Author : Rumi Aijaz

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Published on Jun 14, 2024 Updated 2 Days ago

शहरों की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, उसमें गंदे पानी की भूमिका एवं अनुपचारित गंदे पानी के दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, इसको कैस बेहतर तरीके से संचालित किया जाये इसका प्रयास जारी है.

गंदे पानी का प्रबंधन कर ‘जल संकट’ का समाधान मुमकिन!

भारतीय शहरों में पानी से संबंधित कई प्रकार की समस्याएं एक के बाद एक सामने आ रही हैं. एक तरफ, शहरों में रह रहे नागरिकों के लिए ज़रूरी पेयजल की उपलब्धता भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है. चूंकि, उपचार के बाद सप्लाई किये जाने वाले ताज़े पानी की मांग एवं आपूर्ति में काफी अंतर दिखता है, खासकर के अनियोजित इलाकों में. (उदाहरण के लिये उन अनाधिकारिक बस्तियों, झुग्गी झोपड़ियों में) जल की उपलब्धता काफी कम है. इसके अलावा भी, गैर-उपचारित गंदा जल कीअनुपलब्धता के कारण, लोग-बाग जो उपचार किया गया पीने के पानी नगरपालिका के पाइपलाइन से आपूर्ति की जाती है उसका इस्तेमाल अन्य ज़रूरतों जैसे बागवानी, वाहनों की साफ-सफाई, और ड्राइव-वे, शौचालयों की साफ-सफाई, हॉर्टिकल्चर, निर्माण एवं अन्य औद्योगिक उद्देश्यों के लिये करते हैं. साफ पानी के इस तरह के अनर्गल इस्तेमाल से, हमें उपलब्ध सीमित शुद्ध उपचारित जल खत्म होता है. इस कारण, ज़रूरतें पूरी करने के लिये धरती से अनावश्यक एवं ज़रूरत से ज़्यादा भू-जल निकाला जाता है. जिसके परिणामस्वरूप, भू-जल का वर्तमान स्तर निरंतर गिरता जा रहा है.   

साफ पानी के इस तरह के अनर्गल इस्तेमाल से, हमें उपलब्ध सीमित शुद्ध उपचारित जल खत्म होता है. इस कारण, ज़रूरतें पूरी करने के लिये धरती से अनावश्यक एवं ज़रूरत से ज़्यादा भू-जल निकाला जाता है. जिसके परिणामस्वरूप, भू-जल का वर्तमान स्तर निरंतर गिरता जा रहा है.   

दूसरी तरफ, खपत के बाद, बचे उपचारित ताज़े जल की एक मामूली मात्रा को, नागरिक एजेंसियों एवं अन्य संस्थाओं द्वारा पुनः उपयोग में लाने के लिए फिर से उपचारित किया जाता है. कई अन्य उपभोक्ताओं द्वारा जिसमें रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोग, संस्थागत, व्यावसायिक, मेडिकल और औद्योगिक प्रतिष्ठान शामिल हैं, वे सब गैर-उपचारित गंदा जल छोड़न के दोषी हैं. इस गंदे पानी से कई तरह का सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसान होता है.   

इस गंदे जल में कई तरह की अशुद्धियां व प्रदूषण के तत्व मौजूद होते हैं जिससे मिट्टी की गुणवत्ता, वनस्पति, सतही जल निकाय (जैसे- नदियां, नहरें, झीलें और तालाबों), भू-जल, एवं साथ ही मनुष्यों व वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. उदाहरण के लिए, हमारे देश में गरीबों का एक बड़ा वर्ग नहाने और कपड़ों को साफ करने के लिए नदियों के जल पर आश्रित होता है, जिसके कारण वे कई जल-जनित बीमारियों से पीड़ित हो जाते हैं एवं काफी मेहनत कमाये पैसों को स्वास्थ्य सेवाओं आदि पर खर्च करते हैं. 

गंदे जल का समाधान 

शहरों की जल की ज़रूरत की पूर्ति में गंदे पानी (या फिर इस्तेमाल किए जा चुके जल) की भूमिका, एवं गैर-उपचारित गंदा जल से प्राप्त होने वाले नकारात्मक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, इसके सही संचालन के लिए कोशिशें की जा रही हैं. इन मामों के विशेषज्ञों का सुझाव है कि पुनःइस्तेमाल के इन गंदे पानी को उस स्तर तक उपचारित किए जाने की आवश्यकता  है जहां, पानी पूरी तरह से किसी प्रकार की गंदगी से मुक्त हो जाये. 

