Author : Shairee Malhotra

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jul 28, 2025 Updated 0 Hours ago

यूरोपियन यूनियन और चीन के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों की स्थापना के पचास वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन इस कूटनीतिक उपलब्धि की छाया में बढ़ते विवाद प्रमुखता से उभर आए हैं. दोनों के बीच इस अवसर पर बैठक आयोजित हो रही है, लेकिन इसमें सौहार्दपूर्ण रिश्तों के बजाय गहराता व्यापार विवाद, रणनीतिक अविश्वास और भू-राजनीतिक मतभेद हावी हैं.

यूरोपीय संघ-चीन राजनयिक रिश्तों के 50 वर्ष: उत्सव की जगह अविश्वास

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यूरोपीय संघ और चीन के राजनयिक रिश्तों की 50वीं वर्षगांठ के मौक़े पर 24 जुलाई 2025 को दोनों के बीच शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया है. हालांकि, यह ख़ुशी का अवसर है, लेकिन दोनों पक्षों में इसको लेकर कोई ख़ास उत्साह नज़र नहीं आ रहा है. इसकी बड़ी वजह है यूरोपीय संघ और चीन इन दिनों व्यापार से लेकर सुरक्षा तक तमाम मुद्दों पर तनातनी के दौर से गुजर रहे हैं और उनके आपसी रिश्तों में अब पहले जैसी गर्मजोशी नहीं है.

राजनयिक रिश्तों के पचास साल पूरे होने पर चीन और ईयू के बीच यह समिट पहले ब्रुसेल्स में होने वाली थी, लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रुसेल्स आने का निमंत्रण ठुकरा दिया था, इसके बाद इस शिखर सम्मेलन को बीजिंग में आयोजित करना तय किया गया. इतना ही नहीं, समिट को दो दिन के बजाय एक दिन का कर दिया गया है. दूसरे दिन चीन के अनहुई प्रांत में एक बिजनेस समिट आयोजित की जाएगी. इसके अलावा, राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस समिट में शामिल होंगे या नहीं इसके बारे में भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है. बताया गया है कि राष्ट्रपति की जगह पर चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता कर सकते हैं. वहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा इस द्विपक्षीय बैठक में यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व करेंगे. इसके अलावा, दोनों के बीच व्यापार बातचीत में ठहराव की वजह से यूरोपीय संघ ने चीनी अधिकारियों के साथ इस समिट से पहले होने वाले उच्च-स्तरीय आर्थिक एवं व्यापारिक वार्ता को भी निरस्त कर दिया है.

कुछ महीनों पहले के घटनाक्रमों पर नज़र डालें, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दिनों में, जो कि पूर्व राष्ट्रपति बाइडेन के शासन से कई मायनों में एकदम अलग थे, चीन और यूरोपीय संघ के बीच के रिश्तों में काफ़ी गर्मजोशी देखने को मिली थी. कहने का मतलब है कि चीन के समर्थन में यूरोपीय देशों ने एकजुटता दिखाई थी और लग रहा था कि यूरोपीय संघ व चीन के रिश्ते प्रगाढ़ हो रहे हैं. दावोस में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने अपने भाषण के दौरान चीन के साथ रचनात्मक जुड़ाव पर बल दिया था. इसके बाद ईयू की ओर से तमाम ऐसे कूटनीतिक क़दम भी उठाए गए, जिनमें अमेरिका की तुलना में साफ तौर चीन को तवज्जो दी गई और कहीं न कहीं बीजिंग को यूरोप का एक भरोसेमंद साझेदार बताने की कोशिश की गई. इनता ही नहीं, यूरोपीय संघ के ट्रेड कमिश्नर मारोस शेफोविच ने मार्च 2025 में बीजिंग का दौरा किया था, जिसका मकसद चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों को संतुलित करना था.

इस समिट में यूरोपियन यूनियन के लिए सबसे बड़ा मुद्दा दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना है. दरअसल, ईयू अपनी 98 प्रतिशत दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है. 

