Author : Akshay Ranade

Expert Speak India Matters
Published on Apr 29, 2026 Updated 2 Days ago

नक्सलवाद काफी हद तक खत्म हो चुका है लेकिन खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है. अब ये शहरों में नए तरीके से फैलने की कोशिश कर सकता है. जानें नक्सलवाद पर बड़ी जीत के बाद भी क्यों जरूरी है लगातार निगरानी.

नक्सल-मुक्त भारत: जीत के बाद की असली चुनौती

Image Source: Getty

‘उनका (माओवादियों का) पोलित ब्यूरो और केंद्रीय ढांचा लगभग पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है. हमारा लक्ष्य 31 मार्च तक भारत को नक्सल-मुक्त बनाना था. पूरी प्रक्रिया औपचारिक रूप से पूरी होने के बाद देश को सूचित किया जाएगा, लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि हम नक्सल-मुक्त हो चुके हैं,’ गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को संसद में भारत में माओवादी विद्रोह की स्थिति पर अपने संबोधन में कहा-यह उस समय सीमा से एक दिन पहले था, जो उन्होंने अगस्त 2024 में देश को नक्सल-मुक्त बनाने के लिए निर्धारित की थी. गृह मंत्री ने आगे कहा, ‘आज की स्थिति में, एक को छोड़कर पूरा माओवादी नेतृत्व समाप्त कर दिया गया है. बताया जाता है कि बेसरा इस वर्ष जनवरी में सारंडा जंगल में सुरक्षाबलों के साथ हुई मुठभेड़ से बच निकले थे. यदि वे आत्मसमर्पण करते हैं, तो इससे केंद्र सरकार को माओवाद को पूरी तरह समाप्त करने-कम से कम इसके संगठनात्मक रूप में, विशेषकर जंगल क्षेत्रों में-अपने लक्ष्य के और करीब पहुंचने में मदद मिल सकती है.

यह समयबिंदु भारत सरकार के उस प्रयास का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, जो कभी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा ‘भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा‘ कहा गया था. सिमटता हुआ ‘रेड कॉरिडोर,’ वामपंथी उग्रवाद (LWE) की घटनाओं में तेज गिरावट, प्रमुख माओवादी नेताओं का निष्क्रिय होना, और बढ़ते आत्मसमर्पण-ये सभी संकेत देते हैं कि शक्ति संतुलन अब भारतीय राज्य के पक्ष में झुक चुका है. चुनौती यह है कि सुरक्षा में मिली सफलता को स्थायी शांति में बदला जाए, और भारत का अनुभव दिखाता है कि लोकतंत्र के जरिए उग्रवाद से निपटा जा सकता है, लेकिन नई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं.

रेड कॉरिडोर से राष्ट्रीय रणनीति तक

सीपीआई (माओवादी) ने माओ के ‘दीर्घकालिक जनयुद्ध’ के सिद्धांत को व्यवहार में लागू किया, जिसका भारतीय संदर्भ में अर्थ था-वन क्षेत्रों में मजबूत ठिकाने स्थापित करना, शासन की कमजोरियों का लाभ उठाकर नियंत्रण मजबूत करना, और अंततः शहरों को घेरकर अंतिम आक्रमण करना. इस रणनीति ने 1990 और 2000 के दशक में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की, जो ‘रेड कॉरिडोर’ के विस्तार और तथाकथित ‘मुक्त क्षेत्रों’ के उदय में दिखाई दी, जहां समानांतर प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्थाओं ने राज्य की सत्ता को चुनौती दी.

गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को संसद में भारत में माओवादी विद्रोह की स्थिति पर अपने संबोधन में कहा-यह उस समय सीमा से एक दिन पहले था, जो उन्होंने अगस्त 2024 में देश को नक्सल-मुक्त बनाने के लिए निर्धारित की थी. आगे कहा, ‘आज की स्थिति में, एक को छोड़कर पूरा माओवादी नेतृत्व समाप्त कर दिया गया है. 

भारतीय राज्य के पक्ष में यह महत्वपूर्ण उपलब्धि रही कि उसने इन चुनौतियों का जवाब मुख्यतः लोकतांत्रिक-संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर दिया. प्रारंभ में जहाँ राज्यों ने इस चुनौती का सामना किया, वहीं धीरे-धीरे केंद्र ने एक अधिक समन्वयकारी भूमिका अपनाई. 2006 में गृह मंत्रालय के अंतर्गत एलडब्ल्यूई डिवीजन की स्थापना एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जिससे खुफिया सूचनाओं के संकलन और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय में सुधार हुआ, और इस समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा जाने लगा.

