आज भी भारत में आधी आबादी कमाई की जंग लड़ रही है, रोज़गार असुरक्षित है और न्यूनतम जीवन स्तर का सपना कई के लिए दूर है. इस लेख में जानिए कैसे बजट 2026–27 सिर्फ मध्यम वर्ग की जेब नहीं बल्कि असली गरीब और कामकाजी लोगों की जिंदगी सुधारने पर ध्यान देता है. पढ़ें और समझें, क्यों आर्थिक नीतियाँ केवल कर कटौती तक सीमित नहीं हो सकती.
आज भारत की जनसंख्या 145 करोड़ से अधिक है. आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के अनुसार, श्रम-बल भागीदारी दर (LFPR) 42.3 प्रतिशत है. इसका अर्थ है कि काम करने के इच्छुक और सक्षम लोगों की संख्या 61 करोड़ से अधिक है. इसी सर्वेक्षण में कार्यशील जनसंख्या अनुपात 40.2 प्रतिशत बताया गया है यानी लगभग 58 करोड़ लोग कार्यरत हैं. इन दोनों के बीच का अंतर लगभग 3 करोड़ लोगों का है, जो बेरोज़गार हैं-अर्थात वे लोग जो काम करने के लिए उपलब्ध थे लेकिन सर्वेक्षण से पहले के सात दिनों में उन्हें एक घंटे का भी काम नहीं मिला.
PLFS 2023-24 के इकाई-स्तरीय आँकड़ों से आय में गहरी असमानता सामने आती है. भारत में केवल 22 प्रतिशत श्रमिकों की औसत मासिक आय 15,000 रुपये से अधिक है जबकि 27.5 प्रतिशत लोग 100 रुपये प्रतिदिन या उससे कम कमाते हैं. लगभग 55 प्रतिशत श्रमिक 300 रुपये प्रतिदिन या 9,000 रुपये प्रतिमाह से कम कमाते हैं. इसका अर्थ है कि 2025-26 में कम से कम आधी भारतीय श्रम शक्ति की मासिक आय 10,000 रुपये से भी कम है.
2024 में तत्कालीन श्रम एवं रोज़गार राज्य मंत्री ने बताया था कि राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी 2017 में 176 रुपये प्रतिदिन तय की गई थी और उसके बाद इसमें कोई संशोधन नहीं हुआ. संयुक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार, यह राशि 2024-25 में 251 रुपये प्रतिदिन के बराबर होती है. PLFS 2023-24 के अनुसार, 176 रुपये की सीमा पर भी 35 प्रतिशत से अधिक श्रमिक इससे कम कमाते हैं. इसमें 21 प्रतिशत पुरुष और 67.5 प्रतिशत महिला श्रमिक शामिल हैं. ग्रामीण-शहरी अंतर भी स्पष्ट है-ग्रामीण क्षेत्रों में 41 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 21 प्रतिशत श्रमिक 176 रुपये प्रतिदिन से कम कमाते हैं. यदि 251 रुपये प्रतिदिन को न्यूनतम आय माना जाए तो लगभग आधी श्रम शक्ति इससे कम या बराबर कमाती है.
2024 में तत्कालीन श्रम एवं रोज़गार राज्य मंत्री ने बताया था कि राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी 2017 में 176 रुपये प्रतिदिन तय की गई थी और उसके बाद इसमें कोई संशोधन नहीं हुआ. संयुक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार, यह राशि 2024-25 में 251 रुपये प्रतिदिन के बराबर होती है. PLFS 2023-24 के अनुसार, 176 रुपये की सीमा पर भी 35 प्रतिशत से अधिक श्रमिक इससे कम कमाते हैं. इसमें 21 प्रतिशत पुरुष और 67.5 प्रतिशत महिला श्रमिक शामिल हैं. ग्रामीण-शहरी अंतर भी स्पष्ट है-ग्रामीण क्षेत्रों में 41 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 21 प्रतिशत श्रमिक 176 रुपये प्रतिदिन से कम कमाते हैं. यदि 251 रुपये प्रतिदिन को न्यूनतम आय माना जाए तो लगभग आधी श्रम शक्ति इससे कम या बराबर कमाती है.
