आज ज़रूरत है कि हम मौजूदा दायरों से बाहर निकल कर भविष्य की संभावनाओं को झपट लें. ठीक उसी तरह जैसे कि अमेरिकी कंपनियां चीन से संभावनाएं छीन रही हैं.
23 अगस्त को सरकार ने ‘आर्थिक विकास की उच्चतर दर हासिल करने के लिए क़दम’ घोषित किया. लेकिन, इससे आर्थिक विकास की दर बढ़ाने में मदद नहीं मिलने वाली. न ही जोखिम लेने वाले कारोबारियों को डराने वाली नैतिकता, प्रशासनिक व्यवस्था और नीतियों से निजात दिलाने के लिए उन्हें प्रोत्साहन देने और सशक्तिकरण से काम चलने वाला है. न ही पुरानी नीतियों की क़ैद की तरफ़ दोबारा लौटने से काम चलने वाला है और न ही भविष्य के लिए कारोबारियों को आज़ादी देने वाले क़दमों से कुछ होगा. आज आर्थिक विकास के लिए हम 1960 के दशक के दक्षिण कोरिया के मॉडल पर चलें, या 1990 के दशक के चीन के रास्ते पर चलें, या फिर आज के वियतनाम के आर्थिक मॉडल पर चलना चाहें. तो, इनसे भी हमारे देश की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं होने वाली. बल्कि, आज ज़रूरत है कि हम मौजूदा दायरों से बाहर निकल कर भविष्य की संभावनाओं को झपट लें. ठीक उसी तरह जैसे कि अमेरिकी कंपनियां चीन से संभावनाएं छीन रही हैं. इसके लिए नई आर्थिक सोच की ज़रूरत है. नीतियों को नए सिरे से बनाने की ज़रूरत है और राष्ट्र निर्माण को नई दशा-दिशा देने की ज़रूरत है.
और, इसके लिए आज हिंदुस्तान को चाहिए नरेंद्र ‘सिंगूर से साणंद’ मोदी.
जो सरकार प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव लाने की नीयत से आई हो, उसने 23 अगस्त 2019 को जो एलान किए वो उम्मीदों को झटका देने वाले थे. महीनों से आंकड़े चीख-चीखकर कह रहे थे, ‘बुरी ख़बर है.’ गाड़ियों की बिक्री लगातार घट रही थी. और अर्थव्यवस्था के दूसरे सेक्टरों में नेगेटिव ग्रोथ के संकेत साफ़ दिख रहे थे. जीडीपी विकास दर पिछली चार तिमाहियों से लगातार घट रही है और अगली दो तिमाहियों तक हालात ऐसे ही बने रहने के संकेत हैं. लेकिन, कुछ रियायतें इधर करने और जीएसटी रिफंड 60 दिनों में उधर करने व टैक्स टेररिज़्म कम करने का ऐलान करने, जिसे मानने से पहले हम उसके सबूत देखना चाहेंगे, या फिर कैपिटल गेन्स पर वो सरचार्ज हटाने, जिसे लगाना ही नहीं चाहिए था, के अलावा, इस सरकार ने मंदी से निपटने के जो 32 ऐलान अब तक किए हैं, वो अभी फ़ौरी राहत देने से ज़्यादा भविष्य की योजनाएं लग रहे हैं.
सुधार उसे कहते हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उस वक़्त के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक जुलाई 2017 को देश के सामने पेश किया था. जब मोदी और जेटली की जोड़ी ने देश में गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी लागू किया था और इसके ज़रिए कमोबेश सारे अप्रत्यक्ष करों को एक टैक्स के दायरे में ला दिया था.
इन क़दमों को आर्थिक सुधार की रफ़्तार बनाने वाला, आर्थिक सुधार के सिद्धांत को ही कमज़ोर करने वाला होगा. आर्थिक सुधार वो होते हैं, जो आज से क़रीब तीस साल पहले हुए थे. जब उस वक़्त के प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और उनके वित्त मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने किया था. वो भी तब जब भारत के ऊपर क़र्ज़ की किस्तें चुकाने का भारी दबाव था. तब नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंन ने 24 जुलाई 1991 को भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाज़े बाहरी दुनिया के लिए खोलने का एलान किया था. उस दिन औद्योगिक नीति पर बयान जारी किया गया था. सुधार उसे कहते हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उस वक़्त के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक जुलाई 2017 को देश के सामने पेश किया था. जब मोदी और जेटली की जोड़ी ने देश में गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी लागू किया था और इसके ज़रिए कमोबेश सारे अप्रत्यक्ष करों को एक टैक्स के दायरे में ला दिया था. इससे पहले 28 मई 2016 को इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड को लागू करना भी सुधार था. आप नई तकनीक की मदद से 28 अगस्त 2014 को लागू की गई जन धन योजना को भी आर्थिक सुधार कह सकते हैं. लेकिन, क़र्ज़ में रियायत, सेबी द्वारा 2014 की डिपॉसिटरी रसीदयोजना को लागू करना या फिर केवायसी के नियम को सरल बनाना एक प्रक्रिया का सरलीकरण हैं. और ये तो बहुत मामूली क़दम हैं. इन्हें सुधार तो नहीं कहा जा सकता.