यह बदलाव 2015 की राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना में स्पष्ट रूप से सामने आया, जिसमें एक समग्र प्रति-विद्रोह रणनीति प्रस्तुत की गई. इसके ‘कठोर’ पक्ष में खुफिया-आधारित अभियान, अग्रिम ठिकानों का विस्तार, और तकनीक के माध्यम से माओवादी नेतृत्व और उनके लॉजिस्टिक नेटवर्क को बाधित करना शामिल था. वहीं ‘नरम’ पक्ष में विकास और शासन को प्राथमिकता दी गई-जिसमें लक्षित वित्तीय सहायता, बुनियादी ढांचे का विस्तार, और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी कल्याणकारी व्यवस्थाएं शामिल थीं. इन दोनों पहलुओं के संयोजन ने राज्य की शक्ति और विकासात्मक पहुंच को साथ लाकर प्रभावित क्षेत्रों में उसकी वैधता को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया.

संख्या बता रही है कहानी

संसद में अपने संबोधन में अमित शाह ने इस गिरावट को आंकड़ों के माध्यम से स्पष्ट किया, जो भारत की वामपंथी उग्रवाद (LWE) के खिलाफ लड़ाई की एक उत्साहजनक तस्वीर प्रस्तुत करता है. उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्षों में ही ‘706 माओवादी मारे गए, 2,218 गिरफ्तार किए गए, और 4,800 से अधिक कैडर ने आत्मसमर्पण किया.’ भौगोलिक दृष्टि से, ‘रेड कॉरिडोर’ काफी सिमट चुका है और अब सरकार के नवीनतम आकलन के अनुसार केवल दो जिले-छत्तीसगढ़ का बीजापुर और झारखंड का पश्चिम सिंहभूम-ही प्रभावित क्षेत्रों में शेष हैं. 2005 में यह संख्या लगभग 200 थी. संगठनात्मक स्तर पर भी सीपीआई (माओवादी) विखंडन और क्षरण का शिकार हुआ है. दशकों में हुए आत्मसमर्पण इस आंदोलन के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुए हैं.

संसद में अपने संबोधन में अमित शाह ने इस गिरावट को आंकड़ों के माध्यम से स्पष्ट किया, जो भारत की वामपंथी उग्रवाद (LWE) के खिलाफ लड़ाई की एक उत्साहजनक तस्वीर प्रस्तुत करता है. उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्षों में ही ‘706 माओवादी मारे गए, 2,218 गिरफ्तार किए गए, और 4,800 से अधिक कैडर ने आत्मसमर्पण किया

यह गिरावट सुरक्षा अभियानों और निरंतर विकासात्मक प्रयासों के एकीकरण का परिणाम है. विशेष केंद्रीय सहायता जैसी लक्षित वित्तीय योजनाओं के तहत सड़कों, दूरसंचार, स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, बैंकिंग और आजीविका से जुड़े महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का विकास किया गया. एक महत्वपूर्ण मोड़ बड़े पैमाने पर हुए आत्मसमर्पण रहे हैं, जिन्हें सुव्यवस्थित पुनर्वास योजनाओं ने संभव बनाया. इन योजनाओं के तहत आर्थिक प्रोत्साहन, शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान किए गए. पूर्व कैडरों ने लॉजिस्टिक्स और नेटवर्क से जुड़ी महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी भी उपलब्ध कराई. लक्षित अभियानों के माध्यम से नेतृत्व को निष्क्रिय करने और बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण के संयोजन ने विद्रोह की संगठनात्मक क्षमता को काफी हद तक कमजोर कर दिया है.

लंबे संघर्ष से लड़ने का लोकतांत्रिक मॉडल

भारतीय अनुभव उन लोकतंत्रों के लिए एक उभरता हुआ मॉडल प्रस्तुत करता है, जो वैचारिक रूप से प्रेरित सशस्त्र विद्रोहों का सामना कर रहे हैं. पहला, यह समकालीन प्रति-विद्रोह सिद्धांत के एक मूल विचार की पुष्टि करता है कि केवल बल प्रयोग पर्याप्त नहीं है; राज्य को विवादित क्षेत्रों पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करने के लिए विश्वसनीय शासन और विकास की उपस्थिति भी सुनिश्चित करनी होती है.

दूसरा, संस्थागत निकास विकल्प-जैसे आम माफी, पुनर्वास और पुनः एकीकरण-उग्रवादी एकता को तोड़कर आत्मसमर्पण को सम्मानजनक व व्यावहारिक बनाते हैं, साथ ही पूर्व कैडर खुफिया स्रोत भी बनते हैं. इस दौरान भारत का लोकतांत्रिक ढांचा-चुनाव, मीडिया, न्यायपालिका और संघीय व्यवस्था-स्थिर बना रहा, बावजूद कुछ स्थानीय दुरुपयोगों के. इस प्रकार, लोकतांत्रिक व्यवस्था ने न केवल इस लंबे समय से चले आ रहे माओवादी विद्रोह को रोकने में बाधा नहीं डाली, बल्कि इसके समाधान में केंद्रीय भूमिका निभाई.