भारत में केवल 22 प्रतिशत श्रमिकों की औसत मासिक आय 15,000 रुपये से अधिक है जबकि 27.5 प्रतिशत लोग 100 रुपये प्रतिदिन या उससे कम कमाते हैं. लगभग 55 प्रतिशत श्रमिक 300 रुपये प्रतिदिन या 9,000 रुपये प्रतिमाह से कम कमाते हैं. इसका अर्थ है कि 2025-26 में कम से कम आधी भारतीय श्रम शक्ति की मासिक आय 10,000 रुपये से भी कम है.
आयकर रिटर्न के आंकड़ों (आकलन वर्ष 2023-24) से पता चलता है कि लगभग 8 करोड़ लोगों ने रिटर्न दाख़िल किया. इनमें से लगभग 1 करोड़ लोगों की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपये से कम थी. इसके अलावा, लगभग 2.35 करोड़ लोगों ने कर तो चुकाया लेकिन रिटर्न दाख़िल नहीं किया. इन सबको जोड़ने पर लगभग 9.35 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी मासिक आय 21,000 रुपये से अधिक है. यह कुल जनसंख्या का 6.5 प्रतिशत से भी कम और श्रम शक्ति का लगभग 15 प्रतिशत है.
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि जिसे आम तौर पर मध्यम वर्ग कहा जाता है, वह वास्तव में देश की कुल आबादी का केवल शीर्ष 10–12 प्रतिशत हिस्सा है. देश की बहुसंख्यक आबादी की आय इतनी कम है कि वह प्रत्यक्ष कर प्रणाली के दायरे में आती ही नहीं. यदि आयकर से छूट प्राप्त लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न किसान परिवारों को भी इस गणना में शामिल कर लिया जाए, तब भी प्रत्यक्ष कर चुकाने वाले लोगों की कुल संख्या अधिकतम 15 प्रतिशत आबादी तक ही सीमित रहती है. यह तथ्य नीति निर्माण की प्रक्रिया में एक बुनियादी पुनर्विचार की मांग करता है. ऐसी अर्थव्यवस्था में, जहां अधिकांश लोग न्यूनतम आय स्तर पर जीवन यापन कर रहे हों, नीतियों का झुकाव केवल कर राहत या कर कटौती जैसे उपायों तक सीमित नहीं हो सकता. इसके बजाय, नीति-निर्माण में वर्ग आधारित दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य हो जाता है, ताकि विकास के लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँच सकें और आर्थिक असमानताओं को कम किया जा सके.
इस पृष्ठभूमि में भारत की निचली आधी आबादी की स्थिति पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है. यह वर्ग न केवल कम आय से जूझ रहा है, बल्कि असुरक्षित रोज़गार, अनियमित आय और सामाजिक सुरक्षा के अभाव जैसी समस्याओं का भी सामना कर रहा है. ऐसे में रोज़गार गारंटी जैसी योजनाएं इनके लिए केवल आय का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सम्मानजनक जीवन का आधार बन सकती हैं. यदि 125 दिनों की रोज़गार गारंटी योजना-विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), जिसे पहले मनरेगा के नाम से जाना जाता था-को प्रभावी और मांग-आधारित ढंग से लागू किया जाए, तो इससे ग्रामीण श्रमिकों की क्रय-शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है. इससे न केवल ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में मांग को भी बल मिलेगा.
