर अनुसूचित जातियों के छात्र, अनुसूचित जनजातियों के छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं. यानी आदिवासी छात्र रैंकिंग में लगातार सबसे नीचे ही रहते हैं. इन आंकड़ों की सबसे चिंताजनक बात तो ये है कि जैसे-जैसे छात्र स्कूल की पढ़ाई में आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे इन सामाजिक समूहों के छात्रों के बीच का फ़ासला और बढ़ता जाता है. राष्ट्रीय स्तर पर कक्षा 3 की भाषा के विषय में अन्य वर्गों और आदिवासी छात्रों के बीच अंतर 5 प्रतिशत का है; लेकिन, कक्षा 9 तक आते आते ये फ़ासला बढ़कर 13 अंक पहुंच जाता है. ये बढ़ती खाई न सिर्फ़ शिक्षा व्यवस्था की पिछड़े छात्रों को भरपाई करने वाला सहयोग देने की नाकामी है, बल्कि गहरी संस्थागत असमानताओं को भी उजागर करती है, जिसमें ऐसा पाठ्यक्रम उपलब्ध कराना जो ये मानकर चलता है कि सभी छात्र बराबर से तैयार होंगे, परिकल्पना जटिल होते जाने पर सीमित मंच देना और सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के अन्य प्रभावों का बुरा असर शामिल है.

परख 2024 के आंकड़े ज़्यादातर राज्यों के अधिकतर दर्जों और विषयों में लगभग एक जैसे पैटर्न को रेखांकित करते हैं: इनमें ऊंच-नीच का एक अनुक्रम नज़र आता है. जहां ‘अन्य’ छात्र, OBC छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं ,और OBC छात्र दलित छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं और फिर अनुसूचित जातियों के छात्र, अनुसूचित जनजातियों के छात्रों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं. यानी आदिवासी छात्र रैंकिंग में लगातार सबसे नीचे ही रहते हैं. 

कक्षा 3 में भाषा और गणित दोनों ही विषयों में सामाजिक समूहों के बीच फ़ासला बहुत से राज्यों में बहुत कम और आम तौर पर 2 से 5 प्रतिशत ही है. फिर भी कई राज्यों में इतने शुरुआती शैक्षणिक स्तर पर भी विभिन्न सामाजिक समूहों में भारी अंतर नज़र आता है. पश्चिम बंगाल में भाषा के विषय में आदिवासियों और दूसरे समुदायों के छात्रों में 15 (48 बनाम 63) अंकों का अंतर है. वहीं OBC और दूसरे वर्ग के छात्रों के बीच 11 अंक, तो दलितों और अन्य वर्गों के बीच 8 अंकों का फ़र्क़ दिखाई देता है. आम तौर पर इतने शुरुआती दौर में अलग अलग समुदायों के छात्रों के बीच इतना फ़ासला कहीं और नहीं दिखाई देता. पश्चिम बंगाल के बाद झारखंड का नंबर आता है, जहां सभी वर्गों के छात्रों के बीच 9-10 अंकों का अंतर है (SC 54, ST 54, OBC 53 बनाम अन्य 63). शिक्षा के शुरुआती स्तर पर ही ये असमानताएं घर और स्कूल के बीच भाषा के अंतर की बाधा, प्री प्राइमरी स्तर पर सीमित पढ़ाई और अध्यापकों की भारी क़िल्लत की दर से जोड़कर देखे जाते हैं. यहां तक कि शिक्षा के मामले में शानदार प्रदर्शन करने वाले राज्यों जैसे कि केरल में भी ये असमानताएं दिख जाती हैं. केरल में कक्षा 3 के आदिवासी छात्र भाषा में 70 अंक लाते हैं, जबकि अन्य वर्ग के छात्र 78 अंक लाते हैं. वहीं, पंजाब में अन्य छात्रों के अंक 81 हैं, तो आदिवासी छात्रों का औसत 73 है. यहां व्यवस्था का उच्च औसत आदिवासियों और प्रवासी परिवारों के लगातार बने हुए प्रतिकूल हालात पर पर्दा डाल देता है. क्योंकि इन राज्यों में बाधाएं अध्यापकों की क़िल्लत की वजह से कम और स्थान व सामाजिक तौर पर अलग-थलग होने की वजह से ज़्यादा होती हैं.

