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Published on Nov 20, 2025 Updated 0 Hours ago

8 नवंबर 2025 की गिरफ्तारियों ने भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर रिसिन जैव-आतंकी हमले की आशंका को उजागर किया लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, जांच आगे बढ़ी तो सुराग पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क तक जा पहुँचे. ऐसे में सवाल ये है कि जैविक हमलों के ख़तरों को लेकर भारत कितना तैयार है?

बायो-आतंकवाद: हमला टला पर खतरा बरकरार, जानें भारत कितना तैयार?

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गुजरात के एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड ने 8 नवंबर को हैदराबाद के एक डॉक्टर और उसके दो सहयोगियों को गिरफ्तार किया. पुलिस ने इनके पास से अरंडी के तेल से जुड़ा सामान, हथियार और जासूसी में इस्तेमाल होने वाला डेटा ज़ब्त किया.  इनकी गिरफ्तारी से भारतीय शहरों में रिसिन ज़हर के ज़रिए आतंक फैलाने की एक बड़ी साज़िश का पर्दाफाश किया. रिसिन एक बहुत ही ख़तरनाक ज़हर है, जो अरंडी के बीजों में मिलता है. ये शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करके जीवन के लिए ज़रूरी प्रोटीन बनाने से रोकता है, जिससे कोशिकाएं मर जाती हैं. इससे शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं और इसकी थोड़ी सी मात्रा भी घातक हो सकती है. अगर इन आतंकियों की योजना कामयाब हो जाती तो ये ना सिर्फ भारत की आतंकवाद-रोधी क्षमताओं की बल्कि सामूहिक विनाश के हथियारों (डब्ल्यूएमडी) से निपटने की सीमाओं की भी परीक्षा लेती. 

“लेख में इस बात की भी चर्चा की गई है कि अगर इस आतंकी हमले को अंजाम दे दिया गया होता तो क्या ये 2003 के परमाणु सिद्धांत में वर्णित 'मुख्य हमला' की सीमा के करीब पहुंच सकता था?”

 रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांचकर्ताओं ने अरंडी के तेल का कच्चा माल और गिरफ्तार किए गए लोगों के विदेश में हैंडलर्स के साथ समन्वय के सबूत बरामद किए हैं. ये भी पता चला है कि इन आरोपियों के निशाने पर दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद जैसे भीड़-भाड़ वाले नागरिक क्षेत्र शामिल थे. ये लेख इस बात की पड़ताल करता है कि इस तरह का ख़तरा भारत के डब्ल्यूएमडी और परमाणु-प्रतिक्रिया ढांचे की कैसे व्याख्या करता है. इसके साथ ही, लेख में इस बात की भी चर्चा की गई है कि अगर इस आतंकी हमले को अंजाम दे दिया गया होता तो क्या ये 2003 के परमाणु सिद्धांत में वर्णित 'मुख्य हमला' की सीमा के करीब पहुंच सकता था?

  • 8 नवंबर की गिरफ्तारी—भारत में बड़े पैमाने के रिसिन जैव-आतंकी खतरे का खुलासा।
  • रिसिन—अरंडी के बीजों से निकला अत्यंत घातक ज़हर।
  • यह लेख—रिसिन खतरे के संदर्भ में भारत के WMD ढांचे की समीक्षा।

 

कैसा है भारत की जैव सुरक्षा का ढांचा?

भारत में कोई भी जैविक घटना व्यापक राष्ट्रीय जैविक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों की भागीदारी शामिल करेगी, जिन्हें इसकी पहचान, नियंत्रण और संकट प्रबंधन का काम सौंपा गया है. इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए), एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डीआरडीई) जैसे संस्थान अनिवार्य रूप से शामिल रहते हैं. ये संस्थान जैविक घटना की निगरानी, प्रकोप की जांच, प्रयोगशाला में पुष्टि, जैविक सुरक्षा अनुसंधान और आपसी समन्वय जैसे काम से जुड़े रहते हैं. सशस्त्र बल अपनी उन प्रतिक्रिया इकाइयों को तैयार रखते हैं जो संदूषित स्थितियों में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (सीबीआरएन) परिस्थितियों से निपटने में सक्षम होती हैं. इस बीच, रोगियों में वृद्धि की किसी भी आपातकालीन स्थिति को राज्यों की स्वास्थ्य प्रणालियों द्वारा संभाला जाता है. इस प्रणाली को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत किए गए निवेशों के माध्यम से मज़बूत रखा जाता है.