303 सीटों वाला राजनीतिक जनादेश ऐसे अस्थायी बंदोबस्त और अर्थव्यवस्था की फौरी मरहम-पट्टी के लिए नहीं है. ये तो छोटे-मोटे प्रशासनिक उपाय हैं. ऐसे विशाल जनादेश से अपेक्षा यही है कि सरकार अर्थव्यवस्था के उन नासूरों को हटाए, जिनकी वजह से भारत की विकास दर पिछले सात दशकों से एक सीमित दायरे से बाहर नहीं हो पा रही है. इस जनादेश से ये उम्मीद की जाती है कि वो ऐसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं और नियम-क़ायदों को ऑपरेशन कर के व्यवस्था से हटा दे, जो विकास में बाधक बन रहे हैं. इस जनादेश की मांग यही होती है कि इसके माध्यम से चुनी गई सरकार हर क़ानून को नए सिरे से देखे, उसके बारे में सोचे और उन्हें नए तरीक़े से ऐसे नया रूप दे जिससे भारत के कारोबारियों और धनार्जन की ख़्वाहिश रखने वालों की राह की बाधाएं दूर हो जाएं. वो व्यवस्था के उस चंगुल से आज़ाद हो जाएं, जिनका कुछ भी दांव पर नहीं है, फिर भी उन्होंने तरक़्क़ी को अपने शिकंजे में क़ैद कर के रखा हुआ है. क्योंकि किसी आर्थिक संकट से न तो उनकी मोटी तनख़्वाहों पर असर पड़ता है, न ही उनसे उनके बड़े-बड़े बंगले छिनते हैं और न ही उनकी मुद्रास्फ़ीति के हिसाब से बढ़ने वाली पेंशन पर ही कोई फ़र्क़ पड़ता है. प्रशासनिक व्यवस्था के ऐसे अधिकारियों के हाथ में क़ानून के माध्यम से ऐसी शक्तियां दे दी गई हैं कि वो भारत की क़िस्मत की लाइफ़लाइन को अपने हाथों में जकड़े हुए हैं. क्योंकि इससे उनकी अपनी क़िस्मत और अपनी धन-संपत्ति पर कोई असर नहीं पड़ता है. जिस दर्द से देश गुज़रता है, वो उन्हें छू कर भी नहीं जाता, उसका असर होने की आशंका तो दूर की बात है.
इंस्पेक्टर राज के ये अधिकारी टैक्स, कारखानों, मज़दूरी, मज़दूर और संसाधनों से जुड़े नियमों की ऐसी दीवार खड़ी कर देते हैं कि लोगों की चुनी हुई आकांक्षाओं और प्रशासनिक तौर पर उनकी पूर्ति करने के लिए चुनी गई सरकार की राह बहुत मुश्किल हो जाती है. निष्क्रियता की एक मोटी सी दीवार, जो निजी हितों से पलती-पोसती रहती है, वो शासक वर्ग और शासित वर्ग को दो हिस्सों में बांट देती है. इन अधिकारियों को ज़िम्मेदारी तो देश की सेवा की मिली होती है, मगर ये काम इसके उलट ही करते हैं. भारत की आर्थिक विकास की रफ़्तार, आर्थिक आज़ादी और धनार्जन करने वाले लोग एक तरफ़ ख़राब क़ानून और अच्छी नौकरशाही और अच्छे क़ानून और बुरी नौकरशाही की इस खाई के बीच फंस कर रह जाते हैं. कुछ लोगों का किया हुआ नुक़सान, उन्हीं के साथियों के किए हुए भले कामों पर भारी पड़ जाता है. इस में कोई दो राय नहीं कि ये बुरा करने वाले नौकरशाही में बहुत कम हैं.
आज अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती कारोबारी तनातनी हमारे लिए सुनहरे मौक़े के तौर पर खड़ी है. पहले तो हम ने इस तनातनी को अस्थायी समझने की ग़लती की. और ये लगा कि ये कूटनीतिक सनक की एक मिसाल है.