इसके अलावा, ये भी कहा गया है कि अपर्याप्त तौर पर उपचारित गंदे जल (या वो जल जो तय मानक के अनुकूल नहीं है) उसको छोड़ना, अभी भी एक सामान्य प्रकिया है, जिसकी वजह से, गंदे पानी में रोग पैदा करने वाले जीवों (अथवा पैथोजन्स) पैदा होते हैं. वर्तमान समय में, भारत में कई वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं, ऐस विषाक्त गंदे पानी को छोड़ने का दोषी पाये गये हैं जो प्रकृति के स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक और नुकसानदायक साबित होते हैं. इसी तरह से, कई औद्योगिक इकाईयां भी, अपने आस-पास के जल निकायों में अनुपचारित गंदा पानी छोड़ते हैं. 

इस लेख में कुछ शहर में संस्थानिक स्तर पर शुरू किये गए गंदे जल के उपचार के पहल की चर्चा करता है. यह भारतीय शहरों में गंदे जल के उपचार प्रणाली संबंधी पहल एवं भारतीय शहरों में प्रौद्योगिकी संबंधी संभावनाओं को ढूँढने की कोशिश करता है. 

दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी) में, जल एजेंसी लगभग 946 मिलियन गैलन प्रतिदिन (एमजीडी) पानी की आपूर्ति करती है, और पूरा शहर लगभग 792 एमजीडी सीवेज या वेस्ट वॉटर का उत्पादन करता है. कुल अपशिष्ट या गंदे जल का लगभग 70 प्रतिशत (550 एमजीडी) विभिन्न सीवेज उपचार संयंत्रों में उपचार (ट्रीटमेंट) के लिये भेजा जाता है (STPs). इनमें से शुरू की गई कुछ अपशिष्ट जल उपचार टेक्नोलॉजी इंटरनेट ऑफ थिंग्स यानी (IoT) पर आधारित टेक्नोलॉजी हैं, जिनका इस्तेमाल केमिकल इनहांस्ड डोज़िंग के लिये किया जाता है, जिसके ज़रिये बायोलॉजीकल या जैविक ऑक्सीजन डिमांड, 10 मिलीग्राम प्रति लीटर (मिलीग्राम/लीटर) से नीचे टोटल सस्पेंडेड सॉलिड्स (TSS), एसटीपी के सीवेज के संयुक्त सैंपल के लिए रिमोट से नियंत्रित ऑटोमैटिक यूनिट और प्रक्रिया नियंत्रण पर रियल टाइम में प्रतिक्रिया पाने के लिए सूचना प्रबंधन प्रणाली सॉफ्टवेयर शामिल है. इस प्रकार, एजेंसी दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति द्वारा निर्धारित सभी गुणवत्ता नियंत्रण मापदंडों (हाइड्रोजन (पीएच) स्तर, बीओडी, रासायनिक ऑक्सीजन मांग (सीओडी) टीएसएस, तेल और ग्रीस स्तर, अमोनियाकल नाइट्रोजन स्तर और विघटित फॉस्फेट सहित) को बनाए रखने की कोशिश करती है (DPCC).

मौजूदा समय में, सिंचाई, बागवानी, हॉर्टिकल्चर, निर्माण, एवं उद्योग आदि में फिर से इस्तेमाल के लिए लगभग 89 एमजीडी उपचारित गंदे जल की आपूर्ति की जा रही है. गंदे जलों को अधिक से अधिक मात्रा को उपचारित करने का प्रयास निरंतर जारी है, ताकि पॉवर स्टेशन, ग्राउंड वॉटर री-चार्ज, शौचालयों, एवं मोटर वाहनों की धुलाई जैसी ज़रूरतें पूरी हो सकें. 

अभी भी दिल्ली और इसके आसपास के कई इलाके जिनमें कई अनाधिकृत/अनियमित कॉलोनी और बस्तियां शामिल हैं उनमें अब भी अंडरग्राउंड सीवेज सिस्टम अनुपलब्ध है. इन बस्तियों में बसे घरों से छोड़ा जाने वाला गंदा पानी, खुले, मैदानों एवं आस-पास के निचले इलाकों में लंबे समय तक के लिए जमा हो जाता है जिसके कारण वहां मच्छरों का प्रजनन बड़ी मात्रा होने लगता है.