 

ये संस्थागत क्षमताएं भारत की विश्व स्वास्थ्य संगठन की अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमों (आईएचआर 2005) के समग्र कार्यान्वयन का हिस्सा हैं. इसके अलावा, भारत ने जैविक हथियार संधि (बीडब्ल्यूसी) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) प्रस्ताव 1540 को लेकर भी प्रतिबद्धता जताई है. ये प्रस्ताव उस कानूनी और नियामक माहौल को निर्धारित करते हैं जिसके भीतर राष्ट्रीय जैव-रक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय संचालित होते हैं. सामूहिक रूप से, ये संस्थागत ढाँचा वो स्थापित फ्रेमवर्क बनाता है, जिसके भीतर भारत में किसी भी जैविक आपदा का प्रबंधन किया जाएगा. फिर चाहे वो आपदा दुर्घटनावश, प्राकृतिक या जानबूझकर लाई गई हो.


“महत्वपूर्ण बात ये है कि इस नीति में विशिष्ट रूप से ‘नो फर्स्ट यूज़’ का अपवाद भी शामिल है…”

 

फिर भी, इस व्यापक ढांचे के अस्तित्व से एक और सवाल उठता है. अगर बाहरी स्रोत यानी आतंकी हमले से जैविक ख़तरा इस हद तक बढ़ जाता है कि, सार्वजनिक स्वास्थ्य और जैव-रक्षा प्रणाली वास्तविक रूप से इसे नियंत्रित या सहन नहीं कर सकती. ऐसी परिस्थिति में भारत की प्रतिक्रिया को क्या नियंत्रित करता है, यानी इसे कैसे संभाला जाएगा? इसी सीमा पर 2003 का परमाणु सिद्धांत सामने आता है, जो इसे चरम जैविक या रासायनिक हमले की सूरत में अंतिम उपाय बनाता है. भारत की परमाणु नीति मुख्य रूप से “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” पर आधारित है. भारत ने ये वादा कर रखा है कि वो परमाणु हथियारों का “पहले इस्तेमाल नहीं” करेगा. इसीलिए परमाणु हथियारों पर पर राजनीतिक नियंत्रण के लिए परमाणु कमान प्राधिकरण (एनसीए) भी स्थापित किया गया है. महत्वपूर्ण बात ये है कि इस नीति में विशिष्ट रूप से “नो फर्स्ट यूज़” का अपवाद भी शामिल है जिसे धारा-VI के रूप में पेश किया गया है. इसमें “भारत के ख़िलाफ़, या कहीं भी भारतीय बलों के विरुद्ध जैविक या रासायनिक हथियारों से किए गए बड़े हमले की स्थिति में” प्रतिशोध के अधिकार को सुरक्षित रखा गया है. इस अपवाद को रणनीतिक लचीलापन बनाए रखने के लिए जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया है. भारत द्वारा परमाणु हथियारों का “पहले इस्तेमाल नहीं” का सिद्धांत नैतिक और कानूनी रूप से काफ़ी मज़बूत है, लेकिन धारा-VI का अपवाद इसे परमाणु प्रतिशोध के लिए संभावित ऑपरेशनल ट्रिगर में बदल देता है.

'मुख्य हमले' की सीमा क्या है?

धारा-VI व्यावहारिक धरातल पर कैसे काम करेगी, ये सैद्धांतिक व्याख्या और राजनीतिक निर्णय का विषय है. वरिष्ठ विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने लंबे समय से तर्क दिया है कि. भारत का “नो फर्स्ट यूज़” सिद्धांत एक मानक आधार है, ना कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध. उदाहरण के लिए, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने अपनी किताब 'चॉइसेज़' में भारत की परमाणु नीति में कुछ अनिवार्य ‘ग्रे एरियाज़’ को स्वीकार किया. ये एक्टर्स (स्टेट या नॉन स्टेट एक्टर, अस्पष्ट) द्वारा 'गैर-परमाणु असममित ख़तरों' के साथ बड़े पैमाने पर हमलावर कार्रवाई करने के संबंध में हैं.  एक इंटरव्यू में शिवशंकर मेनन ने कहा कि, “भारत की परमाणु नीति को जिस तरह से प्रतिष्ठा मिली है, इस नीति में उससे कहीं ज़्यादा लचीलापन है.” यानी ज़रूरत पड़ने पर परमाणु प्रतिक्रिया दी जा सकती है. इस दृष्टिकोण से देखने पर ये बात बिल्कुल हैरान नहीं करती कि जैविक या रासायनिक हमलों के लिए नीति में “प्रमुख हमला” की परिभाषा को जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया है. इसका फायदा ये होगा कि फैसला लेने वालों को कुछ हद तक अपने विवेक के इस्तेमाल का अधिकार मिल सके.

