दोहा पर हमला करके इज़राइल ने न केवल मध्यस्थ के तौर पर क़तर की भूमिका को चोट पहुंचाई है, बल्कि उसने खाड़ी देशों की एकजुटता, अरब निरपेक्षता और अमेरिका की सुरक्षा गारंटी से जुड़ी बहसों को भी फिर से ज़िंदा कर दिया है
हमास की बैठक को निशाना बनाते हुए इज़राइल ने दोहा के एक कार्यालय पर हमला किया, तो 7 अक्टूबर के आतंकी हमले का असर अरब देशों की राजधानी तक जा पहुंचा था. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा की गुज़ारिश (और क़तर के प्रधानमंत्री के मुताबिक़ इज़राइल के समर्थन से) क़तर 2012 से ही हमास के राजनीति कार्यालय का मेज़बान रहा है. यही नहीं, क़तर ने इलाक़े की राजनीतिक दरारों को पाटने के लिए ख़ुद को एक मध्यस्थ के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है. 2024 में क़तर ने अपने यहां मौजूद हमास के कार्यालय को स्थायी तौर पर बंद करने और मध्यस्थता के प्रयासों को ख़त्म करने पर भी विचार किया था. क्योंकि बातचीत में शामिल सभी पक्ष समझौते की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे थे. इसके अलावा, हमास और तालिबान जैसे उग्रवादी संगठनों का ज़रिया बनने की वजह से सार्वजनिक परिचर्चाएं भी क़तर के ख़िलाफ़ होती जा रही थीं.
इज़राइल के इस हमले के निशाने पर हमास का नेतृत्व था. लेकिन, हमले में उनको कोई नुक़सान नहीं हुआ. इसके बजाय, क़तर की राजधानी दोहा पर हुए इस हमले ने इज़राइल और उसके पड़ोसी खाड़ी देशों के पहले से तनावपूर्ण चल रहे संबंधों की दरार को और भी गहरा कर दिया. क़तर, अरब शक्ति, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और धन के मामले में दुबई जैसे केंद्रों से होड़ लगाने की कोशिश में जुटा हुआ है. वैसे तो खाड़ी के ज़्यादातर देश हमास को पूरी तरह ख़त्म करने और उसकी जगह फ़िलिस्तीन की राजनीति को नया स्वरूप देने के लिए एक वैकल्पिक राजनीतिक परिणाम के विचार के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन इज़राइल के सैन्य हमले के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में उठ रहे सुर अब तेज़ होते जा रहे हैं. इसी वजह से अरब देशों ने 2020 में अब्राहम समझौते (Abraham Accords) और फिर 2023 में चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान के संबंध सामान्य बनाने जैसे दो अहम समझौतों के ज़रिए जो निरपेक्षता हासिल करने की कोशिश की थी, वो और भी जटिल हो गई है.
इज़राइल के सैन्य हमले के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में उठ रहे सुर अब तेज़ होते जा रहे हैं. इसी वजह से अरब देशों ने 2020 में अब्राहम समझौते (Abraham Accords) और फिर 2023 में चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान के संबंध सामान्य बनाने जैसे दो अहम समझौतों के ज़रिए जो निरपेक्षता हासिल करने की कोशिश की थी, वो और भी जटिल हो गई है.
हालांकि, इज़राइल की गतिविधियों के पीछे जो वेन डायग्राम की रणनीतियां और उन पर खाड़ी देशों से जिस प्रतिक्रिया की अपेक्षा जताई गई है, वो इससे भी ज़्यादा जटिल है. क़तर में हमास ने 2012 से ही अपना राजनीतिक दफ़्तर खोल रखा है. क़तर के प्रधानमंत्री मुहम्मद बिन अब्दुल रहमान बिन जस्सिम अल थानी ने इज़राइल के हमले के बाद हड़बड़ी में जो वॉशिंगटन का दौरा किया था, उस दौरान एक इंटरव्यू में थानी ने साफ़ तौर पर कहा था कि दोहा में हमास का दफ़्तर खुलवाने के पीछे अमेरिका और इज़राइल ने बराबरी से दबाव डाला था. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इज़राइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद अपने एजेंटों के ज़रिए ज़मीनी ऑपरेशन करने के वादे से मुकर गई थी, ताकि क़तर की हुकूमत के साथ इज़राइल के रिश्ते बिगड़ न जाएं. ये बात भी अल थानी के दावे पर ही मुहर लगाती है. इस साल की शुरुआत में भी एक स्कैंडल सामने आया था, जब इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दो सहयोगियों को इज़राइल में क़तर के हितों को बढ़ावा देने के लिए पैसे लेकर काम करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. इज़राइल और क़तर के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं.