आज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में आर्थिक नेतृत्व और नया विज़न देने वालों की कमी नहीं है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, वाणिज्य और रेलवे मंत्री पीयूष गोयल, सड़क और मध्यम व लघु उद्योग मंत्री नितिन गडकरी, जल संसाधन मंत्रालय (ये एक ऐसा नया मंत्रालय है जिसमें अगले कुछ वर्षों में आर्थिक विकास का अगुवा बनने की पूरी संभावनाएं हैं) के मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत उन लोगों में से हैं, जो इस सरकार को नया आर्थिक नेतृत्व देने में सक्षम हैं. न ही इस सरकार में इच्छा शक्ति की कमी है. जिस मज़बूत इच्छा शक्ति के माध्यम से इस सरकार ने दो लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों को हल करने की दिशा में क़दम बढ़ाया है, वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. पाकिस्तान के आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति का हिस्सा बना कर कश्मीर और भारत के दूसरे हिस्सों में बेगुनाहों को क़त्ल करने पर इस सरकार ने पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर बालाकोट में एयरस्ट्राइक कर के निर्णयात्मक रूप से प्रहार किया है. साथ ही संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाकर मोदी सरकार ने कश्मीर में पिछले 70 साल से चली आ रही संवैधानिक गतिरोध को समाप्त कर दिया. ये ऐसी राजनीतिक इच्छा शक्ति है, जो हमने पिछले कई दशकों में नहीं देखी थी.
इन क़दमों से हम ने इस सरकार के इरादों और बदलाव लाने के इरादों का तजुर्बा कर लिया है. ऐसे में हमारे ज़हन में सवाल ये है कि ये सरकार, ऐसे ही बड़े और दूरंदेशी भरे क़दम आर्थिक क्षेत्र में क्यों नहीं ले पा रही है ? हमें समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में पुराने पड़ चुके विचारों को आज़मा रही है और आर्थिक क्षेत्र में जोड़-घटाव से काम चला रही है. मसलन, अगर औद्योगिक घराने अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) नहीं निभाते हैं, तो उन्हें जेल भेजने का प्रावधान (हालांकि इस संशोधन की अधिसूचना नहीं जारी हुई है और न ही इसके जारी होने की संभावना है. लेकिन, ये अभी भी समझ से परे है कि ऐसा संशोधन कैसे हमारे क़ानून में शामिल ही किया गया?). आख़िर ये सरकार 1970 के दशक के क़ीमतें नियंत्रित करने की सोच को आज क्यों लागू कर रही है? जिस तरह मेडिकल उपकरणों और अब साफ़-सफ़ाई से जुड़े उत्पादों के मामले में ऐसा किया जा रहा है, वो समझ में नहीं आता. ये बात भी समझ में नहीं आती कि पहले वो आंत्रेप्रेन्योरशिप का गला सख़्त नियमों, जैसे बढ़े हुए टैक्स और 1970 के दशक की याद दिलाने वाले नियमों की रस्सी से घोंटने की कोशिश करते हैं. फिर उस में ढील देकर ये दावा करते हैं कि हम ने ये रियायत दे दी है. इससे तो ऐसा ही लगता है कि भले ही सियासी चेहरे बदल गए हों, मगर भारतीय प्रशासन का बुनियादी चरित्र वही का वही है. एक ऐसी सरकार, जिसने संपत्ति को सामाजिक रूप से नए सिरे से बांटने का साहस दिखाया है, वो, आज भारत में संपत्ति निर्माण की नई संरचना से विश्व को नई दिशा दे पाने में क्यों नाकाम है?
चलिए, एक बार को हम विचारधारा की अपनी घरेलू सीमाओं को परे रखते हैं. बाहर की तरफ़ देखते हैं. आज अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती कारोबारी तनातनी हमारे लिए सुनहरे मौक़े के तौर पर खड़ी है. पहले तो हम ने इस तनातनी को अस्थायी समझने की ग़लती की. और ये लगा कि ये कूटनीतिक सनक की एक मिसाल है. आज एक साल बाद ये दिख रहा है कि असल में ये कूटनीतिक सनक नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति है. अपने हालिया हमले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिकी कंपनियों को चीन के बाज़ार छोड़ देने का फ़रमान सुनाया है. ऐसे में इन अमेरिकी कंपनियों को लुभाने से भारत को कौन रोक रहा है भला? आख़िरकार जब टाटा मोटर्स ने सिंगूर में तृण-मूल कांग्रेस द्वारा आयोजित लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शन के चलते पश्चिम बंगाल के अपने प्लांट को बंद करने का फ़ैसला किया था, और जब कंपनी ने ये ऐलान किया कि वो प्लांट के लिए वैकल्पिक जगह तलाशेगी, तो उस वक़्त के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को टाटा मोटर्स के साथ प्लांट को गुजरात के साणंद में लगाने का समझौता करने में 100 घंटे से भी कम का वक़्त लगा था. इस प्लांट के गुजरात आने से गुजरात को नैनो कार का उत्पादन करने के साथ नौकरियों के अवसर भी मिले थे. और टाटा मोटर्स को अपने यहां प्लांट लगाने के लिए मनाने की रेस में गुजरात ने कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और ओडिशा को पराजित किया था. साणंद में टाटा मोटर्स का प्लांट लगने के बाद फोर्ड जैसी कंपनियों ने भी साणंद में अपने कारखाने लगाए थे.
