Expert Speak Raisina Debates
Published on Nov 27, 2025 Updated 0 Hours ago

दुनिया इस वक्त भू-राजनीतिक तनावों,  युद्धों और टैरिफ हमलों के कारण आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है. 2025 को एक ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा, जब एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए भारी उथल-पुथल हो रही है.

नौकरी, सुरक्षा, उद्योग...सब बदलने वाला है: जानिए कैसे

दुनिया इस वक्त भू-राजनीतिक तनावों,  युद्धों और टैरिफ हमलों के कारण आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है. 2025 को एक ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा, जब एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण के लिए भारी उथल-पुथल हो रही है. इन सब महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाक्रमों के बीच भारत ने साल 2025 के आखिरी महीनों में एक ऐसा फैसला लिया है, जिसे 1991 के वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद का सबसे बड़े संरचनात्मक सुधार बताया जा रहा है. ये फैसला है श्रम कानूनों में सुधार का. 21 नवंबर 2025 को, केंद्र सरकार ने मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक सुरक्षा पर चार श्रम संहिताओं को प्रभावी बनाया. भारत में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले ये सुधार भू-राजनीतिक प्रतिकूलताओं के असर को भी कम करेंगे. इनसे भारतीय उद्यमियों के विकास की रफ्तार को पंख मिलेंगे,  अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण में मदद मिलेगी. श्रमिकों की स्थिति में सुधार की प्रक्रिया आसान और तेज़ होगी. कुल मिलाकर, ये कहा जा सकता है कि 21वीं सदी के श्रमिकों को इस तरह के कानूनों की बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी. श्रम कानूनों में ये सुधार कर्मचारियों को 21वीं सदी की सुरक्षा प्रदान करके एक नई और उभरती हुई श्रम गतिशीलता को मान्यता प्रदान करते हैं, उद्योगों के विकास में भी ये सहारा देते हैं.

  • वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने 2025 में एक निर्णायक कदम उठाया है.
  • चार नई संहिताएं उद्योगों और करोड़ों श्रमिकों—दोनों को नई दिशा देंगी.
  • ये सुधार उद्यमिता को तेज़ करेंगे और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाएंगे.

इन नए श्रम कानूनों के संभावित प्रभाव इतने ज़्यादा हैं कि ये भारत में पिछले कुछ साल के सबसे बड़े आर्थिक संरचनात्मक सुधार माने जाने वाले वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से भी आगे निकल सकते हैं. जीएसटी 1.2 करोड़ उद्यमों पर लागू होता है जबकि नए श्रम कानूनों का असर संभावित रूप से 6.3 करोड़ उद्यमों पर पड़ेगा, इनमें से सिर्फ 10 लाख ही औपचारिक क्षेत्र में हैं. अब अनौपचारिक से औपचारिक क्षेत्र में आने के लिए नियमों का पालन करना आसान हो जाएगा क्योंकि अब रजिस्टर बनाए रखने और फॉर्म भरने में आसानी हो जाएगा. सरकारी बाबूओं का दख़ल कम होने से भ्रष्ट और पैसा कमाने वाली नौकरशाही का अत्याचार कम हो जाएगा. ये श्रम सुधार बाकी 6.2 करोड़ उद्यमों के एक बड़े हिस्से को उभरते भारत के अनुरूप औपचारिक भविष्य अपनाने के लिए सक्षम बनाएगा, उन्हें प्रोत्साहित भी करेगा. अगर जीएसटी ने छोटी फर्म और उद्यमों को टैक्स नेटवर्क की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित किया, तो नए श्रम कानून इन बदलावों को और तेज़ करेंगे.

“ये श्रम संहिताएं नियामक ढांचे में एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती हैं.”


श्रम सुधार के इन चार कानूनों को एक साथ देखने पर इनसे पांच निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं:

1. नियामक ढांचा

ये श्रम संहिताएं नियामक ढांचे में एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती हैं. अब व्यापार करना बहुत आसान हो गया है. विधायी आधार को पर्याप्त रूप से तर्कसंगत बनाया गया है. 29 कानूनों में से 1,436 नियमों को 75 प्रतिशत घटाकर 351 कर दिया गया है. रिपोर्टिंग के संदर्भ में, 181 फ़ॉर्म 60 प्रतिशत घटाकर 73 कर दिए गए हैं. अंत में, रिटर्न के लिए 84 रजिस्टरों को मिलाकर आठ कर दिया गया है, जो 90 प्रतिशत की कमी है. इससे इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और तेज़ी आएगी, काम आसान होगा. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि, रिकॉर्ड रखने, फाइलिंग और पंजीकरण में डिजिटलीकरण इस नई संरचना का केंद्रीय आधार बन गया है.