Figure 1 & 2: सामाजिक समूहों के बीच भाषा और गणित विषय के राष्ट्रीय ट्रेंड

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

स्रोत: परख डैशबोर्ड 2024 की मदद से लेखिका द्वारा स्वयं तैयार किए गए आंकड़े

कक्षा 3 के छात्रों के बीच राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS) के 2017 और 2021 के दौर के आंकड़ों की तुलना करने पर इस बात की पुष्टि होती है कि अंकों में अंतर का उतार चढ़ाव तो मामूली तौर पर दिखता है. लेकिन, मोटा पैटर्न जस का तस बना रहता है. यहां इस बात पर भी ग़ौर करना ज़रूरी है कि NAS में ‘सामान्य वर्ग’ कहा जाता है, वहीं परख के ‘अन्य’ वर्ग के दायरे में दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों के अलावा बाक़ी सभी सामाजिक और धार्मिक समूहों को शामिल किया जाता है, जो संवैधानिक दर्जों के बाहर आते हैं. Figure 3 और 4 में पढ़ाई के नतीजों में ये स्थिरता नज़र आती है: सभी वर्गों के बीच सीमित प्रगति देखी गई है. वहीं उपलब्धि का अनुक्रम इन सभी मूल्यांकनों में लगभग उसी तरह दोहराता दिखता है. मिसाल के तौर पर भाषा के मामले में जहां 2024 में अन्य वर्गों के छात्रों के अंक 2017 में 68.1 थे, वो 2021 में 64 और 2024 में 66 दर्ज किए गए. वहीं आदिवासी (ST) छात्रों के अंक क्रमश: 65.3, 61, और 61 रहे. गणित के अंकों की बात करें, तो वहां भी यही स्थिति दिखाई देती है. अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के छात्रों के अंक 2017 में 64.2 से 2024 में घटकर 60 रह गए. जबकि अनुसूचित जातियों (SC) के छात्रों के अंक इस पूरे चक्र में लगभग एक जैसे ही रहे (2017 में 61.9, 2021 में 57, 2024 में 60). दूरगामी अवधि की ये निरंतरता दिखाती है कि संस्थागत असमानताएं, लगातार किए जा रहे सुधारों के प्रयासों के बावजूद अपने आप दुरुस्त नहीं हो रही हैं.

Figure 3 और 4: अलग अलग समय में सामाजिक समूहवार कक्षा 3 के भाषा और गणित के अंक

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

स्रोत: परख डैशबोर्ड 2024 और NAS डैशबोर्ड 2017, NAS डैशबोर्ड 2021, NAS डैशबोर्ड 2024 की मदद से लेखिका द्वारा स्वयं तैयार किए गए आंकड़े

कुल मिलाकर देखें, तो ये सबूत तीन प्रमुख आयाम दिखाते हैं. पहला, शुरुआती स्तर का अंतर कक्षा के साथ-साथ बढ़ता जाता है. इससे ये संकेत मिलता है कि जैसे-जैसे पाठ्यक्रम की जटिलताएं बढ़ती जाती हैं, तो उसी अनुपात में शिक्षा व्यवस्था कमज़ोर वर्गों के छात्रों को उचित उपाय या मदद नहीं उपलब्ध कराती है.

