ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन यूरोपीय संघ के लिए एक साझेदार से बढ़कर अब एक व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी बन गया है.
इस साल 16 सितंबर को यूरोपीय संसद के एक अधिवेशन में दिए गए अपने पहले संबोधन में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने अब तक जग-ज़ाहिर हो चुके एक सूत्र को दोहराते हुए कहा कि यूरोपीय संघ चीन को एक “साझेदार, एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी और एक सर्वांगी प्रतिद्वंद्वी” के रूप में देखता है.
लेयेन ने स्वीकार किया कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के हित समान थे, लेकिन यूरोपीय कंपनियों की बाज़ार तक पहुंच से संबंधित प्रमुख मसलों पर दोनों पक्षों को मिलकर और अधिक काम करने की ज़रूरत थी. उन्होंने ख़ासतौर पर इस बात का ज़िक्र किया कि यूरोपीय संघ “लोकतंत्र के सार्वभौमिक मूल्यों और वैयक्तिक अधिकारों” में निष्ठा रखता है और उनपर पूरी तरह विश्वास करता है. यही वजह है कि उन्होंने इस बात की घोषणा की कि यूरोपीय संघ, हांगकांग में मानवाधिकारों के हनन, या चीन द्वारा वीगर समुदाय पर किए जा रहे अत्याचार के मामले में ज़रूरी “सवाल-जवाब” करेगा.
दुनियाभर में फैली कोविड-19 की महामारी ने विश्व व्यवस्था में ऐसे फेरबदल किए हैं, जो नकारात्मक भी हैं और कुछ हद तक सकारात्मक भी. इन बदलावों ने विश्व की राजनीति को नया आकार देने और एक नई व्यवस्था की संरचना में अहम भूमिका निभाई है.
जो बात और भी अधिक महत्वपूर्ण थी वह यह कि यूरोपीय संघ की संसद, यूरोपीय मैग्निट्स्की अधिनियम (European Magnitsky Act) के साथ आगे आएगी. इससे पहले लागू किया गया, साल 2012 का मूल अमेरिकी क़ानून उन रूसी अधिकारियों के लिए था, जो मॉस्को के एक जेल में रूसी वकील सर्गेई मैग्निट्स्की की मौत के लिए ज़िम्मेदार थे. यूरोपीय संघ अगर अमेरिकी मॉडल का पालन करता है, तो यह कानून व्यैक्तिक स्तर पर अपराध करने वालों पर लक्षित होगा और इसके तहत, उनकी संपत्ति को ज़ब्त कर, उनका इन देशों में आना-जाना प्रतिबंधित कर दिया जाएगा. यूरोपीय संघ का यह नया रुख इस बात की ओर इशारा करता है कि वो बीजिंग को यह बताना चाहता है कि चीन के बाज़ारों में पैठ बनाना यूरोपीय संघ का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, लेकिन यह मानवाधिकारों को लेकर चीन पर उठ रहे सवालों को नज़रअंदाज़ करने और इसके संबंध में सुस्थापित चिंताओं को दरकिनार करने, की कीमत पर नहीं होगा.
दुनियाभर में फैली कोविड-19 की महामारी ने विश्व व्यवस्था में ऐसे फेरबदल किए हैं, जो नकारात्मक भी हैं और कुछ हद तक सकारात्मक भी. इन बदलावों ने विश्व की राजनीति को नया आकार देने और एक नई व्यवस्था की संरचना में अहम भूमिका निभाई है. पिछले कई महीनों में हमने कोविड1-19 से निपटने की प्रक्रिया को लेकर यूरोपीय संघ और चीन के बीच लगातार मनमुटाव, मतभेद और घर्षण देखा है. साथ ही हांगकांग और शिंजियांग प्रांत में चीन की कार्रवाई से भी नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ और सवाल पैदा हुए हैं. इसके अलावा चीन द्वारा यूरोपीय कंपनियों को समान अवसर न दिए जाने और उनके लिए व्यापार को कठिन बनाने को लेकर भी यूरोपीय संघ में अप्रसन्नता रही है. यूरोपीय कंपनियों को ख़रीद कर उनकी प्रौद्योगिकी को चीन से बाहर करने और पारस्परिक रूप से चीनी कंपनियों पर यही नियम न लागू करने के चीनी सरकार के फैसले, लंबे से यूरोपीय संघ को असहज बना रहे हैं.