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यूरोप को व्यापारिक लिहाज़ से तमाम परेशानियों से जूझना पड़ रहा था और यूरोप व अमेरिका के बीच व्यापारिक साझेदारी भी कमज़ोर होती जा रही थी. इन हालातों में यूरोपीय संघ और चीन के बीच एक मज़बूत गठजोड़ की संभावनाएं दिखाई देने लगी थीं. इन्हीं संभावनाओं से दोनों के रिश्तों में जमी बर्फ़ को पिघलाने के अवसर पैदा हुए और उनकी नज़दीकी का रास्ता साफ हुआ. हालांकि, ब्रुसेल्स और बीजिंग के बीच तनाव उतना कम नहीं हो पाया जिसकी उम्मीद की जा रही है. इसकी बड़ी वजह थी ट्रंप प्रशासन की ओर से थोपा गया आयात शुल्क, जिससे यूरोपीय देश ख़ासे परेशान थे. इसी के चलते चीन के साथ यूरोपीय संघ के व्यापारिक रिश्ते ज़्यादा परवान नहीं चढ़ पाए और चीन से उसकी शिकायतें लगातार बढ़ती गईं.

चीन के साथ परेशानी पैदा करने वाले मुद्दों की लंबी फेहरिस्त

यूरोपियन यूनियन और चीन के बीच विवादों की सूची बहुत लंबी है. इनके बीच इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) से लेकर एल्कोहल, पोर्क, मेडिकल उपकरणों और दुर्लभ खनिजों तक कई मसलों पर तलवारें खिंची हुई है और आरोप-प्रत्यारोप व बदले की कार्रवाई का दौर जारी है. यहां तक कि दोनों ही पक्ष एक दूसरे की औद्योगिक नीतियों और व्यापार के तौर-तरीक़ों में खामियां निकालते रहते हैं और उनकी जांच-पड़ताल में उलझे रहते हैं. ये सारे विवाद बुनियादी मुद्दों यानी चीन में यूरोपीय कंपनियों की सीमित पहुंच और यूरोप के लगातार बढ़ते व्यापार घाटे से तमाम मसलों की वजह से और पेचीदा हो गए हैं.

इस समिट में यूरोपियन यूनियन के लिए सबसे बड़ा मुद्दा दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना है. दरअसल, ईयू अपनी 98 प्रतिशत दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है. इस समिट में यूरोपीय संघ इस मुद्दे को उठाकर अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स एवं ग्रीन टेक्नोलॉजियों के लिए इन महत्वपूर्ण घटकों तक सुगम पहुंच स्थापित करना चाहता है. चीन ने इस साल की शुरुआत में दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर रोक लगाने का ऐलान किया था. हालांकि, चीन अपने इस फैसले से अमेरिका को किए जाने वाले दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर रोक लगाना चाहता था, लेकिन उसके इस निर्णय से कहीं न कहीं यूरोपीय संघ भी प्रभावित हुआ और उसके उद्योगों पर भी इसका गंभीर असर पड़ा. चीन के फैसले के कारण इस वर्ष की पहली छमाही में चीन से यूरोपीय संघ के सदस्य राष्ट्रों को निर्यात किए जाने वाले दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति में 84 प्रतिशत की कमी आई है. इसके अलावा, यूरोपीय विनिर्माण कंपनियों की आपूर्ति श्रृंखला में भी रूकावटें आई हैं. कनाडा में आयोजित G7 समिट में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष वॉन डेर लेयेन ने चीन पर दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति को हथियार की तरह इस्तेमाल करने, इस मामले में अपना दबदबा बनाने और दूसरे देशों को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाते हुए उसकी ज़बरदस्त फटकार लगाई थी. बीजिंग ने उनके इन आरोपों की कड़ी आलोचना की थी.

जिस तरह से यूरोपीय संघ और चीन के बीच संबंधों में लगातार खटास बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए दोनों के बीच विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए शिखर सम्मेलन एक बेहतरीन माध्यम होते हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दरम्यान देखा गया है कि ये शिखर सम्मेलन भी ज़्यादा प्रभावशाली साबित नहीं हो रहे हैं और इनमें बातचीत के कोई सकारात्मक और उत्साहजनक नतीज़े नहीं निकल रहे हैं

