Author : Pratnashree Basu

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 23, 2026 Updated 1 Days ago

तेल के रास्ते पर तनाव बढ़ा तो जापान फंस गया. आखिर क्यों वह तुरंत फैसला नहीं ले रहा? हॉर्मुज़ में सेना क्यों नहीं भेज रहा और क्यों बीच का रास्ता चुन रहा है...इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख.

ईरान संकटः क्या रोक रहा है जापान को?

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और अमेरिका से बदलते संकेतों के कारण जापान ऐसी स्थिति में है जहां उसके फैसले तुरंत नहीं बल्कि उसकी पुरानी नीतियों और सीमाओं से तय हो रहे हैं. कुछ ही दिनों के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगी देशों पर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक की सुरक्षा के लिए दबाव बढ़ाया और फिर अचानक अपना रुख बदलते हुए नाटो, जापान और अन्य सहयोगियों से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में नौसैनिक संसाधन भेजने की अपनी मांग वापस ले ली. यह बदलाव ट्रंप के गठबंधन संबंधों के प्रति अस्थिर दृष्टिकोण को दिखाता है जहां मांगें जल्दी ही एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व के दावों में बदल सकती हैं. जापान के लिए इससे वाशिंगटन की स्थिरता और भरोसेमंदता को लेकर अनिश्चितता और बढ़ जाती है.

प्रधानमंत्री साने  की व्हाइट हाउस की पहली यात्रा के समापन के साथ इस घटनाक्रम को अतिरिक्त कूटनीतिक महत्व भी मिल गया है. शिखर बैठक से यह संकेत मिला कि कई मुद्दों पर चर्चा हुई, हालांकि सुर्खियों में हॉर्मुज़ ही रहा- बातचीत का एक अहम हिस्सा यह था कि सुरक्षा सहयोग की पुष्टि की जाए लेकिन जलडमरूमध्य में जापानी नौसैनिक तैनाती को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता न दी जाए. अमेरिका के दबाव के बावजूद प्रधानमंत्री साने ने ज़ोर देकर कहा कि टोक्यो की किसी भी भागीदारी को कानूनी सीमाओं के भीतर ही रहना होगा.

कुछ ही दिनों के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगी देशों पर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक की सुरक्षा के लिए दबाव बढ़ाया और फिर अचानक अपना रुख बदलते हुए नाटो, जापान और अन्य सहयोगियों से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में नौसैनिक संसाधन भेजने की अपनी मांग वापस ले ली. यह बदलाव ट्रंप के गठबंधन संबंधों के प्रति अस्थिर दृष्टिकोण को दिखाता है जहां मांगें जल्दी ही एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व के दावों में बदल सकती हैं.

इसी के साथ बैठक का दायरा आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों तक भी बढ़ा- दोनों पक्षों ने रक्षा-औद्योगिक सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और सह-उत्पादन पहलों पर चर्चा की. नतीजा जानबूझकर संतुलित रखा गया-कोई बड़ा ऐलान नहीं हुआ लेकिन निरंतरता का संदेश देने की कोशिश साफ दिखी. रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका के ऊर्जा और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों जिनमें परमाणु और गैस परियोजनाएं शामिल हैं, में जापान के नए निवेश की तैयारी हो रही है. इस तरह शिखर बैठक ने एक परिचित पैटर्न को रेखांकित किया-सिद्धांत रूप में करीबी समन्वय, लेकिन व्यवहार में खासकर क्षेत्र से बाहर की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर सावधानीपूर्वक अलग रुख.

हॉर्मुज़ का महत्त्व  

वाशिंगटन का दबाव हॉर्मुज़ से गुजरने वाले जहाज़ों में आ रही बाधाओं से जुड़ा है, जो अमेरिका–इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण पैदा हुई हैं. दुनिया की लगभग पाँचवाँ हिस्सा तेल आपूर्ति इसी जलमार्ग से गुजरती है, और इसमें किसी भी तरह की अस्थिरता ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को तुरंत प्रभावित करती है. जापान भी इससे अछूता नहीं है, क्योंकि यह जलडमरूमध्य उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है- रिपोर्टों के मुताबिक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ने पर टोक्यो ने अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग भी शुरू कर दिया है.