2. कानून की परिभाषाओं में सामंजस्य

नए श्रम कानूनों में वेतन, श्रमिकों और प्रतिष्ठानों जैसी परिभाषाओं को सुसंगत बनाया है. उद्यमियों के लिए, इन संहिताओं ने वस्तुओं का एक समान अर्थ और विवरण प्रदान किया है. पहले, अलग-अलग कानूनों के अनुसार इनकी परिभाषाएं भी भिन्न-भिन्न थी. पहले कई तरह के रजिस्टरों का हिसाब-किताब रखना पड़ता था. अधिकारी अपने हिसाब से नियमों की व्याख्या करते थे, और उन सब नियम-क़ायदों को फाइलों में रखा जाता था. अब नई संहिताओं के साथ, श्रमिकों को ग्रेच्युटी, सामाजिक सुरक्षा, बोनस और वैधानिक अंशदान की सरल और सुसंगत गणनाओं का लाभ मिलेगा. पहले ग्रेच्युटी पाने के लिए किसी कंपनी में लगातार पांच साल काम करना अनिवार्य था, अब एक साल की नौकरी के बाद ग्रेच्युटी के लाभ मिल सकते हैं. इन कानूनों में 'गिग वर्कर्स' को भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है. गिग वर्कर्स में आम तौर पर अस्थायी नौकरी या फ्रीलांसिग करने वालों को शामिल किया जाता है. इसके अलावा डिलीवरी ब्वॉय और उबर-ओला राइडर भी इस श्रेणी में आते हैं. इसके साथ ही, उद्यमियों को भी सरल और सुव्यवस्थित नियम मिलेंगे और उनके लिए इनका अनुपालन करना आसान होगा.

3. एकल पंजीकरण

पंजीकरण और लाइसेंसिंग ढांचे में एक बुनियादी बदलाव आया है. पहले बहुत तरह के पंजीकरण करने पड़ते थे, जैसे कि कारखाना अधिनियम, खनन अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम, प्रशिक्षु अधिनियम, ईएसआई अधिनियम, या भविष्य निधि अधिनियम. अब इन सबको एकल पंजीकरण, सिंगल लाइसेंस और सिंगल रिटर्न ढांचे में जोड़ दिया गया है. 

4. कंपनी में कर्मचारियों की सीमारेखा क्या?

नए श्रम कानूनों में कई स्तर की संरचना की जगह एक समान 10 कर्मचारियों की सीमा ने ले ली है. पहले, 15 कर्मचारियों वाले किसी छोटे या मध्यम आकार के उद्यम पर कुछ दायित्व अनिवार्य रूप से लागू होते थे, जैसे कि ईएसआई, अप्रेंटिस अधिनियम, या कारखाना अधिनियम के तहत, लेकिन भविष्य निधि और पीओएसएच (प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट) जैसे अन्य दायित्व लागू नहीं होते थे. इससे ये भ्रम पैदा होता था कि, क्या नियम विशेष रूप से लागू हैं और क्या नहीं? इसे औपचारिकता की राह में एक बड़ी बाधा के रूप में पहचाना गया. रिकॉर्ड रखने की आवश्यकताओं को 48 अलग-अलग श्रम रजिस्टरों से घटाकर 10 से भी कम कर दिया गया है.

5. नियमों को लागू करने के मॉडल में बड़े बदलाव

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ये है कि नियामक मॉडल में कुछ बड़े परिवर्तन किए गए हैं. अब नियामकों को दंड की बजाए सुविधा और सक्षमता के मॉडल में बदला गया है. अब जो संस्थाएं या व्यक्ति किसी कंपनी का निरीक्षण करने जाएंगे, वो कानूनी कार्रवाई करने वाले एजेंटों की बजाए सलाहकार भागीदारों के रूप में काम करेंगे. अब तक ये होता था कि नियमों के पालन में थोड़ी से भी चूक हो जाए तो निरीक्षण करने वाले लोग दंडात्मक कार्रवाई की बात करते थे. ये फैक्ट्री स्तर पर सक्रिय, सुधारात्मक जुड़ाव की ओर बढ़ने का संकेत देता है.


