Author : Sohini Bose

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 12, 2026 Updated 1 Days ago

नेपाल में युवाओं के वोट ने राजनीति की दिशा बदल दी लेकिन बांग्लादेश में छात्र आंदोलन से निकली नई पार्टी एनसीपी चुनाव में बड़ी ताकत नहीं बन पाई. यह लेख बताता है कि क्यों आंदोलन की ऊर्जा के बावजूद एनसीपी सिर्फ कुछ सीटों तक सिमट गई और अब उसके सामने असली राजनीतिक चुनौती क्या है.

बांग्लादेश में क्यों हारा युवा? जानें वजह

कई बांग्लादेशियों के लिए नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) एक ताज़ी और भरोसेमंद आवाज़ के रूप में उभरी, ऐसे राजनीतिक माहौल में जहां लंबे समय से दो वंशवादी दल-बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और अवामी लीग-का वर्चस्व रहा है. एनसीपी की उत्पत्ति 2024 के जुलाई विद्रोह से हुई जिसने अवामी लीग सरकार के लंबे शासन का अंत किया. छात्र नेताओं से बनी इस पार्टी ने एक समावेशी और युवा-केंद्रित विचारधारा का समर्थन किया और उसे विश्वास था कि वह देश की अगली निर्वाचित सरकार बना सकती है.

हालांकि, चुनाव से पहले बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी (JeI) के साथ उसका गठबंधन विवाद का कारण बना. यह सवाल उठने लगा कि क्या यह साझेदारी मतदाताओं को असहज कर सकती है और एनसीपी की चुनावी संभावनाओं को कमजोर कर सकती है.

आलोचकों का कहना है कि कम सीटें मिलने के पीछे जमात-ए-इस्लामी के साथ उसका गठबंधन और पार्टी की संगठनात्मक कमजोरियाँ जिम्मेदार हैं. अब जब एनसीपी विपक्ष में अपनी भूमिका तय कर रही है, तो उसके उद्भव और बांग्लादेश के लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण में उसकी संभावित भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है.

12 फरवरी 2026 को हुए 13वें आम चुनाव के परिणामों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया. एनसीपी को जातीय संसद (जातीय संसद) की 299 सीटों में से केवल 6 सीटें मिलीं, जो कुल निर्वाचित सांसदों का लगभग 2 प्रतिशत है जहां एनसीपी इसे अपने चुनावी पदार्पण की एक सकारात्मक शुरुआत मानती है, वहीं आलोचकों का कहना है कि कम सीटें मिलने के पीछे जमात-ए-इस्लामी के साथ उसका गठबंधन और पार्टी की संगठनात्मक कमजोरियाँ जिम्मेदार हैं. अब जब एनसीपी विपक्ष में अपनी भूमिका तय कर रही है, तो उसके उद्भव और बांग्लादेश के लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण में उसकी संभावित भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है.

युवा आंदोलन से राजनीति तक

28 फरवरी 2025 को ‘स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन’ आंदोलन और जातीय नागरिक समिति से उत्पन्न एनसीपी को औपचारिक राजनीतिक दल के रूप में लॉन्च किया गया. इसके नेता 2024 के जुलाई विद्रोह में अपनी भूमिका के कारण काफी लोकप्रिय हुए थे. यह विद्रोह अवामी लीग सरकार द्वारा लागू आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ था. इन विरोध प्रदर्शनों ने बांग्लादेश के बड़े हिस्से की उस नाराजगी को आवाज़ दी, जो शेख हसीना सरकार पर कथित निरंकुशता और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण बढ़ रही थी.

अवामी विरोधी भावना के आधार पर बनी एनसीपी को जमात-ए-इस्लामी और हिफाज़त-ए-इस्लाम जैसे दक्षिणपंथी संगठनों से भी समर्थन मिला, जो सरकार की आलोचना कर रहे थे. उदाहरण के लिए, एनसीपी और पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने जुलाई विद्रोह के दौरान ‘सामूहिक हत्या’ के आरोप में अवामी लीग पर मुकदमा चलाने की माँग पर सहमति जताई और मुकदमा पूरा होने तक उसकी राजनीतिक गतिविधियों को ‘आतंकवादी गतिविधि’ बताया.

हालांकि विचारधारा के स्तर पर एनसीपी इन दक्षिणपंथी समूहों से अलग थी. बांग्लादेश की पहली छात्र-नेतृत्व वाली पार्टी ने एक मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाया और ‘दूसरे गणराज्य’ के निर्माण का लक्ष्य रखा. इसका अर्थ था. लोकतांत्रिक तरीकों से राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन, संवैधानिक सुधार और संस्थागत पुनर्गठन.

जुलाई विद्रोह से मिली भावनात्मक वैधता धीरे-धीरे कम होने लगी थी. फरवरी चुनाव से पहले के सर्वेक्षणों में एनसीपी का समर्थन एक अंक तक सिमटता दिखाई दे रहा था. ऐसे में गठबंधन का निर्णय मुख्यतः राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए लिया गया.

