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दुनिया इस वक्त भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों और टैरिफ हमलों के कारण आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है. 2025 को एक ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा, जब एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए भारी उथल-पुथल हो रही है.
दुनिया इस वक्त भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों और टैरिफ हमलों के कारण आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है. 2025 को एक ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा, जब एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए भारी उथल-पुथल हो रही है. इन सब महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाक्रमों के बीच भारत ने साल 2025 के आखिरी महीनों में एक ऐसा फैसला लिया है, जिसे 1991 के वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद का सबसे बड़े संरचनात्मक सुधार बताया जा रहा है. ये फैसला है श्रम कानूनों में सुधार का. 21 नवंबर 2025 को, केंद्र सरकार ने मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक सुरक्षा पर चार श्रम संहिताओं को प्रभावी बनाया. भारत में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले ये सुधार भू-राजनीतिक प्रतिकूलताओं के असर को भी कम करेंगे. इनसे भारतीय उद्यमियों के विकास की रफ्तार को पंख मिलेंगे, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण में मदद मिलेगी. श्रमिकों की स्थिति में सुधार की प्रक्रिया आसान और तेज़ होगी. कुल मिलाकर, ये कहा जा सकता है कि 21वीं सदी के श्रमिकों को इस तरह के कानूनों की बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी. श्रम कानूनों में ये सुधार कर्मचारियों को 21वीं सदी की सुरक्षा प्रदान करके एक नई और उभरती हुई श्रम गतिशीलता को मान्यता प्रदान करते हैं, उद्योगों के विकास में भी ये सहारा देते हैं.
इन नए श्रम कानूनों के संभावित प्रभाव इतने ज़्यादा हैं कि ये भारत में पिछले कुछ साल के सबसे बड़े आर्थिक संरचनात्मक सुधार माने जाने वाले वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से भी आगे निकल सकते हैं. जीएसटी 1.2 करोड़ उद्यमों पर लागू होता है जबकि नए श्रम कानूनों का असर संभावित रूप से 6.3 करोड़ उद्यमों पर पड़ेगा, इनमें से सिर्फ 10 लाख ही औपचारिक क्षेत्र में हैं. अब अनौपचारिक से औपचारिक क्षेत्र में आने के लिए नियमों का पालन करना आसान हो जाएगा क्योंकि अब रजिस्टर बनाए रखने और फॉर्म भरने में आसानी हो जाएगा. सरकारी बाबूओं का दख़ल कम होने से भ्रष्ट और पैसा कमाने वाली नौकरशाही का अत्याचार कम हो जाएगा. ये श्रम सुधार बाकी 6.2 करोड़ उद्यमों के एक बड़े हिस्से को उभरते भारत के अनुरूप औपचारिक भविष्य अपनाने के लिए सक्षम बनाएगा, उन्हें प्रोत्साहित भी करेगा. अगर जीएसटी ने छोटी फर्म और उद्यमों को टैक्स नेटवर्क की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित किया, तो नए श्रम कानून इन बदलावों को और तेज़ करेंगे.
“ये श्रम संहिताएं नियामक ढांचे में एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती हैं.”
श्रम सुधार के इन चार कानूनों को एक साथ देखने पर इनसे पांच निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं:
ये श्रम संहिताएं नियामक ढांचे में एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती हैं. अब व्यापार करना बहुत आसान हो गया है. विधायी आधार को पर्याप्त रूप से तर्कसंगत बनाया गया है. 29 कानूनों में से 1,436 नियमों को 75 प्रतिशत घटाकर 351 कर दिया गया है. रिपोर्टिंग के संदर्भ में, 181 फ़ॉर्म 60 प्रतिशत घटाकर 73 कर दिए गए हैं. अंत में, रिटर्न के लिए 84 रजिस्टरों को मिलाकर आठ कर दिया गया है, जो 90 प्रतिशत की कमी है. इससे इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और तेज़ी आएगी, काम आसान होगा. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि, रिकॉर्ड रखने, फाइलिंग और पंजीकरण में डिजिटलीकरण इस नई संरचना का केंद्रीय आधार बन गया है.
नए श्रम कानूनों में वेतन, श्रमिकों और प्रतिष्ठानों जैसी परिभाषाओं को सुसंगत बनाया है. उद्यमियों के लिए, इन संहिताओं ने वस्तुओं का एक समान अर्थ और विवरण प्रदान किया है. पहले, अलग-अलग कानूनों के अनुसार इनकी परिभाषाएं भी भिन्न-भिन्न थी. पहले कई तरह के रजिस्टरों का हिसाब-किताब रखना पड़ता था. अधिकारी अपने हिसाब से नियमों की व्याख्या करते थे, और उन सब नियम-क़ायदों को फाइलों में रखा जाता था. अब नई संहिताओं के साथ, श्रमिकों को ग्रेच्युटी, सामाजिक सुरक्षा, बोनस और वैधानिक अंशदान की सरल और सुसंगत गणनाओं का लाभ मिलेगा. पहले ग्रेच्युटी पाने के लिए किसी कंपनी में लगातार पांच साल काम करना अनिवार्य था, अब एक साल की नौकरी के बाद ग्रेच्युटी के लाभ मिल सकते हैं. इन कानूनों में 'गिग वर्कर्स' को भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है. गिग वर्कर्स में आम तौर पर अस्थायी नौकरी या फ्रीलांसिग करने वालों को शामिल किया जाता है. इसके अलावा डिलीवरी ब्वॉय और उबर-ओला राइडर भी इस श्रेणी में आते हैं. इसके साथ ही, उद्यमियों को भी सरल और सुव्यवस्थित नियम मिलेंगे और उनके लिए इनका अनुपालन करना आसान होगा.
