Author : Diya Shah

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Published on Apr 24, 2026 Updated 3 Days ago

पुरानी पीएटी योजना में ढील और देरी से कंपनियां नियमों का सही पालन नहीं कर पाईं जिससे असली उत्सर्जन में कमी नहीं आई. नई सीसीटीएस योजना बेहतर है लेकिन कड़े नियमों के बिना इसका असर सीमित रह सकता है. एक विश्लेषण.

पीएटी vs सीसीटीएसः आसान भाषा में समझें

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ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए 2008 में परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (पीएटी) योजना शुरू की गई. इस योजना के पहले चक्र में, गैर-अनुपालन दर 9 प्रतिशत थी, लेकिन दूसरे फेज़ में ये दर बढ़कर लगभग 56 प्रतिशत हो गई. जिन नामित उपभोक्ताओं पर अनिवार्य ऊर्जा बचत प्रमाणपत्रों (ईएससी )का 86 प्रतिशत खरीदने का दायित्व था, वो अपंजीकृत पाए गए. ईएससी प्रमाणपत्रों को ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई)द्वारा निर्धारित न्यूनतम मूल्य पर बेचा गया. ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस) में क्या प्रणालीगत खामियां हैं? दरअसल ये तीन बातों पर निर्भर करती है; प्रवर्तन, सत्यापन और मूल्य.

पीएटी में संरचनात्मक कमजोरियां  

पीएटी योजना का अनुपालन रिकॉर्ड अचानक ध्वस्त नहीं हुआ. ये इसलिए बिगड़ा, क्योंकि कंपनियों ने जो देखा, उस पर तर्कसंगत प्रतिक्रिया दी: देरी, रियायतें और कार्रवाई का अभाव. पीएटी द्वितीय के लिए जो ईएससी प्रमाणपत्र दिसंबर 2019 तक जारी किए जाने चाहिए थे, वो अगस्त 2021 में ही जारी किए गए. तीन साल के अनुपालन चक्र में करीब 2 साल की देरी हुई. यही देरी अगले कुछ पीएटी चक्रों में भी जारी रही, और समय के साथ समस्या बढ़ती गई. स्थिति तब और बिगड़ गई जब पहले दो चक्रों में नियमों का पालन ना करने वाले नामित उपभोक्ताओं को तीसरे चक्र में भी व्यापार करने की अनुमति दे दी गई. अनिवार्य रूप से खरीदे जाने वाले 52 लाख ईएससी प्रमाण पत्रों में से कुल मिलाकर 34 लाख प्रमाणपत्रों पर ध्यान नहीं दिया गया. ये आंकड़े दिखाते हैं कि नियमों और विनियमों का खुलकर उल्लंघन किया गया.

ईएससी प्रमाणपत्रों को ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा निर्धारित न्यूनतम मूल्य पर बेचा गया. ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम में क्या प्रणालीगत खामियां हैं? दरअसल ये तीन बातों पर निर्भर करती है- प्रवर्तन, सत्यापन और मूल्य.

बेहद उदार नियमों के चलते, नामित उपभोक्ता अपने ऊर्जा बचत लक्ष्यों को पूरा करने में सफल रहे और न्यूनतम मांग के बावजूद बाज़ार में बड़ी मात्रा में ईएससी प्रमाणपत्रों की आपूर्ति कर दी. पहले तीन पीएटी चक्रों में लगभग 103 लाख ईएससी जारी किए गए, जिनमें से सिर्फ 52 लाख की खरीद अनिवार्य थी. इससे बाज़ार खुलने से पहले ही संरचनात्मक व्यवधान की स्थिति उत्पन्न हो गई. न्यूनतम मूल्य पर सभी लेन-देन संपन्न होने के कारण इसकी मूल्य निर्धारण प्रक्रिया पूरी तरह से विफल हो गई. वास्तविक उत्सर्जन कटौती पर इसके प्रभाव क्षेत्रीय आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिए.