“धारा-VI व्यावहारिक धरातल पर कैसे काम करेगी, ये सैद्धांतिक व्याख्या और राजनीतिक निर्णय का विषय है.”

 

ऐसे में ये आकलन करना कि 'अरंडी के बीज से रिसिन ज़हर' की साज़िश उस स्तर तक पहुंच सकती थी या नहीं, इस पर सावधानी से विचार करने की ज़रूरत है. इस योजना की संभावित घातकता का एक अनुभव के आधार पर पद्धतिगत रूप से सतर्कता से मूल्यांकन होना चाहिए. विष विज्ञान संबंधी अध्ययनों से पता चलता है कि औसत वयस्क को श्वसन तंत्र के ज़रिए मारने के लिए शरीर के वजन के प्रति किलोग्राम 5 से 10 माइक्रोग्राम रिसिन ज़हर की ज़रूरत होती है. इसका अर्थ ये हुआ कि एक औसत वयस्क की मौत के लिए 0.35 से 0.7 मिलीग्राम रिसिन काफ़ी है. अरंडी के बीज में आम तौर पर वजन के हिसाब से 1–5 प्रतिशत रिसिन निकाला जा सकता है. 4 किलो बीज से 40 से 200 ग्राम रिसिन हासिल हो सकता है. हालांकि, पुलिस ने गिरफ्तार किए गए आरोपियों के पास से 4 किलो अरंडी का तेल बरामद किया. जांच के दौरान आरोपियों ने कुबूल किया कि, वो अरंडी का बीज ही खरीदना चाहते थे, लेकिन गलती से तेल खरीद  लिया. सैद्धांतिक रूप से देखें तो, अगर 4 किलो अरंडी के बीच से 40 ग्राम रिसिन भी निकाला जाता तो ये 57,000–114,000 लोगों की हत्या करने के लिए पर्याप्त है, जबकि 200 ग्राम रिसिन के उत्पादन से मरने वालों का आंकड़ा 285,000 से 570,000 तक हो सकता है. इस तरह के नुकसान की सीमा व्यापक रूप से हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु हमले में मारे गए लोगों के बराबर है. इससे ये संभावना बढ़ती है कि इतने बड़े पैमाने पर मृत्यु का आंकड़ा भारत की परमाणु सिद्धांत में दी गई धारा-VI में परिभाषित 'मुख्य हमला' की श्रेणी में आ सकता है. हालांकि, इन आंकड़ों की गणना रिसिन ज़हर के पूर्ण फैलाव और 100 प्रतिशत घातकता को ध्यान में रखकर की गई है. हालांकि, व्यावहारिक वास्तविकता में रिसिन की अस्थिरता, एरोसोल बनाने में आने वाली मुश्किलों और अनियंत्रित वातावरण में इसके असर के कम हो जाने से मृतकों की संख्या शायद कुछ हजार तक ही सीमित रह जाएगी. इसलिए, ये निर्धारित करना काफ़ी जटिल होगा कि ऐसा अटैक सैद्धांतिक रूप से 'मुख्य हमले' सीमा पार करेगा या नहीं. ये जटिलता भारत की परमाणु नीति में अंतर्निहित अस्पष्टता को दिखाती है. 

 

इसके अलावा, एयरोसोल किए गए रिसिन हमले की चिकित्सकीय पहचान तुरंत नहीं होती. शुरुआती लक्षण सामान्य सांस और जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) संबंधी बीमारियों से मेल खाते हैं. मौत की सही वजह जानने के लिए प्रयोगशाला से पुष्टि और विशेष जांचों की ज़रूरत होती है. इसका अर्थ है कि शुरुआती मौतों की एक श्रृंखला गलत तरीके से समझी जा सकती है या मृत्यु के कारणों की पहचान में 24-72 घंटे तक देरी हो सकती है. इस तरह की देरी तत्काल जिम्मेदारी निर्धारित करने की प्रक्रिया को और जटिल बना देती है. भारत की परमाणु नीति जैविक और रासायनिक हमलों को उनके कर्ता यानी अटैक करने वाले की औपचारिक स्थिति की परवाह किए बिना ट्रिगर के रूप में देखती है, लेकिन व्यवहार में, किसी भी परमाणु प्रतिक्रिया पर फैसला करने से पहले ये देखना होगा कि इस हमले में दुश्मन देश का हाथ है या नहीं? इसके लिए पुख्ता सबूत जुटाने होंगे. भारत का सीमा-पार आतंकवाद के साथ अब तक का अनुभव दिखाता है कि आरोपों को सबूतों के साथ साबित करना आसान नहीं होता. भारत के दुश्मन देश प्रॉक्सी और नॉन स्टेट एक्टर्स की मदद से हमले करवाते हैं, जिससे वो देश हमले की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकते हैं. 2001 के संसद हमले से लेकर हाल में हुए पहलगाम हत्याकांड तक के पिछले आतंकवादी घटनाओं से पता चलता है कि, भारत ने लगातार पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क की जिम्मेदारी को ट्रेस किया है, पाकिस्तानी सेना के शामिल होने के भी सबूत मिले हैं, फिर भी, एक जैविक हथियार हमला उन पहले संकटों में अभूतपूर्व वैचारिक सवाल उठाएगा.