“नए श्रम कानूनों में वेतन, श्रमिकों और प्रतिष्ठानों जैसी परिभाषाओं को सुसंगत बनाया है.”

स्याह अतीत से उज्जवल भविष्य

श्रम कानून, भारत में व्यापार को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचों की सात श्रेणियों में से एक हैं. हालांकि, सात श्रेणियों में से एक होने के बावजूद कारोबार करने के रास्ते में इनका प्रभाव बहुत व्यापक है. सभी अनुपालन दायित्वों में उनका योगदान लगभग आधा (47 प्रतिशत) था, और देश के व्यावसायिक कानूनों में लगभग 10 में से सात, यानी 68 प्रतिशत, सभी आपराधिक दायित्व इनसे जुड़े थे. कारखानों में, ये 29 श्रम कानून 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में 32,542 अलग-अलग अनुपालन दायित्वों में बदल गए थे.

इस जटिलता को और बढ़ाते हुए, जाने-अनजाने में हुई किसी भी गलती के लिए नियामक ढांचे ने आपराधिक दंडों को हथियार बना दिया था, जिनमें से 17,000 से ज़्यादा में जेल भेजे जाने की धाराएं थीं. इनमें से कई कानूनों में मूल उल्लंघनों के बजाए प्रक्रियात्मक चूक और तकनीकी गलतियों के लिए कारावास का प्रावधान था. इस दंडात्मक ढांचे में कुछ अस्पष्ट विधायी परिभाषाएं भी शामिल थी, जैसे कि वेतन, श्रमिक और प्रतिष्ठान की परिभाषाओं से जुड़े नियम स्पष्ट नहीं थे. कई ऐसी सीमारेखाएं थीं, जो व्यावहारिक नहीं थी. रिकॉर्ड का हिसाब रखने और नियम-कायदों का ऐसा जाल था, जिनका पालन करना बहुत मुश्किल था. पुराने श्रम कानून 21वीं सदी के आधुनिक भारतीय उद्यम की आकांक्षाओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे. 

पुराने श्रम कानूनों का प्रशासनिक बोझ छोटी-छोटी चीजों तक फैला हुआ था. थूकदान कैसे होंगे, महिला-पुरुषों के लिए सुविधाएं, कपड़ों के भंडारण के मानकों, रसोई और कैंटीन को चूने से धोने जैसे प्रावधान इसमें शामिल था. ये नियामक अतिक्रमण का उदाहरण था, जिसने उद्यमशीलता का ध्यान मूल्य सृजन से हटाकर नियमों के पालन और उनके प्रबंधन की तरफ मोड़ दिया. उदाहरण के तौर पर, एक राज्य में एक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) विनिर्माण इकाई सालाना लगभग 120 विशिष्ट श्रम अनुपालन दायित्वों और 500 से ज़्यादा अनुपालन मामलों का प्रबंधन करती है. अगर गौर से देखें तो आपको इन रिकॉर्ड-कीपिंग की ज़रूरतों में भारी दोहराव, ओवरलैप और फालतू का काम दिखाई देगा, जिससे रोज़मर्रा की परेशानी होती है.

भारत के श्रम सुधारों का कठिन सफर
श्रम सुधारों की यात्रा ने 2002 में बौद्धिक गति पकड़ी. तब राष्ट्रीय श्रम आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में 44 श्रम कानूनों की बहुलता को युक्तिसंगत बनाकर चार या पांच संहिताओं में समेटने की आवश्यकता है. वर्तमान सहस्राब्दी में अभी तक सिर्फ असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 ही लागू किया गया था. ये अधिनियम उन 29 कानूनों में से एक था, जिन्हें अब चार श्रम संहिताओं में समेट दिया गया है. भारत की आज़ादी से पहले चार क़ानून लागू थे. इसके बाद 1947 और 1948 के बीच चार और कानून बनाए गए. छह 1950 के दशक में, चार 1960 के दशक में, पांच 1970 के दशक में, तीन 1980 के दशक में और दो कानून 1990 के दशक में बने. भारत अभी तक पिछली सहस्राब्दी में लिखे गए कानूनों के तहत काम कर रहा है, जबकि दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है. खुद भारत ने भी, अपनी संरचना में विनिर्माण से लेकर सेवाओं तक, और इंटरनेट और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपनाते हुए, संरचनात्मक बदलावों को अपनाया है.