पंजीकरण और लाइसेंसिंग ढांचे में एक बुनियादी बदलाव आया है. पहले बहुत तरह के पंजीकरण करने पड़ते थे, जैसे कि कारखाना अधिनियम, खनन अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम, प्रशिक्षु अधिनियम, ईएसआई अधिनियम, या भविष्य निधि अधिनियम. अब इन सबको एकल पंजीकरण, सिंगल लाइसेंस और सिंगल रिटर्न ढांचे में जोड़ दिया गया है.
नए श्रम कानूनों में कई स्तर की संरचना की जगह एक समान 10 कर्मचारियों की सीमा ने ले ली है. पहले, 15 कर्मचारियों वाले किसी छोटे या मध्यम आकार के उद्यम पर कुछ दायित्व अनिवार्य रूप से लागू होते थे, जैसे कि ईएसआई, अप्रेंटिस अधिनियम, या कारखाना अधिनियम के तहत, लेकिन भविष्य निधि और पीओएसएच (प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट) जैसे अन्य दायित्व लागू नहीं होते थे. इससे ये भ्रम पैदा होता था कि, क्या नियम विशेष रूप से लागू हैं और क्या नहीं? इसे औपचारिकता की राह में एक बड़ी बाधा के रूप में पहचाना गया. रिकॉर्ड रखने की आवश्यकताओं को 48 अलग-अलग श्रम रजिस्टरों से घटाकर 10 से भी कम कर दिया गया है.
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ये है कि नियामक मॉडल में कुछ बड़े परिवर्तन किए गए हैं. अब नियामकों को दंड की बजाए सुविधा और सक्षमता के मॉडल में बदला गया है. अब जो संस्थाएं या व्यक्ति किसी कंपनी का निरीक्षण करने जाएंगे, वो कानूनी कार्रवाई करने वाले एजेंटों की बजाए सलाहकार भागीदारों के रूप में काम करेंगे. अब तक ये होता था कि नियमों के पालन में थोड़ी से भी चूक हो जाए तो निरीक्षण करने वाले लोग दंडात्मक कार्रवाई की बात करते थे. ये फैक्ट्री स्तर पर सक्रिय, सुधारात्मक जुड़ाव की ओर बढ़ने का संकेत देता है.
“नए श्रम कानूनों में वेतन, श्रमिकों और प्रतिष्ठानों जैसी परिभाषाओं को सुसंगत बनाया है.”
स्याह अतीत से उज्जवल भविष्य
“पंजीकरण और लाइसेंसिंग ढांचे में एक बुनियादी बदलाव आया है.”
“सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ये है कि नियामक मॉडल में कुछ बड़े परिवर्तन किए गए हैं.”
उभरते भारत के लिए श्रम सुधार ज़रूरी थे. 29 श्रम कानूनों की आड़ में जो नियम बने हुए थे, वे 21वीं सदी के उद्योग जगत के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे. अब घरेलू विनिर्माण यानी मेड इन इंडिया मुहिम एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है. सरकार भी औद्योगिक गलियारों, तेज़ कनेक्टिविटी और बंदरगाहों पर तेज़ी से काम पूरा करने जैसी योजनाओं के ज़रिए उद्योग जगत की नींव रख रही है. ऐसे में उद्योगों को भी ज़रूरत से ज़्यादा नियम-कायदों के बोझ से मुक्ति मिल सकती है. इन चार कानूनों को प्रभावी बनाकर सरकार ने श्रम-पूंजी-उद्यमी की उद्योग त्रिमूर्ति को मजबूत किया है. ये फैसला अब देश को विकसित भारत की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
इस सुधार के माध्यम से सरकार ने लगभग वही काम किया है, जिसकी उससे उम्मीद थी. इस सुधार का अंतिम चरण जन विश्वास 2.0 में लागू किया जाएगा, जिस पर अभी बातचीत चल रही है. अब गेंद उद्योगपतियों के पाले में है. ये सही है कि, उन्हें अभी भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन श्रम कानून और उनके नियमों के बोझ से उन्हें छुटकारा मिल गया है.
गौतम चिकरमाने ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हैं.
ऋषि अग्रवाल टीमलीज रेगटेक के सह-संस्थापक और सीईओ हैं.
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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