पिछले वर्ष ईयू ने चीन के इलेक्ट्रिक वाहनों पर 45 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा दिया था. इसके पीछे वजह यह थी की चीन की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी के कारण ईवी उद्योग की उत्पादन क्षमता बाज़ार की मांग से बहुत ज़्यादा हो गई थी और यूरोपीय देशों के बाज़ार में हर तरफ चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियां छा गई थीं, जिससे यूरोप के घरेलू ऑटो उद्योग को मुश्किलों से जूझना पड़ रहा था और वो चीनी  EVs का मुक़ाबला नहीं कर पा रहा था. सिर्फ़ EVs के मामले में ही ईयू और चीन के बीच तनातनी पैदा नहीं हुई है, बल्कि सोलर पैनल, विंड टर्बाइन और इस्पात समेत तमाम दूसरे सेक्टरों में भी कुछ इसी तरह के विवाद पैर पसार चुके हैं. चीन भी कहां चुप बैठने वाला था, उसने भी कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए 1.75 अरब यूरो मूल्य के यूरोपीय पोर्क निर्यात, जिसका चीन विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, पर डंपिंग-रोधी जांच शुरू कर दी और यूरोप में निर्मित ब्रांडी पर भी शुल्क थोप दिया. यूरोपीय संघ ने चीन की ओर से दूसरे देशों के रास्ते अपने उत्पादों के निर्यात की जांच-पड़ताल के लिए गठित किए गए आयात निगरानी टास्क फोर्स की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि जब से ट्रंप प्रशासन ने चीनी उत्पादों पर 145 प्रतिशत के शुरुआती टैरिफ लगाया है, उसके बाद से ईयू देशों को होने वाले चीनी निर्यात में 8.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इससे यूरोपीय देशों के बाज़ार चीनी वस्तुओं से पट गए हैं और यह समस्या दिनोंदिन विकराल होती जा रही है. चीन ने हाल ही में सरकारी ख़रीद पर प्रतिबंध लगाए हैं और नियम-शर्तों को कड़ा किया है, जिससे यूरोपीय संघ की कंपनियों को ज़बरदस्त झटका लगा है. इसके जवाब में ईयू ने इंटरनेशनल प्रोक्योरमेंट इंस्ट्रूमेंट यानी अंतर्राष्ट्रीय खरीद उपकरण (IPI) का पहली बार इस्तेमाल किया. इसे यूरोपीय संघ ने वर्ष 2022 में अपनाया था. इस क़दम के ज़रिए यूरोपीय संघ के 50 लाख यूरो से अधिक मूल्य के मेड-टेक टेंडर्स यानी चिकित्सा-तकनीक़ी निविदाओं तक चीन की पहुंच को सीमित कर दिया गया. इन सभी मसलों की वजह से चीन के साथ यूरोपीय संघ का व्यापार घाटा बहुत बढ़ गया है. चीन के साथ ईयू का व्यापार घाटा वर्ष 2022 में 400 बिलियन यूरो था, जबकि 2023 में लगभग 300 बिलियन यूरो था. द इकोनॉमिस्ट के आंकड़ों पर गौर करें, तो 2025 की पहली छमाही में चीन से यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात में 7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि आयात में 6 प्रतिशत की कमी आई है. द्विपक्षीय व्यापार को संतुलित करने के लिए चीन और ईयू अब बातचीत के दौरान अपनी-अपनी ताक़त का फायदा उठाकर एक दूसरे से रियायतों की मांग कर रहे हैं. जैसे कि चीन, यूरोपीय संघ की तरफ से चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर लगाए गए टैरिफ को हटाने और उसकी जगह EVs की न्यूनतम क़ीमतें निर्धारित करने की मांग कर रहा है.  

इस बीच, रूस व चीन के बीच बढ़ती यारी ने भी यूरोपियन यूनियन की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है. दरअसल, रूस और चीन के बीच "असीमित साझेदारी" को गहरा करने के साथ-साथ दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकी की आपूर्ति और ऊर्जा ख़रीद के ज़रिए चीन कहीं न कहीं यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध में मास्को का परोक्ष रुप से समर्थन कर रहा है. चीन की तरफ से किए जा रहे रूस के इस समर्थन ने सुरक्षा के मुद्दे पर यूरोप की परेशानी को बढ़ा दिया है. ज़ाहिर है कि इसी साल मई में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस का दौरा किया था. फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद जिनपिंग का यह तीसरा रूसी दौरा था. दरअसल, जिनपिंग मई के महीने में विक्ट्री डे परेड में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के मुख्य अतिथि बनकर रूस गए थे. इतना ही नहीं, हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने बयान दिया था कि रूस का यूक्रेन से युद्ध हारना चीन के हित में नहीं है, क्योंकि ऐसा होने पर अमेरिका का फोकस फिर से चीन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर हो जाएगा. उनके इस बयान ने रणनीतिक तनाव को और अधिक गहरा कर दिया है, यानी चीनी विदेश मंत्री के इस बयान ने यूरोप की चिंताओं को और बढ़ा दिया है. इसके अलावा, जिस प्रकार से चीन की ओर से यूरोप में लक्षित साइबर हमलों को अंज़ाम दिया जा रहा है और वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक तरीक़े से अपना सैन्य विस्तार कर रहा है, उससे भी यूरोपीय देशों को विचलित कर दिया है. अगर चीन के नज़रिए से देखा जाए, तो जिस प्रकार से इंडो-पैसिफिक रीजन में यूरोपियन यूनियन अपना दख़ल बढ़ा रहा है और जिस तरह से वह ताइवान को खुलकर अपना समर्थन दे रहा है, उसने चीन की चिंता बढ़ाने का काम किया है.