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि रोज़गार गारंटी जैसी योजनाओं को केवल ग्रामीण संदर्भ तक सीमित न किया जाए. शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में अनौपचारिक श्रमिक, प्रवासी मज़दूर और कम आय वर्ग के लोग निवास करते हैं, जिनकी आजीविका अस्थिर और अनियमित होती है. इन्हें अक्सर औपचारिक रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा जाता है. ऐसे में रोज़गार गारंटी का शहरी विस्तार न केवल आय की असुरक्षा को कम कर सकता है, बल्कि शहरी गरीबी और सामाजिक असमानता से निपटने का एक प्रभावी माध्यम भी बन सकता है. साथ ही, इससे बुनियादी ढाँचे, सार्वजनिक सेवाओं और सामुदायिक कार्यों को भी बल मिलेगा, जिससे शहरी अर्थव्यवस्था में समावेशी और टिकाऊ वृद्धि को प्रोत्साहन मिल सकता है.
यदि आयकर से छूट प्राप्त लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न किसान परिवारों को भी इस गणना में शामिल कर लिया जाए, तब भी प्रत्यक्ष कर चुकाने वाले लोगों की कुल संख्या अधिकतम 15 प्रतिशत आबादी तक ही सीमित रहती है. यह तथ्य नीति निर्माण की प्रक्रिया में एक बुनियादी पुनर्विचार की मांग करता है. ऐसी अर्थव्यवस्था में, जहां अधिकांश लोग न्यूनतम आय स्तर पर जीवन यापन कर रहे हों, नीतियों का झुकाव केवल कर राहत या कर कटौती जैसे उपायों तक सीमित नहीं हो सकता.
हालांकि, इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता एक अहम शर्त है. वर्तमान व्यवस्था के अनुसार राज्यों को इस योजना के कुल व्यय का 40 प्रतिशत वहन करना होता है, जो कई वित्तीय रूप से कमज़ोर राज्यों के लिए चुनौतीपूर्ण है. इसलिए केंद्र सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान करे और केंद्र–राज्य वित्तीय हस्तांतरण को मज़बूत बनाए. मज़बूत वित्तीय समर्थन के साथ यदि रोज़गार गारंटी योजनाओं को समय पर भुगतान, पारदर्शी व्यवस्था और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लागू किया जाए, तो यह निचली आधी आबादी के लिए समावेशी विकास का एक सशक्त माध्यम बन सकती हैं.
इसके साथ-साथ समावेशी विकास को सुदृढ़ करने के लिए निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं की सार्वभौमिक उपलब्धता अनिवार्य है. शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय बढ़ाने से न केवल मानव पूँजी का निर्माण होता है, बल्कि अंतर-पीढ़ीगत असमानताओं को तोड़ने में भी मदद मिलती है. इसी क्रम में लैंगिक बजटिंग को औपचारिक प्रक्रिया भर न रखकर वास्तविक संसाधन आवंटन से जोड़ना आवश्यक है, ताकि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और सामाजिक सुरक्षा मज़बूत हो सके. अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य वंचित वर्गों के लिए लक्षित प्रावधान सामाजिक न्याय के एजेंडे का केंद्रीय तत्व होने चाहिए.
खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बनी हुई है. ये तंत्र न केवल खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं, बल्कि कृषि आय को स्थिरता भी प्रदान करते हैं. अप्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर, GST दरों में सीमित कटौती उपभोक्ताओं को तात्कालिक राहत दे सकती है, किंतु दीर्घकाल में कर आधार का विस्तार और कर अनुपालन में सुधार अधिक प्रभावी विकल्प सिद्ध होगा. अंततः, यदि नीति निर्माण में निचली आधी आबादी को केंद्र में रखा जाए, तो ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य और SDG-2030 की दिशा में ठोस और न्यायसंगत प्रगति संभव है.
सुरजीत दास जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में सहायक प्रोफेसर हैं.
प्रेक्षा मिश्रा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में सहायक प्रोफेसर हैं.
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Surajit Das is an assistant professor at the Centre for Economic Studies & Planning, Jawaharlal Nehru University, New Delhi. ...
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Preksha Mishra is an assistant professor at the Ramanujan College, University of Delhi. ...
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