परमाणु हमले का ख़तरा हमेशा बना रहता है, इसके बावजूद ये मुद्दा पिछले कुछ साल में वैश्विक कूटनीतिक विमर्श से गायब हो गया था. हाल के कुछ संकट हमें याद दिलाते हैं कि दुनियाभर में अशांति के बीच परमाणु हमले का ज़ोखिम हमेशा बना रहता है.
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1 अगस्त 2025 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दो परमाणु पनडुब्बियों को "उचित क्षेत्रों में तैनात" करने का आदेश दिया. ट्रंप ने ये फैसला पूर्व रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के बयान के बाद लिया. मेदवेदेव ने कहा था कि परमाणु शक्ति से सम्पन्न पारंपरिक विरोधी देशों, अमेरिका और रूस, के बीच परमाणु युद्ध का ख़तरा है.
ये कदम ट्रंप की 31 जुलाई की उस टिप्पणी के तुरंत बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि "मुझे परवाह नहीं कि रूस के साथ भारत क्या करता है. वे अपनी मृत अर्थव्यवस्थाओं (डेड इकॉनमी)को मिलकर रसातल में ले जाएं, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता". दुनिया की सबसे जीवंत और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के नाते, भारत में ट्रंप की इस टिप्पणी को अविश्वास और मनोरंजन दोनों ही तरह से देखा गया.
हालांकि, रूस में ट्रंप की इस टिप्पणी ने एक अलग मोड़ ले लिया. "मृत" शब्द का इस्तेमाल करते हुए, मेदवेदेव ने उस "काल्पनिक डेड हैंड" का ज़िक्र किया, जो अर्ध-स्वचालित रूसी कमांड सिस्टम की ओर इशारा करता है. इस "डेड हैंड" के बारे में कहा जाता है कि परमाणु हमले में अपने नेतृत्व के नष्ट हो जाने के बाद भी वो रूसी मिसाइलें दागता रहेगा.
मेदवेदेव के बयान के जवाब में ही ट्रंप ने दो अमेरिकी परमाणु चालित पनडुब्बियों को नई जगह तैनात करने का आदेश दिया था. ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल पोस्ट में कहा था, "अगर ये मूर्खतापूर्ण और भड़काऊ बयान सिर्फ़ बयानबाजी से ज़्यादा हैं, तो क्या होगा?" ट्रंप जैसे व्यक्ति के साथ शब्दों के टकराव की संभावना को समझते हुए, रूस ने इस मुद्दे को तूल देना ज़रूरी नहीं समझा. रूस ने कहा कि अमेरिका के साथ कोई वास्तविक तनाव नहीं बढ़ा है और परमाणु मुद्दों को लेकर सभी को "बहुत सतर्क" रहने की ज़रूरत है.
रूस ने कहा कि अमेरिका के साथ कोई वास्तविक तनाव नहीं बढ़ा है और परमाणु मुद्दों को लेकर सभी को "बहुत सतर्क" रहने की ज़रूरत है.
ये बातचीत रूस और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच हुई है, क्योंकि ट्रंप यूक्रेन में युद्धविराम के लिए पुतिन पर दबाव बढ़ा रहे हैं. ट्रंप-मेदवेदेव विवाद तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने पुतिन के लिए शांति समझौते पर सहमत होने की समय सीमा 50 दिनों से घटाकर 12 दिन कर दी.
शीत युद्ध के दौरान बनाई गई हथियार नियंत्रण व्यवस्था के पतन के कारण दोनों परमाणु महाशक्तियों के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं. आज, शीत युद्ध के बाद के सभी प्रमुख अमेरिकी-रूसी हथियार नियंत्रण समझौते या तो समाप्त हो चुके हैं या, न्यू स्टार्ट संधि के मामले की तरह, निलंबित कर दिए गए हैं.
इस महीने की शुरुआत में, रूस ने घोषणा की थी कि वो अब मध्यम दूरी के परमाणु बल (आईएनएफ) संधि से बंधा नहीं रहेगा. अमेरिका इस समझौते से फरवरी 2019 में ही औपचारिक रूप से बाहर हो गया था. हालांकि, इस संधि से बाहर होने का अमेरिका का उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की मिसाइलों का मुकाबला करना था. वहीं रूस के इस समझौते से देर से बाहर निकलने का मक़सद यूरोप को संदेश भेजना था. रूस ये संदेश देना चाहता है कि अगर यूरोप ने कुछ गड़बड़ी की तो उसके लघु और मध्यम दूरी के परमाणु मिसाइल बलों का लक्ष्य वही होगा.