इसके अलावा, एक और अहम मसला यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच एकजुटता की कमी का है, जो कि हमेशा से क़ायम है. दरअसल, यूरोपीय देशों के चीन के साथ अपने-अपने द्विपक्षीय रिश्ते हैं और उनके अपने हित हैं, अपने अलग नज़रिए हैं. यूरोपीय देशों का यह रवैया देखा जाए तो उसकी आक्रामकता की धार को कुंद करने का काम करता है. बीजिंग ने चालाकी के साथ यूरोपीय देशों के बीच इन मतभेदों का लाभ उठाया है. कहने का मतलब है कि चीन ने यूरोप में विभाजन और प्रभुत्व की रणनीति का अनुसरण किया है. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ इस साल के अंत में चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं और इस दौरान एक भारी-भरकम व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी उनके साथ होगा. ज़ाहिर है कि उनकी यह यात्रा एक बार फिर यूरोपीय संघ की एकजुटता को परखने का काम करेगी.

जब तक बीजिंग ऐसा नहीं चाहे. यानी जब तक ईयू के साथ अपने सौहार्द पूर्ण सहयोगी रिश्तों में रोड़ा बनने वाले मुद्दों को चीन स्वीकार नहीं करता है और उनका हल निकालने के लिए अपनी तरफ ठोस प्रयास नहीं करता है, तब तक यूरोपीय संघ की उसके साथ संबंध सुधारने की सभी कोशिशें बेमानी साबित होंगी.

चीन और यूरोपीय संघ के बीच हाल ही में एक सकारात्मक घटनाक्रम भी देखने को मिला है. दोनों ने वर्ष 2021 में 'जैसे को तैसा' नीति के तहत एक-दूसरे पर थोप गए प्रतिबंधों को हटा दिया है. ज़ाहिर है कि यूरोपीय संघ ने चीन के शिनजियांग प्रांत में कथित मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इसके जवाब में चीन ने यूरोपीय संघ के सांसदों (MEPs) और थिंक टैंकों से जुड़े विश्लेषकों पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इससे दोनों के बीच सहयोग और संवाद का रास्ता काफ़ी हद तक ठहर सा गया था. दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर थोपे गए इन प्रतिबंधों का असर यूरोपीय संघ-चीन व्यापक निवेश समझौते (CAI) पर भी पड़ा था और इसकी बहाली पर रोक लगा दी गई थी. CAI का उद्देश्य यूरोपीय संघ और चीन के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को मज़बूत करना था, जिसमें यूरोपीय कंपनियों के लिए चीन में बाज़ार पहुंच सुनिश्चित करना, प्रतिस्पर्धा और टिकाऊ विकास जैसे मुद्दे शामिल थे. देखा जाए तो कुछ मसलों को छोड़कर चीन और ईयू के बीच ज़्यादातर दूसरे विवादित मुद्दों के समाधान में कोई ख़ास सफलता नहीं मिली है. 

क्या यूरोपीय संघ-चीन फिर से नज़दीक आ रहे हैं?