दिल्ली सरकार इन समस्याओं के शीघ्र समाधान की दिशा में लगातार काम कर रही है, जिससे हमें बेहतर एवं अधिक लाभ प्राप्त मिल सके: सीवेज उपचार प्लांट (एसटीपी), जरूरत एवं क्षमता अनुसार जल उत्पन्न कर पाने में इस वजह से सक्षम नहीं है कि एसटीपी तक सीवेज का प्रवाह कम है, एसटीपी के साथ ट्रंक और उस परिधी की सीवर लाइनों के कनेक्शन में हो रही देरी, व गादयुक्त सीवर लाइनों के को दोबारा काम लायक बनाने संबंधी फैसले और कार्यों का अधूरा रहना भी एक समस्या है. इसके अलावा, अभी भी दिल्ली और इसके आसपास के कई इलाके जिनमें कई अनाधिकृत/अनियमित कॉलोनी और बस्तियां शामिल हैं उनमें अब भी अंडरग्राउंड सीवेज सिस्टम अनुपलब्ध है. इन बस्तियों में बसे घरों से छोड़ा जाने वाला गंदा पानी, खुले, मैदानों एवं आस-पास के निचले इलाकों में लंबे समय तक के लिए जमा हो जाता है जिसके कारण वहां मच्छरों का प्रजनन बड़ी मात्रा होने लगता है. ऐसी ही स्थिति, देश के कई छोटे, मझोले और बड़े शहरों में देखा जाता है, जिनमें अलीगढ़, फिरोज़ाबाद, मेरठ, और सरधना जैसे कमोबेश भारत के कई शहर शामिल हैं. उपचारित गंदा जल की गुणवत्ता के संदर्भ में, DPCC ने इस बात का संज्ञान लिया है कि कई एसटीपी निर्धारित मानकों के एक या दो शर्तों को अब भी पूरा कर पाने में असफल हैं. इस वजह से, इसके पुन:उपयोग के साथ-साथ यमुना नदी जैसे सतही जल निकायों में इनके छोड़े जाने को लेकर भी चिंता बराबर से कायम है. अपर्याप्त तौर पर उपचारित गंदे पानी के लगातार छोड़े जाने की वजह से भूजल की गुणवत्ता भी काफी तेज़ी से प्रभावित हो रही है.    

 

भारत के कुछ जगहों पर, गंदा जल उपचार संबंधी पायलट परियोजनाएं चल रही हैं: 

  • आईआईटी भुवनेश्वर परिसर में, गंदे जल में से पोषक तत्वों को हटाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं. ऐसा पता चला है कि पोषक तत्वों (नाइट्रोजन और फॉस्फोरस) युक्त गंदे जल के निपटान से, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा होता है.   

  • जयपुर में, एक डिब्बाबंद गंदा जल उपचार संयंत्र की स्थापना की गई है, जहां पैथोजिन से दूषित गंदे जन का ट्रीटमेंट किया जाएगा 

  • मुंबई में ताज़े जल पर दबाव कम होने की आशा इस बात से होने की उम्मीद है कि, वहां सिंचाई और खेती-बाड़ी के लिए उपचारित जल का संरक्षण एवं उसके दोबारा उपयोग को सुनिश्चित करने के लिये रोटेटिंग बायोलॉजिकल कॉन्ट्रैक्टर मुहैया कराये जाने की कोशिश है. 

  • खड़गपुर ने अपशिष्ट या गंदे जल से बीमारी पैदा करने वाले निष्क्रिय पोषक तत्वों के बायोलॉजिकल निष्कासन के लिए उपाय शुरू किए हैं. इसका उद्देश्य दोबारा उपयोग के लिए पानी के रूप में प्रोटीन युक्त बायोमास को पाना है.

  • रुड़की में सीवेज से पैदा होने वाले कीचड़ को कैसे मैनेज किया जाये, इसको लेकर काम शुरू हो गये हैं. इसके लिये थर्मल हाइड्रोलिसिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है. ये पर्यावरण को बदबूदार दुर्गंध और सतही, भूजल प्रदूषण से बचाता है एवं पैथोजेन के प्रसार को रोकता है. आईआईटी खड़गपुर में, कीचड़ के अल्ट्रासोनिक उपचार के कार्य की शुरुआत की गई है ताकि जैविक पदार्थों एवं बीमारियों को जन्म देने वाले  तत्वों को कम किया जा सके.   

  • आईआईटी मद्रास परिसर ने अवशिष्ट नाइट्रोजन-आधारित पोषक तत्वों को कम करने के लिए एक बायो-रियेक्टर स्थापित किया है; यह रियेक्टर उपचार किये गये अपशिष्टों की उपयोगिता कैसे बढ़ाई जाये इसके लिये काम करता है.