फिर भी एनसीपी के सामने एक बड़ी चुनौती थी-वह एक आंदोलन से एक संगठित राजनीतिक दल में बदलने के लिए पर्याप्त अनुभव और संसाधन नहीं रखती थी. उसे संगठनात्मक ढाँचा, चुनाव प्रचार तंत्र और राजनीतिक दमन से सुरक्षा की जरूरत थी. छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद यह आवश्यकता और बढ़ गई. इसलिए पार्टी के भीतर विरोध के बावजूद एनसीपी ने जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया, क्योंकि वह इन संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकता था. जुलाई विद्रोह से मिली भावनात्मक वैधता धीरे-धीरे कम होने लगी थी. फरवरी चुनाव से पहले के सर्वेक्षणों में एनसीपी का समर्थन एक अंक तक सिमटता दिखाई दे रहा था. ऐसे में गठबंधन का निर्णय मुख्यतः राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए लिया गया.

चुकानी पड़ी गठबंधन की कीमत

इस फैसले के बाद एनसीपी के कई छात्र सदस्य पार्टी छोड़कर चले गए. उनका मानना था कि यह गठबंधन पार्टी के मूल उद्देश्य को कमजोर कर रहा है. जमात-ए-इस्लामी का महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका और इस्लामी राज्य की अवधारणा पर रूढ़िवादी दृष्टिकोण, एनसीपी की समतावादी और समावेशी विचारधारा से काफी अलग था. परिणामस्वरूप कुछ युवा मतदाताओं का समर्थन भी कम हुआ. दिलचस्प बात यह है कि कई विश्लेषकों ने जमात-ए-इस्लामी के एनसीपी के साथ गठबंधन को युवाओं को आकर्षित करने की रणनीति माना था, क्योंकि वह स्वयं को एक आधुनिक और लोकतांत्रिक इस्लामी राज्य के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करना चाहती थी.

चुनाव के बाद एनसीपी ने स्पष्ट किया कि चुनावी गठबंधन का मतलब राजनीतिक विलय नहीं है. पार्टी का कहना है कि जिन क्षेत्रों में उसके उम्मीदवारों ने दीर्घकालिक सामुदायिक जुड़ाव पर ध्यान दिया, वहाँ उन्होंने पारंपरिक संरक्षण-आधारित राजनीति से बेहतर प्रदर्शन किया. भविष्य में एनसीपी इसी मॉडल को आगे बढ़ाना चाहती है और स्थानीय चुनावों में स्वतंत्र रूप से लड़ने पर विचार कर रही है. हालांकि संसद में विपक्ष का हिस्सा होने के कारण उसकी भूमिका अभी भी गठबंधन की राजनीति से प्रभावित रहेगी. व्यापक गठबंधन की 77 सीटों में से 68 सीटें जमात-ए-इस्लामी के पास हैं, इसलिए उसके प्रभाव की छाया में एनसीपी के लिए अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना कठिन होगा.

असली चुनौती यह है कि क्या एनसीपी 2024 के जुलाई आंदोलन से मिले समर्थन को मजबूत संगठन और भरोसेमंद राजनीति में बदल पाएगी. अगर वह ऐसा नहीं कर पाई, तो वह केवल एक आंदोलन बनकर रह जाएगी जिसने अपने बड़े मौके को खो दिया.

फिर भी एनसीपी के पास जुलाई विद्रोह की भावनात्मक वैधता है-एक ऐसी भावना जो बांग्लादेश में 1971 के मुक्ति संग्राम की स्मृति जितनी ही शक्तिशाली राजनीतिक प्रभाव रखती है. दरअसल, यही कारण था कि जमात-ए-इस्लामी ने एनसीपी के साथ गठबंधन किया, ताकि वह इस भावनात्मक वैधता को साझा कर सकें और अपने ऊपर लगे ‘रज़ाकार’ होने के ऐतिहासिक आरोपों को कम कर सके.

राजनीतिक विश्वसनीयता की दिशा में

यदि एनसीपी बांग्लादेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाना चाहती है, तो उसे संसद में एक सिद्धांतवादी दबाव समूह के रूप में काम करना होगा, न कि जमात-ए-इस्लामी के एक छोटे सहयोगी के रूप में. विपक्ष में होने के कारण उस पर जनता की निगरानी अधिक रहेगी, और यही अवसर है कि वह अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाकर स्वतंत्र समर्थन आधार विकसित करे.

सिर्फ भावनाओं के सहारे कोई पार्टी लंबे समय तक मजबूत नहीं बन सकती. एनसीपी को ढाका के बाहर भी अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी. इसके लिए उसे स्थानीय चुनावों में भाग लेना, लोगों के बीच काम करना और अलग-अलग मुद्दों पर अन्य समूहों के साथ सहयोग करना होगा. साथ ही उसे अपने उदार और समावेशी विचारों को भी बनाए रखना होगा. असली चुनौती यह है कि क्या एनसीपी 2024 के जुलाई आंदोलन से मिले समर्थन को मजबूत संगठन और भरोसेमंद राजनीति में बदल पाएगी. अगर वह ऐसा नहीं कर पाई, तो वह केवल एक आंदोलन बनकर रह जाएगी जिसने अपने बड़े मौके को खो दिया.


सोहिनी बोस ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.

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