कक्षा 6 तक आते आते, छात्रों के बीच ये असमानताएं और भी व्यापक हो जाती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर अन्य वर्गों के छात्र जहां भाषा में औसतन 61 अंक लाते हैं, वहीं दलित छात्रों (SC) का औसत 54 है और आदिवासी छात्रों (ST) का औसत सिर्फ़ 51 रह जाता है. गणित में अन्य वर्गों के छात्रों के 50 के मुक़ाबले आदिवासी छात्रों का औसत केवल 41 रहा है. राज्य स्तर के आंकड़े प्रतिकूल परिस्थितियों को और भी रेखांकित करते हैं. पश्चिम बंगाल में आदिवासी छात्र भाषा में औसत 45 अंक लाते हैं और गणित में सिर्फ़ 33. जबकि अन्य वर्ग के छात्रों का भाषा में औसत 59 और गणित में 45 है. तेलंगाना में भी यही चलन दिखता है: दलित छात्र कक्षा छह की गणित में 39 का औसत लाते हैं, तो अन्य वर्गों के छात्रों का औसत 51 है, यानी दोनों के बीच 12 अंकों का फ़ासला है. सबसे ज़्यादा फ़र्क़ तो केरल में देखा गया है, जहां भाषा के विषय में अन्य वर्गों के छात्रों का औसत 82 है, वहीं आदिवासी छात्रों का 61 (यानी शिक्षा के मामले में देश भर में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य में 21 अंकों का भारी फ़ासला है). वहीं गणित में अन्य वर्गों के छात्रों के औसत अंक 63 हैं तो आदिवासी छात्रों के 47, यानी इसमें भी 16 अंकों का अंतर है. इसकी तुलना में हिमाचल प्रदेश में तुलनात्मक रूप से ये खाई उतनी चौड़ी नहीं है. कक्षा 6 के गणित के अंक लगभग आस-पास ही हैं (SC 51, ST 53, अन्य 54). इससे पता चलता है कि अलग अलग ग्रेड वाले स्कूल होने और उचित क़दम उठाने से असमानताओं में कितनी कमी आ जाती है. असम में कक्षा 6 के भाषा के विषय में अन्य वर्गों के छात्र दलितों-आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के छात्रों से थोड़े कम अंक (55 बनाम 56) लाते हैं, जिससे आम तौर पर दिखने वाला अनुक्रम उल्टा होता नज़र आता है. कक्षा 9 तक आते आते असमानताएं और भयानक व स्थायी हो जाती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर जहां ST छात्र भाषा में औसत 47 अंक लाते हैं, वहीं अन्य वर्गों के छात्रों का औसत 60 होता है. वहीं, गणित में ये औसत 32 और 40 का हो जाता है. कई राज्यों में ख़ास तौर पर ये फ़ासला नज़र आता है. झारखंड में दलित और आदिवासी छात्र भाषा में औसतन 45-46 अंक लाते हैं, तो अन्य वर्गों के छात्र 62 (यानी 16-17 अंकों का अंतर). जबकि गणित में अन्य छात्रों के 42 के मुक़ाबले आदिवासी छात्र 30 अंक हासिल करते हैं. ओडिशा में भी यही खाई नज़र आती है, जहां ST छात्र भाषा में 49 और गणित में 34 अंक लाते हैं. जबकि अन्य वर्गों के छात्रों के औसत अंक क्रमश: 68 और 47 रहते हैं. शानदार प्रदर्शन करने वाले राज्यों में भी यही चलन दिखाई देता है. केरल में कक्षा 9 में दलित और आदिवासी छात्रों का औसत 68 और 64 देखा गया है, जबकि अन्य वर्गों के छात्रों के औसत अंक 80 रहते हैं, यानी दोनों के बीच 12 से 16 अंकों का फ़ासला है. गणित में SC-ST के छात्रों का औसत 42 और 40 है, तो अन्य का 49 है. पंजाब में भी इसी तरह की असमानताएं दिखाई देती हैं. आदिवासी छात्र कक्षा नौ में भाषा के विषय में अन्य के 70 की तुलना में औसतन 52 अंक लाते हैं, जिससे 18 अंकों का फ़ासला नज़र आता है. इसके उलट असम और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में इन असमानताओं पर अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रण पाया गया है. असम में कक्षा 9 के सभी वर्गों के छात्रों के अंक लगभग समान हैं (भाषा में SC 51, ST 51, OBC 55, अन्य 53; गणित में SC 35, ST 33, OBC 35 और अन्य 37). वहीं, हिमाचल प्रदेश में भाषा के विषय में सभी वर्गों के छात्रों के औसत अंक 62 और 68 के बीच रहे हैं.

Figure 5-8: पंजाब और केरल में सभी सामाजिक वर्गों के बीच भाषा और गणित के अंकों का औसत 

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

Addressing Educational Inequality In India Insights From Parakh 2024

 

स्रोत: परख डैशबोर्ड 2024 की मदद से लेखिका द्वारा स्वयं तैयार किए गए आंकड़े

कुल मिलाकर देखें, तो ये सबूत तीन प्रमुख आयाम दिखाते हैं. पहला, शुरुआती स्तर का अंतर कक्षा के साथ-साथ बढ़ता जाता है. इससे ये संकेत मिलता है कि जैसे-जैसे पाठ्यक्रम की जटिलताएं बढ़ती जाती हैं, तो उसी अनुपात में शिक्षा व्यवस्था कमज़ोर वर्गों के छात्रों को उचित उपाय या मदद नहीं उपलब्ध कराती है. दूसरा, गणित के मामले में कमज़ोर तबक़े के छात्र अधिक अलग थलग पड़ते जाते हैं, जिससे उच्च शिक्षा और कौशल पर आधारित रोज़गार के अवसर उनके लिए सीमित होते जाते हैं. तीसरा शिक्षा के मामले में अच्छा प्रदर्शन, असमानताएं घटाने की गारंटी नहीं देता. केरल और पंजाब में शिक्षा की व्यवस्था बेहद मज़बूत है. लेकिन, इन राज्यों में भी जाति पर आधारित अनुक्रम तब तक बना रहेगा, जब तक लक्ष्य करके इनको कम करने के क़दम नहीं उठाए जाते हैं.