ऊपर हमने जिन पेचीदगियों का ज़िक्र किया है, वो दो मुख्य मोर्चों पर मतभेदों का संकेत देते हैं. पहला तो हमास के खात्मे का इज़राइल का घोषित लक्ष्य है और दूसरा इसके साथ ही साथ हमास के साथ शांति वार्ता की उसकी कोशिशें हैं, जिसके तहत इज़राइल हमास के शिकंजे में फंसे बंधकों को रिहा कराने और अक्टूबर 2023 से अब तक मारे जा चुके बंधकों की लाशों को हासिल करना है. कुल मिलाकर ये दोनों ही सामरिक लक्ष्य एक दूसरे के विरोधाभासी हैं. अपनी सैन्य ताक़त के दम पर हमास को समर्पण के लिए मजबूर करने और बंधकों को रिहा कराने के लिए इज़राइल दो साल से अभियान चला रहा है और उसे अब तक अपेक्षित नतीजे हासिल नहीं हुए हैं. हमास ख़ुद भी जब तक संभव है, तब तक लड़ाई लड़ने की कोशिश कर रहा है, जबकि उसे भारी नुक़सान हुआ है और ग़ज़ा में तबाही मची हुई है. हमास ने ग़ज़ा पर अपना मज़बूत शिकंजा ढीला करने या फिर आम फिलिस्तीनियों की मौत को हार के रूप में स्वीकार करने का अब तक तो कोई संकेत नहीं दिया है.
ऐसे में इस जंग के परिणाम पूरे इलाक़े पर दिखने लगे हैं. इज़राइल के हमले के ख़िलाफ़ क़तर को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सभी देशों से समर्थन मिला था. इज़राइल के हमले का एकजुटता से जवाब देने के लिए GCC की एक बैठक दोहा में बुलाई गई थी. इस बैठक में ईरान के नेता भी शामिल हुए थे. जबकि कुछ महीने पहले ही जब इज़राइल और ईरान के बीच 12 दिनों का युद्ध चला था, तो ईरान ने ख़ुद भी क़तर में अमेरिका के सैन्य केंद्रों को निशाना बनाकर हमले किए थे.
2019 में जब सऊदी अरब के तेल के ठिकानों पर ड्रोन हमले थे, तब भी अमेरिका के अपने सैन्य संसाधन उसकी सुरक्षा में तैनात करने की अनिच्छा ने अरब देशों को नाख़ुश किया था. क़तर के भीतर हमास के ऊपर इज़राइल के हमले ने एक बार फिर से उस विवाद को ज़िंदा कर दिया है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, इज़राइल की हरकतों को चुनौती देने में अनिच्छा जता रहे हैं.
क़तर ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे दूसरे देशों को अब्राहम समझौतों के तहत इज़राइल के साथ कूटनीतिक संबंध सामान्य बनाने पर पुनर्विचार का दबाव बनाया है. सऊदी अरब- जिसने संयुक्त अरब अमीरात के साथ मिलकर 2017 से 2021 के दौरान क़तर के उनके क्षेत्रीय भू-राजनीतिक रुख़ के साथ तालमेल मिलाने में अनिच्छा जताने पर उसकी आर्थिक नाकेबंदी की थी- उसने अब कहा है कि उसके सारे संसाधन इज़राइल के ख़िलाफ़ क़तर के लिए उपलब्ध हैं. जबकि अभी चार साल पहले ही UAE और सऊदी अरब, क़तर से मांग कर रहे थे कि वो मुस्लिम ब्रदरहुड (Muslim Brotherhood) और पूरे क्षेत्र में व्यापक राजनीतिक इस्लाम को अपना समर्थन देना बंद करे. दोनों देश हमास और मुस्लिम ब्रदरहुड को क़तर के समर्थन को भी इसी नज़रिए से देख रहे थे.