 

भारत के लिए चेतावनी

रिसिन योजना को नाकाम करने की रिपोर्टिंग में पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क से जुड़े संबंध प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं. जांच के अब तक के नतीजे बताते हैं कि पाकिस्तानी क्षेत्र और उससे संबंधित नेटवर्क ने इस साज़िश को समर्थन दिया है. इसके बावजूद, ये भारत के सामने जटिल नीतिगत सवाल उठाते हैं. इसमें एक सवाल ये भी शामिल है कि, क्या इस गतिविधि को सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के नज़रिए से देखा जाना चाहिए या इसे राज्य-समर्थित जैविक आक्रमण के रूप में देखा जाना चाहिए. पहली वाली स्थिति भारत के स्थापित आतंकवाद विरोधी ढांचे को मज़बूत करती है, जबकि बाद वाली स्थिति के प्रभाव निवारक स्थिरता के क्षेत्र तक भी फैल सकते हैं. भारत पर हमले के लिए पाकिस्तान लंबे समय से प्रॉक्सी समूहों पर निर्भर है. इस बात को ध्यान में रखते हुए, ये घटना इस बात की ज़रूरत पर ज़ोर देती है कि भारत की नीति में सैद्धांतिक स्पष्टता होनी चाहिए. हालांकि, भारत को अपने नीतिगत लचीलेपन को नहीं छोड़ना चाहिए. भारत को उकसावे की कार्रवाई और सामूहिक विनाश के हथियार वाले हमले के बीच अंतर को स्पष्ट करना होगा. यहां इस बात को समझना भी ज़रूरी है कि, अगर रिसिन हमले की योजना सफल हो जाती, तो इससे भारतीय नीति निर्माताओं को एक नए तरह के निर्णय लेने का सामना करना पड़ता. एक ऐसा क्षेत्र जो आतंकवाद विरोध और परमाणु प्रतिरोध क्षमता के बीच का है. भारत के सामने अभी तक इस क्षेत्र में फैसला लेने की नौबत नहीं आई है, इसलिए ये एक बड़ी चुनौती होती.

 “इस घटना से अधिक सैद्धांतिक स्पष्टता की ज़रूरत को तो दिखाती ही है.”


रिसिन साज़िश की नाकामी ने भारत को उस स्थिति से बचा लिया, जहां उसे कठिन सवालों का सामना करना पड़ता. भारत को इस सवाल का जवाब तलाशना पड़ता कि इस प्रकार के वास्तविक जैविक हमले को अपने व्यापक निरोधक ढांचे के भीतर कैसे रखा जाना चाहिए. इसके बावजूद, ये घटना अधिक सैद्धांतिक स्पष्टता की ज़रूरत को तो दिखाती ही है. इस सवाल का जवाब खोजा जाना चाहिए कि 2003 के परमाणु सिद्धांत के तहत क्या इसे एक 'मुख्य' जैविक या रासायनिक हमला माना जा सकता है. ये इस बात पर भी ज़ोर देता है कि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य, आतंकवाद विरोधी नीति और परमाणु सिद्धांत में सामंजस्य बिठाया जाए. भविष्य के जैव-हाइब्रिड ख़तरों का मूल्यांकन और प्रबंधन करने के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है. राष्ट्रीय सुरक्षा ज़रूरतों को क्षेत्रीय सुरक्षा परिवेश की वास्तविकताओं के हिसाब से देखा जाना चाहिए.


अनुभव शंकर गोस्वामी पर्थ की मर्डोक यूनिवर्सिटी में डॉक्टोरल कैंडिडेट हैं. वो यूनिवर्सिटी के इंडो-पैसिफिक सेंटर में राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से भी जुड़े हैं.

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Anubhav Shankar Goswami

Anubhav Shankar Goswami

Anubhav Shankar Goswami is a Doctoral Candidate of Politics and International Relations at the School of Humanities, Arts and Social Science, Murdoch University, Perth. His ...

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