माओवादी रणनीतिक साहित्य और बदलते लामबंदी पैटर्न इस बात का संकेत देते हैं कि अब उनका ध्यान शहरी मोर्चों, नागरिक समाज में पैठ बनाने और विस्थापन तथा राज्य हिंसा जैसे मुद्दों पर वैचारिक संघर्ष छेड़ने की ओर बढ़ रहा है.

और तीसरा, पेरू में अल्बर्टो फुजीमोरी के शासन के तहत सेंडेरो लुमिनोसो के दमन या श्रीलंका में लिट्टे (LTTE) की हार जैसी अधिक सत्तावादी सफलताओं के विपरीत, भारत का अनुभव यह संकेत देता है कि विद्रोहों का मुकाबला लोकतांत्रिक राजनीति को स्थगित किए बिना, या आपातकालीन अथवा सैन्य शासन लागू किए बिना भी किया जा सकता है. इस तरह, भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत संरचना इस संघर्ष के समाधान में एक महत्वपूर्ण आधार बनी रही है.

जंगल शांत, शहर निशाने पर

वन क्षेत्रों में सफलता के बावजूद यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या आंदोलन अब ऐसे जटिल चरण में पहुंच गया है, जहाँ विद्रोह, उग्र राजनीति और वैध असहमति की सीमाएँ धुंधली हो रही हैं. माओवादी रणनीतिक साहित्य और बदलते लामबंदी पैटर्न इस बात का संकेत देते हैं कि अब उनका ध्यान शहरी मोर्चों, नागरिक समाज में पैठ बनाने और विस्थापन तथा राज्य हिंसा जैसे मुद्दों पर वैचारिक संघर्ष छेड़ने की ओर बढ़ रहा है.

सीपीआई (माओवादी) अब यह स्वीकार करने लगी है कि केवल आदिवासी और वन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना भारत की बदलती सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है. ग्रामीण–शहरी संबंधों की जटिलता उन्हें शहरों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही है. माओवादी अब ‘क्रांतिकारी संयुक्त मोर्चों’ के जरिए शहरी क्षेत्रों, नागरिक समाज और सार्वजनिक विमर्श में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ा रहे हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से सशस्त्र आंदोलन को मजबूत कर सकता है. हालांकि पुनरुत्थान की संभावना सीमित है, फिर भी इसका प्रभाव अहम है. चुनौती यह है कि गुप्त हिंसात्मक समर्थन पर कार्रवाई करते हुए वैध लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा बनी रहे.

भारतीय राज्य के सामने दोहरी चुनौती है, पहला, पूर्व संघर्ष क्षेत्रों में अधिकार-आधारित और संवेदनशील शासन के माध्यम से अपनी उपलब्धियों को स्थायी बनाना और दूसरा, माओवाद के शहरी आयाम से निपटना, बिना नागरिक स्वतंत्रताओं, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन-को कमजोर किए.

राजनीतिक बहस से अलग, यह तथ्य कि माओवादी अपने ही दस्तावेजों में इस रणनीतिक बदलाव को स्वीकार कर रहे हैं, इस परिवर्तन को और स्पष्ट करता है. विश्लेषणात्मक रूप से देखें तो यह उनके दृष्टिकोण में एक बदलाव है, जहाँ अब लक्ष्य केवल तत्काल सत्ता पर कब्जा करना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मूल संरचना को चुनौती देना और सशस्त्र संघर्ष को वैधता प्रदान करना बनता जा रहा है.

सुरक्षा vs स्वतंत्रता: असली चुनौती

माओवादियों का शहरी क्षेत्रों और नागरिक समाज की ओर झुकाव लोकतांत्रिक सुरक्षा शासन के एक पुराने द्वंद्व को सामने लाता है-ऐसा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून कैसे बनाया जाए जो उभरते खतरों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके, लेकिन असहमति और विद्रोह के बीच नैतिक और कानूनी अंतर को धुंधला न करे.

कानूनी और राज्य शक्तियों का विस्तार आवश्यक है, पर असली चुनौती गुप्त हिंसा को रोकते हुए लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा करना है, क्योंकि कमजोर पड़ने के बावजूद माओवादी वैचारिक नेटवर्क नए क्षेत्रों में सक्रिय हो सकते हैं. ऐसे में भारतीय राज्य के सामने दोहरी चुनौती है-पहला, पूर्व संघर्ष क्षेत्रों में अधिकार-आधारित और संवेदनशील शासन के माध्यम से अपनी उपलब्धियों को स्थायी बनाना और दूसरा, माओवाद के शहरी आयाम से निपटना, बिना नागरिक स्वतंत्रताओं-विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन-को कमजोर किए.


अक्षय रानाडे, डॉ. श्रीपति शास्त्री रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक हैं.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.