इज़राइल की कार्रवाइयों ने उसे एक और अनचाही स्थिति में पहुँचा दिया है: अब वो पूरे मध्य पूर्व की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त है, ख़ास तौर से हवाई दबदबे के मामले में. विद्वान सनम वकील ने तो यहां तक मूल्यांकन किया है कि ईरान की जगह अब इज़राइल ने खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है. साइबर अभियानों, इलेक्ट्रॉनिक जंग, ख़ुफ़िया सैटेलाइट से जासूसी और दूसरे तौर-तरीक़ों को अपने हवाई अभियानों में शामिल करके इज़राइल निश्चित रूप से ये दिखाने में सफल रहा है कि इलाक़े का कोई भी लक्ष्य अब उसकी पहुंच से बाहर नहीं है. हां, मोसाद ने पिछले कई सालों के दौरान पूरे मध्य पूर्व में अपने जासूसों का जो जाल बिछाया है, उसने भी बिना किसी दिक़्क़त के इसमें योगदान दिया है. अमेरिका के इज़राइल के ख़िलाफ़ अरब देशों का साथ देने में अनिच्छा जताने ने अमेरिका की सुरक्षा गारंटी को लेकर भी बहस को नए सिरे से छेड़ दिया है. 2019 में जब सऊदी अरब के तेल के ठिकानों पर ड्रोन हमले थे, तब भी अमेरिका के अपने सैन्य संसाधन उसकी सुरक्षा में तैनात करने की अनिच्छा ने अरब देशों को नाख़ुश किया था. क़तर के भीतर हमास के ऊपर इज़राइल के हमले ने एक बार फिर से उस विवाद को ज़िंदा कर दिया है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, इज़राइल की हरकतों को चुनौती देने में अनिच्छा जता रहे हैं.
आख़िर में, मध्य पूर्व के देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग का रास्ता अब पहले की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल भरा हो गया है. इसमें न सिर्फ़ इज़राइल और अरब देशों के तनाव से नई बाधाएं खड़ी हुई हैं, बल्कि इज़राइल द्वारा राजनीतिक प्रबंधन के बजाय सैन्य विजय को तरज़ीह देने से भी स्थिति को और जटिल बना दिया है. इज़राइल के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की क़तर की ख़्वाहिश भी अरब देशों और ख़ास तौर से सऊदी अरब और संयुक्त अरब की बाक़ी देशों के साथ मुश्किल भरी एकजुटता का इम्तिहान लेगी. क़तर ने UAE को पहले ही संकेत दे दिया है कि उसको इज़राइल के साथ अपने कूटनीतिक संबंध सामान्य बनाने पर पुनर्विचार करना होगा. भले ही क़तर, संयुक्त अरब अमीरात पर अब्राहम समझौते से अलग होने का दबाव न बनाए. पर, अगर इज़राइल पश्चिमी तट को अपने में मिला लेता है, तो संयुक्त अरब अमीरात के पास कोई और विकल्प नहीं रह जाएगा. क्योंकि ग़ज़ा को लेकर अरब देशों में पहले ही भारी नाराज़गी है और अब क़तर पर हमले के बाद अरब राजशाहियां जिस तरह की नीतियों पर चल रही हैं, वो उनके देशों के नागरिकों द्वारा सोशल मीडिया पर गढ़े जा रहे नैरेटिव को अपनाने और उसे सार्वजनिक परिचर्चाओं में प्राथमिकता देने से बिल्किल अलग हैं.
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