डिज़ाइन में सुधार और शासन संबंधी ज़ोखिम

कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना अनुपालन संरचना को औपचारिक रूप देकर इन कमियों को दूर करने की कोशिश करती है. उत्सर्जनलक्ष्यों को पूरा करने में नाकाम रहने वाली संस्थाओं को भारतीय कार्बन बाज़ार (आईसीए) प्लेटफॉर्म से कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र (सीसीसी) खरीदना होगा, वर्ना उन्हें संबंधित अनुपालन अवधि में औसत व्यापार मूल्य के दोगुने के बराबर वित्तीय दंड का सामना करना पड़ेगा. इस ज़ुर्माने का निर्धारण ऊर्जा दक्षता ब्यूरो करेगा. इन प्रावधानों के अलावा, वित्तीय वर्ष के चार महीनों के भीतर अनिवार्य वार्षिक ग्रीनहाउस गैस रिपोर्टिंग, तीन-वर्षीय चक्रों पर आधारित पीएटी की तुलना में वास्तविक संरचनात्मक सुधार लाती है. एक बार पूरी तरह से लागू होने पर, यह योजना लगभग 740 संस्थाओं और 700 मिलियन टन से ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस को कवर करेगी. इससे भारत कवरेज़ के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी उत्सर्जन व्यापार प्रणालियों में से एक बन जाएगा.

डिज़ाइन में सुधार के संकेत मिलते हैं, फिर भी सत्यापन प्रक्रिया ही मुख्य संरचनात्मक कमजोरी बनी हुई है. हालांकि सत्यापन एजेंसियों को एक गहन मान्यता प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, लेकिन एक बार ये प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद, इन संस्थाओं पर से सरकारी नियंत्रण लगभग खत्म हो जाता है. मज़बूत सत्यापन प्रणालियां अकास्मिक आवंटन, सत्यापनकर्ताओं के अनिवार्य रोटेशन और केंद्रीकृत सरकारी आवंटन के माध्यम से इस समस्या का समाधान करती हैं. सीसीटीएस वर्तमान में मान्यता मानदंड तय करता है, लेकिन इनमें से किसी भी तंत्र को अनिवार्य नहीं बनाता है. ये महत्वपूर्ण बिंदु है, क्योंकि डेटा की सत्यता मूल रूप से क्रेडिट की गुणवत्ता निर्धारित करती है. इससे खरीदारों का विश्वास बढ़ता है, बाज़ार के व्यवहार को आकार मिलता है.

कंपनी का व्यवहार अनुपालन ना करने की अपेक्षित लागत से निर्धारित होता है, जो दंड की मात्रा और प्रवर्तन की संभावना पर निर्भर करता है. सीसीटीएस का सत्यापन डिज़ाइन अकेले ही एक अलग परिणाम सुनिश्चित नहीं कर सकता. इसे कड़े प्रवर्तन के साथ लागू किया जाना चाहिए.

दूसरी कमज़ोरी तब सामने आती है, जब जुर्माने के अस्तित्व को प्रवर्तन के साथ भ्रमित कर दिया जाता है. पीएटी के तहत जुर्माने, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम में परिभाषित किए गए थे, लेकिन उन्हें कभी भी एकसमान रूप से लागू नहीं किया गया. यहां तक ​​कि सबसे बड़े और सबसे स्पष्ट तौर पर नियमों का पालन नहीं करने वाले, यानी बिजली क्षेत्र को भी कोई वास्तविक और गंभीर नतीजे नहीं भुगतने पड़े. यदि सीसीटीएस प्रवर्तन उन्हीं संस्थानों के माध्यम से किया जाता है, जिनमें पीएटी के तहत क्षमता की कमी थी और देरी हुई थी, तो जुर्माने का नाममात्र का मूल्य, अप्रासंगिक हो जाएगा. इस देरी से नियम तोड़ने वालों का उत्साह बढ़ेगा. कंपनी का व्यवहार अनुपालन ना करने की अपेक्षित लागत से निर्धारित होता है, जो दंड की मात्रा और प्रवर्तन की संभावना पर निर्भर करता है. सीसीटीएस का सत्यापन डिज़ाइन अकेले ही एक अलग परिणाम सुनिश्चित नहीं कर सकता. इसे कड़े प्रवर्तन के साथ लागू किया जाना चाहिए.