“पंजीकरण और लाइसेंसिंग ढांचे में एक बुनियादी बदलाव आया है.”

श्रम सुधारों की तात्कालिकता के बावजूद लगभग एक चौथाई सदी तक इन्हें लेकर विधायी चुप्पी रही. कृषि कानूनों की तरह श्रम कानूनों में सुधार करना भी राजनीतिक तौर पर एक संवेदनशील कदम था. ये उस समय की बदलती राजनीति को दर्शाता है. 2004 में, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गए, और श्रम सुधारों की प्रक्रिया को भी भारी नुकसान हुआ. अगले एक दशक तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे, लेकिन यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) के कार्यकाल में आंतरिक अंतर्विरोध बहुत ज़्यादा थी. बहुमत के लिए वामपंथी सहयोगियों पर निर्भरता के कारण श्रम सुधार अछूते रह गए. 2014 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास इन सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए राज्यसभा में आवश्यक बहुमत नहीं था. 2019 में, जब उनके पास संसद के दोनों सदनों में बहुमत था, तो ये श्रम संहिताएं विधायी प्रक्रिया से गुज़रीं. फिर भी, इन्हें लागू करने में सरकार को और पांच साल लग गए. इसी से ये साबित होता है कि भारत में श्रम सुधार करना कितना कठिन काम है.

अब अगला महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार को सभी चार श्रम संहिताओं के नियमों को शीघ्रता से अधिसूचित करना चाहिए. इसका फायदा ये होगा कि नियमों को लेकर किसी भी तरह की अस्पष्टता दूर होगी. श्रम कानूनों पर व्यापक विचार-विमर्श पहले ही हो चुका है, इसलिए अब इन अधिसूचनाओं को अंतिम रूप देने का समय आ गया है. ज़्यादातर राज्य सरकारें भी इन पर सहमत है. ऐसे में श्रम सुधारों के निर्बाध कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने और इनका पूरा लाभ उठाने जल्द से जल्द इन्हें अधिसूचित कर लेना चाहिए. 

“सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ये है कि नियामक मॉडल में कुछ बड़े परिवर्तन किए गए हैं.”

अगर इन श्रम कानूनों के समग्र प्रभाव को देखें, तो कहा जा सकता है कि श्रम सुधार आसान नहीं था. प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम की इस दिशा में आगे बढ़ाने के लिए सराहना की जानी चाहिए. वैसे ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि मोदी ने बार-बार खुद को एक ऐसे सुधारक के रूप में साबित किया है, जिसे अपने फैसले पर विश्वास है. 2014 के बाद से लागू किए गए कई आर्थिक सुधारों से मोदी की मज़बूत इरादों का पता चलता है, जैसे कि जन धन योजना, जीएसटी, दिवालियापन कानून और बैंकरप्सी कोड.

अब आगे क्या?

 उभरते भारत के लिए श्रम सुधार ज़रूरी थे. 29 श्रम कानूनों की आड़ में जो नियम बने हुए थे, वे 21वीं सदी के उद्योग जगत के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे. अब घरेलू विनिर्माण यानी मेड इन इंडिया मुहिम एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है. सरकार भी औद्योगिक गलियारों, तेज़ कनेक्टिविटी और बंदरगाहों पर तेज़ी से काम पूरा करने जैसी योजनाओं के ज़रिए उद्योग जगत की नींव रख रही है. ऐसे में उद्योगों को भी ज़रूरत से ज़्यादा नियम-कायदों के बोझ से मुक्ति मिल सकती है. इन चार कानूनों को प्रभावी बनाकर सरकार ने श्रम-पूंजी-उद्यमी की उद्योग त्रिमूर्ति को मजबूत किया है. ये फैसला अब देश को विकसित भारत की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

इस सुधार के माध्यम से सरकार ने लगभग वही काम किया है, जिसकी उससे उम्मीद थी. इस सुधार का अंतिम चरण जन विश्वास 2.0 में लागू किया जाएगा, जिस पर अभी बातचीत चल रही है. अब गेंद उद्योगपतियों के पाले में है. ये सही है कि, उन्हें अभी भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन श्रम कानून और उनके नियमों के बोझ से उन्हें छुटकारा मिल गया है.


गौतम चिकरमाने ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हैं.

ऋषि अग्रवाल टीमलीज रेगटेक के सह-संस्थापक और सीईओ हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.