यूरोपीय संघ का चीन को लेकर 2019 में त्रि-आयामी रणनीतिक नज़रिया था, बावज़ूद इसके चीन को लेकर ईयू के विचारों और दृष्टिकोण में तेज़ी से बदलाव आया है और अब वो चीन को कहीं न कहीं अपना प्रतिस्पर्धी और कई मामलों में प्रणालीगत प्रतिद्वंदी मानने लगा है. यानी उसे लगने लगा है कि चीन मौज़ूदा वैश्विक व्यवस्था और ईयू के मूल्यों एवं हितों के लिए चुनौती पेश करने लगा है. हालांकि, जलवायु कार्रवाई यानी जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए उठाए जाने वाले क़दमों के मामले में यूरोपीय संघ चीन का निकटतम साझेदार बना हुआ है और इस क्षेत्र में उसके साथ मिलकर आगे बढ रहा है. इसके अलावा, ईयू ने चीन के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग क्षेत्रों में फैलाने और ख़तरों को कम से कम करने की दिशा में ज़ोरशोर से काम शुरू किया है. जिस तरह से यूरोपीय संघ और चीन के बीच संबंधों में लगातार खटास बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए दोनों के बीच विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए शिखर सम्मेलन एक बेहतरीन माध्यम होते हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दरम्यान देखा गया है कि ये शिखर सम्मेलन भी ज़्यादा प्रभावशाली साबित नहीं हो रहे हैं और इनमें बातचीत के कोई सकारात्मक और उत्साहजनक नतीज़े नहीं निकल रहे हैं, बल्कि इन बैठकों की चुनौतियां साल दर साल बढ़ती जा रही हैं. यूरोपीय संघ के तत्कालीन विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल ने वर्ष 2022 की ईयू-चीन समिट को "बहरे लोगों की बातचीत" बताया था, तब उनकी इस टिप्पणी ने काफ़ी सुर्खियां बटोरी थीं. इतना ही नहीं, उम्मीद की जा रही है कि जिस तरह से वर्ष 2023 में आयोजित ईयू-चीन शिखर सम्मेलन के बाद साझा वक्तव्य की जगह पर प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थी, इस साल आयोजित होने वाली समिट में भी दोनों पक्षों की रज़ामंदी से संयुक्त वक्तव्य की जगह प्रेस रिलीज ही जारी की जाएगी.

पिछले महीनों के दौरान अमेरिकी टैरिफ युद्ध शुरू होने के बाद से यूरोपीय संघ और चीन, दोनों ही वाशिंगटन के साथ अपने-अपने स्तर पर व्यापारिक वार्ताओं में उलझे रहे हैं. इस दौरान, चीन जून में अमेरिका के साथ एक लचर और कमज़ोर व्यापारिक समझौता करने में कामयाब रहा, वहीं यूरोपियन यूनियन पर अमेरिका ने 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया है. ज़ाहिर है कि अमेरिका ने यूरोपीय देशों के उत्पादों पर टैरिफ लगाने की समयसीमा 1 अगस्त निर्धारित की है. ऐसे में अगर इस समयसीमा से पहले और बीजिंग में आयोजित हो रही ईयू-चीन समिट में दोनों पक्षों के बीच कोई अस्थिर ट्रान्साटलांटिक व्यापार समझौता होता है, तो इससे एक बड़ा संदेश जाएगा और इससे चीन को लेकर यूरोपीय संघ का रुख़ भी स्पष्ट होगा. इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिस प्रकार से राष्ट्रपति ट्रंप का अनिश्चितता भरा रवैया है, उसके मद्देनज़र यूरोप और चीन दोनों को ही एक-दूसरे के बाज़ारों की बेहद ज़रूरत है.

इन तमाम विवादों और मतभेदों के बीच बीजिंग में आयोजित होने वाले यूरोपीय संघ-चीन शिखर सम्मेलन पर सभी की निगाहें टिकी हुई है. देखना यह है कि क्या इस समिट में दोनों पक्षों के बीच जो बुनियादी मतभेद हैं, उनका ठोस समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा और एक-दूसरे को रियायतें देकर व्यापारिक रिश्तों को मज़बूत किया जाएगा, या फिर इस मौक़े का इस्तेमाल केवल एक-दूसरे की शिकायतें करने के लिए ही किया जाएगा. बेशक, वर्तमान में यूरोपीय संघ अपने हितों और मुद्दों को लेकर ज़्यादा दृढ़ है और चीन के साथ मतभेदों को सुलझाने की बातचीत में निर्णायक रुख़ अपनाने के लिए तैयार दिखाई दे रहा है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि यह काम जितना आसान दिखाई दे रहा है, वास्तविकता में उतना है नहीं, बल्कि बेहद जटिल है. कहने का मतलब है कि यूरोपीय संघ चीन के साथ रिश्तों को सुधारने में तब तक क़ामयाब नहीं हो सकता है, जब तक बीजिंग ऐसा नहीं चाहे. यानी जब तक ईयू के साथ अपने सौहार्द पूर्ण सहयोगी रिश्तों में रोड़ा बनने वाले मुद्दों को चीन स्वीकार नहीं करता है और उनका हल निकालने के लिए अपनी तरफ ठोस प्रयास नहीं करता है, तब तक यूरोपीय संघ की उसके साथ संबंध सुधारने की सभी कोशिशें बेमानी साबित होंगी.


शायरी मल्होत्रा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में डिप्टी डायरेक्टर हैं.

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