ज़ाहिर है परमाणु हमले के ज़ोखिम के बावजूद, इसे महत्व देने की बजाए परमाणु मुद्दा वैश्विक विमर्श से गायब हो गया है. फिर भी, जैसा कि हालिया संकट हमें याद दिलाते हैं कि परमाणु ख़तरा हमेशा मौजूद रहता है. दुनिया भर में निरंतर अशांति और वैश्विक अव्यवस्था परमाणु हथियारों के उपयोग को बढ़ावा देने में उत्प्रेरक का काम कर सकती है.
यूक्रेन पर आक्रमण की शुरुआत से ही, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चेतावनी दी थी कि अगर किसी बाहरी शक्तियों ने इस युद्ध में दख़ल दिया तो उसके ऐसे परिणाम होंगे "जैसा आपने अपने पूरे इतिहास में पहले कभी नहीं देखा होगा".
यूक्रेन पर आक्रमण की शुरुआत से ही, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चेतावनी दी थी कि अगर किसी बाहरी शक्तियों ने इस युद्ध में दख़ल दिया तो उसके ऐसे परिणाम होंगे "जैसा आपने अपने पूरे इतिहास में पहले कभी नहीं देखा होगा". पुतिन के इस बयान का अर्थ परमाणु ख़तरे के रूप में निकाला गया.
सीएसआईएस के एक अध्ययन के अनुसार, आने वाले वर्षों में रूस के नेताओं द्वारा यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में परमाणु हथियारों की बात करने के 200 से ज़्यादा उदाहरण सामने आए हैं. पश्चिमी देशों की तरफ से कोई सीधी धमकी नहीं दी गई, लेकिन ऐसे कई संदेश दिए गए, जिनमें परमाणु ख़तरे के ख़िलाफ प्रतिरोधक क्षमता के महत्व पर ज़ोर दिया गया.
हाल ही में ईरान-इज़राइल युद्ध में परमाणु हमले का ज़ोखिम एक प्रमुख मुद्दा रहा. हालांकि, दोनों ही पक्षों ने स्पष्ट धमकी नहीं दी, लेकिन इज़राइल ने कहा कि उसकी कार्रवाई का उद्देश्य ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल खतरे को खत्म करना है. इसलिए, इज़राइल ने अपने हमलों को संभावित ख़तरे से निपटने का कदम बताया. हालांकि, इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार थे या वह बना रहा है.
इज़राइल-ईरान के संघर्ष से पहले भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन का युद्ध हुआ. चूंकि, दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं, इसलिए इस जंग ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी. समस्या को और बढ़ाने वाली बात ये थी कि युद्ध मिसाइलों और विमानों से लड़ा गया था. ये दोनों ही चीजें परमाणु हथियार ले जाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं.
हालांकि, संकट बढ़ने से पहले ही, पाकिस्तान ने परमाणु प्रतिक्रिया के संकेत दिए थे. भारत द्वारा सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को निलंबित करने के बाद, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से एक बयान जारी किया गया. इस बयान में कहा गया था कि जल रोकने या उसका रुख़ मोड़ने की किसी भी कोशिश को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा और राष्ट्रीय शक्ति के पूरे दायरे में पूरी ताकत से इसका जवाब दिया जाएगा. "पूरी ताकत" का ये संदर्भ स्पष्ट रूप से परमाणु हथियारों से संबंधित है.
7 अगस्त को पाकिस्तानी टीवी चैनल जियो न्यूज़ से बात करते हुए पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाज़ा आसिफ ने कहा कि "अगर वो (भारत) इस क्षेत्र पर पूर्ण युद्ध थोपता है और अगर ऐसे ख़तरे पैदा होते हैं जिससे गतिरोध की स्थिति पैदा होती है, तो किसी भी समय परमाणु युद्ध छिड़ सकता है".
अमेरिका ने संकट की शुरुआत से ही तनाव कम करने की अपील की थी. परमाणु मुद्दे पर चिंताएं सामने आने पर अमेरिका ज़्यादा सक्रियता से इसमें शामिल हुआ. 9-10 मई की रात को, सरगोधा वायुसेना अड्डे के पास किराना हिल्स पर भारतीय हमला हुआ. कहा जाता है कि कथित तौर पर पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों का भंडारण इसी क्षेत्र में किया है. हालांकि, तस्वीरों के विश्लेषकों के अनुसार, ये एक सतही हमला था. "इस क्षेत्र के आसपास के क्षेत्र में कोई मूल्यवान चीज़ नहीं थी". एक भारतीय प्रवक्ता ने भी 11 मई को अपनी मीडिया के साथ अपनी बातचीत में किसी भी हमले से इनकार किया. हालांकि, ये हमला आकस्मिक भी हो सकता है. इसे एक संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है. 10 मई को, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण की एक बैठक बुलाई, जो पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की निगरानी करता है. हालांकि, पाकिस्तान ने इस तरह की किसी बैठक की बात को अस्वीकार कर दिया, लेकिन मूल घोषणा को अमेरिका ने एक संकेत के रूप में देखा.