यूरोप, चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना का अंतिम गंतव्य है. यूरोपीय निवेश और औद्योगिक निर्यात ने चीन को विनिर्माण का गढ़ बनने में मदद की है. बीजिंग अब उम्मीद करता है कि प्रौद्योगिकी के अलावा, यूरोप एक बाज़ार के रूप में भी, उच्च गुणवत्ता वाले चीनी सामान को अपनाएगा. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बीजिंग कई क्षेत्रों में यूरोप को पूरक बनाने के बजाय, अपना लाभ उस पर लादना चाहता है. यूरोपीय संघ को लगता है कि चीन की ये कार्रवाई परस्पर और समान संबंधो पर न टिकी होकर, यूरोपीय संघ को दबाने की मंशा रखती है. साथ ही यूरोपीय कंपनियों के लिए चीन में व्यापार करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
यूरोप, चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना का अंतिम गंतव्य है. यूरोपीय निवेश और औद्योगिक निर्यात ने चीन को विनिर्माण का गढ़ बनने में मदद की है. बीजिंग अब उम्मीद करता है कि प्रौद्योगिकी के अलावा, यूरोप एक बाज़ार के रूप में भी, उच्च गुणवत्ता वाले चीनी सामान को अपनाएगा.
यूरोपीय संघ में चीन का प्रभुत्व कायम करने के लिए, चीन और मध्य यूरोप व पूर्वी यूरोप के देशों (CEEC) के 17 + 1 समूहों के साथ चीन की सामूहिक व्यवस्था ने भी कुछ असहजता और अलगाव पैदा किया है. सदस्य राज्य इस बात को लेकर नाराज़ हैं कि व्यापार और निवेश के मामले में चीन का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. इसके अलावा, अमेरिका ने हुवावे (Huawei) और 5-जी (5G) के मद्देनज़र अलग-अलग राज्यों पर खासा राजनीतिक दबाव डाला है.
हालांकि, इस तरह की सुगबुगाहट पिछले कुछ वर्षों से लगातार सुनाई दे रही है. मार्च 2019 में, राष्ट्रपति मैक्रॉन ने घोषणा की थी कि “चीन को लेकर यूरोप का भोलापन अब अपने अंतिम दौर में है.” वह शी जिनपिंग और यूरोप के तीन शीर्ष नेताओं- जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल, यूरोपीय आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष जीन-क्लॉड जुनकर और स्वंय अपने द्वारा, पेरिस शिखर सम्मेलन की सह-मेज़बानी से ठीक पहले बोल रहे थे.
इस साल, इन संबंधों में महामारी से हुए नुकसान और हांगकांग व शिंजियांग प्रांत में चीनी कार्रवाई के कारण और अधिक गिरावट आई है. अब ऐसा प्रतीत होता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह मंथन, अपने अंतिम नतीजों में, चीन की हार और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों के एक नए रूप को जन्म दे सकता है. आंकड़ों को बारीकी से देखें तो वस्तुओं और सेवाओं (goods and services) को लेकर ट्रांस-अटलांटिक व्यापार, 1.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का रहा है, वहीं यूरोपीय संघ और चीन के बीच का व्यापार 718 बिलियन डॉलर का रहा है. इसके अलावा, दोनों क्षेत्रों के बीच सेवाओं का व्यापार भी बेहतर गति से बढ़ रहा है. वहीं, एक मुद्दा निवेश का भी है. अमेरिका और यूरोपीय संघ एक दूसरे के लिए विदेशी निवेश (FDI) का प्राथमिक स्रोत और गंतव्य रहे हैं, जो फिलहाल 6.2 ट्रिलियन डॉलर पर टिका है. यूरोप में अमेरिकी निवेश बाहरी क्षेत्रों में किए गए अमेरिकी निवेश का कुल 60 प्रतिशत के लगभग है, वहीं अमेरिका में किया गया यूरोपीय निवेश लगभग 68 प्रतिशत तक है. इस सब की तुलना में, चीन का यूरोपीय संघ में निवेश, एफडीआई के कुल स्टॉक का केवल तीन प्रतिशत ही बनाता है.
बीजिंग, अमेरिका के साथ अपनी समस्याओं को हल करने के लिए, यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों को सुधारने के सोचे-समझे प्रयास कर रहा है. हालांकि, इस मसले को लेकर, हाल फिलहाल में वरिष्ठ चीनी नेताओं के इस क्षेत्र में किए गए दौरों का अकलन करें, तो परिणाम कुछ खास नहीं नज़र आते.