सरप्लस की समस्या पीएटी से सीसीटीएस तक भी जारी रह सकती है, जिससे एक तीसरा कमज़ोर बिंदु उत्पन्न हो सकता है. सीसीटीएस बाज़ार की मांग में संरचनात्मक कमी है, जिसे पीएटी के रिकॉर्ड से नजरअंदाज़ करना असंभव है. पहले दो पूर्ण पीएटी चक्रों में, तापीय विद्युत संयंत्रों से उत्सर्जन में कमी इस क्षेत्र के कुल वार्षिक उत्सर्जन का केवल 3 प्रतिशत थी. सीसीटीएस ने अब तक विद्युत क्षेत्र को अपने अनुपालन तंत्र से बाहर रखा है. इस योजना में शामिल नौ क्षेत्र भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा हैं, जिसका अर्थ है कि योजना शुरू होने के समय राष्ट्रीय उत्सर्जन के 1/5 हिस्से से भी कम को कवर करती है. ये सिर्फ एक पर्यावरणीय विफलता नहीं है, बल्कि ये एक कार्बन बाज़ार को भी उस क्षेत्र से बाहर रखता है, जिसने पिछली योजना के तहत मांग-पक्ष अनुपालन को सबसे अधिक बढ़ावा दिया था. 

व्यवस्था में किन सुधारों की ज़रूरत?

ये कमियां दिखाती हैं कि कीमत, दंड और फर्म के व्यवहार के बीच का संबंध ही ये निर्धारित करता है कि सीसीटीएस वास्तविक कमी लाने में सफल होता है या सिर्फ प्रशासनिक अनुपालन में. ये खामियां सीधे तौर पर उन बदलावों की ओर इशारा करती हैं, जो सीसीटीएस से बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है. 

इस योजना में शामिल होने वाली कंपनियां वही हैं, जो एक दशक से अनुपालन संबंधी कमियों का सामना कर रही हैं. वो सिस्टम की कमज़ोरियां जानती है और उनका फायदा उठाती हैं. इसलिए, चुनौती बाज़ार व्यवहार में ठोस बदलाव लाने में है, जिसे कड़े प्रवर्तन के माध्यम से ही हासिल किया जा सकता है.

जो एक और चीज की जानी चाहिए, वो ये कि नियम का पालन न करने का जुर्माना अनुपालन की लागत से बहुत ज़्यादा होना चाहिए. इसके लिए पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क बढ़ाना आवश्यक है. चीनी ईटीएस एक उपयोगी मानदंड पेश करता है, जो एक व्यापार चक्र में औसत क्रेडिट मूल्य के पांच से दस गुना तक जुर्माना लगाता है. ऐसे जुर्माने तभी विश्वसनीय होते हैं जब उन्हें व्यापक अनुपालन प्रक्रिया में निर्धारित समय-सीमा के भीतर लागू किया जाए. प्रक्रियात्मक देरी प्रशासनिक लापरवाही का संकेत देती है और बाजार अनुशासन को कमज़ोर करती है. इसलिए, मंत्रालय स्तर पर क्षमता और संसाधन संबंधी बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए.

बाजार की स्थिरता के लिए एक मज़बूत मूल्य निर्धारण तंत्र ज़रूरी है. चूंकि अनुपालन बाज़ार खुद ही मांग उत्पन्न नहीं करता, इसलिए मांग पैदा करने के लिए आधारभूत मानकों को पर्याप्त रूप से कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए. इसके लिए मौजूदा आधारभूत मानकों को और सख्त करना और उच्च उत्सर्जन वाले उद्योगों, विशेष रूप से तापीय ऊर्जा और डिस्कॉम क्षेत्रों को शामिल करने के लिए क्षेत्रीय कवरेज का विस्तार करना आवश्यक है. इन क्षेत्रों को शामिल करने से क्रेडिट की सार्थक मांग उत्पन्न होती है.

कुल मिलाकर सीसीटीएस, डिज़ाइन के मामले में पीएटी से बेहतर है, लेकिन इस योजना में शामिल होने वाली कंपनियां वही हैं, जो एक दशक से अनुपालन संबंधी कमियों का सामना कर रही हैं. वो सिस्टम की कमज़ोरियां जानती है और उनका फायदा उठाती हैं. इसलिए, चुनौती बाज़ार व्यवहार में ठोस बदलाव लाने में है, जिसे कड़े प्रवर्तन के माध्यम से ही हासिल किया जा सकता है.


दिया शाह ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर इकोनॉमी एंड ग्रोथ में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Diya Shah

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Diya Shah is a Research Assistant at ORF’s Centre for Economy and Growth. Her work explores developments in climate finance as part of a broader, ...

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