ट्रंप का तर्क है कि जलडमरूमध्य में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सहयोगी देशों का सहयोग जरूरी है- इसी कारण उन्होंने नाटो और अन्य साझेदारों से आग्रह किया है कि वे इस जलमार्ग से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाज़ों की सुरक्षा के लिए नौसैनिक संसाधन उपलब्ध कराएँ- ‘बोझ साझा करने’ के रूप में पेश की गई यह पहल अमेरिकी गठबंधन प्रबंधन में व्यापक बदलाव को भी दर्शाती है.जहाँ अब केवल अप्रत्यक्ष समर्थन की बजाय प्रत्यक्ष और दिखाई देने वाले योगदान पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है.

रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका के ऊर्जा और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों जिनमें परमाणु और गैस परियोजनाएं शामिल हैं, में जापान के नए निवेश की तैयारी हो रही है. इस तरह शिखर बैठक ने एक परिचित पैटर्न को रेखांकित किया-सिद्धांत रूप में करीबी समन्वय, लेकिन व्यवहार में खासकर क्षेत्र से बाहर की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर सावधानीपूर्वक अलग रुख.

हालांकि जापान की प्रतिक्रिया अभी भी अनिश्चित बनी हुई है. ताकाइची अपने विकल्पों पर विचार कर रही हैं और उन्होंने कहा है कि एस्कॉर्ट मिशन भेजने पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है- सरकार किसी भी संभावित भागीदारी के कानूनी और परिचालन पहलुओं की जांच कर रही है- यह अस्पष्टता जानबूझकर रखी गई है, ताकि टोक्यो अपनी प्रतिबद्धता दिखा सके, लेकिन ऐसा कदम न उठाए जो राजनीतिक या रणनीतिक रूप से महंगा साबित हो. ऐसे फैसले राजनीतिक रूप से संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं. जापान की हिचकिचाहट सिर्फ सावधानी नहीं, बल्कि गठबंधन की अपेक्षाओं, आर्थिक संवेदनशीलता और घरेलू कानूनी सीमाओं के बीच लंबे समय से मौजूद तनाव को भी उजागर करती है.

जापान की सामरिक रणनीति  

जापान के संविधान का अनुच्छेद 9, कई बार की पुनर्व्याख्याओं के बावजूद, विदेश में बल प्रयोग को अब भी सीमित करता है- हालांकि जापान ने समय के साथ अपनी सुरक्षा भूमिका को धीरे-धीरे बढ़ाया है, खासकर सामूहिक आत्मरक्षा के प्रावधानों के माध्यम से, फिर भी सक्रिय संघर्ष क्षेत्र में जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेन्स फोर्स की तैनाती विवादास्पद बनी हुई है. हॉर्मुज़ में वाणिज्यिक जहाज़ों को एस्कॉर्ट करना-जहाँ अमेरिकी बल पहले से सैन्य रूप से सक्रिय हैं.रक्षात्मक समर्थन और सीधे संघर्ष में भागीदारी के बीच की रेखा को धुंधला कर सकता है.

यह कानूनी अस्पष्टता घरेलू राजनीतिक कारकों से और जटिल हो जाती है- सामान्य तौर पर जापानी जनमत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अधिक सक्रिय सुरक्षा भूमिका का समर्थन करता रहा है, खासकर चीन के उदय के संदर्भ में. लेकिन इस क्षेत्र से बाहर के संघर्षों में शामिल होने के लिए समर्थन बहुत कम है. इसलिए हॉर्मुज़ में तैनाती से takaichi सरकार को इस आलोचना का सामना करना पड़ सकता है कि वह ऐसे संघर्ष में अमेरिकी सैन्य अभियानों के साथ बहुत अधिक निकटता से खड़ी हो रही है, जिसका जापान की क्षेत्रीय रक्षा से सीधा संबंध नहीं है.