बीजिंग, अमेरिका के साथ अपनी समस्याओं को हल करने के लिए, यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों को सुधारने के सोचे-समझे प्रयास कर रहा है. हालांकि, इस मसले को लेकर, हाल फिलहाल में वरिष्ठ चीनी नेताओं के इस क्षेत्र में किए गए दौरों का अकलन करें, तो परिणाम कुछ खास नहीं नज़र आते. अगस्त के अंतिम सप्ताह में, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे, फ्रांस और जर्मनी का भी दौरा किया. महामारी के बाद यह इस क्षेत्र में उनकी पहली यात्रा थी और यह, हांगकांग, शिंजियांग और कोविड-19 से निपटने के मुद्दे पर चीन को लेकर की गई यूरोपीय जांच-पड़ताल के बाद की गई थी.
वांग, शायद यह संदेश देना चाहते थे कि चीन ने महामारी पर सफलतापूर्वक काबू पा लिया है, उसकी अर्थव्यवस्था अब बेहतर हो गई है, और चीन आर्थिक रूप से यूरोप को दोबारा पटरी पर लाने को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. लेकिन इस यात्रा का नतीजा विशेष रूप से सकारात्मक नहीं रहा. यूरोपीय संघ के लगभग सभी वार्ताकारों ने यूरोप में पैदा हो रहे मज़बूत जनमत को सामने रखते हुए, हांगकांग और वीगर समुदाय पर चीन की ज्यादतियों का मुद्दा उठाया. इस सबके बीच चीनी विदेश मंत्री वांग यी, चेक गणराज्य के साथ नोंकझोक में भी उलझ गए, जब चेक गणराज्य की सीनेट के अध्यक्ष माइलोस विस्ट्रसिल की ताइवान यात्रा को लेकर, चीन की आलोचना दुर्व्यवहार और अपशब्दों के उपयोग तक पहुंच गई.
चीन पर यूरोप का रुख लगातार तीखा हो रहा है और मुखर रूप में सामने आ रहा है. यूरोपीय संघ के शीर्ष विदेश नीति अधिकारी जोसेफ बोरेल ने हाल ही में चीन की बढ़ती अधिनायकवादी प्रवृत्तियों और विश्व व्यवस्था को लेकर चीन के दृष्टिकोण की आलोचना की थी. उन्होंने कहा था कि चीन लगातार राजनीतिक और नागरिक अधिकारों के बजाय, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को प्राथमिकता दे रहा है. इसके संबंध में उन्होंने यह भी कहा कि वह चीन के साथ यूरोपीय संघ के संबंधों में, गंभीर असंतुलन देखते हैं, विशेष रूप से यूरोपीय व्यवसायों की बाज़ार तक पहुंच में लागू की गई असमानता, जो स्पष्ट रूप से सामने आ रही है. राष्ट्रपति वॉन लेयेन ने भी इस बात को दोहराया था.
चीन और यूरोपीय संघ के बीच जो हो रहा उसका एक बड़ा हिस्सा, बीजिंग और बर्लिन के बीच होने वाली घटनाओं का नतीजा है. पर्यवेक्षक लगातार इस ओर इशारा कर रहे हैं कि चीन और जर्मनी के बीच संबंधों में भी लगातार दूरी आ रही है. यह बात, जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल द्वारा यूरोपीय संघ और चीन के बीच वर्चुअल रूप से आयोजित किए गए शिखर सम्मेलन की मेज़बानी के दौरान भी सामने आई. मर्केल वर्तमान में यूरोपीय संघ के अध्यक्ष पद पर हैं, और नीतिगत रूप से चीन को जर्मनी के करीब रखने की हिमायती रही हैं. उम्मीद की जा रही थी कि यह शिखर सम्मेलन, निवेश के लिए व्यापक समझौते (सीएआई) के लिए एक रोडमैप तैयार करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वास्तव में न सीएआई पर कोई बातचीन हुई और न ही, जलवायु परिवर्तन, कोविड-19 संबंधी सहयोग या समान मानकों से जुड़ी, जर्मनी की मांगों पर भी कोई समझौता हो पाया.
इसका परिणाम काफी विपरीत रहा, जिसके चलते किसी भी एक दिशा में लक्षित होकर काम करने को लेकर कोई रणनीति नहीं बन पाई. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा एक “व्यापक रणनीतिक साझेदारी” का आह्वान किए जाने पर, चीन में हुए मानवाधिकारों के हनन पर यूरोपीय गुस्सा एक बार फिर सामने आया. यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष वॉन लेयन ने अपने बयान में ख़ासतौर पर हांगकांग और शिंजियांग प्रांत में घटी घटनाओं और मुद्दों को उठाया.
ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन यूरोपीय संघ के लिए एक साझेदार से बढ़कर अब एक व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी बन गया है. साल 2008-2009 के उलट, इस बार, जर्मनी को चीन में उस तरह की तवज्जो नहीं मिल रही है, जो पहले मिली थी. यह सिर्फ इसलिए नहीं है, कि चीनी लोग अब जर्मनी का माल नहीं ख़रीद नहीं रहे हैं, बल्कि इसलिए भी है कि चीनी कंपनियों ने अलग-अलग देशों के माल को चीनी माल से प्रतिस्थापित कर दिया है, और यह उच्च तकनीक वाली औद्योगिक मशीनों जैसे टनल बोरिंग मशीन, विंड टर्बाइन, इलेक्ट्रिकल बैटरी आदि के वर्ग में हो रहा है. जर्मनी के लोग अब चीन के इस रवैये की ताप महसूस कर रहे हैं.
चीन और यूरोपीय संघ के बीच जो हो रहा उसका एक बड़ा हिस्सा, बीजिंग और बर्लिन के बीच होने वाली घटनाओं का नतीजा है. पर्यवेक्षक लगातार इस ओर इशारा कर रहे हैं कि चीन और जर्मनी के बीच संबंधों में भी लगातार दूरी आ रही है.
जर्मन उत्पादों के लिए चीन एक महत्वपूर्ण बाज़ार बना हुआ है, और वोक्सवैगन (Volkswagen) और बीएएसएफ (BASF) जैसी महत्वपूर्ण जर्मन कंपनियों का वहां बड़ा निवेश है. हालाँकि चीन की गतिविधियों ने, समायोजन में विश्वास रखने वाले मर्केल प्रशासन को भी अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया है.
इस सबके बीच एक ऐसा घटनाक्रम भी हुआ है जो बीजिंग के लिए विशेष रूप से सहज नहीं हो सकता. वांग के दौरे के बीच में, जर्मनी ने अपनी पहली हिंद-प्रशांत रणनीति को आकार देने के लिए नीतिगत दिशानिर्देश जारी किए. जर्मन सरकार द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, कि दस्तावेज़ का उद्देश्य, “हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने में सक्रिय योगदान से जुड़ा” था. हिंद-प्रशांत क्षेत्र की जर्मन परिभाषा, भारतीय परिभाषा के समान है, जिसमें संपूर्ण भारतीय और प्रशांत महासागर शामिल है. इस रणनीति में जलवायु परिवर्तन और समुद्री प्रदूषण जैसे मुद्दों को संदर्भित किया गया है, और साथ ही कानून और मानवाधिकारों के शासन को मज़बूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है.
दिशानिर्देशों के साथ जारी किए गए एक बयान में, विदेश मंत्री हेइको मास ने कहा कि हालांकि हिमालय और मलक्का जलडमरूमध्य बहुत दूर लग रहे थे, “लेकिन आने वाले दशकों में हमारी समृद्धि और हमारे भू-राजनीतिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे, कि हम हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ कैसे काम करते हैं.” गौरतलब है कि जर्मनी, विश्व में उभरती नई व्यवस्था को आकार देना चाहता है, “ताकि यह नियमों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित हो, न कि कौन अधिक मज़बूत और प्रभुत्वशाली है इस आधार पर.”
जर्मनी और यूरोपीय संघ, क्वाड (Quad) में हिस्सा लेते हुए, बीजिंग के ख़िलाफ़ अमेरिका के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. जर्मनी की नीति, जापान और दक्षिण कोरिया और यहां तक कि भारत से प्रेरित लगती है. यह नीति अनिवार्य रूप से फ्रांसीसी नीति का अनुपालन करती है, जिसे दो साल पहले जारी किया गया था और जो विश्व की बहु-ध्रुवीयता पर ज़ोर देती है. जर्मनी और फ्रांस अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर यूरोपीय संघ की एक आम रणनीति की ओर काम कर रहे हैं.
ऐसे परिदृश्य में, जर्मनी की स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक जुलाई से, जर्मनी ने यूरोपीय संघ परिषद की छह महीने की बारी-बारी से मिलने वाली अध्यक्षता स्वीकार की है. इससे जर्मनी, यूरोपीय संघ की हिंद-प्रशांत नीति को आकार देने की प्रबल स्थिति में होगा. लेकिन यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ-साथ फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय संघ के राज्यों से आने वाले बयानों को देखते हुए, हम जल्द ही अन्य यूरोपीय देशों को भी न केवल हिंद-प्रशांत क्षेत्र, बल्कि चीन और अमेरिका को लेकर भी एक मज़बूत और नई यूरोपीय संघ की नीति के तहत, एकजुट होते देख सकते हैं.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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