आज नरेंद्र मोदी को उसी नीतिगत लचीलेपन और राजनीतिक उत्साह की ज़रूरत है, जो उन्होंने 2008 में गुजरात के लिए दिखाया था. उस उत्साह और नीतियों में बदलाव के लचीलेपन को आज मोदी को पूरे भारत पर लागू करने की ज़रूरत है.
आज नरेंद्र मोदी को उसी नीतिगत लचीलेपन और राजनीतिक उत्साह की ज़रूरत है, जो उन्होंने 2008 में गुजरात के लिए दिखाया था. उस उत्साह और नीतियों में बदलाव के लचीलेपन को आज मोदी को पूरे भारत पर लागू करने की ज़रूरत है. आज जब चीन छोड़ रहीं ज़्यादातर अमेरिकी कंपनियां वियतनाम का रुख़ कर रही हैं, तो मोदी को टाइम मशीन से पीछे जाकर उस गुजरात के उसी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलना चाहिए और आर्थिक नुस्खों की सीख लेनी चाहिए. ताकि वो दुनिया की बड़ी कंपनियों और औद्योगिक घरानों को स्वागत करने वाली नीतियों, आसानी से ज़मीन ख़रीदने की सुविधाओं और औद्योगिक नीतियों में और लचीलापन लाकर भारत आने के लिए लुभाने की कोशिश करनी चाहिए. आज देश के कई बड़े राज्यों में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में मोदी के लिए इन राज्यों को नीतियां बदल कर बड़ी कंपनियों को अपने यहां आमंत्रित करने के लिए राज़ी करने में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए. एक बार अगर राजनीतिक बाधाओं को दूर कर लिया जाता है, तो हम उसी विदेश की बड़ी कंपनियों को आमंत्रित करने में वही उत्साह देखने को पा सकते हैं, जो बालाकोट एयरस्ट्राइक और अनुच्छेद 370 हटाने में हमें दिखा था. जैसे ही बड़ी, मल्टीनेशनल कंपनियां भारत में दाख़िल होती हैं, तो भारतीय कंपनियां भी उनके रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगी. इससे ये होगा कि रोज़गार सृजन की जिस सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती का हम आज आज सामना कर रहे हैं, वो दोबारा शुरू हो सकेगा. इसके बाद दुनिया की बड़ी कंपनियों की भारत के विकास में हिस्सेदारी होगी. आर्थिक रूप से भारत और समृद्ध भी होगा और सुरक्षित भी होगा. और ये लाभ वक़्ती नहीं, लंबे समय के लिए होगा. लोगों को रोज़गार मिलेगा. देश की समृद्धि बढ़ेगी. आगे चल कर भारत दुनिया की विशाल कंपनियों के लिए निवेश की पहली पसंद बन सकेगा.
जोड़-घटाव और मरहम-पट्टी का वक़्त ख़त्म हो चुका है. आज सुरक्षा के मामले में भारत ने जोखिम लेने से मिलने वाली क़ामयाबी का स्वाद चख लिया है. आज देश को ये मालूम है कि इसकी सरकार, मौजूदा आलस्य को छोड़कर ऐसे तेज़-तर्रार क़दम उठा सकती है, जो मतदाताओं की आशाओं-आकांक्षाओं को पूरा कर सके. दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर में आ रही कमी की वजह से आज भारतीयों की अपेक्षाएं आर्थिक तरक़्क़ी और रोज़गार पर निर्भर हैं. इसके लिए भारत को घरेलू और विदेशी निजी क्षेत्र के भारी निवेश की ज़रूरत है.
और ये लक्ष्य पूरा करने के लिए आज देश को नरेंद्र, ‘सिंगुर से साणंद’ मोदी के दोबारा आगमन की आवश्यकता है.
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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