9-10 मई की रात को, सरगोधा वायुसेना अड्डे के पास किराना हिल्स पर भारतीय हमला हुआ. कहा जाता है कि कथित तौर पर पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों का भंडारण इसी क्षेत्र में किया है.
भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम की मध्यस्थता का दावा करते हुए, राष्ट्रपति ट्रंप ने ज़ोर देकर कहा कि उन्होंने परमाणु संघर्ष को टाल दिया है. ट्रंप ने कहा, "ये एक भयानक परमाणु युद्ध हो सकता था. लाखों लोग मारे जा सकते थे".
अमेरिका की चिंता जायज़ है. भारत और पाकिस्तान दोनों के पास लगभग 200-200 परमाणु हथियारों का भंडार है. भारत के ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान के ऑपरेशन बनयान अल-मर्सूस में मिसाइल और ड्रोन हमले शामिल थे. भारत ने पारंपरिक रूप से सशस्त्र ब्रह्मोस और स्कैल्प ईजी मिसाइलों का इस्तेमाल किया. ये बात मानने के कुछ आधार हैं कि ब्रह्मोस मिसाइल भी परमाणु आयुध ले जा सकती है. 2022 में, एक घटना हुई थी जब भारत ने गलती से ब्रह्मोस मिसाइल दाग दी थी, जो पाकिस्तान में 124 किलोमीटर अंदर जा गिरी थी. हालांकि, उस मिसाइल में कोई हथियार नहीं थे. भारत को अपनी चूक स्वीकार करने में 48 घंटे लगे थे.
ऑपरेशन सिंदूर ने भारत के आतंकवाद-रोधी सिद्धांत को दो तरह से बदल दिया है. पहला, 2016 के उरी हमले के बाद किए गए ज़मीनी कमांडो हमलों के बजाय हवाई हमला किया. पुलवामा आतंकी हमले के बाद 2019 से ही भारत जवाबी कार्रवाई के लिए मुख्य रूप से हवाई शक्ति का इस्तेमाल कर रहा है. दूसरा, इसकी व्याख्या स्वयं प्रधानमंत्री ने की, जिन्होंने 12 मई को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा था कि "भारत परमाणु ब्लैकमेल बर्दाश्त नहीं करेगा. भारत परमाणु ब्लैकमेल की आड़ में विकसित हो रहे आतंकवादी ठिकानों पर सटीक और निर्णायक हमला करेगा." दूसरे शब्दों में कहें तो, पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार का भंडार भी भारत को हवाई शक्ति का उपयोग करके आतंकवाद विरोधी कार्रवाई करने से नहीं रोकेगा.
2019 और 2025, दोनों ही बार, भारत और पाकिस्तान ने तनाव को बढ़ने से रोकने के उपाय किए हैं. हालांकि, युद्ध जैसी स्थिति में, ये हमेशा संभव नहीं हो सकता. किसी संवेदनशील लक्ष्य पर अनजाने में किया गया हमला तनाव को और बढ़ा सकता है, फिर चाहे वो परमाणु भंडारण स्थल हो या नागरिक सुविधा वाली जगह.
सेंटर फॉर ज्वाइंट वारफेयर स्टडीज़ (CENJOWS) द्वारा प्रकाशित एक व्याख्यान श्रृंखला में हाल ही में दिए गए अपने भाषण में, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने एक महत्वपूर्ण बात कही. अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर में भारत के लंबी दूरी के सटीक हमलों के "मनोवैज्ञानिक प्रभाव" की सराहना की. हालांकि, हमें इस प्रभाव के परिणामों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. अगर ऐसे हमलों में अनजाने में ही सही, परमाणु हथियार भंडारण स्थलों पर निशाना साध दिया गया तो इससे पाकिस्तान की प्रतिक्रिया भड़क सकती है. भारत को ये सुनिश्चित करने के उपाय खोजने होंगे, जिनसे पाकिस्तान को परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहन ना मिले. भारत और पाकिस्तान के बीच 2005 से एक ऐसा समझौता है, जिसके तहत दोनों देशों को ज़मीन या समुद्र से बैलेस्टिक मिसाइलों के परीक्षण की सूचना तीन दिन पहले देनी होती है. अभी तक मोटे तौर पर, दोनों देश परीक्षणों की सूचना (NOTAM) जारी करके इसका पालन करते हैं, लेकिन इसमें युद्ध जैसी स्थितियों में ऐसा किया जाना ज़रूरी नहीं है.
मनोज जोशी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो हैं.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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