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ जुड़ी होने के कारण हॉर्मुज़ जैसे दूर के संकट भी पश्चिम एशिया की समस्याओं को इंडो-पैसिफिक के लिए रणनीतिक चुनौती बना देते हैं. इसलिए जापान की प्रतिक्रिया को इस संकेतक के रूप में भी देखा जा सकता है कि एशिया में अमेरिकी सहयोगी, क्षेत्र से बाहर की सुरक्षा कार्रवाइयों में भागीदारी के बढ़ते दबाव को कैसे संभालते हैं.

जापान पहले भी ऐसी दुविधाओं का सामना कर चुका है, हालांकि परिस्थितियाँ उतनी गंभीर नहीं थीं- मध्य पूर्व में समुद्री सुरक्षा के लिए टोक्यो का योगदान-जिसमें वाणिज्यिक जहाज़ों की सुरक्षा और अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती विरोधी अभियान शामिल हैं. सावधानीपूर्वक इस तरह तैयार किए गए थे कि सीधे युद्ध में भागीदारी से बचा जा सके. हॉर्मुज़ और उसके आसपास सक्रिय संघर्ष की मौजूदगी किसी भी संभावित तैनाती के कानूनी और राजनीतिक संदर्भ को बदल देती है.

जापान के निर्णय का महत्व केवल इस तत्काल संकट तक सीमित नहीं है. यह उसकी सुरक्षा भूमिका के भौगोलिक दायरे से जुड़े बड़े सवाल भी उठाता है- युद्ध के बाद लंबे समय तक जापान का रणनीतिक ध्यान पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया पर केंद्रित रहा है. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ जुड़ी होने के कारण हॉर्मुज़ जैसे दूर के संकट भी पश्चिम एशिया की समस्याओं को इंडो-पैसिफिक के लिए रणनीतिक चुनौती बना देते हैं. इसलिए जापान की प्रतिक्रिया को इस संकेतक के रूप में भी देखा जा सकता है कि एशिया में अमेरिकी सहयोगी, क्षेत्र से बाहर की सुरक्षा कार्रवाइयों में भागीदारी के बढ़ते दबाव को कैसे संभालते हैं.

निष्कर्ष 

इस पूरे घटनाक्रम से जो तस्वीर सामने आती है, वह कार्रवाई और निष्क्रियता के बीच साधारण चुनाव की नहीं, बल्कि जोखिम प्रबंधन की एक जटिल प्रक्रिया की है. टोक्यो इन तीनों मांगों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है-कानूनी सीमाओं का पालन, आर्थिक हितों की रक्षा और गठबंधन की मजबूती. संभव है कि इसका परिणाम सीमित भागीदारी के रूप में सामने आए, जो प्रतिबद्धता का संकेत दे, लेकिन तत्काल जोखिमों से भी बचाए. संकट किस दिशा में बढ़ता है, इससे तय होगा कि यह तरीका कितना टिकाऊ रहता है.

इन सीमाओं को देखते हुए टोक्यो सीधे जहाज़ों को एस्कॉर्ट करने जैसे बड़े सैन्य कदम की बजाय बीच का रास्ता चुन सकता है, इसका मतलब है कि जापान कुछ ऐसे कदम उठाए जो अमेरिका के साथ सहयोग दिखाएँ, लेकिन उसके अपने कानूनों की सीमा के भीतर रहें. अभी यह साफ नहीं है कि इससे वाशिंगटन पूरी तरह संतुष्ट होगा या नहीं. फिलहाल, डोनाल्ड ट्रम्प के पहले वाले दबाव से पीछे हटने के बाद टोक्यो लचीली रणनीति अपना रहा है. विकल्प खुले रख रहा है और जल्दबाज़ी में कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहता, इससे पता चलता है कि बदलती अंतरराष्ट्रीय अपेक्षाओं के बावजूद जापान की विदेश और सुरक्षा नीति अभी भी कुछ तय सीमाओं के भीतर ही चलती है.


प्रतनाश्री बसु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.

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Pratnashree Basu

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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...

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