  • केंद्र प्रायोजित स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत, विभिन्न शहरों में गंदा जल संबंधित परियोजनाओं को अमल में लाया गया है. कुछ ऐसे उदाहरण हैं जैसे- कोयम्बटूर में जलनिकासी छिद्र (ड्रेनेज होल) एवं सेप्टिक टैंकों की सफाई में रोबोट इस्तेमाल में लाए गए, पटना में सीवर, और सेप्टिक टैंकों की मशीनीकृत सफाई में महिला सहकारी समिति को प्रशिक्षण दिया गया, पोर्ट-ब्लेयर में स्व-टिकाऊ कीचड़ उपचार संयत्र की स्थापना, एवं GIS-आधारित तराई माड्लिंग की मदद से सीवर नेटवर्क की डिज़ाइनिंग व साथ ही इंदौर में एक विकेंद्रीकृत STP की स्थापना की गई. 

वैश्विक स्तर पर, कई शहर 100 प्रतिशत तक गंदे जल के पुनर्चक्रण या रिसाइक्लिंग के लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में काम कर रहे हैं; कुछ तो पहले से ही गंदे जल को उस स्तर तक साफ कर रहे हैं, कि वो पीने के इस्तेमाल में लाया जा सके. ये कोशिश सस्टेनेबिलिटी की रणनीति का ही एक हिस्सा है.  

भारत के विभिन्न शहरी केंद्रों में हो रहे गंदे जल के प्रबंधन से जुड़े कार्यों की समीक्षा से बेहतर गुणवत्तायुक्त गंदे जल के महत्व को समझने में सहायक है; दिनोंदिन जिस तरह से पानी की मांग बढ़ती जा रही है उसे पूरा करने के लिये ये ज़रूरी है कि जल की उपलब्धता पर्याप्त और बड़ी मात्रा में हो. इस अभ्यास से संसाधन संरक्षण एवं अच्छी पर्यावरणीय स्थितियों के रख-रखाव में काफी मदद होगी. वैश्विक स्तर पर, कई शहर 100 प्रतिशत तक गंदे जल के पुनर्चक्रण या रिसाइक्लिंग के लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में काम कर रहे हैं; कुछ तो पहले से ही गंदे जल को उस स्तर तक साफ कर रहे हैं, कि वो पीने के इस्तेमाल में लाया जा सके. ये कोशिश सस्टेनेबिलिटी की रणनीति का ही एक हिस्सा है.  

शहरी भारत में, गंदा जल प्रबंधन एक निश्चित स्तर तक किया जाता रहा है, हालांकि, इसमें  और अधिक काम किए जाने की अब भी आवश्यकता है. 

  • जब तक कि पूरे शहरी स्तर पर सीवेरेज योजना, सीवेरेज इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे- आपस में जुड़े सीवर नेटवर्क और उपचार संयत्र) और सीवर सिस्टम/ खुले नाले को नियंत्रित करने की प्रशासनिक दक्षता हासिल नहीं हो जाती है तब तक गंदे पानी से जुड़ी समस्यायें बनी रहेंगी.   

  • गंदे जल के प्रबंधन के लिए ज़िम्मेदार नागरिक एजेंसियों के पास अपना काम करने के लिये पर्याप्त पैसा, जानकारी और तकनीकी दक्षता नहीं होने से भी वे अपना काम अच्छी तरह से कर पाने में असमर्थ हैं. अगर इन लोगों को केंद्र व राज्य सरकार एवं ग़ैर राज्य संस्थाओं द्वारा सहयोग दिया जाता है तो उससे इन्हें लाभ प्राप्त होगा.    

  • जो सीवेज उपचार संयंत्रों तक पहुंचता है उसकी भी गुणवत्ता काफी हद तक इसलिये खराब हो जाती है क्योंकि रास्ते में लोग कई प्रकार के तरल एवं ठोस कचरों को खुले नालों एवं सीवर लाइनों की दरारों में फेंक देते हैं. नागरिक निकायों एवं सिविक एजेंसियों द्वारा कराई जाने वाली लगातार सफाई और रखरखाव, एवं नागरिकों के बीच जागरूकता पैदा करने वाले विभिन्न अभियानों से भी उपचार संस्थाओं का बोझ हल्का हो सकता है. 

  • कुछ शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान  (जिनमे आईआईटी एवं आईआईएम भी शामिल है) उन्होंने गंदे जल के उपचार के लिए कम लागत वाली, पर्यावरण के अनुकूल, छोटे पैमाने या खर्चे वाली  तकनीक़ विकसित की है. नागरिक एजेंसियों के लिए ऐसी उभरती हुई एवं सहजता से उपलब्ध टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना काफी हद तक फायदेमंद साबित होगा. 

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