शिक्षा के परिणामों में समता लाने के लिए उठाए जाने वाले क़दम

भारत सरकार ने पढ़ाई में SC, ST और OBC छात्रों की इन कमियों को दूर करने के लिए वज़ीफ़े, रिहाइशी स्कूल व्यवस्था और लक्ष्य आधारित कल्याणकारी पहलें की हैं. हालांकि, हाल के आंकड़े ये दिखाते हैं कि बजट आवंटन में लगातार वृद्धि के बावजूद लाभार्थी छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट देखी जा रही है. मिसाल के तौर पर मैट्रिक के बाद SC छात्रों को मिलने वाली स्कॉलरशिप की रक़म 2019-20 में 2710 करोड़ थी, जो 2023-24 में बढ़कर 5475 करोड़ हो गई. लेकिन, इसी अनुपात में लाभार्थियों की तादाद में 12.7 प्रतिशत की गिरावट भी आई. आवंटन और लाभार्थियों की संख्या में ये व्यतिक्रम नीतियों को लागू करने में आने वाली संस्थागत और प्रक्रियागत चुनौतियों को उजागर करता है. इसकी प्रमुख वजह डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) को आधार से जोड़ने की अनिवार्य शर्त है. वैसे तो इसका मक़सद फंड ट्रांसफर को सुगम बनाना है. लेकिन, ग्रामीण इलाक़ों में छात्रों के पास फ़ोन न होने, कम डिजिटल साक्षरता होने और कनेक्टिविटी के भरोसेमंद न होने की वजह से उनको ये सुविधा हासिल नहीं हो पा रही है. इसके अलावा फंड के वितरण में होने वाली देरी भी एक कारण है जिससे छात्रों को अपने वज़ीफ़े के लिए दो से तीन साल तक का इंतज़ार करना पड़ता है और पैसे नहीं देने की सूरत में अकादेमिक संस्थान उनको दस्तावेज़ नहीं देते या फिर जुर्माने लगाते हैं. वित्तीय और लॉजिस्टिकल नीतियों के अलावा शिक्षा व्यवस्था को अध्यापन और सामाजिक बाधाओं को भी दूर करना चाहिए, जिसमें जाति पर आधारित भेदभाव की चुनौती शामिल है. स्पष्ट और अपरोक्ष रूप से किया जाने वाला जातिगत भेदभाव कक्षा में भागीदारी और समान शिक्षण पर गहरा असर डालता है. मातृ भाषा में शिक्षा देने की जिस व्यवस्था की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) वकालत करती है, उसको लागू करने से भी और सुधार लाया जा सकता है.

भविष्य के प्रयासों में अध्यापकों पर केंद्रित मॉडल अपनाया जाना चाहिए, और ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रशिक्षण प्रासंगिक है और ट्रेनिंग के बाद भी अध्यापकों को सहायता दी जानी चाहिए, ताकि वो अध्यापन के नए हुनर को पढ़ाने में लागू कर सकें.

इस बहुआयामी चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए शिक्षा की समानता लाने के लिए एक दूरदर्शी सोच वाली रूप-रेखा की ज़रूरत है. इसके लिए सिर्फ़ वित्तीय सहायता देने के बजाय एक व्यापक रणनीति बनाने की ज़रूरत है, जिसमें लक्ष्य पर केंद्रित अकादेमिक, मनोवैज्ञानिक और संस्थागत क़दम उठाए जा सकते हैं. जैसे कि:

  • हाशिए पर पड़े छात्रों के लिए लक्ष्य आधारित और सबकी बराबरी हासिल करने में मदद करने वाले क़दम उठाए जाएं. इस मामले में ‘सही स्तर पर शिक्षा देने’ (TaRL) मॉडल अपनाया जा सकता है, जिसे प्रथम ने विकसित किया है जो कम लागत में बड़े पैमाने पर लागू किया  जा सकता है और जिससे बुनियादी शिक्षा में सुधार आता देखा गया है.

  • छात्रों को सामाजिक आर्थिक बाधाओं से उबरने के लिए ज़रूरी कौशल और आत्मविश्वास के मामले में सशक्त बनाने के लिए मेंटॉरशिप और सहयोग के एक व्यापक नेटवर्क की स्थापना करना.

  • समावेशी शिक्षण के लिए अध्यापकों को नियमित रूप से लागू किए जाने वाले और संदर्भ आधारित भागीदारी के लिए प्रशिक्षित करना. भविष्य के प्रयासों में अध्यापकों पर केंद्रित मॉडल अपनाया जाना चाहिए, और ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रशिक्षण प्रासंगिक है और ट्रेनिंग के बाद भी अध्यापकों को सहायता दी जानी चाहिए, ताकि वो अध्यापन के नए हुनर को पढ़ाने में लागू कर सकें.

व्यक्तिगत शिक्षा और ख़ुद से पढ़ने में मदद के लिए तकनीक का इस्तेमाल करना. डिजिटल खाई को पाटने के लिए ऑफलाइन और तकनीक पर आधारित ऐसे समाधान उपलब्ध कराने होंगे, जो  बेसिक मोबाइल फ़ोन पर काम करते हों.


The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.