Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 03, 2023 Updated 25 Days ago

पाकिस्तान में हो रहे घटनाक्रमों को लेकर दक्षिण एशियाई देशों में जनता ने अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दी हैं.

लोकतंत्र और तानाशाही: पाकिस्तान में उत्पन्न संकट को लेकर दक्षिण एशिया की प्रतिक्रिया

यह लेख हमारी सीरीज़, पाकिस्तान: दि अनरैवेलिंग  का ही एक भाग है.


पाकिस्तान गृहयुद्ध के कगार पर खड़ा है. सैन्य प्रतिष्ठान और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की आपसी लड़ाई अब देश के भीतर दरारें पैदा कर रही है. सेना हर हाल में सत्ता पर कब्ज़ा जमाए रखना चाहती है, पर उसकी वैधता और लोकप्रियता वैसी नहीं रही जैसी पहले कभी हुआ करती थी. प्रोजेक्ट इमरान को ख़त्म करने और उनकी पार्टी (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ) को ग़ैर-कानूनी घोषित करने की उनकी कोशिशों के चलते देश को सुरक्षा, आर्थिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर एक जटिल समस्या का सामना करना पड़ रहा है. दक्षिण एशियाई देशों की जनता इन घटनाक्रमों को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रही है.

मालूम पड़ता है कि श्रीलंका में इमरान खान के पक्ष में ज्य़ादा लोग हैं. यहां इमरान खान की छवि एक ऐसे साहसी नेता की है, जो राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठा रहा है और व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है.


मालूम पड़ता है कि श्रीलंका में इमरान खान के पक्ष में ज्य़ादा लोग हैं. यहां इमरान खान की छवि एक ऐसे साहसी नेता की है, जो राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठा रहा है और व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है और इसके लिए वह व्यवस्था के पक्ष में खड़े ताकतवर राज्यों का सामना कर रहा है. उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जा रहा है, जो देश को सेना के राजनीतिक दखल से आज़ाद कराने की कोशिश कर रहा है जबकि सेना अध्यक्ष लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं. देश की न्याय व्यवस्था को भी लोकतंत्र के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है. ऐसी धारणा बनी हुई है कि इमरान खान की रिहाई देश में शांति और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष समाधान को बढ़ावा देगी.

ऐसी सकारात्मक धारणा की वजह यह हो सकती है कि दोनों देश एक जैसी समस्याओं के परिणाम भुगत रहे हैं. एक लेख के अनुसार, भ्रष्टाचार के जिन आरोपों के चलते इमरान खान की गिरफ़्तारी की गई है, वे श्रीलंकाई राजनेताओं के भ्रष्टाचार की तुलना में कुछ भी नहीं हैं. सेना के प्रति संदेह और नकारात्मक धारणा भी इसलिए है क्योंकि श्रीलंकाई सेना देश की राजनीति और नागरिक प्रशासन के बेहद महत्त्वपूर्ण पदों पर काबिज है. जनता को भी लगता है कि देश में शायद सैन्य तख्तापलट हो सकता है. अरगालय आंदोलन को दबाने और धमकाने में श्रीलंकाई सेना की भूमिका ने इस संस्था के खिलाफ़ भावनाओं को और ज्यादा भड़काने का काम किया है. शायद इन्हीं कारणों से लोगों के मन में इमरान खान और लोकतंत्र के लिए सहानुभूति पैदा हुई हो.

इतिहास का असर


बांग्लादेश में, लोग अगर इमरान खान के पक्ष में नहीं भी हैं, तो भी मज़बूती से लोकतंत्र के पक्ष में हैं. पाकिस्तान के संकट को लेकर बांग्लादेश की धारणा ऐतिहासिक घटनाओं और उसकी अपनी विरासत से ज्य़ादा से ज्यादा प्रभावित है. ऐसी धारणा है कि मौजूदा संकट उस ऐतिहासिक भूल का परिणाम है जब 1970 के दशक में सेना ने आवामी लीग को सरकार बनाने से रोक दिया था और पाकिस्तान ने एक स्थापित लोकतंत्र होने का अवसर खो दिया था. सेना की आलोचना इस बात को लेकर की जाती रही है कि वह राजनीति से दूर रहने की बजाय नागरिक सरकार के शासन में दखल देती रही है. और देश में इमरान खान की छवि एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने सेना के दखल वाली राजनीतिक व्यवस्था को हिला कर रख दिया है. जबकि लोग राजनीति में सेना के दखल से डरने लगे हैं, ऐसे में इमरान खान को राहत देने के लिए न्यायलय की सराहना की जा रही है. बांग्लादेश में, लोग इस बात को लेकर आशावान हैं कि चुनाव के ज़रिए पाकिस्तान में आर्थिक और लोकतांत्रिक मोर्चे पर सामान्य स्थिति की बहाली की जा सकेगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सेना का दखल समाप्त हो जाएगा.

ऐसा लगता है कि मालदीव, नेपाल और भूटान में इस संकट को लेकर कोई मीडिया कवरेज नहीं की गई है. नेपाल और भूटान में सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी लोकतंत्र के बारे में नकारात्मक धारणा बनी हुई है.


ऐसा लगता है कि मालदीव, नेपाल और भूटान में इस संकट को लेकर कोई मीडिया कवरेज नहीं की गई है. नेपाल और भूटान में सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी लोकतंत्र के बारे में नकारात्मक धारणा बनी हुई है. नेपाल में, कुछ लोगों का कहना है कि इमरान खान को ज़मानत देकर न्यायालय अभिजात्य वर्ग द्वारा किए नुकसान की भरपाई करने का प्रयास कर रही है. भूटान में, एक नामी पत्रकार ने पाकिस्तान की भारत के साथ तुलना करते हुए तर्क दिया है कि पाकिस्तानी लोकतंत्र में नेहरू जैसे मज़बूत संस्थापक नेताओं के अभाव ने मौजूदा संकट को बढ़ावा दिया है. आश्चर्यजनक रूप से, इन देशों की मुख्यधारा की मीडिया ने इस संकट को अनदेखा किया है.

इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक तो ये है कि दक्षिण एशियाई देशों में से किसी ने भी आतंकवाद और परमाणु प्रसार के मुद्दे पर चिंता नहीं जताई है. इसका एक कारण यह हो सकता है कि उन्हें ऐसा लगता है कि शासन में परिवर्तन के बावजूद ये समस्याएं बनी रहेंगी. अगर ऐसा है तो ऐसा लगता है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान को लेकर कोई सकारात्मक उम्मीद नहीं बची है. ऐसे में, पाकिस्तान (जो कभी संशोधनवादी रहा है) एक टूटे हुए और अलग-थलग पड़े हुए देश की स्थिति से कभी बाहर नहीं निकल पाएगा.

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